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Magazine - Year 1991 - Version 2

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मन को निग्रहीत कर तन्मय किया जाय।

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हमारा मस्तिष्क एक उर्वर उद्यान है। उसमें जो कुछ बोया जाता है वही उगता और फलता फूलता है। विचार ही वह बीज है जो बोये जाने पर उगे बिना नहीं रहते। यह उगना मात्र दर्शनीय बनकर नहीं रहता, वरन् उसके प्रतिफल भी समयानुसार सामने आते हैं।

समझा जाता है कि कर्म का प्रतिफल मिलता है। जो जैसा करता है वैसा भरता है। जो बोया गया है वही काटा जाता है, इस कथन में इतना और जोड़ा जाना चाहिए कि जो सोचा जाता है, वह कालान्तर में किया भी जाता है। मस्तिष्क में अनगढ़ विचार आते रहते हैं। ऐसी कल्पनायें उठती रहती हैं, जिनका न सिर होता है न पाँव। कितने ही व्यक्ति बिना पंख की रंगीली कल्पनाओं में उड़ते रहते हैं। कुछ का चिन्तन ऐसा होता है, परिस्थितियों के साथ कोई तालमेल नहीं बैठता। कई पिछली घटनाओं का स्मरण करते रहते हैं। जो बीत गया उसे ताजा करके गड़े मुर्दे उखाड़ने की कहावत चरितार्थ करते रहते हैं। कुछ की आदत भविष्य के सपने देखने की होती है, वे मात्र सुखद कल्पनाओं में डूबे रहते हैं और सहज सफलताओं के उपलब्ध होने की कल्पना करते रहते हैं। कइयों का चिन्तन इसके प्रतिकूल होता है। वे अनिष्ट की आशंका का भयावह चित्र खड़ा करते हैं। उन्हें लगता है मानो कोई विपत्ति का पहाड़ सिर पर टूटने वाला है। किसी व्यक्ति के द्वारा कष्ट या हानि पहुँचाये जाने की कुकल्पना उमड़ती घुमड़ती रहती है। यह विचार प्रक्रिया होती तो काल्पनिक है, पर उसकी प्रतिक्रिया समूचे मनः क्षेत्र को हड़बड़ा देती है। उद्विग्न मन उस योग्य नहीं रहता कि विचारों का विश्लेषण कर सके और उनमें से संभाव्य और असंभव का वर्गीकरण कर सके। यह न बन पड़ने पर मधुर कल्पनायें एक प्रकार के सुख और दुःखद संभावनायें दूसरे प्रकार के दिवास्वप्न विनिर्मित करती है। त्यों यह काल्पनिक संरचनायें निरर्थक और निराधार होती हैं तो भी उनका प्रभाव उत्पन्न हुए बिना नहीं रहता।

कामुकता के अश्लील विचार इतने आकर्षक और उत्तेजक होते हैं कि उनमें उलझा हुआ मन किसी उपयोगी, वास्तविक चिन्तन पर चित्त एकाग्र करने में असमर्थ हो जाता है। इस प्रकार के विचारों में निमग्न विद्यार्थी अक्सर परीक्षा में फेल होते रहते हैं। पाठ्यक्रम पर पाठ्य पुस्तकों पर चित्त एकाग्र ही नहीं होता। कुकल्पनायें उसे उड़ाये-उड़ाये फिरती हैं। फलतः वे योजनायें पीछे हट जाती हैं, जिन पर योजनाबद्ध ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी।

जो विचारों का महत्व नहीं समझते, वे उन्हें किसी भी दशा में उड़ते रहने की छूट दे देते हैं। यह उच्छृंखलता बाद में स्वभाव बन जाती है। अनगढ़ सपने रात में ही नहीं, दिन में भी देखते रहते हैं। उनमें से जो मधुर होते हैं लिप्सा, लालसा के साथ जुड़े होते हैं, शेखचिल्ली का उदाहरण बनते हैं और मन के मोदक खाते रहते हैं। जिन्हें अनिष्ट की आशंका घेरती है, वे हानियों, आक्रमणों, बीमारियों, ग्रह नक्षत्रों द्वारा उत्पन्न की जाने की विभीषिकाओं के डरावने दृश्य रचते और उन्हें वास्तविकता की तरह अनुभव करते, डरते, काँपते हैं। खाली दिमाग को शैतान की दुकान कहा गया है। मन खाली नहीं बैठ सकता। अवकाश के क्षण में वह ऐसी ही उड़ाने उड़ता रहता है, जिनमें हर्षातिरेक या भयावह संभाव्य के रंग-बिरंगे चित्र सामने आते रहते हैं यह नशेबाजी जैसी मनःस्थिति है, इसमें उद्विग्नता का ही आवेश भरा दौर चढ़ा रहता है।

छुट्टल मन उस घोड़े के समान है, जिस पर लगाम नहीं चढ़ाई गई। वह किसी भी दिशा में छलाँगे लगा सकता है। इसमें घोड़ा थकता है, ठोकरें खाता है। साथ ही सवार को भी किसी खाई-खन्दक में गिरा सकता है। अव्यवस्थित कल्पनायें करते रहने वाला एक प्रकार से विक्षिप्त, सनकी बन जाता है। ऐसी मानसिक अराजकता बहुमूल्य सम्पदा को बरबाद कर देती है, जिसे योजनाबद्ध रूप से किन्हीं सदुद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया गया होता, तो उसका उपलब्धियों से भरा-पूरा सत्परिणाम सामने आता।

बुद्धिजीवी यशस्वी होते हैं और साथ ही, अनेक उपलब्धियाँ, विभूतियाँ अर्जित करते हैं। इनकी प्रमुख विशेषता एक ही होती है कि वे मन को उद्धत उड़ानों में उड़ने न देने की सुव्यवस्था बनाते हैं, मनोयोग साधते हैं। अभीष्ट का निर्धारण करते हैं और उस पर गंभीरता भरी एकाग्रता का अभ्यास करते हैं। अर्जुन के मत्स्यवेध की कथा जिन्हें विदित है, वे जानते हैं कि एकाग्रता और सफलता का कितना घना संबंध है।

वास्तुशिल्पी विशालकाय भवन बना कर खड़ा करते हैं, पर इससे पूर्व उसकी समग्र कल्पना उनके मस्तिष्क में उतरती है, कागज पर नक्शा बनता है या छोटा मॉडल विनिर्मित होता है। यह मात्र मानसिक परिश्रम है। इसके सही बन जाने पर आधे उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है, फिर साधन और श्रमिक जुटाने की धन साध्य व्यवस्था बनाना मात्र ही शेष रह जाता है। यदि नक्शा सही न बन सके, तो समस्त साधन उपलब्ध होते हुए भी निर्माण में भूल होती रहेगी और जब बन कर खड़ा होगा, तब कुरूप होगा। कल्पना कर्म का पूर्व रूप है। यदि सही विषय की सही कल्पना कर सकना बन पड़ा, तो समझना चाहिए कि कार्य का पूर्वार्ध पूरा हो गया। कलाकार, साहित्यकार,वैज्ञानिक अपने-अपने कार्य का पूर्व ढांचा खड़ा करने में ही अपनी समूची कल्पनाशक्ति को नियोजित करते हैं। उसके समग्र सम्पन्न हो जाने पर संरचना का प्रत्यक्ष ढाँचा खड़ा होने में कोई कठिनाई नहीं रहती है। तब मात्र श्रम करना,साधन जुटाना शेष रह जाता है।

छोटे बड़े सभी कार्यों में कृत्य की रूपरेखा सही कल्पना के माध्यम से ही खड़ी करनी पड़ी है। यह उन्हीं के लिए शक्य है, जो मन को अनगढ़ उड़ाने उड़ने से रोकने का अभ्यास कर लेते हैं। इसी को मनोनिग्रह या चित्तवृत्तियों का विरोध कहा गया है। इसी को अध्यात्म की भाषा में योग कहते हैं। योग का तात्पर्य है मानसिक क्षमता को अभीष्ट प्रयोजन में समग्र रूप से तल्लीन करने की क्षमता। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे करतल गत कर लेने पर महान् मानसिक क्षमता का उच्चस्तरीय सदुपयोग बन पड़ता है और ऐसी सफलताओं का संयोग हस्तगत होता रहता है, जिन्हें सराहा और श्रेय दिया जा सके।

क्रिया का कितना ही महत्व क्यों न हो पर वह होती प्रत्यक्ष एवं दृश्य रूप ही है। उसका पूर्व ढाँचा मनःसंस्थान के क्षेत्र में ही विनिर्मित होता है। विचार ही उनका ताना-बाना बुनते हैं और कार्यान्वित भी वही करते हैं।

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