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Magazine - Year 1991 - Version 2

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योगी कर्म का भाष्यकार बना

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“वत्स! कर्म ही गुरु है। कर्म ही महान है। कर्म ही ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति-स्थिति का हेतु है।”कर्म मीमाँसा के आचार्य शायद कुछ और कहते, किन्तु उन्होंने देख लिया कि उनका शिष्य इस समय कुछ अधिक सुनने की स्थिति में नहीं है। वह अन्तर्मुखी न भी हुआ हो, उसके नेत्र यज्ञ कुण्ड से उठते सुगन्धित धुएँ पर टिक गए हैं। जैसे वह इन धुएँ की कुण्डलियों में अपने सवाल का हल ढूंढ़ने लगा हो।

इधर वह काफी अन्तर्मुखी रहने लगा था। आज कई दिनों बाद गुरु चरणों के पास बैठा है, किन्तु इस समय उसकी नजर हवन कुण्ड से उठ रही यज्ञ-धूम पर टिकी है।

“आहुति रूप कर्म का वेग धूम्र-कुण्डलियाँ उठाता है और इनसे कुछ आकृतियाँ बनती हैं।” वह अपने आप कुछ कह चला- क्या स्थिरता है- कर्म के परिणाम में। तब कर्म और जीवन का सम्बन्ध? कर्म जीवन के लिए है या जीवन कर्म के लिए? कौन किसका प्रयोजन साधता है?

“तुम्हें महर्षि औषस्ति का आश्रय लेना चाहिए।” कर्म मीमाँसा के आचार्य ने सम्भवतः उसके लिए योग साधना जरूरी समझी होगी।

आचार्य की आज्ञा स्वीकार कर उसने हिमालय की ओर प्रस्थान किया था। रास्ते में मिल गए लय योग के आचार्य सुनेत्र। उन्होंने प्रेरणा दी “थोड़े समय यहाँ निवास करो। सामान्य श्रम से भी समाधि सिद्ध हो सकती है। जटिल श्रम- साध्य साधनाओं की आवश्यकता नहीं।”

उसे वैसे भी चातुर्मास्य करना था। यात्रा रुकती ही हो तो क्यों न अवरोध का उपयोग कर लिया जाय। शैवालिक अंचल अपनी सौम्य सुरम्यता में अनूठा था। उसे यहाँ पर्वतीय गुहा मिल गई रहने के लिए।

“नाद स्वर ही तो हैं।” उस दिन वह अपने मार्गदर्शक से कह रहा था “स्वर अन्तर में सुनाई दे या बाह्य जगत में, इन्द्रिय का ही विषय है। वीणा, वेशी, शंख, मेध गर्जन, श्रोत्रेन्द्रिय, प्रत्यक्ष होता है। माध्यम स्थूल बने या सूक्ष्म वह विषय है, अतः कर्म साध्य है और कर्म साध्य है तो नाशवान है। कर्म का नाम कोई साधन दे ले, क्या फर्क पड़ता है। कर्म साध्य तथ्य शाश्वत नहीं हो सकता।”

आचार्य सुनेत्र शुरू में बहुत उत्साहित हुए थे। उत्थित जाग्रत कुण्डलिनी, साधक मिला था उन्हें। मणिपुर-अनाहत चक्रों का भेदन शुरुआत में ही हो गया। मेरुदण्ड में महास्फोटनाद, कम्प और गति साधारण बात थी। आज्ञा चक्र अर्थात् त्रिपुटी भंग, बिन्दु बेध, बंकनाल, भ्रमर गुहा आदि का अतिक्रमण कर कुण्डलिनी में सहस्रार के महा कुण्ड में स्नान किया और अमृत निर्झर से उठकर वह दिव्य-आलोक की पीठ पर आसीन हो गई। “नित्य धाम की प्राप्ति” उस दिन आचार्य उल्लास में भर कर कह उठे और तभी उसने उन्हें निराश कर दिया।

“नित्य-धाम कैसे हो सकता है वह?” उस प्रबुद्ध प्रज्ञ को कोई मनोकल्पित अवस्था अपने में उलझाने में असमर्थ थी। “किसी नाद के न सुनने, किसी रूप के न देखने से जीवन में छटपटाहट नहीं है। मनुष्य का बन्धन उसके सुख-दुख का कारण है- देहासक्ति, राग, द्वेष। इनमें छुटकारा पाए बगैर किसी भी मानसिक अनुभव को लेकर ऐसा मान लेना आत्म प्रवंचना होगी।”

जो अनहद श्रवण से भी नहीं सन्तुष्ट हुआ, उसे अस्पर्शयोग, गन्धयोग, ज्योतिदर्शन अथवा शांभवी मुद्रा की सिद्धि से सन्तुष्टि हो जाएगी, इसकी आशा आचार्य सुनेत्र नहीं कर सकते थे। उन्होंने चातुर्मास्य के अन्त में उसे सस्नेह विदा किया।

यम और नियम उसके लिए सहज सिद्ध थे। जो आह्वानीय अग्नि के समीप बैठकर अहर्निशि अग्नि-सेवा कर चुका हो, आसन सिद्धि की बात उससे कौन करे? धारणा-ध्यान का अवलम्बन भले बदल ले, अहदोत्थान पर्यन्त ध्यान सिद्ध तो वह था ही। पर ये सभी मिल कर भी जीवन की पहेली तो नहीं सुलझाते।

“सिद्धिकामो भव!” अधिकारी की उपस्थिति महर्षि औषस्ति को अज्ञात नहीं रही। समाधि से उसी समय उठे थे वह। अपने पांवों में सिर झुकाते इस अद्भुत जिज्ञासु को उन्होंने उठा लिया। उसी दिन से एक गुफा इस नए योगी की साधन स्थली बन गई।

“भगवन्! समाधि काल से परे की अवस्था नहीं है क्या?” सविकल्प-निर्विकल्प समाधियों की अवस्थाओं को पार कर आज कई महीनों के बाद वह अपनी गुफा से महर्षि के चरणों में प्रणाम करने आया। उसका मुख तेजोदीप्त हो रहा था। अभिवादन के बाद उसने हाथ जोड़ कर सवाल उठाया “यह भी प्रयत्न साध्य स्थिति है। प्रयत्न कितना भी विशुद्ध, निर्बीज हो चुका हो कर्म ही है।”

“कर्म साध्य स्थिति शाश्वत नहीं होती।” महर्षि ने स्वयं वह बात कही जो वह कहना चाहते थे। “इसी से समाधि में व्यात्थान होता है।”

“जबकि जीव शाश्वत है। निरपवाद अमर है। काल उसे बाँध नहीं सकता।” उसने जिज्ञासा की “तब जीव को अपने स्वरूप की नित्य प्राप्ति क्यों संभव नहीं है? क्यों उसकी सारी कोशिशें काल का ग्रास बन कर रह जाती है। “

“ठीक कहते हो वत्स! पर हरेक की अपनी सीमा है शरीर और अन्तःकरण असीम शक्ति और संस्कार युक्त नहीं हुआ करते।” महर्षि स्नेहपूर्वक समझा रहे थे “तुमने व्यक्तित्व परिशुद्धि की सीमा पा ली अपने द्रष्ट स्वरूप में अवस्थिति, समाधि की निर्बीजता तुम पा चुके।”

“यह अवस्थिति बनी क्यों नहीं रहती प्रभू। उसका स्वर वेदना से आकुल था। जीवन का तत्व... इसके लिए तुम्हें परमाचार्य श्री कृष्ण द्वैपायन का आह्वान करना चाहिए। तुम्हारी निश्छल पुकार पर वे जरूर आएँगे।” महर्षि ने कहा और वह चल पड़ा, जिज्ञासा का अपूर्व सम्बल लिए। कुलूक्षेत्र (कुल्लूघाटी) में इलावर्त को दाँयी ओर छोड़ते यमुनोद्गम की परिक्रमा करके उसी दिन उनने गंगा के उद्गम में स्नान किया। दूसरे दिन दिव्य कैलाश को दाहिने छोड़ते वे अलकनन्दा में मिलने वाली उदीची सरस्वती के किनारे सभ्याप्रास में जा पहुँचे, जो कभी परमर्षि व्यास की तपस्थली थी।

“तुम कौन हो, यह जान लेना काफी नहीं है वत्स!” वेदान्त दर्शन के परमाचार्य को उसकी प्रबल पुकार ले आयी थी। “प्रचलित योग व्यक्तित्व की चरम ऊंचाइयों तक पहुँचा पाते हैं। यहाँ सिर्फ जीवन का संस्पर्श होता है, प्राप्ति नहीं। जीवन अस्तित्व है -व्यक्तित्व नहीं।” इसी को जानने के लिए क्या-क्या नहीं किया उसने। कुछ संकोचपूर्वक पूछा उसने “और कर्म?”

“योग सिर्फ चित्तवृत्ति निरोध नहीं है यह तो उसकी शुरुआत है, “तत् दृष्टि स्वरूप वस्थातुम” उसकी मध्य स्थिति पतंजलि।” अब वह अपने अनुभव को सूत्र बद्ध कर रहा था “और चरम स्थिति” नवीन सूत्रकार को थोड़ी हिचक हुई। सस्नेह उसे उत्साहित करते हुए वह बोले “कर्मसु कौशलम्”। योगेश्वर कृष्ण के इन शब्दों को समझा नहीं गया। तुम्हें अपने जीवन से इसकी व्याख्या करनी होगी।” स्पन्दित वातावरण के बीच ऋषि बता रहे थे। “जीवन-शाश्वत अस्तित्व-अविरल चेतना प्रवाह है, शरीर की नावें उसमें बदले रूपों में प्रकट होती रहती है। इन्हीं के द्वारा जीवन अभिव्यक्त होता है और यह अभिव्यक्ति है कर्म। दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं, इन्हें अलग न समझो।”

“पर आज कर्म का स्वरूप...” शंका जैसे बाकी रह गई थी। “उसे कर्म मत कहो वह अकर्म है, कुकर्म है, दुष्कर्म है। विराट अस्तित्व की नहीं क्षुद्र अहं की अभिव्यक्ति। जीवन संवेदना बाह्य जगत को, स्वयं को कर्म के रूप में प्रकट करती है। कर्म का यही उदार रूप हमें पूर्ण बनने के लिए बाध्य करता है। जिसमें हम तुच्छ व्यक्तित्व को समाप्त कर अधिकाधिक उदार बनते जाते हैं।”

..”कर्म जीवन वीणा से उभरा संगीत है। समूची प्रकृति में इसी की गूँज है। परमाणु पर परमाणु मिलते जाते हैं और पृथ्वी, सूरज, तारे बनते हैं। फिर वे भी एक दूसरे की ओर आत्मीय आकर्षण में खींचे जा रहे हैं। समूची सृष्टि में यही एकात्मता का प्रवाह है सर्वथा एक है जीवन और कर्म।”

..”इसी एकत्व की प्राप्ति इन दोनों का परम प्रयोजन है। जिसके लिए दोनों साध्य है, दोनों साधन है”। वेदांत दर्शन के सूत्रकार का भावबोध उसे अस्तित्व में मग्न कर रहा था।

इस भावपूर्ण उद्बोधन ने योग के सूत्रकार पतंजलि को कर्म का भाष्यकार बनाया। ईसा से 225 वर्ष पूर्व बँट -बिखर कर नष्ट हो रहे मौर्य साम्राज्य से त्रस्त भारत फिर से एक चाणक्य को पुकार रहा था। महर्षि पतंजलि आगे आए, पुष्पमित्र शुँग बना उनका माध्यम। विदिशा और उज्जैन के बीच स्थित गोनर्द हुआ उनके व्यापक कार्य का केन्द्र। ऋषि परम्पराएँ पुनर्जागृत हुई। “योगश्चि चित्तवृत्ति निरोधः, योग कर्मसु कौशलम्” पुस्तक के पन्नों में नहीं जन-जन की क्रिया में परिलक्षित हुए।

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