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Magazine - Year 1991 - Version 2

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धर्माचरण का मर्म

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मनीषियों के जीवन जीने की कला को धर्म का नाम दिया है। ऐसी कला जिसको सीखकर जीवन की सारी विकृतियों, कुरूपताओं का निवारण कर इसे सर्वांग सुन्दर और सुरुचिपूर्ण बनाया जा सकता है।

इसके स्वरूप को और अधिक स्पष्ट करते हुए मैथ्यू अर्नाल्ड ने इसे ‘भावनामय नैतिकता’ का नाम दिया है। उनके द्वारा दिया गया यह नाम निश्चित रूप से उचित लग सकता है। अकेली नैतिकता तब तक अधूरी है जब तक इसमें भावनाओं का संयोग न हो। इसके बिना यह कठोर नियन्त्रण बन कर रह जाती है।

मानव जीवन को श्रेष्ठ व उन्नत बनाने के लिए प्रारम्भिक समय से लेकर आज तक लगातार प्रयत्न होते रहे हैं। समय-समय पर विभिन्न मूल्यों एवं मर्यादाओं की रचना की गई है। इन्हें मान्यता भी मिली है, पर इनको वही ठीक ठीक अपना सके हैं, जिन्होंने भावनाओं को उभारने में सफलता पायी है। बाकी के पूरी तरह सफल न होने का कारण इनसे विलग रहना ही है।

जीवन जीने की शैली का निर्धारण मुख्यतः दो ढंग से हुआ है। एक वह जिसमें सुख-भोग की प्रधानता दी गई है। इसकी व्याख्या भारत में चार्वाक तथा पश्चिम में बैंथम, हाब्स, मिल आदि ने की है। दूसरी वह जिसमें भोगो की निन्दा कर आदर्श को प्रमुख बताया गया है। इसको बतलाने वाले स्टोडक, काण्ट शोपेनहॉवर आदि हैं, किन्तु जन सामान्य इसे ठीक तरह से अपना नहीं सका। उलटे इसे कठोरतावाद का नाम दिया। इसकी ओर उसकी स्वाभाविक अभिरुचि भी नहीं हुई।

इसके कारणों पर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि उसके मर्म को छुआ ही नहीं गया। भाव सम्वेदनाओं को उभारा ही नहीं गया। मनुष्य का यह एक स्वाभाविक गुण है। कोई विचार वह तब तक नहीं अपनाता, जब तक उसके बुद्धिगत सारे सवालों का जवाब न मिल जाय। आदर्श का मार्ग त्याग की बात तो कहता है,किन्तु बदले में क्या मिलेगा, इसे वह बुद्धि को समझा नहीं पाता। गीता ने इसी तथ्य को व्यवसायात्मिक बुद्धि अर्थात् “बुद्धि का व्यवसायीपन “ कहकर समझाया है। आदर्श की कठोरता उसे न रुचे, यह स्वाभाविक ही है। यहाँ तक कि जो इसे किन्हीं तर्कों से मजबूर होकर स्वीकार लेते हैं, उनके द्वारा भी इसे किसी ऐसी चीज के रूप में देखा जाता है, जो विजातीय है और किसी खास वर्ग के लोगों के लिए है।

भाव-सम्वेदनाओं का क्षेत्र बुद्धि से ऊपर है। इसमें व्यवसायीपन नहीं है। धर्म एवं व्यावहारिक अध्यात्म इन्हीं के उद्गम स्त्रोत है। भावनाएँ भीतर से उमड़ती हैं। ये अन्तःकरण का उत्पादन हैं। इनसे प्रेरित व्यक्ति दूसरों की व्यथा, वेदनाओं को अनुभव कर सकता है। यही नहीं इनको दूर करने के लिए बड़े से बड़े त्याग करने में नहीं हिचकिचाता। प्रेम, सेवा, करुणा, उदारता जैसी आत्म सम्वेदनाएँ इसी से उपजती हैं। इन दिव्य सम्वेदनाओं से संचालित होकर लोग खुशी-खुशी कष्ट सहते हैं, अपने लाभों का परित्याग करते हैं, भौतिक दृष्टि से घाटा उठाते हैं। आदर्शवादियों द्वारा किसी न किसी रूप में अपने स्वार्थों की बलि दी जाती है। उदार व्यवहार में भी कुछ न कुछ त्याग करना ही पड़ता है। भौतिक लाभ जैसी कोई बात इसमें दिखाई नहीं पड़ती। इतने पर भी भावनाओं के सम्बल के आधार पर इस राह पर चलना सहज बन पड़ता है। इस तथ्य को बुद्धिवादी गणित से नहीं सुलझाया जा सकता है। यह भाव सम्वेदना के क्षेत्र की उर्वरता की परिणति है, जो समस्त तर्कों व बौद्धिकता से ऊपर जा कर जीवन को आदर्शोन्मुखी बनाती है।

किन्तु भाव-सम्वेदनाओं के अकेलेपन में अक्सर एक गड़बड़ी होती है वह यह कि इससे प्रेरित होकर अधिकाँश लोग भावनाशील होने की जगह भावुक अधिक हो जाते हैं। इसी को भ्रमवश भावनाशीलता मान लिया जाता है। इस भावुकता की स्थिति में उन्हें ठगा और परेशान किया जाता है। चालाक किस्म के लोग उनके भोलेपन का लाभ उठाकर उन्हें कठिनाई में डाल देते हैं। इसी कारण इन भाव-सम्वेदनाओं पर परिष्कृत नीतियों का अंकुश अनिवार्य है। इसी के आधार पर इन्हें व्यवहार में उतारा जा सकता है। श्रीरामकृष्ण ने इसकी आवश्यकता पर बल देते हुए एक भावुक शिष्य से कहा था कि आध्यात्मिक बनना है तो आध्यात्मिक बन बुद्धू नहीं। उनका कहना था कि भगवान ने विवेक दिया है,उसे काम में लाना चाहिए। विवेकयुक्त व्यवहार ही नैतिकता है सच्ची धार्मिकता है।

एफ. एच. ब्रैइले ने अपनी पुस्तक “एपियरेन्स एण्ड रियल्टी “ में इस बात को अच्छे ढंग से समझाया है। उनके अनुसार जब नैतिकता एक ऊंचे और शुभ स्तर तक पहुँचती हैं, तब उसका योग भाव- सम्वेदनाओं से होता है। इस स्थिति में यह धर्म बन जाती है। इसे उन्होंने जीवन जीने का परिष्कृत दृष्टिकोण कहा है। ब्रैडले की इस बात में यथार्थता है। अधिकाँशतया व्यक्ति इस तत्व को गहराई से न जानने के कारण ही इसकी उपेक्षा सी करते हैं। धर्म को कुछ कर्मकाण्डों का पर्याय भर मान लिया गया है, फलतः वे जिन क्रिया कृत्यों को ग्रहण करते हैं उसी में सीमित होकर रह जाते हैं अथवा यों कहें रूढ़िग्रस्त होकर धर्म के मार्ग से भटक जाते हैं।

मनीषियों के अनुसार भावनामय नैतिकता जीवन जीने की परिष्कृत दृष्टि है। इसके आधार पर जिन्दगी व्यतीत करने पर मानवी मूल्यों का संरक्षण और प्रसार होता है। धार्मिक होने का अर्थ है अन्तराल में पवित्रता, हृदय में सबके प्रति मैत्री भाव, मन में शान्ति, अपने पास विद्यमान साधनों में सन्तोष करने की प्रवृत्ति का होना। यही नहीं, व्यक्ति को कर्मनिष्ठ, श्रमशील एवं सहनशील होना चाहिए। इसी को सही अर्थों में धर्माचरण का पर्याय समझा जाता है।

इसके लिए न तो जाति, देश, काल का कोई बन्धन है, और न ही किसी प्रकार की बाहरी योग्यता जरूरी है। संसार में प्रायः सभी काम ऐसे हैं, जिन्हें करने के लिए परिस्थितिजन्य बन्धन होते हैं। एक निश्चित योग्यता और निश्चित स्थिति का व्यक्ति ही इन्हें कर सकता है उदाहरण के लिए यदि डॉक्टर, इंजीनियर अथवा प्रशासक का काम करना हो तो निर्धारित योग्यता होनी चाहिए, साथ ही इस योग्यता को पाने के लिए उपयुक्त धन भी चाहिए।

किन्तु अध्यात्मवादी होने के लिए ऐसी कोई बात नहीं, धनहीन और बिना पढ़े लिखे कबीर और रैदास भी अध्यात्मवादी बन सकते हैं और संत एकनाथ के गुरु जनार्दन पन्त तथा रामकृष्ण परमहंस के शिष्य डॉ. रामचन्द्र दत्त जैसे पढ़े लिखे और धनवान भी। इसके लिए अलग से समय और स्थान की भी जरूरत नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति जिस समय जो काम कर रहा है उसी में भावनामय नैतिकता को मिला देने से वह धर्माचरण बन जाता है।

जो लोग धर्माचरण को सिर्फ पूजा की कोठरी तक सीमित कर लेते हैं, उन्हें समझाते हुए जे. कृष्ण मूर्ति का अपनी कृति “मेडिटेशन “ में कहना है कि 24 घण्टों में एक दो घण्टे मन उच्च भावों में रखने से काम नहीं चलेगा। रात-दिन के प्रत्येक क्षण में भाव-सम्वेदनाओं व नैतिकता का समावेश करके इन्हें धर्माचरण के रूप में परिवर्तित करना चाहिए।

इस स्थिति को जीवन की व्यावहारिकता में उतारना ही सच्चे अर्थों में धार्मिक बनना है। शुरू में सम्भव है इसमें कठिनाई अनुभव हो पर महर्षि पातंजलि के शब्दों में “दीर्घकाल नैरन्तर्य सेविता दृढ़ भूमिः।” अर्थात् लम्बे समय तक लगातार इसका अभ्यास करने पर परिपक्वता सहज संभव बन जाती है।

इसी स्थिति को बताते हुए आचार्य शंकर का “उपदेश सहस्री” में कहना है कि फिर समूचा जीवन ही धर्मधारणा से भरा हो जाता है। धर्म की यही यथार्थ प्रक्रिया हम सभी के आचरण में लायी जानी चाहिए। गीताकार के शब्दों में “स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य भायते महतो भयात्” अर्थात् भावनामय नैतिकता रूपी धर्म का सही ढंग से किया गया थोड़ा सा आचरण भी व्यावहारिक जीवन की तमाम सारी कठिनाइयों को दूर करने वाला है।

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