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Magazine - Year 1991 - Version 2

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साँस्कृतिक गौरव अक्षुण्ण है, अक्षुण्ण ही रहेगा।

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राजा की हार हुई। वह दुश्मनों से अपना पीछा छुड़ाने के लिए भाग निकला, पर दुश्मन भी उसे छोड़ने वाले कहाँ थे। उन्होंने भी नरेश का पीछा किया। शत्रुओं से अपनी जान बचाने के लिए सम्राट एक मकान में घुस गया। पीछे-पीछे विद्रोही भी वहाँ आये, पर यह क्या? कमरे में प्रवेश करते ही राजा मानो योगियों की भाँति अदृश्य हो गया। शत्रुओं ने इमारत का चप्पा-चप्पा छान मारा, किन्तु सम्राट का कोई पता न चला, जैसे कमरा जादुई हो और उसमें पाँव रखते ही वह आँखों से ओझल!

प्रस्तुत पंक्तियाँ किसी तिलिस्मी उपन्यास अथवा जासूसी फिल्म का अंश नहीं, वरन् एक सच्ची घटना है बात सन् 1651 की है और सम्बद्ध व्यक्ति इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय थे। घटना के अनेकों वर्ष बाद जब पुरातत्ववेत्ताओं ने वारविकशायर स्थित उस मकान का गहन व सूक्ष्म परीक्षण किया, तो चार्ल्स के अचानक गायब होने का रहस्य खुल गया। वस्तुतः उस मकान में एक ऐसा तहखाना था, जिसे ढूँढ़ निकालना असंभव नहीं तो टेढ़ी खीर अवश्य था।

आज से चार दशक पूर्व भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों के पुरातत्व विभागों ने अपने यहाँ ऐसे ढेरों स्थान-मकान ढूँढ़ निकाले, जिनकी संरचना तिलिस्मी उपन्यासों जैसी थी। उन्हीं के समान रहस्यमय सीढ़ियाँ, न दीखने वाले कमरे, उनमें लगे उपकरणों के विचित्र कारनामे-सब कुछ अचम्भे से भरा हुआ। लेसिस्टरशायर में पाँच सौ वर्ष पुराने एक ऐसे ही मकान का पता अभी हाल में चला है, जिसकी बनावट ऐसी है कि उसे तिलिस्मी की संज्ञा दी जाय, तो कोई अत्युक्ति न होगी।

यह मध्य युग का समय था, पर इसके बहुत समय पूर्व से ही यह विज्ञान लुप्त होने लगा और 19 वीं सदी का प्रारंभ आते-आते इसका लगभग पूर्ण लोप हो गया। इसके उपरान्त यह तिलिस्मी उपन्यासों और कहानियों के रूप में पुस्तकीय चर्चा का विषय भर बन गया। देवकीनंदन खत्री और दुर्गा प्रसाद खत्री के उपन्यासों “भूतनाथ”, “काजल की कोठरी” “रोहतास मठ” आदि में इसी की झलक-झाँकी मिलती है। इनमें वर्णित असली-से लगने वाले नकली शेर, बारहसिंघे, हंस जैसे कितने ही स्वचालित खिलौनों का पश्चिमी देशों द्वारा वर्तमान समय में निर्माण का उल्लेख एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (भाग 15) में मिलता है। लन्दन के “विक्टोरिया एण्ड अल्बर्ट म्यूजियम” में एक यंत्र-शेर है, जिसे एक व्यक्ति को अपने नीचे दबाये हुए दिखाया गया है। यंत्र में संयुक्त मूठ को जब घुमाया जाता है, तो वह शेर की ही भाँति दहाड़ता है और उसी के साथ व्यक्ति की बाँहें भी हरकत में आ जाती है। “मैसाचुसेट्स इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालॉजी” ने एक ऐसा यंत्र-मानव बनाया है, जो एक कमरे से निकल कर गलियारे में से गुजरता हुआ दूसरे कमरे में प्रवेश कर उसे सुव्यवस्थित करता है और पुनः अपने पूर्व कमरे में लौट आता है। वैसे, अब तो इससे भी विकसित किस्म के रोबोट तैयार कर लिये गये हैं, जो अग्नि से जुड़े उपकरणों तथा विमान चलाने से लेकर दूसरे ग्रहों में काम-काज करने की क्षमता रखते हैं। इस दृष्टि से उक्त तिलिस्मी उपन्यासों में वर्णित जानवरों, तलवार चलाते सैनिकों,शतरंज खेलती पुतलियों, असली होने का भ्रम पैदा करने वाली महिलाओं एवं उनके करतबों तथा अन्यान्य ऐसे ही आश्चर्य में डालने वाले करिश्मों को कपोल-कल्पनामात्र कह कर नहीं टाला जा सकता। यह हमारे प्राचीन विकसित पदार्थ विज्ञान के जीवाश्म (फासिल्स) है और जीवाश्म को झुठलाया कैसे जा सकता है। उनके आकार, प्रकार और उभार से बहुत कुछ लुप्त जन्तु की आकृति-प्रकृति का अनुमान लग जाता है। वेद ऐसे ही प्रामाणिक ग्रन्थ हैं, जो हमारे प्राचीन विकसित विज्ञान के विश्वसनीय साक्ष्य हैं।

वेद शब्द ‘विद्’ धातु से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ होता है- ज्ञान। इस संसार में ज्ञान-विज्ञान की जितनी भी धाराएँ हैं, सभी का मूल उद्गम वेद ही है। वैसे भी वेद (ऋग्वेद को विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ माना जाता है। श्रीमद्भागवत (12/17/47) के अनुसार आरंभ में वेद (ऋक् के रूप में) एक ही था, किन्तु द्वापर के अन्त में समय और परिस्थिति की आवश्यकता को देखते हुए कृष्ण द्वैपायन व्यास ने उसे ऋक्, यजुः, साम और अथर्व चार भागों में बाँट दिया। इस प्रकार एक ही ज्ञानागार के चार खण्ड हो गये और सम्प्रति हम उन्हीं की विभिन्न धाराओं को ज्ञान एवं विज्ञान के रूप में पढ़ते, सुनते और देखते हैं।

मूर्धन्य मनीषी केशव पटवर्धन अपने शोधपूर्ण ग्रन्थ “ऋषियों के विज्ञान की श्रेष्ठता” की प्रस्तावना में लिखते हैं कि “वैदिक ग्रन्थों में निर्देशित वैज्ञानिक निष्कर्षों को हम चाहे किसी भी भाषा में निरूपित करें,यदि वे आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों से संगति खाते और साम्य रखते हैं, तो हमें इस बात को स्वीकारने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए कि कई हजार वर्ष पूर्व हमारे प्राचीन ऋषियों को इन नियमों और सिद्धान्तों का सम्पूर्ण ज्ञान अवश्य था। शंका और संदेह की गुँजाइश तब और खत्म हो जाती है, जब विज्ञान के विकास को इंगित करने वाले सैंकड़ों-हजारों की संख्या में वाक्य प्राचीन साहित्य में देखने को मिल जाते हैं। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता।”

कणाद प्रणीत “वैशेषिक दर्शन” के अवलोकन से ज्ञात होता है कि परमाणु विज्ञान में उन्हें महारत हासिल थी। अतः यदि उन्हें विज्ञान की इस विधा का जनक कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। भारद्वाज रचित “भारद्वाज-संहिता” में विज्ञान की अनेक धाराओं का वर्णन आता है, जिसमें “वैमानिकी” विषय को विशेष प्रमुखता दी गई है। “शुल्ब सूत्र” में पदार्थ विज्ञान की विभिन्न शाखा-प्रशाखाओं का विशद् वर्णन था, पर अब यह शास्त्र प्रायः अप्राप्य है, मात्र यजुर्वेद का कात्यायन शुल्ब सूत्र ही सम्प्रति उपलब्ध है, जिसमें ज्यामिति शास्त्र का विस्तृत उल्लेख है। यजुर्वेद के उपवेद धनुर्वेद में शस्त्रास्त्रों के निर्माण-प्रक्रिया की चर्चा है।

एक आख्यान के अनुसार महाभारत युद्ध में महाराजा अम्बरीश के पास एक ऐसा शस्त्र था, जिसके प्रहार से एक अक्षौहिणी सेना का संहार करके शस्त्र सुरक्षित उनके पास वापस आ जाता था? आज इसकी तुलना परमाणु बमों से की जा सकती है, पर फिर भी आज का विज्ञान तब के विज्ञान के सदृश्य विकसित नहीं माना जा सकता, क्योंकि आज के बमों का प्रयोग सिर्फ एक ही बार किया जा सकता है। उसके बाद वे नष्ट हो जाते हैं, जबकि प्राचीन शस्त्रों की विशेषता थी कि उन्हें अनेकानेक बार काम में लाया जा सकता था। इसके अतिरिक्त प्राचीन साहित्यों में क्राकीक, चित्राग्नि तथा स्वाति जैसे अनेक विलक्षण यंत्रों का वर्णन आता है। क्राकीक में यह विशेषता थी कि व्यक्ति की एक बूँद रक्त से ही वह उसका पूरा चित्र प्रस्तुत कर देता था। चित्राग्नि वर्तमान टेलीविजन के सामने “क्रिस्टलबॉल” जैसा उपकरण था, जबकि स्वाति यंत्र की विशिष्टता यह थी कि वह वर्षों पूर्व कहे शब्दों को वायुमंडल से पकड़ कर पुनः सम्प्रेषित कर सकता था। इसके साथ ही चालक रहित मोटरों की भाँति गति से जमीन पर चलने वाले रथों (ऋक् 6/66/7, यजु 9/8) तथा अति वेगवान विमानों (ऋग्वेद /1/116/, 1/37/1) की भी स्थान स्थान पर चर्चा मिलती है।

भोज प्रबंध ग्रन्थ में इस बात का उल्लेख मिलता है कि राजा भोज के पास काष्ठ का एक ऐसा अश्व था, जिसकी गति एक घड़ी में ग्यारह कोस थी। “धम्मपद” ग्रन्थ में एक ऐसे ही यन्त्र का वर्णन आता है। कथा है कि कौशाम्बी नरेश उद्यन की उज्जयिनी नरेश चण्डप्रद्योत्त से शत्रुता थी। प्रद्योत ने उन्हें बन्दी बनाने के लिए एक “हस्ति यन्त्र” तैयार किया, जो हाथी के ही समान चल-फिर सकता था। प्रद्योत ने इस लकड़ी के हाथी को उद्यन के वन में छोड़ दिया। उद्यन को जब इस श्वेत हाथी के बारे में पता चला, तो देखने गये, जहाँ उन्हें यन्त्र ने पकड़ लिया। “गया चिन्तामणि” नामक पुस्तक में मयूर आकृति वाले विमान तथा बाल्मीकि रामायण (सुन्दर काण्ड) में पुष्पक विमानों का वर्णन मिलता है।

ये सभी साक्ष्य यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हमारा पुरातन विज्ञान अध्यात्म विज्ञान के साथ-साथ अत्यन्त विकसित स्थिति में था। इस आत्म गौरव को विस्मृति के गर्त्त में डालकर हम अपनी आज की स्थिति का रोना रोते हैं तो प्रकारान्तर से यह तथ्य सही ही प्रमाणित होता है कि जो पूर्वजों के गौरव की मात्र दुहाई ही देता रहेगा उसे काल की प्रबल चाल उपेक्षित कर पीछे छोड़ देगी।

हमारी अपनी साँस्कृतिक धरोहर आर्षग्रन्थों में निहित है एवं वह उपार्जन, उपभोग, सदुपयोग, सुनियोजन, कौशल व सामर्थ्य अर्जन सभी क्षेत्रों में मार्गदर्शन कर सकती है। मार्गदर्शन हम आत्मिकी से लें किन्तु परिस्थितियों को नहीं, मनःस्थिति को बदलने वाले प्रतिपादन को विज्ञान सम्मत सिद्ध कर विश्वमानवता के समक्ष रखें। यही समय की माँग है। सारे विश्व की आंखें टकटकी लगाए भारतवर्ष को ही देख रही है। जब भौतिकी का हमारा पुरातन गौरव आज के पश्चिम जगत की तुलना में कहीं अधिक वजनदार सिद्ध होता है, तो आत्मिकी का, अध्यात्म विज्ञान का तो कहना ही क्या? गौरव की याद मात्र न कर उसे परिस्थितियों के अनुरूप सत्यापित कर दिखाएँ तो सारा विश्व भारत का अनुकरण करता दीख पड़ेगा।

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