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Magazine - Year 1993 - Version 2

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सहयोग और समन्वय का मार्ग अपनायें

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संघर्ष और सहयोग दो ही मार्ग ऐसे है जिनमें से किसी एक को चुनकर समस्याओं का समाधान सोचा जा सकता है। संघर्ष का तात्पर्य है-अपनी मर्जी को दूसरे पर थोपना। उसे अपनाने के लिए बाधित करना। कहने से न मानता हो तो उसका दमन, उत्पीड़न करना, यह नीति समर्थ-असमर्थों के प्रति अपनाते रहे हैं। बलवान के लिए ही यह संभव है कि वह निर्बल को दबा ले और उसे अपनी मर्जी पर चलायें इसी मान्यता वाले दूसरा उपाय प्रलोभन देने के रूप में भी अपनाते रहे हैं। लालच देकर भी किसी को वह करने के लिये बाधित किया जा सकता है जिसे वह स्वेच्छा से नहीं करना चाहता। वेश्यावृत्ति इसी आधार पर पनपी है। उसमें दोनोँ में से कोई भी पक्ष किसी का सच्चे मन से सहयोगी नहीं होता पर प्रलोभन को माध्यम बनाकर एक दबता है, दूसरा दबाता है। दास प्रथा में दमन प्रधान रहा है। युद्धों में हारे हुये राज्य की प्रजा को विजेता अपनी विजय उपलब्धि में लूटी गई संपदा की तरह अपनी मानता है। उनके धन साधन तो छीन ही लिये जाते थे, साथ ही युवा स्तर के नर-नारियों को भी लूटे हुये पशुओं की तरह पकड़ लिया जाता था। और उनसे स्वामी पशुओं की तरह काम लेता था। अमेरिका के बाजारों में काले हब्शी इसी बिकते रहते, उन्हें चिड़ियोँ या मछलियों की तरह जाल में फँसाकर लाया जाता था।

यह प्रक्रिया बौद्धिक स्तर पर भी काम करती देखी गई है। चतुर लोगों ने मूर्खों को इसी आधार पर अपना अनुयायी बनाया है और उसी पिंजड़े में स्वेच्छापूर्वक कैदी बनें रहने के लिये विवश किया है। इन सब तरीकों को दबाव का संघर्ष का, तरीका कह सकते हैं। इस विधा को अपना लेने पर पराजित अपना मनोबल यहाँ तक कि ईमानदारी भी खो बैठता है। साथ ही विजेता की अहंमन्यता का वारापार नहीं रहता, वह अपने को सर्वशक्तिमान मानने लगता है और अपनी आक्रामक नीति का और भी अधिक दुस्साहस के साथ प्रयोग करता है।

दूसरा मार्ग सहयोग का है। सभी जानते हैं कि ईंटों के मिलने से भवन बनता है। तिनके मिलाकर रस्सी बनती है। सींकें समर्थ बुहार लगाती हैं। बूँदें मिलकर सरिता के रूप में बहती हैं। बिखरें मन के मिलकर सुन्दर माला या हार का रूप धारण करते हैं। परिवार एक प्रकार से छोटा समाज है जिसमें सभी समर्थ असमर्थ मिलजुल कर रहते, मिल बाँट कर खाते, सुरक्षित रहते और समुन्नत बनने के लिए अग्रसर होते हैं। बिखर जानें पर इनमें से किसी का भी कोई महत्व नहीं रह जाता। सहकारिता के आधार पर सैन्य दल बनता है, कारखाने चलते हैं। और विशालकाय निर्माण कार्य पूरे होते हैं कहते हैं कि चींटियां मिलकर हाथी की सूंड़ में घुस पड़ें तो उसे मार सकती हैं। दीमकों और टिड्डियों को विशालकाय क्षेत्रों को वीरान करते देखा गया है। प्रजाताँत्रिक देशों में वोट के बल पर शासनों में परिवर्तन होते देखा गया है। मधुमक्खियाँ मिलकर छत्ता बनाती और शहद बनाने जैसा कौशल विकसित करते हुये यशस्वी बनती हैं। सहकारिता को इस युग की उच्चस्तरीय उपलब्धि माना गया है। संगठन इसी सिद्धाँत के अनुरूप खड़े होते हैं। ठेके इसी आधार पर काम करते हैं। धर्मतंत्र से लेकर राजतंत्र में अपनी संगठन शक्ति के आधार पर ही आश्चर्यजनक कार्य करते देखा गया है। अर्थतंत्र की प्रगति में यही शक्ति प्रमुख रूप से काम करती है। जहाँ इसके विचार को अपनाया नहीं जाता विग्रह पर विघटन पर उतारू रहा जाता है वहाँ समझना चाहिये कि देर सबेर में सर्वनाश होकर रहेगा। संयुक्त परिवार की हर दृष्टि से विकासोन्मुख एवं सुख-शाँति की सुनिश्चित विधा माना गया है। इसके विपरीत संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रेरित अदूरदर्शी लोग डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाते और ढाई चावल की खिचड़ी पका कर उपहासास्पद बनते और असफल रहते देखे गये हैं।

सहकारिता का प्रत्यक्ष स्वरूप मिलजुल कर काम करने के रूप में एक जुट बनने, एकत्रित होने के रूप में दृष्टिगोचर होता है पर थोड़ी गहराई में उतर कर उसके सिद्धाँत या दर्शन पर विचार किया जाये तो यह तथ्य उभर कर ऊपर आता है कि समन्वय की भावना ही सहकारिता के रूप में विकसित होती है। अपने स्वार्थ को अलग या ऊँचा रखने पर वह आधार बन नहीं सकता अपने स्वार्थ को अन्यायों के स्वार्थ में मिलाकर चलना होता है, इसी को उदारता या परमार्थ-परायणता कहते हैं। अधिकार को गौण और कर्तव्य को प्रमुख मानकर चलने पर ही यह विधा बनती है। इसी को संकीर्णता, अनुदारता, स्वार्थपरता कट्टरता आदि के नाम से जाना जाता है। यह क्रिया-परक भी हो सकती है और विचार-परक भी। अपने को ही प्रधानता देना और अन्यायों की उपेक्षा करना यही है वह चिन्तन जो अनेक विग्रह और संकट खड़े करता है।

यह संकीर्णता अनेक रूपों में सामने आती रहती हैं। सम्प्रदायवाद जातिवाद, व्यक्तिवाद आदि के रूप में यह क्षुद्रता अपने-अपने ढंग से काम करती और टकराव का माहौल बनाती है।

सम्प्रदायवादी अपनी मान्यताओं को ही सही होने का हठ करते हैं। अपने विचारों के साथ ईश्वरीय आदेश शास्त्र वचन, देवदूत कथन, सनातनी, सत्य मानते हैं। बात इतने भर तक सीमित रहती तो कोई बात भी नहीं थी।

व्यक्ति अपने लिए किसी विश्वास को सही मानने और अपनायें रहे तो इसे उसकी व्यक्तिगत मान्यता कहकर विचार स्वातंत्र्य के अंतर्गत लिया जा सकता है। पर संकट तब खड़ा होता है। जब अन्यायों को सभी मान्यताओं को झुठलाया जाता है, उन्हें अधर्मी, नास्तिक, काफिर म्लेच्छ आदि कहकर झूठा ठहराया जाता है। इसी आधार पर उनके साथ झंझट खड़ा किया जाता है। दमन को पुण्य माना जाता है। और विचारों को दूसरों पर थोपने में जितनी सफलता पाई जाय, इसे धर्म की, ईश्वर की सेवा कहा जाता है। यह अतिवाद है, दुराग्रह भी। किसके विचार किस हद तक सही हैं। इसका निर्णय होना अभी शेष है। जब सभी संप्रदाय अपने को सच्चा और दूसरों को झूठा मानते हैं तो इसका निर्णय कैसे हो कि अगणित सम्प्रदायों में से कौन एक सही तथा अन्य सब झूठे हैं?जब सभी एक जैसा दावा करते हैं। तो विचार शीलता के आगे यह संकट खड़ा होता है कि वह किसको सही और अन्यों को झूठा ठहरायें। उपयोगिता की कसौटी पर अपने को कसे जानें के लिए कोई प्रस्तुत नहीं होता। दुहाई पूर्वजों की या प्रचलन कर्ताओं की देवदूत ठहराने की दुहाई देता है। जब सभी का दावा एक जैसा हो तो फिर किसे सही और किसे गलत ठहराया जाय?यह झगड़ा हठवादिता पर आधारित होने के कारण कभी निपटने वाला नहीं है प्रत्येक मतावलंबी अपने अतिरिक्त सभी को झूठा ठहरायेगा और उन्हें मिटाने या नीचा दिखाने के लिये चित्र-विचित्र तरकीबें सोचता रहेगा। शास्त्रार्थ होने से लेकर तलवार चलने तक की दुर्घटनाएं इसी आधार पर होती रहीं हैं। कट्टरता जब तक शाँति और समाधान का कोई मार्ग निकलने वाला है नहीं। सहकारिता की जड़ें यह संकीर्णता के पक्षधर सदा काटते ही रहेंगे।

चैन से रहने और रहने देने का तरीका एक ही है-सहिष्णुता और समन्वय। अपने को सही मानें, पर दूसरे मतावलम्बियों को भी वैसे ही स्वतंत्रता प्रदान करें। भोजन और वस्त्र के संबंध में अपनी रुचि के अनुसार चयन करने की छूट रहती है, तो फिर साम्प्रदायिक मान्यताओं को भी अपनी रुचि के अनुरूप अपनाने की सुविधा क्यों न हो?कोई किसी से टकराये क्यों?कोई किसी को झूठा क्यों बताये?जब हर व्यक्ति की आकृति और प्रकृति में थोड़ा अन्तर रहने पर भी परस्पर मिलजुलकर रहा जा सकता है। तो अनेक मान्यता वाले अपने अभिमतों को एक गुलदस्ता क्यों न मानें और क्यों न बिना टकराये अपनी-अपनी मान्यता बनायें रहकर भी सहिष्णुता का मार्ग क्यों न अपनायें?हिन्दू धर्म में यह परिपाटी अति प्राचीन काल से चलती चली आ रही है। अनेक देवी-देवताओं की मान्यता है। किसी को देवता के देवालय में जानें पर आपत्ति नहीं होती है?वरन् सभी को श्रद्धापूर्वक शीश झुकाते हैं। कई बार तो एक ही देवालय में अनेकानेक देवताओं की स्थापना होती है। यों उनके नाम पर पूजा-प्रचलन और कथा प्रसंग अलग-अलग भी पाये जाते हैं। अपने प्रिय देवता को सर्वोपरि ठहराने का भी उपक्रम चलता है। इतने पर भी देवताओं की भिन्नता को लेकर कभी कोई कटुता भरे विग्रह खड़े नहीं होते। यही बात एक कदम और भी आगे बढ़ाई जा सकती है। अनेक धर्म सम्प्रदायोँ को भी इसी सहिष्णुता और समन्वय भावना से सहन किया जा सकता है। इससे भी एक कदम आगे बढ़ना हो तो सभी धर्म प्रचलनों में से जो बातें समय के अनुरूप उपयोगी प्रतीत हों उन सभी को अपनाने का उत्साह जगाया जा सकता है। जो मान्यताएं या प्रथायें समय से पीछे की हो गई, उनकी उपेक्षा की जा सकती है। आवश्यक नहीं कि जो प्रतिपादन कभी किन्हीं परिस्थितियों में किन्हीं व्यक्तियों या क्षेत्रों के लिए उपयुक्त ठहराया गया हो, वह आज भी हर किसी के लिए उसी रूप में मान्यता प्राप्त करता रहे। ऐसा करने पर तो सुधार परंपरा और प्रगतिशीलता का अंत ही हो जायेगा। सत्य की शोध में चलते आ रहे प्रयत्नों के मार्ग में अवरोध ही खड़ा हो जायेगा।

सम्प्रदायवाद की तरह संकीर्णता का एक दूसरा क्षेत्र भी है -जातिवाद। किसी जमाने में व्यवसाय और क्रियाकलाप के आधार पर जातियाँ बनती थीं। बजाज, सुनार, अध्यापक, शिल्पी, साहित्यकार आदि की भी अपनी-अपनी बिरादरियाँ हैं, पर उनका सभी वंशों में जन्में लोग अध्यापक, व्यवसायी, कलाकार आदि हो सकते हैं। ऐसी दशा में जन्म जाति पर आग्रह करने का कोई तुक नहीं रह जाता। विशेषतया तब जब कि उसकी अलग पहचान बनाई जाय। दूसरों से उसे सर्वथा भिन्न रखा जाये। अपने वंश के लोगों को अपना और अन्य सबको बिराना ठहराया जाये। बात इस तरह बढ़ जाये कि अपनी जाति वालों के साथ पक्षपात और दूसरों के साथ उपेक्षा बरती जाये। इन दिनों तो जातियाँ एक प्रकार से छोटे-छोटे राष्ट्रों समुदायोँ के रूप में इस सीमा तक विकसित हो गई है कि एक दूसरे के साथ रोटी-बेटी का संबंध करना तो दूर, उत्सव आयोजनों में भी अपनी ही जाति वालों को आमंत्रित करते हैं। बात बढ़ते-बढ़ते ऊँच-नीच तक पहुँचती है। हर बिरादरी अपने को ऊँचा ठहराती है। और दूसरों को नीचा होने की मान्यता बनाती है। देखा यहाँ तक गया है कि एक ही बड़ी जाति के अंतर्गत पाई जानें वाली उपजातियाँ तक अपने-अपने को ऊँचा ठहराती हैं, दूसरों को नीचा बताती हैं, अपने दायरे से आगे बढ़कर कोई किसी के साथ रोटी-बेटी जैसे रिश्ते बनाने को तैयार नहीं होता। यह बिखराव की भयावह स्थिति है। इसके रहते कोई देश, समाज पारस्परिक घनिष्ठता के सूत्र में नहीं बँध सकता। यह जातिवाद भी एक प्रकार की संकीर्णता, कट्टरता ही है। इसे हटना और हटाया ही जाना चाहिये। जातियों, वंशों के बीच समन्वयवादी तालमेल बैठना ही चाहिये।

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