परिवर्तन की महा बेला में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें
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महत्वपूर्ण परिवर्तन, घटनाक्रम, क्राँतियाँ अनायास होती दिखाई पड़ती तो हैं, किंतु गंभीरतापूर्वक तथ्यों का अवलोकन करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि इस परिवर्तन के पीछे न जानें कब से परिस्थितियाँ बन रहीं थीं एवं सम्भावनाओं का जाल जंजाल अनायास फूट पड़ने के लिए ताने-बाने बुन रहा था। हाँ, स्थूल दृष्टिकोण से चर्म-चक्षुओं को ये सारे परिवर्तन चमत्कारिक ढंग से घटते हुए प्रतीत होते अवश्य हैं। पर लगता नहीं कि यह उथल-पुथल लंबे समय से निर्मित परिस्थितियों का प्रतिफल हैं। पता तब चलता है जब ये सारी घटनाएं घट चुकती हैं। उस समय सिर्फ पछतावा ही हाथ लगता है और चिंतन का क्रम प्रारंभ हो जाता है कि काश। हम भी दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाये होते और संभावनाओं को देखते हुए अपने क्रिया-कलापों में परिवर्तन पहले से किये होते तो महत्वपूर्ण श्रेय-सौभाग्य से वंचित भी न होते और दुःखद संभावनाओं से भी बच निकलने का रास्ता मिल गया होता।
महापुरुष, महामानव, देवमानव अवतार संत, सुधारक, शहीद उन परिस्थितियों को पहले से परख कर सुखद संभावनाओँ को लाने के लिए प्रबल-पुरुषार्थ में जुट पड़ते हैं और विपरीत परिस्थितियों के प्रति सचेत हो जाते हैं। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त एवं पृथ्वी के महत्वपूर्ण उथल पुथल से लेकर ब्रह्मांडीय विस्फोटों तक यही एक तथ्य उभर कर सामने आता है कि परिवर्तन लंबे काल से चल रही प्रक्रिया का परिणाम है। किसी आकस्मिक प्रतिक्रिया की परिणति नहीं।
माँ के गर्भ में प्रसव काल के समय उठने वाली पीड़ा एवं नवसृजन के परिवर्तनों को देखकर छोटे बच्चे एवं बुद्धि के लोग यही सोचते हैं। कि कल तक तो माँ स्वस्थ थीं, आज अचानक क्या हो गया। यह परिवर्तन उन्हें अजीब सा लगता है और उनके लिए मात्र कौतुक-कौतूहल से भरा हुआ जान पड़ता है, किंतु संबंधित व्यक्ति एवं चिकित्सक जानते हैं कि यह परिवर्तन तो उस समग्र व सहज प्रक्रिया का ही अंग है, जिसकी संभावना नौ माह पूर्व बन चुकी थी ओर उस भ्रूण कलल का बीजारोपण हो चुका था जो चेतन बिंदु को खींचकर ले आये।
आधि - व्याधियोँ के बारे में चरक, सुश्रुत, धन्वंतरि प्रभूति मनीषियों ने एक ही बात स्पष्ट की है कि जो बीमारियाँ अनायास होती दिखाई पड़ती हैं, जिसके दबाने के लिए ही एलोपैथिक चिकित्सक लाल, पीली गोलियाँ एवं कैप्सूल देते और बदले में रोगों को निकलते हुए देखते हैं। सामान्य जन इन रोगों के बारे में सोचते हैं कि यह गड़बड़ी तो कल ही हुई, किन्तु उपरोक्त शोधकर्ताओं ने बताया है कि स्थूल आकार धारण करने वाला रोगों का जखीरा लंबे समय से चले आ रहे असंयम का ही दुष्परिणाम है, इसे ठीक करने के लिए चिकित्सा व्यवस्था से लेकर लंबे समय तक संयमशीलता अपनाने की भी सलाह उन्होंने दी और कहा है कि तभी रोगों से मुक्ति संभव है। मनुष्य इन्हीं रीति-नीति को अपनाकर अपने स्वास्थ को अक्षुण्ण रख भी सकता है।
दाँत सड़ने की घटना अचानक एक दिन में ही प्रकाश में आती है, किन्तु इसके लिए चिकित्सकों ने लंबे समय से चली आ रही चटोरेपन एवं शक्कर से बनें पदार्थों का बाल्यावस्था से प्रयोग और इन्द्रिय लोलुपता अपना कर जीवनी शक्ति का क्षरण ही मुख्य कारण बताया है। वर्षा, आँधी, चक्रवात, ज्वालामुखी, भूकंप जैसी घटनाओं के बारे में संबंधित वैज्ञानिकों ने एक ही तथ्य स्पष्ट किया है कि घटनायें भले ही क्षणों में घट जाती हैं पर इसका अर्थ यह नहीं कि यह सब सामयिक परिस्थितियों का परिणाम है, बल्कि प्रकृति में यह क्रम बहुत पहले चल चुका होता है।
वर्षा के पहले ग्रीष्म ऋतु में तपन का क्रम बन चुकता है, जिससे मानसून की हवायें प्यास बुझाने के लिए चल पड़ती हैं और घनघोर वर्षा करती हैं। आँधी एवं चक्रवात के समय क्षण में ही तिनकों पत्तों एवं धूल कणों को आकाश में उड़ते हुए देखते हैं। इस तीव्र प्रकृतिगत असंतुलन के पीछे कारण उस क्षेत्र में कम दबाव का बन जाना होता है। जिसे पूरा करने के लिए सभी दिशाओं से तीव्र हवा के झोंके चलने लगते हैं। ज्वालामुखी एवं भूकंप के लिए पृथ्वी के नीचे गैसों के बवंडर वर्षों से उमड़ते घुमड़ते रहते हैं एवं चमत्कार दिखाने धरती को हिलाने और छेद कर बाहर निकलने के लिए आतुर रहते हैं। ये घटनाएँ कुछ ही क्षणों की होती हैं। इसमें करोड़ों रुपये की संपत्ति मिनटों में ही नष्ट हो जाती है पर ऐसी परिस्थितियाँ कई वर्षा से निर्मित हो रही होती हैं।
वैज्ञानिकों, विद्वानोँ, विद्यार्थियों, एवं मनीषियोँ के बारे में भी तथ्य ऐसा ही कुछ है। न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धाँत की खोज, जेम्सवाट द्वारा स्टीम इंजन बनाया जाना, जगदीशचन्द्र बसु द्वारा पेड़−पौधों में जीवन होने का संकेत ग्राहमबेल द्वारा बिजली शक्ति का उत्पादन, आर्किमिडीज द्वारा प्रतिपादित उत्पलावन सिद्धाँत, कोपरनिकस के पृथ्वी के घूमने एवं सूर्य के स्थिर रहने की बात, ये सभी महत्वपूर्ण खोजें एक दिन ही घटित हुई। किंतु इन वैज्ञानिकों के जीवन को देखने पर स्पष्ट पता चलता है कि इसके लिए उन्हें जीवन भर तत्परता एवं तन्मय पूर्वक एक दिशा में जुटे रहना पड़ा। तब ये महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत हो पाई। गोता खोरों की तरह मणि, मुक्तक प्राप्त करने के लिए नित-निरंतर डुबकी लगाते रहे। किसी निश्चित दिन सफलता मिलने पर यह तो नहीं कह सकते कि यह उपलब्धि उन्हें एक दिन में मिली। वह तो उनके लंबे समय से चलने वाले प्रबल पुरुषार्थ, अदम्य साहस एवं जीवट का प्रतिफल था।
विद्यार्थी को अंकसूची एक दिन में मिल जाती है, किन्तु उसके लिए उसे एक वर्ष तक अपने समस्त लालसाओं की ओर से ध्यान हटाकर एकाग्रता पूर्वक जुटे रहना पड़ता है। रामायण, महाभारत, उपनिषद् जैसे आर्ष साहित्य एवं कैयट द्वारा लिखित भामती, चरक संहिता जैसे ग्रंथ प्रकाश में तो एक दिन में आये, लेकिन इसके लिए रचनाकारों को पहले से न जानें कितना परिश्रम करना पड़ा था। कार्लमार्क्स द्वारा ‘दास कैपिटल ‘उनके जीवन भर के अध्ययन का सार था। टाम काका की कुटिया, लिखने वाली हैरियट स्टो के मन मस्तिष्क में बाल्यावस्था से ही दास प्रथा को बन्द करने वाले क्राँतिकारी विचार उमड़ रहे थे। ये घटनाएँ बताती हैं कि परिवर्तन तो क्षण में दिखाई पड़ते हे। किन्तु उसके पीछे मानवी पुरुषार्थ प्रकृतिगत व्यवस्था एवं सामाजिक परिस्थितियाँ न जानें कब से काम करती रहती हैं, तभी अचानक यह परिवर्तन एक दिन संभव हो जाता है। जिसे आमतौर से चमत्कार की संज्ञा दे दी जाती है।
इन दिनोँ संसार भर में घट रहे घटनाक्रम को भी ऐसा ही माना जाना चाहिए और समझना चाहिए कि जो कुछ वर्तमान में फलित हो रहा है। वह लंबे समय से चलने वाली प्रक्रिया की परिणति है। ऐसे अवसर लाखों वर्षों में कदाचित् ही उपस्थित होते हैं, जब संपूर्ण विश्व का समग्र का या-कल्प हो तो दिखाई पड़े। इतिहास में जब-जब ऐसे मौके प्रस्तुत हुए हैं। तब-तब उनमें भगवान का प्रत्यक्ष हाथ होने का अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित हुआ है और उनसे साझेदारी करने वालों को अनुदान-वरदान से निहाल होते देखा गया हैं। आज का समय भी वैसा ही अपूर्व है, जिसमें चहुँओर ईश्वरीय हस्तक्षेप हस्तामलकवत दिखाई पड़ रहा है। हम इसमें भागीदारी, निभाकर वैसा ही श्रेय-सम्मान अर्जित कर सकते हैं, जैसा कभी हनुमान-अंगद, नल-नील ने किया था। कही ऐसा न हो कि यह स्वर्णिम अवसर हम चूक जायें और जन्म भर पछताते रहें।

