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Magazine - Year 1993 - Version 2

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मरने से डरना क्या?

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शरीर मरणधर्मा है। जो इस संसार में आता है, उसे एक-न-एक दिन जाना पड़ता है। उसकी मृत्यु निश्चित रूप से होती है, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो आनंद और संतोषपूर्वक जीते और उसी उत्साह से मृत्यु को गले लगाते हैं, जबकि अधिकाँश उसका नाम सुनकर ही भयभीत हो उठते व उससे बचने की अपनी प्रबल इच्छा व्यक्त करते हैं।

देखा जाय तो इन दो प्रकार के लोगों में मूलभूत अंतर उनकी अपनी जीवन शैली के कारण होता है। एक जो समाज के लिए जीना और उसी के लिए मरना चाहता है, जो अपने “स्व”को गलाकर “पर”में मिला लेता है। और जिसकी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाएँ पूर्णतः समाप्त हो गई हैं, उसके लिए मृत्यु भी वैसी ही संतोषप्रद होती है, जैसी जिन्दगी, पर जो लोग कूपमण्डूक बन कर स्वार्थपरायण जीवन जीते हैं, उनकी व्यक्तिगत इच्छाएँ अनंत -अपूर्ण होने के कारण जब तक जीते हैं, तब तक तो दुःख तकलीफ उठाते ही रहते हैं, मरते समय भी इससे मुक्त नहीं रह पाते और मौत को दुःखद बना लेते हैं।

मनोवैज्ञानिकों ने मृत्यु-भय के दो कारण बताये हैं-एक अनभ्यास दूसरा आकाँक्षा प्रायः देखा जाता है कि जिस अवस्था अथवा कार्य का हमें अभ्यास या अनुभव नहीं होता, उससे डर लगने लगता है। जिस व्यक्ति को अँधेरे में नहीं रह सकता। जो व्यक्ति कभी किसी सुनसान स्थान अथवा जंगल में नहीं रहा हो, उसका ऐसे अवसर आने पर दिल धड़कनें लगता है। यही बात मौत साथ भी लागू होती है। इसका जीवन में पहले किसी ने एहसास किया हो, ऐसा किसी को याद नहीं आता, तब तो उसका अभ्यास ही कैसे संभव हो? भले ही शरीराँत अकष्टकर और पीड़ाहीन हो, फिर भी उसका भय प्रथम बार पानी में तैरने अथवा हवाबाजी करने की तरह सतत् बना रहता है।

पर भय का इससे भी महत्वपूर्ण कारण मरने वाले की अतृप्त इच्छाएँ हैं। जब तक व्यक्ति को ऐसा महसूस होता रहे कि अभी उसे बहुत कुछ जानना करना और भोगना शेष है, और इसी बीच उसका जीवन-शकट अवरुद्ध होता दिखाई पड़े, तो तब तक, वह चाहे ज्ञानी-अज्ञानी, नास्तिक-आस्तिक कोई भी हो, उसकी जिजीविषा समाप्त नहीं हो सकती। यदि यात्रा के दौरान गाड़ी खराब हो जाय, और गंतव्य अभी दूर हो, तो यात्रीगण निराश हुए बिना नहीं रहते, किंतु यात्रा पूरी होने के उपरान्त गाड़ी का कुछ भी हो जाय, इसकी चिंता उन्हें नहीं होती।

जीवन में ऐसी स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति की कामना और शरीर के बीच परस्पर सामंजस्य नहीं होता। व्यक्ति की तृष्णा अपूर्ण होती है और शरीर अपनी आयु पूर्ण करने को होता है, तो व्यक्ति शोकाकुल हो उठता है। फिर उसे जीवन की इस अंतिम कड़ी के स्मरण से ही डर लगने लगता है। दूसरी ओर ऐसे भी उदाहरण देखने को मिलते हैं, जिसमें मृत्यु का आलिंगन खुशी-खुशी कर लिया जाता है। भगतसिंह, विवेकानन्द, शंकराचार्य आदि ऐसे पुरुष हुए हैं, जिन्हें मरने का भय तनिक भी नहीं रहा।

आखिर व्यक्ति अपने अंतिम समय में अभय क्यों नहीं रह पाता? क्यों उसे मौत की पीड़ा सताती रहती है। क्यों कुछ लोग इसके प्रति साहस सँजो लेते हैं? जबकि अधिकाँश असंतुष्ट व भयभीत बनें रहते हैं? गंभीरता पूर्वक विचार करने में आता है वह व्यक्ति की स्वार्थ और परमार्थपरक, व्यक्ति और समाजपरक गतिविधियाँ।

वस्तुतः जब व्यक्ति का जीवनोद्देश्य महान हो, वह समय अथवा समाज की किसी ऐसी समस्या के समाधान में निरत हो, जो समय साध्य हो एवं जिसके हल के लिए किसी एक व्यक्ति का प्रयत्न - पुरुषार्थ काफी न हो, वरन् समाज के एक बहुत बड़े समुदाय के समग्र जीवन एवं लम्बा समय अभीष्ट हो, तो ऐसा उच्च प्रयोजन अपने साथ ओत-प्रोत होने वाले व्यक्ति को शाँति और संतोष पूर्वक शरीर त्यागने की शक्ति प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है, कि जिस प्रयोजन में लोकमंगल की, समाज कल्याण की कामना निहित हो, उसकी गणना श्रेष्ठ कार्यों में होती है। ऐसे कार्य करने वाले व्यक्ति को मरते समय संतोष रहता है कि उसने अपने मानवोचित कर्त्तव्यों का पालन करते रह कर समय और समाज की आजीवन अमूल्य सेवा की और जीवन को धन्य बताया। मृत्यु भय ऐसे लोगों को नहीं होता। वास्तविकता तो यह है कि इनकी अंतिम साँसें अत्यन्त चैन और शाँतिपूर्वक निकलती है। उनमें लक्ष्य पूर्ति के लिए जीने का भी उत्साह बना रहता है और यदि इसके लिए जीवनोत्सर्ग आवश्यक हुआ, तो उससे भी पीछे नहीं हटते।

इसके विपरीत यदि जीवन ध्येय घर परिवार के छोटे दायरे तक ही सीमित संकुचित रहा और व्यक्ति सदा अपनी ही उन्नति-प्रगति की बात सोचता एवं योजनाएँ बनाता रहा, तो न तो जीते जी उसे शाँति मिल सकेगी, न मरणोपराँत। मृत्यु के दौरान भी उसका ध्यान उसी ओर लगा रहेगा। ऐसी स्थिति में व्यक्ति द्वारा लंबे जीवन की कामना करना स्वाभाविक है और यदि इसी बीच मौत की घड़ी अकस्मात् उपस्थित हो गई, तो उसकी घबराहट और चिंता का बढ़ जाना अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि उसकी इच्छाएँ अपूर्ण रहती है, जिसे वह हर हालत में पूर्ण होता देखना चाहता है, पर वह हो कैसे ?इच्छाएँ सीमित हो, तब तो यह संभव भी है, किंतु”इच्छाएँ अनंत होती हैं”-अर्थशास्त्र का यह प्रसिद्ध सिद्धाँत चरितार्थ होता हो, वहाँ किसी की समस्त इच्छाएँ सदा पूरी कैसे होती रह सकती हैं?ऐसे व्यक्ति में उसकी एक इच्छा पूर्ण हुई नहीं कि दूसरी आ धमकती है और दूसरी के बाद तीसरी जीवन इन्हीं के पूर्ति -प्रयास में लगा रह जाता है। एवं इसी मध्य मौत के क्षण आ जाते हैं। इस समय तक भी जब वह अपनी कामनाएँ अधूरी पाता है, तो परेशान हो उठता है, एवं महाप्रयाण से कतराने लगता है।

तात्पर्य यह कि जब तक जीवन-लक्ष्य में समूह और समुदाय की कल्याण-भावना समाहित न हो, तब तक मृत्यु सुखद संतोषप्रद नहीं हो सकती। जब व्यक्ति ऐसे कार्य में अपना श्रेय-सम्मान समझ कर जीवन में उसे महत्व देता एवं आवश्यकतानुसार समय, श्रेय, और संपदा नियोजित करता है, तब उसका सत्परिणाम जीवन में स्वर्ग -मुक्ति का आनंद लाभ के रूप में सामने आता और अंतकाल में तृप्ति-तुष्टि प्रदान करता है। फिर ऐसे लोगों के लिए मौत कष्टकारक नहीं रह जाती। चूँकि इनका एकमेव लक्ष्य समाजपरक होता है, अस्तु आजीवन इसके सुधार, निर्माण उत्थान की बात सोचते रहने से व्यक्तिगत इच्छा-आकाँक्षाएँ जाग्रत हो नहीं पातीं, फलतः उनकी पूरी-अधूरी होने का विचार भी मन में नहीं उठता। अतः तत्संबंधी कोई चिन्ता भी नहीं सताती। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक उत्थान के लिए अनेकों के समय और श्रम अपेक्षित होते हैं, साथ ही इसकी सिद्धि भी लंबे काल में हो पाती है, न तो किसी एक व्यक्ति का पराक्रम ऐसे कार्य को पूरा कर सकता है, न ही स्वल्प अवधि में इसके पूर्ण होने की गुँजाइश रहती है, अतः प्रयोजन अधूरा रहने पर भी इसमें संतोषपूर्वक जीने और मरने की पूरी-पूरी संभावना रहती है। मृत्यु को जीतने और उसे भयमुक्त बनाने का निस्संदेह यही सरल -सुनिश्चित मार्ग है।

वस्तुतः मानवी जीवन अपने उद्गम स्रोत से निकल कर समुद्र की ओर प्रवाहमान होने वाली गंगा के समान है। उसकी एक-एक बूँद एक-एक व्यक्ति के समान है। यदि यह बूँदें अपना पृथक अस्तित्व बना कर रहना चाहें और अपनी आकाँक्षा पूर्ति के लिए मनमर्जी ढंग से इधर-उधर बहना चाहें तो क्या वह प्रवाहमान रह पायेंगी?अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर पायेंगी?संभवतः नहीं। इसके लिए उसे अपना व्यक्तिगत अस्तित्व त्यागना पड़ेगा और नदी-जल राशि बन कर चलना पड़ेगा, तभी उसकी गति -प्रगति है, अन्यथा अकेली बूँद तो कुछ ही देर में गर्मी से भाप बन जायेगी, अथवा जमीन द्वारा सोख ली जायेगी, या वृक्ष-वनस्पतियों जीव-जन्तुओं द्वारा उदरस्थ हो जायेगी। इस प्रकार उसका दुःखद अंत हो जायेगा और समुद्र से मिलने की उसकी चाहें धरी की धरी रह जायेंगी। अस्तु बूँद समुद्र से मिल सकें, इसके लिए आवश्यक है कि वह नदी जल सके एकाकार होकर आगे बढ़े। इसी में उसकी स्वयं की सार्थकता और उसका सुखद अंत सन्निहित है।

मनुष्य भी अपना स्वार्थ त्याग कर समाज से एकाकार हो सके, अपनी व्यक्तिगत अभिलाषाओं को समाज की उन्नति-प्रगति में विसर्जित कर सके और पृथक अस्तित्व बनाये रहने का उसका कोई आग्रह न हो, तो निश्चय ही उसके जीवन मृत्यु के बीच का भेद मिट सकता है। फिर इस स्थिति में जीवन में जिस आनंद की अनुभूति करता है, मरते समय भी उसे ऐसी ही शाँति का एहसास होगा।

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