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Magazine - Year 1993 - Version 2

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इन दिनों लोक चिंतन का प्रवाह इस दिशा में है कि मनुष्य शरीर मात्र है और उसके लिए जितना सुविधा साधनों का बाहुल्य होगा, वह उतना ही सुखी एवं प्रसन्न होगा, पर यह मान्यता आँशिक रूप से ही सत्य है। यह भुला नहीं देना चाहिए कि मनुष्य की वास्तविक सत्ता उसकी चेतना में सन्निहित है। वह शरीर से भिन्न भी है। यदि जीवन तत्व शरीर से पृथक हो जाये तो मात्र अकेली काया सुख साधनों के बाहुल्य होने पर भी किसी प्रकार की अनुभूति न कर सकेगी। इतना ही नहीं, वह अपनी सत्ता भी देर तक यथावत् बनाये न रह सकेगी। थोड़ी देर में वह सड़ने गलने लगेगी। जीव जन्तुओं का भक्ष्य बन जायेगी। ऐसी दशा में सुख साधनों का लाभ तो उसे मिल ही कैसे सकेगा? शरीर को यदि सब कुछ मान लिया जाये, तो भी अकेले सुविधा साधन उसे स्वस्थ, सुखी और सक्षम बनाये रहेंगे, इस बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता। अनुगमन चेतना का होता है। चेतना का स्तर गड़बड़ा जाये, तो फिर साधनों की बहुलता भी कुछ काम न आ सकेगी। मस्तिष्क को चेतना का केन्द्र माना जाता है। उसे यदि क्लोरोफार्म आदि के सहारे संज्ञाशून्य कर दिया जाये, तो शरीर का किसी प्रकार की अनुभूति न हो सकेगी। यहाँ तक कि बड़ा आपरेशन होने पर भी पता न चलेगा कि किसी अंग की काट-छाँट तक हो रही हैं। अन्य प्रकार से मूर्च्छा आदि की स्थिति हो जानें पर शरीर को किसी प्रकार की अनुभूति नहीं होती। यहाँ तक कि मृत्यु हो जानें पर शरीर को अपना अस्तित्व होने, न बचने तक का पता नहीं चलता। जीवन तभी तक हैं, जब तक चेतना है।

चेतना को शरीर के साथ घुला मिला तो देखा जा सकता है, पर उसकी स्वतंत्र सत्ता वस्तुतः उससे है सर्वथा अलग। वही न होता, तो शरीर के यथावत् बनें रहने पर भी मृत्यु हो जानें पर भी चेतना का स्वतंत्र अस्तित्व मरणोत्तर जीवन के रूप में पाया जाता है। पुनर्जन्म के अगणित प्रमाण उपलब्ध होते हैं। अशरीरी भूत-प्रेत जैसी आत्माओं के अस्तित्व भी सप्रमाण पाये गये हैं। इससे दोनोँ की सत्ता एक-दूसरे के पृथक ही मानना पड़ता है। जड़ और चेतन से मिल कर जीवन बनता है। पंच तत्वों को सम्मिश्रण काय-कलेवर का निर्माण करता है और उसमें अनुभूतियाँ करने की शक्ति तभी तक काम करती है, जब तक कि जीवन का अस्तित्व बनारहता है। प्रत्यक्ष जीवन को जड़ और चेतन का संयुक्त अस्तित्व माना जाये, तो कुछ अत्युक्ति न होगी। दोनों के सर्वथा पृथक हो जाने पर तो सारा सीराजा ही बिखर जाता है। जिसे कुछ समय पूर्व जीवित कहा जाता था, वही प्राण निकलने पर सड़ने लगता है। जीवन के साथ ही संबंध भी समाप्त हो जाता है। मृतक शरीर को जल्दी ठिकाने लगा देने की उतावली पड़ती है। इसके विपरीत यदि चेतना के साथ संबंध जुड़ा हो तो उससे जन्म-जन्मान्तरों का किसी न किसी रूप में सूत्र जुड़ा रहता है। यह सब शरीर और चेतन के प्रमाण हैं।

इन प्रचलित मान्यताओं में शरीर को एकाँकी समर्थ माने जानें के कारण ऐसा सोचा जाता है कि शरीर-सुविधाएँ यदि जुटायी जाती रहें तो मनुष्य प्रसन्न रह सकता है, पर यह मान्यता भी गलत है। यदि मन किसी कारण खिन्न-विपन्न स्थिति में हो, तो भूख, नींद तक गायब हो जाती है और स्वजन विछोह जैसा कष्ट इतना कष्टकारक होता है कि उसे शरीर पीड़ा से किसी प्रकार कम नहीं कहा जा सकता। अपमान, हानि, घाटा, असफलता जैसे मानसिक कष्ट भी ऐसे त्रासदायक होते हैं। कि उनसे अत्यधिक पीड़ित होकर मनुष्य आत्म हत्या कर तक कर बैठता है। इसका अर्थ यह हुआ कि बड़ी-बड़ी सुविधा होते हुए भी चेतना की व्यथा इतनी अधिक कष्टकारक होती है कि उसकी तुलना में शरीर को गँवा देना भी कम मालूम पड़ता है।

प्रसन्न रखने और सुख पाने के लिए सिर्फ सुविधा साधनों से ही काम नहीं चल सकता उसके लिए यह भी आवश्यक है कि मानसिक प्रसन्नता भी जुड़ी रहे?यहाँ यह विचारणीय है कि मात्र साधन ही शरीर और चेतना दोनों को समान रूप से सुखी नहीं रख सकते। ऐसे अवसर तो कभी-कभी ही कदाचित् ही आते हैं। जब यह आभास ही नहीं होता कि उन्हे किसी प्रकार का कष्ट है। पर बहुधा होता उससे उल्टा है। आत्म प्रताड़ना, अंतः व्यथा, असंतोष, खेद, उद्वेग आदि का कारण मानसिक होता है। दुष्कर्मां ओर दुष्प्रवृत्तियोँ का प्रभाव ही ऐसा होता है। जो अन्तस् को विचलित कर देता है। इसके विपरीत ऐसा भी होता है कि परमार्थ के लिए किया गया त्याग और शरीर से सहायता करना इतना आनंदित करता है कि उसके लिए उठाई गई प्रत्यक्ष हानि भी दुःख देने की अपेक्षा आनंद और उल्लास ही अधिक प्रदान करती है।

त्यागी, तपस्वी, संत, महामानव, दानी, परोपकारी आदि को आर्थिक एवं शारीरिक दृष्टि से घाटा ही उठाना पड़ता है, इतने पर भी उसकी प्रसन्नता इतनी बड़ी चढ़ी होती है, कि उसकी तुलना में प्रत्यक्ष घाटे को नगण्य गिना जाता है। उपवास आदि के कुछ कार्यों में शरीर को जितना कष्ट होता है, उसकी तुलना में मानसिक संतुष्टि कहीं अधिक होती है। यह नर-नारी के सम्मिश्रण से चलने वाली प्रगति का समय है। कोई छोटा, कोई बड़ा बन कर रहे, कोई दुर्बल, कोई सशक्त बना रहे-कोई अपने दबाव में दूसरे को कसकर रखे, तो इससे कोई सुखी-संतुष्ट न रह सकेगा। एक का असम्मान दूसरे पर खिन्नता लादे बिना न रहेगा। पिछले दिनों का इतिहास इसका प्रमाण है। दमित नारी से मनमर्जी काम भले ही करा लिया हो, पर उसके साथ ही मनो मालिन्य और कुत्सा का ही जन्म हुआ है, साथ ही पतन पराभव का भी। दमित व्यक्ति की प्रतिभा क्षीण होती है, और खिन्न रहने वाला व्यक्ति सहयोग, सहानुभूति पूर्वक दूसरे का काम नहीं कर सकता। ऐसी दशा में उत्पन्न विपन्नता के बीच रहने वाला अपने मनोबल को गिराता गँवाता चला जाता है। जो शरीर की दुर्बलता से भी महँगा पड़ता है। हल में एक बैल समर्थ और दूसरा दुर्बल हो जाता हो, तो मात्र दुर्बल को ही सामर्थ्य से बाहर बहन नहीं करना पड़ता, समर्थ को भी स्थिति में अधिक भार वहन करना पड़ता है। असंतुष्ट दांपत्य जीवन भी इसी प्रकार भारभूत बनकर रहता है। उनके बीच साझेदारी के साथ जुड़ी हुई सद्भावना पनप ही नहीं पाती। इसमें पुरुष का अहंकार तो प्रमुख कारण होता ही है। दूसरा यह अनीति मूलक तथ्य भी जुड़ा होता है कि प्रतिरोध न कर पाने वाले दुर्बल का अधिक शोषण क्यों न किया जाय?यह स्थिति दोनों ही पक्षों के लिए कष्ट कारक और घाटे में रखने वाली है। इसी के चरितार्थ होने से अधिकाँश पति-पत्नी उस आनंद और उत्कर्ष से वंचित रहते हैं, जो पारस्परिक स्नेह सहयोग के बीच सहज ही पनप सकता है।

शोषण की प्रवृत्ति अपना कर कोई दूसरे से प्रत्यक्षतः कुछ लाभ भले ही उठा ले, पर दुर्भाव और असंयम के पनपते ऐसा मनोमालिन्य ही पनपता है, जिससे घाटा उठाने वाला तो दुःखी रहता ही है, सुखी वह भी नहीं रह पाता, जिसने इच्छा के विपरीत किसी प्रकार का शोषण या दहन किया है। पति-पत्नि के बीच जिस सद्भावना और सहयोग की आशा की जाती है, वह इसके बिना पनप ही नहीं सकती कि न्याय निर्वाह ठीक प्रकार चलता रहें। उत्पीड़न से उठाया गया लाभ अंततः घाटे से भी महंगा पड़ता है। इसके बिना लाभ भी नहीं उठाया जाता। खिन्न-विपन्न मानसिकता के रहते असहयोग से भी भारी पड़ता है। उससे उस लाभ की आशा नहीं की जा सकती, जो किसी को दबा, सता कर किसी प्रकार पूरा कराया गया है।

सहयोग पाने वाले का इस संदर्भ में उत्तरदायित्व अधिक है। उसे अपनी विशिष्ट सद्भावना का परिचय देना पड़ता है। सद्भावना बोने पर सहकारिता का अंकुर उगता है। यह कार्य बलपूर्वक सता कर या दबाकर पूरा नहीं कराया जा सकता। पहले बीज बोना पड़ता है, इसके बाद ही काटने का अवसर सामने आता है। निष्ठुरता बरतने और अपनी ही मर्जी को प्राथमिकता देने की स्थिति में किसी प्रकार दमन पर आधारित श्रम भर कराया जा सकता है। पर जब उस निष्ठुरता में अनाचार बरते जानें की गंध आती है तो सहज ही प्रतिशोध जैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। इस प्रकार किसी से कुछ करा लेने पर अपने दर्श अहंकार का प्रदर्शन किया तो जा सकता है। उकसाया और आतंकित भी किया जा सकता है, पर वह स्थिति बन ही नहीं पाती, जिसमें श्रद्धा उपजती और सेवा-सहायता की प्रवृत्ति उमंगती है।

सहयोग और शोषण का प्रतिफल जिन्हें मिलने का ज्ञान है उन्हें दूरदर्शिता और समझदारी की नीति अपनानी चाहिए। सेवा सद्भावना और सहकारिता का अपनी ओर से बढ़ा चढ़ा अनुदान प्रदान करने के बाद ही यह आशा करनी चाहिए कि बदले में सेवा, सद्भावना और सहकारिता की वापसी “बोओ-काटो” सिद्धाँत के अनुसार मिल सकेगी। इस संदर्भ में जो पहले करता है, आगे रहता है, वह अपने बड़प्पन का परिचय देता है। और उसके बदले ऐसा सहयोग भी पाता है। जो भयभीत आतंकित करने वाले को कभी हस्तगत नहीं हो सकता। अच्छा हो, इस संबंध में समर्थ समझा जानें वाला पक्ष पहल करे और सेवा के बदले सहकारिता की अपेक्षा रखे। अच्छा तो यह है कि अपने कर्तव्य पालन में अग्रणी रहा जाये और साथी को किसी प्रकार की शिकायत करने, उलाहना देने का अवसर ही न आने दे।

मैत्री सबसे बड़ी उपलब्धि है। जड़ पदार्थों को पाकर मनुष्य प्रसन्नता और सबलता अनुभव करता है, फिर चेतन पक्ष का सर्वोत्तम उपहार यदि मैत्री के रूप में अर्जित कर लिया जाय, तो समझना चाहिए कि अधिक मूल्यवान और अधिक महत्वपूर्ण लाभ अर्जित कर लिया गया। संसार में अधिक सुखी उसे माना जाता है, जिसके कि सच्चे मित्रों की संख्या अधिक है। शत्रुता तो मनुष्य से दुर्व्यवहार के बदले खरीदी जा सकती है। अपनी ओर से बरती गयी असहिष्णुता एवं उपेक्षा तो किसी को भी अपने से पराया बना सकती है। हाथों हाथ इससे लाभ-हानि का परिचय भले ही न मिलता हो, पर मनों में पड़ी दरार कुछ ही दिन में वह प्रतिफल सामने ला खड़ा करती हैं, जिससे सहज प्रतीत हो जाता है कि असहिष्णुता, अन्यमनस्कता, निष्ठुरता, उद्वेग जैसा बरताव के कारण किसी को खिन्न कर देने के कारण अंततः किसी न किसी दिन अधिक घाटा उठाना पड़ता है।

यह तो लोकाचार का प्रसंग हुआ। हृदय जीतना या किसी के मन में अपना स्थान बना लेना कितना बड़ा लाभ है, इसका पता तब चलता है, जब क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आती है। इस दृष्टि से मैत्री सबसे अधिक लाभदायक सिद्ध होती है। सद्भावनाओँ का आदान-प्रदान इतना अधिक सुखद है, जिसकी तुलना में और किसी लाभ की कामना नहीं की जा सकतीं सद्व्यवहार अपनाकर सेवा सहायतार्थ अवसर ढूंढ़ते रहना और जब कभी भी वे मिलें तब उन्हें चरितार्थ किये बिना न चूकना, ऐसी नीति है, अनेक लाभों के साथ फलित होने वाली सद्भावना है, जिसकी तुलना में कदाचित ही कुछ ढूंढ़ा पाया जा सके।

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