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Magazine - Year 1993 - Version 2

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चिंतन मौलिक हो व विचार स्वतंत्र

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चिंतन ही चरित्र एवं व्यवहार का उद्गम स्रोत हैं। इस क्षेत्र की प्रखरता ही अन्य दोनों को भी उत्कृष्ट एवं पवित्र बनाती है, इस महत्ता पर ध्यान न दिये जानें के कारण ही इसके स्वातंत्र्य व निर्मलता पर प्रायः ध्यान नहीं दिया जाता है।

हमारे द्वारा किसी भी चीज को मात्र इसलिए स्वीकार कर लिया जाता है, क्योंकि वह अमुक किसी ग्रन्थ में लिखी अथवा किसी बड़े आदमी द्वारा कही गई हैं। परन्तु संभव है, तत्कालीन परिस्थितियाँ व व्यक्ति विशेष की स्थिति कुछ भिन्न हो। इस पर पुनः चिंतन करके कोई भी अपनी वर्तमान परिस्थितियोँ के अनुरूप उपयुक्त मार्ग दर्शन प्राप्त कर सकता है। साथ ही उसे मौलिकता का गुण भी हस्तगत हो सकेगा।

स्वामी विवेकानन्द ने इस तरह की स्वतंत्रता की अनिवार्यता को अपने एक वक्तव्य में स्पष्ट किया है उनके अनुसार किसी बात को किसी ग्रंथ अथवा किसी व्यक्ति की प्रभुता के आधार पर न स्वीकारना चाहिए। अपितु वही स्वीकार्य है जो निज के विवेक व स्वतंत्र चिंतन द्वारा अपनाई गयी हो।

प्रत्येक व्यक्ति के अन्तराल में मौलिक विचार क्षमता विद्यमान है। इसी कारण प्रत्येक का मन अपने ढंग से एक नूतन संसार का सृजन करता है। अपनी हर यात्रा में मनुष्य यहाँ कुछ नूतन शोध करता है। नवीन रहस्योँ को उद्घाटित करता है। किन्तु इस मौलिक क्षमता का उपयोग करने वाले कम ही लोग होते हैं। अधिकाँशतया विचारों की गुलामी-परवशता को स्वीकार करके समूचे जीवन को गुलाम बना लेते हैं। इसे जीवन के राजमार्ग में भटकाव ही कहा जायेगा क्योंकि कोई भी पथ दूसरे के कंधे पर बैठ कर पूरा नहीं किया जा सकता। चाहे यह विचार के क्षेत्र में हो अथवा व्यवहार के क्षेत्र में।

स्वतंत्र चिंतन व मौलिक विचार ही विद्या है, जिसके द्वारा मानव मन अपना समाधान प्राप्त कर सकता है। जीवन की समस्याएं सुलझा सकता है। अपना सही मार्ग निर्धारित कर सकता है। हर नए पादप के लिए अनिवार्य है। कि अपनी जड़ों पर खड़ा हो। धरती से स्वयं हेतु स्वतः ही जीवन रस प्राप्त करें जिस तरह शारीरिक आवश्यकताओं के लिए मनुष्य को आत्मनिर्भर होकर जीवन निर्वाह करना होता है उसी तरह विचारों के क्षेत्र में भी स्वाधीन हुए बिना उपयुक्त समाधान पाना संभव नहीं। जीवन निर्वाह के लिए दूसरों के सहारे रहना यदि शारीरिक परजीविता है, तो मन, बुद्धि, विवेक पर ताला लगाकर किसी बात या विचार को अपने ऊपर लाद लेना मानसिक परजीविता ही कही जाएगी।

इसका तात्पर्य यह नहीं है कि पुस्तकें न पढ़ी जाएँ अथवा किसी की बातों का श्रवण न किया जाये। पढ़ना और सुनना विचारों की उर्वरता के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। यह चिंतन और विचार प्रक्रिया के लिए एक प्रकार का खाद है। इससे विचार हेतु नूतन आधार विकसित होते हैं। अवएव अध्ययन तथा विद्वानों-मनीषियों के साथ विचार विमर्श अवश्यमेव करणीय है। किन्तु पढ़ी हुई, सुनी हुई सभी बातों को ध्रुव सत्य मान कर बिना सोँचे-विचारे अनुकरण करने लगना भूल ही कही जायेगी। यह अंधानुकरण ही मानसिक दासता है।

पठन और श्रवण के साथ आवश्यक है मनन और

निदिध्यासन। मनुष्य स्वयं के बारे में जितना अधिक समझ सकता है, उतना दूसरा कोई नहीं। यही कारण है, स्वयं के अनुकूल उपयुक्त समाधान वह स्वयं अन्वेषित कर सकता है। उतना अन्य कोई नहीं। पढ़ी और सुनी बातें समाधान हेतु सहायक तो हैं, पर पूर्ण नहीं। पूर्ण समाधान के लिए इन पर मनन करने की आवश्यकता है। तभी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप सामंजस्य बिठा कर सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। यह क्रिया ही समस्या का पूर्ण समाधान दे सकने में सक्षम है।

शासन-तन्त्र में बराबर की हिस्से दारी धन व धरती का समान विभाजन ही सामाजिक स्वतंत्रता हेतु पर्याप्त नहीं है। इसका मूल आधार मानसिक है।

जब तक लोगों के दिलो-दिमाग पर किसी भी मजहब वाद, सम्प्रदाय का कट्टरपन व भेद भाव की गुलामी रहेगी, तब तक समाज परेशान ही रहेगा। समस्याओं की बहुलता और संघर्ष की स्थिति बनी ही रहेगी।

राजनीतिक दासत्व से छुटकारे की प्राप्ति, दासत्व के विष वृक्ष की डालों को छाँटना भर है। इसकी जड़ें तो मनुष्य के मानसिक धरातल में गहरी जमी है। जब तक अपने बारे में सोचने निर्णय करने का काम मनुष्य किसी ग्रन्थ विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के ऊपर छोड़ देता है, तो यही स्थिति दासत्व के गरल विटप को खाद्य प्रदान करने लगती है। ऐसी स्थिति में मानसिकता दासता से छुटकारा नहीं पाया जा सकता।

निःसंदेह हर मनुष्य को अपने जीवन की गीता स्वयं रचनी होगी। किन्तु अंकन कागज के पन्नों पर नहीं, अपितु अन्तरात्मा कृष्ण के मार्गदर्शन पर आचार व व्यवहार के रूप में लिपिबद्ध होगा। यह प्रक्रिया ही जीवन का यथार्थ समाधान अन्वेषित कर सकेगी। ऐसा करने पर ही स्वतंत्रता व जीवन मुक्ति का अधिकार पाया जा सकता है। संसार में जो भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने ऐसे ही जीवन ग्रन्थों का सृजन किया है

इस तथ्य का हृदयंगम करना होगा कि हम स्वयं ही अपनी समस्याओं तथा जीवन की अधिकतम गहराई में प्रविष्ट हो सकते हैं। इसका सही समाधान भी स्वतंत्र विचारणा ही करेगी। इसके अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं-’नान्यः पन्थाः विद्यतेडनायः।’ ईश्वर प्रदत्त बुद्धि, विवेक प्रतिभा को वैचारिक गुलामी से अनावृत करने पर स्वतंत्र निर्णय शक्ति का विकास संभव बन पड़ेगा।

उपरोक्त कथन का यह भाव कदापि नहीं कि अन्य मनीषियों ग्रंथों के विचार व्यर्थ हैं। पर उनकी अव्यर्थता इतनी भर है कि वे चिन्तन के स्वातंत्र्य का राजमार्ग उद्घाटित करते हैं। पर पथ गमन स्वयं ही करना होगा। इसके बिना उद्घाटन का भी महत्व कम हो जाता है। इसी भाव की अभिव्यक्ति करता हुआ उपनिषद् का ऋषि ‘श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः’ का सूत्र प्रतिपादित करता है। मात्र श्रवण करके उसे व्यवहार में उतारने लगना अविवेकपूर्ण है। श्रवण के पश्चात बाह्य व आंतरिक परिस्थितियों तथा सिद्धाँत व व्यवहार के सभी पक्षों पर सर्वांगीण चिंतन ही मनन व निदिध्यासन है। इसी को चिंतन की स्वतंत्र का नाम दिया गया है।

इस प्रक्रिया में विचार की प्रामाणिकता भी परखी जाती है। इस प्रामाणिकता की एक कसौटी है। वह यह कि उसके मूल में सच्चाई हो। जिस विचार से व्यक्ति व समाज के धारण पोषण, सत्व संशुद्धि का निरोध न हो। अर्थात् जिससे व्यक्ति व समाज का जीवन अधिक समर्थ और निर्बल बनें। जिससे विकृति का उदय न हो वही विचार उत्तम है। पर जिस विचार से किसी व्यक्ति या समूह का तो लाभ हो, किन्तु दूसरे घाटे में रहते हों तो समझना चाहिए उसमें कहीं न कहीं दोष अवश्य है। यह एक ऐसा मापदण्ड है, जिससे किसी भी विचार को मापा जा सकता है।

स्वतंत्र चिंतन के लिए व्यक्ति को महान चरित्र व नैतिक बल का स्वामी होना अनिवार्य है। क्योंकि चरित्रहीन एवं अनैतिक व्यक्ति के मन, प्रतिभा व बुद्धि सभी निर्बल व रुग्ण होते हैं। ऐसे लोगों में उन्नत विचारों का क्षेत्र बंजर प्रायः होता है। इसी कारण चारित्रिक दृढ़ता व मन की सबलता अनिवार्य है। जिस तरह वेगवती गंगा को धारण करने के लिए शिव जी सदृश सामर्थ्यवान व्यक्तित्व की आवश्यकता पड़ी। ठीक वैसे ही अंतराकाश से अवतरित होने वाली विचार गंगा को धारण करने के लिए सबल मस्तिष्क व सशक्त विवेक की आवश्यकता है। अन्यथा चरित्रहीन व्यक्ति को यावज्जीवन दूसरों के विचारों का गुलाम होना ही पड़ता है।

मौलिक चिंतन व विचार स्वातंत्र्य की साधना के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है अंतरात्मा की वाणी सुनना। आत्मा हमें निरन्तर अपना परामर्श देती रहती है। यदि इसे सुनने का प्रयत्न किया जाय, तो वैदिक ऋषियों के सदृश अपनी समस्याओं का समाधान निज के अंतराल में प्राप्त कर सकते हैं।

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