
सफलता, असफलता दोनों ही सिखाती है हमें जीवन जीना
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संसार की हर वस्तु में अच्छाई और बुराई पाई जाती है। कुछ वस्तुएं हमें सुख मिलता है। दूसरी कुछ वस्तुएं इसलिये बुरी लगती है क्योंकि वे हमारी इच्छाओं में बाधक है परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। वह हर वस्तु जिसमें हमें केवल अच्छाई ही दिखाई देती है बुराई को भी छिपाये हुये है। हर बुरी दिखाई देने वाली वस्तु अच्छाई से भी पूर्ण है। सफलता सबको प्रिय है और असफलता सब को उदास कर देती है। परंतु वास्तव में सफलता से भी कुछ हानियाँ होती है और असफलता बहुत से कार्यों में हमारे लिये लाभकारी है।
असफलता हमें हमारी भूलों पर विचार करने को विवश करती है कि हम किन भूलों के कारण अपने कार्य को पूरा करने में असफल रहे है।हम अपनी भूलों को सुधारने की इच्छा को भी जन्म देते हैं। हमारे मन में भूलों के सुधार का आधार तैयार होता है। वास्तव में असफलता का कारण मनुष्य की अपनी कुछ निश्चित भूलें है। सामान्य मनुष्य अपनी असफलता का कारण दूसरों को कहने लगता है और स्वयं उससे मुक्त रहना चाहता है। विवेकी मनुष्य ऐसा नहीं सोचता। वह तो भूलों का दोषी स्वयं को मानकर उनकी खोज करता है और सुधारने का मार्ग ढूंढ़ता है। असफलता के कारण असावधानी मन की अस्थिरता श्रम से बचना आलस्य समय का ध्यान न रखना है। अपने व्यवहार की कमियों के कारण भी हम अपनी असफलता का कारण बन जाते हैं हमें हर कार्य में दूसरों के सहयोग की आवश्यकता होती है परंतु उचित व्यवहार का प्रयोग न करने के कारण भी हमें उनका सहयोग नहीं मिलता और हम असफल हो जाते हैं।
असफलता भूल करने वाले पर एक सुधार के लिये दिया गया दंड है। मनुष्य को उचित अनुचित का ज्ञान कराती है। बिगड़े कार्य को बनाने का मार्ग दिखाती।
कार्यों का मार्गदर्शन करती है यह एक स्पष्ट कहने वाले मित्र का कार्य करती है। असफलता कष्टकारक होते हुये चरित्र निर्माण करने वाली है। परंतु सफलता आनन्दमयी होकर भी अहंकार नामक बुराई को छिपाये रहती है जो सावधानी हटी दुर्घटना हुई के आधार पर हानि करने का साधन बन जाती है एक बार सफल होकर मनुष्य अपनी शक्ति और साहस को अधिक महत्व देने लगता है वह अपनी बुद्धि चतुराई और बल को हर कार्य करने योग्य ..................वह समझने लगता है कि मैं भविष्य में हर कार्य को कर ......................किसी कार्य के प्रति ...........आत्मविश्वास उत्पन्न करना अच्छा गुण है यह कार्य में बाधक है। अहंकार कार्य में .............मनुष्य की वास्तविकता ............विश्वास कार्य से संबंधित होते हुये भी भिन्न है।
आत्म विश्वासी कार्य के लिये सद्गुणोँ को आधार मानता है। सावधानी परिश्रम, अध्यवसाय अनुकूल परिस्थितियाँ सहयोग आदि गुणों को आधार बना कर वह कार्य पर दृढ़ता से लग जाता है और परिणाम के प्रति आसक्ति नहीं रखता। इसलिये उसका कार्य आगे बढ़ता रहता है। कर्तव्य पर ध्यान रखते हुये बाधाओं से टक्कर लेना आत्मविश्वासी की पहचान है। अहंकारी छोटी सी सफलता पर इतना इतराता है कि उन सद्गुणों की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता जिन्होंने .................अपने को ही कार्यकर्ता मानता है और भविष्य में हर कार्य को करने की क्षमता रखने वाला मानने लगता है। इस नशे में वह अपनी त्रुटियों पर भी विचार नहीं कर पाता। अहंकार का प्रभाव बुद्धि में विवेक नहीं है। वे छोटा पद या स्थिति प्राप्त करके सज्जनता छोड़ देते हैं। उनका व्यवहार धृष्टता पूर्ण हो जाता है।
व्यवहार की धृष्टता मनुष्य जाति समाज तथा मानव मात्र के लिये हानि कर है। कोई विवेकी ऐसे आचरण की सहन नहीं करेगा केवल कुछ व्यक्ति स्वार्थ सिद्ध होने पर वे भी विरोध करने लगेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अहंकारी का शत्रु बन जाता है।
कोई विवेकशील ऐसे आचरण को सहन नहीं कर सकता। केवल कुछ व्यक्ति अपने स्वार्थ के वशीभूत ही इसे सहन करेंगे। वे भी स्वार्थ पूर्ति हो जाने पर ऐसे आचरण के विरुद्ध हो जायेंगे। इस प्रकार अहंकारी का कोई मित्र नहीं होगा। भगवान भी
अहंकार के विरोधी है। उन्हें यह अवगुण सबसे अधिक अप्रिय है। ईश्वर ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ जीव बनाया है यह महानता ईश्वर की देन है। अपना अस्तित्व तो मानव के लिये तुच्छ है। तुलना करके देखे तो कई बातों में वह पशुओं से भी निम्नतर है। उदाहरण के लिये मनुष्य अपने किसी कार्य को अकेला नहीं करता। उसे दूसरों के सहयोग की आवश्यकता होती है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य में दूसरों का सहयोग विशेष योगदान देता है अकेले मनुष्य में इन गुणों का विकास नहीं हो सकता जिन पर उसे मानव कहलाने का गौरव प्राप्त है। वह वन में जिसे जीव के साथ रहेगा उसका प्रभाव उस पर पड़ जायेगा और उसका विकास नहीं हो पायेगा।
मनुष्य का बाल्यकाल असहाय अवस्था का काल है। जन्म लेने पर उसे यदि सहयोग न मिले तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा।जीवन काल में मनुष्य में कई ऐसे अभाव उत्पन्न हो जाते हैं जो पशु पक्षियों में स्वच्छन्द विचरण करते हुये नहीं होते जैसे बीमारी कमजोरी तथा ज्ञान की कमी। आज के मानव को उपलब्ध सुविधायें सब सहयोग का ही परिणाम है जो उसके पूर्वजों ने उसे प्रदान की है। इतना होने पर यदि मानव अपने को कर्ता समझकर ऐंठ रहा है अहंकार के नशे में चूर है तो इससे बड़ी नीचता क्या हो सकती है कर्ता न होकर कर्ता कहलाने की इच्छा करना हो तो अहंकार है। में करने वाला हूँ यह सब मेरे द्वारा हुआ है में न करता तो यह न होता। ऐसा सोचना ही वह अहंकार है मनुष्य को नीच की श्रेणी में ले जाती है।
सामान्यतया समझा जाता है कि डाकू या हत्यारे का उद्देश्य धन न लूटना है वे मात्र लोभी है परंतु ऐसा उनका भ्रम है। वास्तव में डाकू या हत्यारे का ऐसा रूप लोभ मिश्रित अहंकार देता है। अहंकारी अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये समाज पर अनेकोँ प्रकार के अत्याचार करते हैं ये समाज को हानि पहुँचाने के अतिरिक्त कभी लाभ नहीं पहुँचा सकते।
सिकन्दर, तैमूरलंग, चंगेजखाँ, नादिरीशाह, अहमदशाह, अब्दाली, औरंगजेब तथा नेपोलियन जैसे लोगों ने अपने अहंकार के कारण निर्दोष जनता का खून बहाया और समाज में जाने वाली पीढ़ियों के सम्मुख अहंकार का नमूना प्रस्तुत किया। अहंकार की प्रवृत्ति अपने पर सामान्य मनुष्य जैसी विघटनात्मक कार्य ही अपनायेगी। उसके कार्य में मात्रा का अंतर होता है क्योंकि मात्रा सामर्थ्य और स्थिति पर ही निर्भर रहती है। ऐसे व्यक्ति से समाज पर विपत्ति ही आती रहेगी उससे समाज के हित में आशा रखना बालू में से तेल निकालना है।
अहंकार समाज और व्यक्ति के लिये हानिकारक है। अतः हमें इस कुप्रवृत्ति से सावधान रहना चाहिये कि कहीं यह कुप्रवृत्ति हमारे अंदर न पनप जाये। इससे बचने का सरलतम उपाय यह हे कि हमें अपने हर कार्य में प्राप्त सफलता के लिये अपने भाग्य को बढ़ा चढ़ाकर नहीं आँकना चाहिये बल्कि उसमें सहयोग देने वालों तथा उस कार्य का मार्गदर्शन करने वालों का उचित आभार मानना चाहियें। अनुदानों का उचित मूल्याँकन करें उसकी जाँच पड़ताल करें। ईश्वर का स्मरण करके उसके द्वारा दी गई विभूतियों तथा अनुग्रहों के लिये उसे धन्यवाद देना चाहिये। मनुष्य को हर कार्य के साथ आत्म निरीक्षण करना चाहिये कि वह कितना महान है तथा कितना तुच्छ है और जीवों से महान है तो प्रभु की दृष्टि में कितना तुच्छ है। ईश्वर तो पल में पर्वत को राई कर सकता है। मनुष्य तो एक बुलबुला है। एक कार्य की सफलता दूसरे की गारंटी नहीं वो काल स्थान परिस्थिति पर निर्भर करता हे कि कब और कितना सहयोग और कृपा आने वाले कार्य में मिलेगी। यदि इतना मात्र सोचना हमें आ जाय तो हमं जीवन जीने की कला समझ में आ जायेगी। फिर असफलता से होने वाला दुःख हमारे लिये तप तथा सफलता से प्राप्त होने वाला सुख हमारे लिये योग बन जायेगा।