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Books - गायत्री द्वारा आत्मोत्कर्ष

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Language: HINDI
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गायत्री द्वारा आत्मोत्कर्ष

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संसार में सबसे बड़ी शक्ति आत्मबल की ही है। वैसे व्यवहार में इस समय सबसे अधिक आवश्यकता अर्थ अथवा धन की दिखलाई पड़ती है, पर यदि तनिक भी विचार किया जाय तो स्पष्ट जान पड़ेगा कि अर्थ तो सर्वथा जड़ पदार्थ है। उसमें अपनी कोई शक्ति नहीं, वरन् उसका उपयोग करने वाले पर ही उसकी भलाई-बुराई निर्भर है। जैसे तलवार या बन्दूक के द्वारा जानकार व्यक्ति अपनी और दूसरों की रक्षा कर सकता है, पर इन्हीं हथियारों को यदि एक अनजान या बुद्धिहीन व्यक्ति के हाथ में दे दिया जाय तो वह स्वयं अपने को चोट लगा सकता है। ठीक यही स्थिति अर्थ की भी है। समझदार व्यक्ति धन सम्पत्ति को पाकर उसका उचित रीति से उपभोग करता है, जिससे उसे सुख और लाभ प्राप्त होता है। पर एक मूर्ख अथवा उन्मत्त के हाथ में सम्पत्ति पड़ जाने से वह प्रायः उसका दुरुपयोग ही करता है जिससे उसका भी अनिष्ट होता है और दूसरों को भी वह हानि ही पहुंचाता है। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि संसार में प्रधानता आत्मशक्ति और बुद्धि की ही है और बुद्धि भी वही श्रेष्ठ है जो आध्यात्मिकता से युक्त होती है। तामसिकता अथवा आसुरी भावों से युक्त बुद्धि भी कल्याण के स्थान में अकल्याणकारी होती है।

यही कारण कि हम गायत्री को सबसे बड़ा शक्ति देने वाला साधन बतलाते हैं। गायत्री का मुख्य उद्देश्य आत्मशक्ति और सद्बुद्धि की कामना करना है, जिसके द्वारा मनुष्य अपना लौकिक और पारलौकिक, दोनों प्रकार का हित भली प्रकार सम्पन्न कर सके। गायत्री केवल स्थूल जगत की समृद्धियां ही प्रदान नहीं करती, वरन् वह हमारी आत्मा और बुद्धि को ऐसी सूक्ष्म शक्तियां भी प्रदान करती है, जिससे हम किसी आकस्मिक आवश्यकता या संकट के अवसर पर भी अपनी रक्षा का उपाय कर लेते हैं। कितने ही अवसरों पर तो वह हमको तत्काल ही प्रेरणा देकर ऐसे कार्य करा देती हैं, और जिन्हें हम दैवी सहायता के अतिरिक्त कुछ नहीं समझ सकते। इतना ही नहीं जो साधक गायत्री-साधना को अचल विश्वास के साथ करते हैं, उनमें अनजाने ही ऐसी दैवी शक्तियों का विकास हो जाता है जिनसे वे आत्मोत्कर्ष ऊंचे दर्जे पर चढ़ सकने में समर्थ होते हैं। *** *** ***

प्राचीन इतिहास, पुराणों से पता चलता है कि पूर्व युगों में प्रायः ऋषि महर्षि गायत्री के आधार पर योग साधना तथा तपश्चर्या करते थे। वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, अत्रि, विश्वामित्र, व्यास, शुकदेव, दधीचि, बाल्मीकि, च्यवन, शख, लोमश, तैत्रेय, जाबालि, उद्दालक, वैशम्पायन, दुर्वासा, परशुराम, पुलस्ति, दत्तात्रेय, अगस्त, सनत्कुमार, कन्व, शौनिक आदि ऋषियों के जीवन वृत्तान्तों से स्पष्ट है कि उनकी महान् सफलताओं का मूल हेतु गायत्री ही थी।

थोड़े ही समय पूर्व अनेक ऐसे महात्मा हुए हैं जिनने गायत्री का आश्रय लेकर अपने आत्मबल एवं ब्रह्म तेज को प्रकाशवान् किया था। उनके इष्टदेव, आदर्श, सिद्धान्त भिन्न भले ही रहे हों पर वेदमाता के प्रति सभी की अनन्य श्रद्धा थी। उन्होंने प्रारम्भिक स्तन पान इसी महाशक्ति का किया था जिससे वे इतने प्रतिभा सम्पन्न महापुरुष बन सके।

शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, नरसी महता, दादू दयाल, सन्त ज्ञानेश्वर, स्वामी रामानन्द, गोरखनाथ, मछीन्द्र नाथ, हरिदास, तुलसीदास, रामानुजाचार्य, माधवाचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ, योगी अरविंद, महर्षि रमण, गौरांग महाप्रभु, स्वामी दयानन्द, महात्मा एकरसानन्द आदि अनेक महात्माओं का विकास गायत्री महाशक्ति के अंचल में ही हुआ था।

आयुर्वेद के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ माधव-निदान के निर्माता श्री माधवाचार्य ने आरम्भ में 13 वर्षों तक वृन्दावन में रह कर गायत्री पुरश्चरण किये थे। जब उन्हें कुछ भी सफलता न मिली तो वे निराश होकर काशी चले गये और एक अवधूत की सलाह से भैरव की तांत्रिक उपासना करने लगे। कुछ दिन में भैरव प्रसन्न हुए और पीठ पीछे से कहने लगे कि ‘‘वर मांग’’ माधवाचार्य जी ने उनसे कहा—आप सामने आइए और दर्शन दीजिए। भैरव ने उत्तर दिया मैं गायत्री उपासक के सम्मुख नहीं आ सकता। इस बात पर माधवाचार्यजी को बड़ा आश्चर्य हुआ उनने कहा यदि गायत्री उपासक के सम्मुख आप प्रकट तक नहीं हो सकते तो मुझे वरदान क्या देंगे? कृपया अब आप केवल यह बता दीजिए कि मेरी अब तक की गायत्री साधना क्यों निष्फल हुई? भैरव ने उत्तर दिया—‘‘तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप नाश करने में अब तक की साधना लग गई। अब तुम्हारी आत्मा निष्पाप हो गई है। आगे जो साधना करोगे सफल होगी।’’ यह सुनकर माधवाचार्य जी फिर वृन्दावन आये और पुनः गायत्री तपस्या आरम्भ कर दी। अन्त में उन्हें माता के दर्शन हुए और पूर्ण सिद्धि प्राप्त हुई।

श्री महात्मा देवगिरि जी के गुरू हिमालय की एक गुफा में गायत्री द्वारा तप करते थे। उनकी आयु 400 वर्ष से अधिक थी। वे अपने आसन से उठकर भोजन, शयन, स्नान या मल मूत्र त्यागने तक को कहीं नहीं जाते थे। इन कामों की उन्हें आवश्यकता भी नहीं पड़ती थी।

नगराई के पास रामटेकरी के घने जंगल में एक हरीहर नामक महात्मा ने गायत्री तप करके सिद्धि पाई थी। महात्मा जी की कुटी के पास जाने में सात कोस का घना जंगल पड़ता था। उसमें सैकड़ों सिंह, व्याघ्र रहते थे। कोई व्यक्ति महात्मा जी के दर्शनों को जाता तो उसकी दो चार सिंह, व्याघ्रों से भेंट अवश्य होती। ‘‘मैं हरीहर बाबा के दर्शन को जा रहा हूं’’ इतना कह देने मात्र से हिंसक पशु रास्ता छोड़कर चले जाते थे।

लक्ष्मणगढ़ में एक विश्वनाथ गोस्वामी नामक प्रसिद्ध गायत्री उपासक हुए हैं। उनके जीवन का अधिकांश भाग गायत्री उपासना में ही व्यतीत हुआ था। उनके आशीर्वाद से सीकर के एक वीदावत का परिवार गरीबी से छुटकारा पाकर बड़ा ही समृद्धिशाली एवं सम्पन्न बना। इस परिवार के लोग अब तक उन पंडितजी की समाधि पर अपने बच्चों का मुंडन कराते हैं।

जयपुर रियासत में जौन नामक गांव में पं. हरराय नामक एक नैष्ठिक गायत्री उपासक रहते थे। उनको अपनी मृत्यु का पहले से ही पता चल गया था। उनने सब परिजनों को बुलाकर धार्मिक उपदेश दिये और बोलते, बात चीत करते—गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हुए प्राण त्याग कर दिए।

जूनागढ़ के एक विद्वान् पंडित मणिशंकर भट्ट पहले यजमानों के लिए गायत्री अनुष्ठान दक्षिणा लेकर करते थे। जब उनने अनेकों को इससे भारी लाभ होते देखे तो उन्होंने अपना सारा जीवन गायत्री उपासना में लगा दिया, दूसरों के अनुष्ठान छोड़ दिए। उनका शेष जीवन बहुत ही सुख-शान्ति से बीता।

जयपुर प्रान्त के बूढ़ा देवल ग्राम में विष्णुदत्त जी का जन्म हुआ। वे आजीवन ब्रह्मचारी रहे। उनने पुष्कर में एक कुटी बनाकर गायत्री की घोर तपस्या की थी, फलस्वरूप उन्हें अनेक सिद्धियां प्राप्त हो गई थीं। बड़े-बड़े राजा उनकी कुटी की धूल को मस्तक पर रखने लगे। जयपुर और जोधपुर के महाराज अनेक बार उनकी कुटी पर उपस्थित हुए। महाराज उदयपुर तो अत्यन्त आग्रह करके उन्हें अपनी राजधानी में ले आये और उनके पुरश्चरण की शाही तैयारी के साथ अपने यहां पूर्णाहुति कराई। इन ब्रह्मचारी जी के सम्बन्ध में अनेक चमत्कारी कथाएं प्रसिद्ध हैं।

खातौली से 7 मील दूर धौंकलेश्वर में मगनानंद नामक एक गायत्री सिद्ध महापुरुष रहते थे। उनके आशीर्वाद से खातोल के ठिकानेदार को उनकी छीनी हुई जागीर पोलिटिकल एजेन्ट ने वापिस की थी।

रतनगढ़ के पं. भूधरमल नामक एक विद्वान ब्राह्मण गायत्री के अनन्य उपासक हो गये हैं। वे संवत् 1966 में काशी आ गए थे और अन्त तक वहीं रहे। अपनी मृत्यु की पूर्व जानकारी होने से उनने विशाल धार्मिक आयोजन किया था और साधना करते हुए आषाढ़ सुदी 5 सं. 1982 को शरीर समाप्त किया। उनके आशीर्वाद पाने वाले कई बहुत ही सामान्य मनुष्य आज भी लखपती सेठ बने हुए हैं।

अलवर राज्य के अन्तर्गत एक ग्राम के सामान्य परिवार में पैदा हुए एक सज्जन को किसी कारण वश वैराग्य हो गया। वे मथुरा आये और एक टीले पर रह कर गायत्री साधना करने लगे। एक करोड़ गायत्री का जप करने के अनन्तर उन्हें गायत्री का साक्षात्कार हुआ और वे सिद्ध हो गये। वह स्थान गायत्री टीले के नाम से प्रसिद्ध है। वहां एक छोटा-सा मन्दिर है जिसमें गायत्री की सुन्दर मूर्ति स्थापित है। उनका नाम बूटी सिद्ध था। सदा मौन रहते थे। उनके आशीर्वाद से अनेकों का कल्याण हुआ। धौलपुर और अलवर के राजा उनके प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे।

आर्य समाज के संस्थापक श्री स्वामी दयानन्दजी के गुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती ने बड़ी तपश्चर्यापूर्वक गंगातीर पर रहकर तीन वर्ष तक गायत्री जप किया था। इस अन्धे संन्यासी ने अपने तपोबल से अगाध विद्या, बल और अलौकिक ब्रह्मतेज प्राप्त किया था।

मांधाता ओंकारेश्वर मन्दिर के पीछे गुफा में एक महात्मा गायत्री तप करते थे। मृत्यु के समय उनके परिवार के व्यक्ति उपस्थित थे। परिवार के एक बालक ने प्रार्थना की कि—‘‘मेरी बुद्धि मन्द है मुझे विद्या नहीं आती, कुछ आशीर्वाद दे जाइए जिससे मेरा दोष दूर हो जाय’’ महात्माजी ने बालक को समीप बुलाकर उसकी जीभ पर कमण्डल में से थोड़ा-सा जल डाला और आशीर्वाद दिया कि तू! पूर्ण विद्वान हो जायगा। आगे चलकर वह बालक असाधारण प्रतिभाशाली विद्वान हुआ और इन्दौर में ओंकार जोशी के नाम से प्रसिद्धता पाई। इन्दौर-नरेश उनसे इतने प्रभावित थे कि सवेरे घूमने जाते समय उनके घर से उन्हें साथ ले जाते थे।

चांदेड़ क्षेत्र निवासी गुप्त योगेश्वर श्री उद्धड़जी जोशी एक सिद्ध पुरुष हो गये हैं। गायत्री उपासना के फलस्वरूप उनकी कृपा से कई मनुष्यों के प्राण बचे थे, कई को धन प्राप्त हुआ था, कई आपत्तियों से छूटे थे, उनकी भविष्यवाणियां सदा सत्य होती थीं। एक व्यक्ति ने उनकी परीक्षा करने तथा उपहास करने का दुस्साहस किया था, तो वह कोढ़ी हो गया।

बड़ौदा के मंजूसर निवासी श्री मुकटरामजी महाराज गायत्री उपासना में परम सिद्धि प्राप्त कर गये हैं। प्रायः आठ घण्टे नित्य जप करते थे, उन्हें अनेकों सिद्धियां प्राप्त थीं दूर देशों के समाचार वे ऐसे सच्चे बताते थे मानो सब हाल आंखों देख रहे हों। पीछे परीक्षा करने पर वे समाचार सोलहों आने सच निकलते थे। उन्होंने गुजराती की दो किताबें पढ़ने तक की स्कूली शिक्षा पाई थी पर संसार की सभी भाषाओं को भली प्रकार बोल और समझ लेते थे। विदेशी लोग उनके पास आकर अपनी भाषा में घण्टों तक वार्तालाप करते थे। योग, ज्योतिष, वैद्यक तन्त्र तथा धर्मशास्त्र का उन्हें पूरा-पूरा ज्ञान था। बड़े-बड़े पंडित उनसे अपनी गुत्थियां सुलझवाने आते थे। उन्होंने कितनी ही ऐसी करामातें दिखाई थीं जिनके कारण लोगों की उन पर अटूट श्रद्धा हो गई थी।

बरसोड़ा में एक ऋषिराज ने सात वर्ष तक निराहार रह कर गायत्री पुरश्चरण किये थे। उनकी वाणी सिद्ध थी। जो कह देते थे वही हो जाता था।

‘कल्याण’ के सन्त अंग में हरे राम नामक एक ब्रह्मचारी का जिक्र छपा है। यह ब्रह्मचारी गंगाजी के भीतर उठी हुई एक टेकरी पर रहते थे और गायत्री की आराधना करते थे। उनका ब्रह्मतेज अवर्णनीय था। सारा शरीर तेज से दमकता था। उन्होंने अपनी सिद्धियों से अनेकों के दुख दूर किए थे।

देवप्रयाग के श्री विष्णुदत्तजी वानप्रस्थी ने चान्द्रायण व्रतों के साथ सवा लक्ष जप और सात अनुष्ठान किए थे। इससे उनका आत्मबल बहुत बढ़ गया था। उन्हें कितनी ही सिद्धियां मिल गई थीं। लोगों को जब पता चला तो अपने कार्य सिद्ध कराने के लिए उनके पास दूर-दूर से भीड़ें आने लगीं। वानप्रस्थीजी इसी खेल में उलझ गये। रोज-रोज बहुत खर्च करने से उनकी शक्ति भण्डार चुक गया। पीछे उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ और फिर मृत्यु समय तक एकान्त साधना करते रहे।

रुद्रप्रयाग के स्वामी निर्मलानंद संन्यासी को गायत्री साधना से भगवती के दिव्य-दर्शन और ईश्वर साक्षात्कार का लाभ प्राप्त हुआ था इससे उन्हें असीम तृप्ति हुई। बिठूर के पास खांडेराव नामक एक वयोवृद्ध तपस्वी एक विशाल खिरनी के पेड़ के नीचे गायत्री साधना करते थे। एक बार उन्होंने विराट गायत्री यज्ञ और ब्रह्म भोज किया। दिन भर हजारों आदमियों की पंगतें होती रहीं। रात के नौ बजे भोजन समाप्त हो गया और बहुसंख्यक आदमियों का भोजन होना शेष था। खांडेरावजी को सूचना दी गई, उन्होंने आज्ञादी-गंगाजी में से चार कनस्तर पानी भर लाओ और उससे पूड़ियां सिकने दो। ऐसा ही किया गया। पूड़ियां घी के समान स्वादिष्ट थीं। दूसरे दिन चार कनस्तर घी मंगाकर गंगाजी में डलवा दिया।

दीनवा के स्वामी मनोहरदासजी ने गायत्री के कई पुरश्चरण किए हैं उनका कहना है कि इस महा साधना से मुझे इतना अधिक लाभ हुआ है कि उसे प्रकट करने की उसी प्रकार इच्छा नहीं होती, जैसे कि लोभी को अपना धन प्रकट करने में संकोच होता है।

पाटन के श्री जटाशंकरजी नान्दी की आयु 77 वर्ष से अधिक है। वे गत पचास वर्षों से गायत्री उपासना कर रहे हैं—कुविचारों और कुसंस्कारों से मुक्ति एवं दैवी तत्वों की अधिकता का लाभ उन्होंने प्राप्त किया है और इसे वे जीवन की प्रधान सफलता मानते हैं।

वृन्दावन के काठिया बाबा, उड़िया बाबा, प्रज्ञाचक्षु स्वामी गंगेश्वरानंदजी, गायत्री-उपासना से आरम्भ करके अपनी साधना को आगे बढ़ाने में समर्थ हुए थे। वैष्णव सम्प्रदाय के प्रायः सभी आचार्य गायत्री की साधना पर बहुत जोर देते रहे हैं।

नवावगंज के पं. बलभद्रजी ब्रह्मचारी, सहारनपुर जिले के श्री स्वामी देवदर्शनानन्दजी बुलन्दशहर प्रांत के परिव्राजक महात्मा योगानन्दजी, ब्रह्मनिष्ठ श्री. स्वामी ब्रह्मर्षिदासजी उदासीन, बिहार प्रांत के महात्मा अनाशक्तजी, यज्ञाचार्य पं. जगन्नाथ शास्त्री ‘ॐ’, राजगढ़ के महात्मा हरि ॐ तत्त् सत्त्, आदि कितने ही सन्त महात्मा गायत्री-उपासना में पूर्ण मनोयोग के साथ संलग्न हैं। अनेक गृहस्थ भी तपस्वी जीवन व्यतीत करते हुए इस महान् साधन में प्रवृत्त हैं। इस मार्ग पर चलते हुए उन्हें महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सफलता प्राप्त हो रही है। *** *** ***

[ये तो प्राचीन उदाहरण हुये, जिनमें ऊंचे दर्जे के साधकों ने गायत्री-साधना के फल स्वरूप ऐसी उल्लेखनीय सफलतायें प्राप्त कीं कि सर्व साधारण में भी उनकी प्रसिद्ध हो गई। पर अनेक संसारी, गृहस्थ-जीवन में फंसे हुए व्यक्ति भी वर्तमान समय में गायत्री-उपासना के द्वारा आत्मोन्नति कर रहे हैं और तरह-तरह के मनोवांछित लाभ भी उठा रहे हैं, उनके कुछ उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं।]

* श्री मु. ग. पाटील, खामगांव से लिखते हैं—मेरे विचार बुरे थे—सपने भी इतने बुरे आते थे कि जिसकी हद नहीं। किसी प्रेरणा ने गायत्री उपासना में प्रवृत्त किया। फिर देखा वे सारे बुरे सपने क्रमशः लुप्त होते गये और उसके स्थान पर ज्योतिर्मय स्वप्न अवतरित होने लगे।

ध्यानावस्था में, प्रकाशपुंज के मध्य दिव्य आलोकपूर्ण ॐ का आविर्भाव हुआ और मैं न जाने कितनी देर तक मुग्ध भाव से, सुस्पष्ट रूपेण देखता रहा। उसी दिन से मेरे अन्तर हृदय में असीम शान्ति का अवतरण हुआ, जो कि आज भी क्रमशः बढ़ती ही जा रही है। कई बार मैं अपने को स्वप्न में एक दिव्य देवी की उपासना करते हुए पाता हूं। कभी गायत्री माता, दिव्य सूर्य बनकर, जिसकी किरणें अत्यन्त सौम्य, सुखद स्पर्श वाली हैं—सपने में मेरे सामने आ जाती है और अपने मधुस्रावी रश्मिधारा से मेरे शरीर और प्राण के कण-कण को सींच देती है। मैं भीग उठता हूं और मेरे शरीर से भी किरणें विकीर्णित होने लगती हैं। शरीर शिथिल हो जाता है एवं अवर्णनीय आनन्द की अनुभूति होती है। इस आनन्द का प्रभाव ऐसा चिरन्तन है कि, किसी दुःखद स्थिति में पड़ने पर भी मुझे आनन्द का वेग ऊपर ही उठाये रखता है। दुःख की पीड़ा जरा भी अनुभूत नहीं होती।

भौतिक दृष्टि से भी मेरी अभ्युन्नति हुई। साम्पत्तिक दुरवस्था का प्रवेश मेरे जीवन में कभी नहीं हो पाया। मुझे जटिल खांसी रोग था। मैंने कितने ही डाक्टरों से इसके अनेक इलाज किये, किन्तु इससे पिण्ड न छूटा। खांसी क्रानिक एवं दुःसाध्य हो गयी। डाक्टरों ने असाध्य रोग घोषित कर पराजय स्वीकार कर लिया। माता की कृपा से यह रोग कैसे मूल से ही नष्ट हो गया—इसका मुझे भी पता नहीं चला। आज मैं पूर्ण स्वस्थ हूं। पहले मेरी बात की ओर कोई ध्यान नहीं देता था, पर आज जैसे मैं चुम्बक बनता जा रहा हूं। सभी मेरी बात ध्यान से सुनते हैं, उसे सम्मान देते हैं, मुझसे मिलकर प्रसन्नता लाभ करते हैं—पुनः मिलने की उत्कण्ठा अनुभव करते हैं। मानसिक विश्वास और शारीरिक ओज दिनानुदिन बढ़ता-सा अनुभव होता है। मेरे व्यक्तित्व का परिविकास हो रहा है। सभी माता की कृपा से ही साधित हो रहे हैं।

* श्री मदन गणेशरामदेव, पूना से लिखते हैं—गत वर्ष से ही मैं प्रतिदिन 1000 गायत्री मन्त्र जप नियमित रूप से करते रहने का प्रयत्न करता आ रहा हूं, पर ऐसा नहीं कि इस प्रयत्न में कभी त्रुटि नहीं आयी। इसमें कई-कई दिन खाड़े (नागा) जरूर होते हैं और उसका पश्चाताप भी जरूर होता है।

गत वर्ष में गुरुदेव के आज्ञानुसार 28 दिन का ‘‘उप पोषण’’ किया था, जिसमें फलाहार में केवल आधा पाव दूध और दो मुसम्बी रोज लेता था, इसके अलावे और कुछ भी नहीं। इन 28 दिनों में निष्काम भाव से सवा लक्ष के अनुष्ठान का भी संकल्प सम्मिलित था। चूंकि यह आयोजन सार्वजनिक था, इसलिये इसके सारे कार्य पूर्ण शास्त्रोक्त नियमों सहित तथा सर्वथा निष्काम होकर ही किया गया था। चौथे दिन मेरी हालत बड़ी ही दयनीय हो गयी। आगे उपवास करने का साहस और सहन शक्ति दोनों नहीं रहे। अब न तो आगे मैं उपवास ही कर सकता था और न उसे छोड़ने की शक्ति ही मुझ में थी। पांचवे दिन मुझ में जरा भी शक्ति बोध नहीं होती थी। ज्यों-ज्यों कर दिवस कटा। रात में गायत्री माता का स्मरण करता सो गया। ब्राह्मी मुहूर्त्त था। मैं स्वप्न या सत्य ही देख रहा था—पूजन पीठ पर, पुष्पों का हार धारण किये हमारे गुरुदेव ध्यान मग्न से बैठे हैं, और मुझे आशीर्वाद देते हुए कह रहे हैं, हिम्मत नहीं हारना—मैं सदैव तुम्हारे पीछे हूं। मैंने अपने को उनके चरणों में समर्पित कर दिया। नींद टूटने पर मैंने अपने में, अत्यधिक स्फूर्ति एवं उपवास जन्य अशक्ति का अभाव पाया। इसके उपरान्त शेष तेईस दिन, उपवास में कैसा कष्ट होता है, इसका जरा-सा भान भी मुझे नहीं हुआ, एक सबल स्वस्थ पुरुष की भांति सारा क्रम निभाता रहा। उपवास की बीसवीं रात में घनीभूत कालिमा की छोटी 2 बिन्दी मेरे सामने आकर चारों ओर फिरने लगीं। इक्कीसवें दिन उसमें भिन्न-भिन्न रंगों की ज्योतियां विकीर्णित होने लगीं और चौबीसवें दिन दो बजे रात में, माता की छवि से पीत रश्मियों की धारा साक्षात् रूप से निकल कर मेरी ओर आने लगीं। मधुरता के आधिक्य से मैंने आंखें बन्द कर लीं, उसके उपरान्त ज्योतिबिन्दु से माता की साक्षात् प्रतिमा को निकलते देखा, जो सम्पूर्णतया चेतना से भरी हुई थी—वे मुझे आशीर्वाद दे रही थीं—मैं अपने शारीरिक भान से ऊपर उठ गया था। वह मेरे जीवन की अपूर्व आनन्दमयी अवर्णनीय स्थिति थी।

* श्री होतीलाल शर्म, अलीगढ़ से लिखते हैं—आज माता की कृपा का बखान करने की इच्छा से, मेरे सामने जीवन के वे सारे शारीरिक आर्थिक एवं मानसिक कष्टों के अतीत-दारुण चित्र सामने में प्रत्यक्षवत् प्रतीत हो रहे हैं। मेरे जीवन के विकास काल में ही मुझे प्यार करने वाले ताऊजी एवं पिताजी की एक एक कर मृत्यु हो गयी। मेरा एक छोटा भाई था, वह भी काल कवलित हो गया। केवल मैं, एक छोटा भाई और मेरी माता अनाथ बनकर दुःख भोगने के लिये रह गयीं। सबों ने एक स्वर से कहा—इसका सुन्दर परिवार एकबारगी ही नष्ट हो गया।

यज्ञोपवीत संस्कार के समय ही मेरे ताऊजी ने कहा था—‘‘गायत्री माता की शरण लेने से मनुष्य सांसारिक जीवन को सुख पूर्वक बिताकर अन्त में भी शान्ति प्राप्त करते हैं।’’ यह पुनीत वाणी शैशव के कोमल-हृदय में अमर भाव से बस गयी थी, और तभी से मैं गायत्री उपासना करने लगा था। पिता-ताऊ एवं भाई की मृत्यु की सूचना मुझे पूर्व ही माता ने खड़ी होकर सुना दी थी, साथ ही कष्ट दूर होने का आश्वासन भी दिया था। इसके उपरान्त छोटे भाई की मृत्यु हो गयी। जीविका की कोई सुस्थिर-व्यवस्था नहीं रहने से भोजन भी भार स्वरूप हो गया। शरीर भी शीर्ण हो गया, पर उपासना करते ही रहा जिसके फल से आज अनायास ही हम सभी भांति सुखी-स्वस्थ और प्रसन्न हो सके हैं।

* श्री चुन्नालाल जे. राजा, साणंद लिखते हैं—मैंने गायत्री उपासना सम्बन्धी (गायत्री महाविज्ञान) पुस्तकों में पढ़ा था कि गायत्री उपासना करने से गुरु विहीनों को सद्गुरु की प्राप्ति होती है। मैंने वही पढ़कर आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए सद्गुरु की आवश्यकता समझी और उन्हें पाने के लिये गायत्री उपासना प्रारम्भ की। दस हजार जप पूरा होते ही मुझे श्रीचरणपादुका जूना अखाड़ा में ब्रह्मचारी जी का दर्शन हुआ। उनसे बातें भी की किन्तु मैंने अपने सद्गुरु को पहिचान नहीं पाया। इसके 15 दिन उपरान्त ही स्वप्न में मुझे सद्गुरु का परिचय कराया गया और उस समय वे जहां थे उसका पूरा पता भी बताया गया। तदुपरान्त मैंने स्वप्न निर्दिष्ट स्थान गिरनार पर्वत की तलहटी में जाकर उनका दर्शन किया। वहां गिरनार पर्वत की आनन्द गुहा में चार महीना तक उनके साथ रह कर सत्संग किया।

चार महीने के उपरान्त उन्होंने मुझे सांणद ग्राम के श्मशान घाट में रह कर साधना करने का आदेश दिया। वहां सिद्धनाथ महादेव का भी एक स्थान है। मुझे चिंता थी कि मेरे भोजन आदि के निर्वाह व्यय की व्यवस्था कैसे होगी? इस स्थान में रह कर गुरु के आदेशानुसार मैं 24 लाख गायत्री का महा पुरश्चरण करने लगा। माता की कृपा से श्री नाथालाल-चुन्नालाल ने स्वेच्छा से मेरा भोजनादि भार उठा लिया। इसमें 35 रू. प्रतिमास खर्च पड़ते हैं। एक वर्ष हुआ मैं अन्नाहार परित्याग कर केवल फलाहार ही करता हूं। एक और सज्जन प्रति दिन तीन बार मेरे आश्रम में आते हैं और मुझ से मेरी आवश्यकताओं के सम्बन्ध में पूछते हैं। इस भांति तो शायद ही कोई पुत्र अपने माता पिता की खोज खबर लेता हो।

माता की कृपा से मेरे पुत्र एवं पुत्रियों को भी जीविका सम्बन्धी सारी सुखद स्थितियां स्वतः ही प्राप्त हो गई हैं। वे सभी प्रसन्न और सुखी हैं। माता ने उन सबों की ओर से भी निश्चित कर मुझे साधना करने का दुर्लभ अवसर प्रदान किया है। ऐसी परम सुखदा गायत्री माता के पावन चरणों में मैं बारम्बार नमस्कार करता हूं। * श्री सुमन्त कुमार मिश्र बी.ए., लिखते हैं—यज्ञोपवीत संस्कार के समय मेरे पुरोहित जी ने बेगार की भांति गायत्री मन्त्र की दीक्षा दी थी। आज की भौतिकवादी विचारधारा का व्यक्ति भला उसका क्या प्रभाव ग्रहण करता? मैं सब भूल-भाल गया। एक दिन मेरे परम मित्र श्रीजीवनधर दीवानजी ने (जिनका मैं चिरकृतज्ञ हूं और रहूंगा) मुझे गायत्री उपासना की चर्चा के संग पं. श्रीराम शर्मा आचार्य और ‘‘अखण्ड ज्योति’’ पत्रिका की चर्चा सुनाई और उसी रात में मैंने स्वप्न देखा कि गायत्री मन्त्र के पवित्र उच्चारण सहित मैं महायज्ञ में आहुति दे रहा हूं। उस समय मुझे अनिर्वचनीय आनन्द मिल रहा था। जागने पर भी मेरे अंगों में उस आनन्द का संचरण होता रहा। मैं भाव-मुग्ध हो रहा। उसी दिन अपने स्वप्न की चर्चा सहित सारी बातें लिख भेजीं। उनका उत्तर जो कुछ मिला—वही मेरे अध्यात्म-जीवन के प्रवेश की अमूल्य और श्रेष्ठ थाती है। मेरी आत्मा को उद्बोधन मिला और मैं गायत्री उपासना में संलग्न हो गया।

मेरा छोटा भाई बीमार था। उस दिन उसे बहुत कष्ट था। नींद नहीं—केवल छटपटी। घर वाले भी उसकी यह बेचैनी देख बेचैन हो रहे थे। मैं उसके सिरहाने बैठ कर उसके ललाट पर हाथ फेरने लगा। तन्मय दशा में स्वतः ही गायत्री मन्त्र उच्चरित हो रहा था। उसकी बेचैनी कम होने लगी और नीन्द आ गयी जब कभी मेरे जीवन में संकट उपस्थित होते हैं, तो मैं माता का आह्वान करता हूं और देखते ही देखते वे कष्ट और संकट विलुप्त होने लगते हैं और मुझे उनसे छुटकारा मिल जाता है। आने वाली शुभाशुभ घटनाओं की छाया मेरे मानस-पटल पर पहले ही अंकित हो जाती है। अपनी बुद्धि में प्रकाश और मनोबल नित्य बढ़ता हुआ अनुभव करता हूं।

आज तो भौतिक विज्ञान ने भी शब्दों के सस्वर ताल-मात्रा युक्त उच्चारण करने की क्रियात्मक शक्ति को मान लिया है, फिर उसमें श्रद्धा-विश्वास के संयोग से वह क्यों न और भी महान शक्ति धारण करने में समर्थ हो जाय? लाखों वर्षों से करोड़ों व्यक्तियों ने गायत्री मन्त्र के शब्दों में अपने आत्म विश्वास की अनन्त शक्तियों को भरपूर कर दिया है। प्रत्येक कल्याण कामी को इस मन्त्र से लाभ उठाना चाहिये।

* श्री नगीनदास, ठाकुरदास शाह, बुरहानपुर से लिखते हैं—मेरे मन में बहुत दिनों से लालसा थी, कि जिस भूमि को भगवान ने अपनी साक्षात् उपस्थिति से, अपनी पावन लीला से पवित्र किया है, उसका दर्शन करूं और सौभाग्य हो तो वहां कुछ दिन निवास भी करूं, पर इसकी पूर्ति का हमारे पास कोई भी उपाय नहीं था। अचानक एक दिन गुजराती भाषा में डा. गणपति सिंह जी लिखित ‘गायत्री महिमा’ नामक पुस्तक पढ़ी। फिर इस मंत्र की अधिक महिमा जानने के लिये व्यग्रता हुई और ‘‘अखण्ड-ज्योति’’ मथुरा का पता लगा। वहां से पत्रिका मंगायी—पुनः गायत्री साहित्य मंगाकर अध्ययन किया। इससे गायत्री उपासना पर मेरी श्रद्धा दृढ़ हो गयी और नित्य गायत्री जप करने लगा।

सहसा ही गायत्री माता की कृपा से मेरे जीवन में ऐसा अवसर उपस्थित हुआ, मुझे मथुरा आना पड़ा। मैं प्रसन्नता से फूला नहीं समाता था। मथुरा स्टेशन पर उतरा और गायत्री तपोभूमि आकर मातृमूर्ति एवं गुरुदेव का दर्शन किया। दो दिन तक वही निवास किया। प्रातः ही यमुना जी में स्नान कर उसी पवित्र किनारे पर जप कर लिया करता। फिर गुरुदेव के आदेशानुसार वृन्दावन आया और सभी मन्दिरों में घूम-घूम कर पावन प्रतिमाओं का दर्शन किया। फिर वहीं एक धनी सेठ के यहां अनायास मुझे नौकरी भी लग गयी, फिर तो छह महीने तक वृन्दावन-धाम में रह कर, नित्य यमुना स्नान कर माधुरी मूर्ति की उपासना करता रहा। आषाढ़ मास की पूर्णिमा में गोवर्द्धन परिक्रमा की। इसी भांति ब्रजधाम की सारी लीला-शोभा देखी। फिर गायत्री-तपोभूमि आकर दो दिन ठहरा सारी ब्रजभूमि को भली भांति देख भाल कर गुरुदेव के आदेश से घर चला आया। आज घर में रह कर ही गायत्री-उपासना करता हूं और जीवन में चारों ओर सुख-शांति ही मुझे नजर आती है।

* श्री महावीर प्रसाद गुप्त, शाहजहांपुर से लिखते हैं—दो वर्ष बीत गये। वायु मंडल स्वच्छ था। शीतल सुगंधित वायु बह रही थी। मैं पद्मासन लगाये माता के ध्यान में तल्लीन था। माला पास में नहीं थी। मैं बड़े ही आर्तभाव से माता की आराधना कर रहा था। समय भी काफी हो चुका था। उस समय इतना अच्छा ध्यान लगा हुआ था कि वैसा आनन्द ध्यान में आज तक नहीं आया। हृदय से एकदम ऐसा प्रकाश पुंज निकला जो सारे शरीर में प्रविष्ट हो गया। ऐसा मालूम होता रहा कि मेरे शरीर के साथ-साथ सारी पृथ्वी कांप रही है। ऐसा बहुत देर तक अनुभव हुआ। सामने हंसारूढ़ माता का वरदहस्त था। माता कह रही थी—पुत्र प्रसन्न हूं! पुत्र प्रसन्न हूं!! यह शब्द कई बार हुआ। मुझे माता का वरदहस्त उसी मूर्ति में सोते-जागते चलते-फिरते हर समय लगभग दो सप्ताह तक निरन्तर मालूम होता रहा। उस समय मेरे नेत्रों में आंसू बह रहे थे। जब आसन छोड़ा तो माता से प्रणाम करके यही प्रार्थना की कि ‘‘जन्मान्तर तक आपके चरणों में ध्यान रहे।’’ इस घटना के बाद से मुझे अपने में काफी परिवर्तन मालूम हुआ और जितना कष्ट मुझे आर्थिक एवं मानसिक था, वह सब दूर हो गया। उसी समय से माता के चरणों में मुझे दृढ़ विश्वास है।

* श्रीरामपाल सिंह, राठौर लिखते हैं—उपासना सभी करते हैं, पर गुरु कृपा से इसमें जितनी जल्दी सफलता मिलती है, उतनी शीघ्रता से सफलता देने वाला शायद ही कोई साधन हो। मेरा तो अपने अनुभव के आधार पर यही विश्वास है। मैंने गुरुदेव के चरणों में अपने को सौंपते हुए, उनकी बताई सारी विधियों का ठीक-ठीक पालन करते हुए ऋषि-पंचमी से गायत्री-उपासना प्रारम्भ की। उस दिन अंग्रेजी ता. 21-9-55 था। मैं ब्राह्मी मुहूर्त से ही साधना में संलग्न हो जाता था। दूसरे दिन 22-9-55 को मैं जप कर रहा था। आंखें खुली थीं। सहसा ही मेरे आगे एक त्रिमुखी देवी प्रगट हुईं। उनके अंगों से सुनहले रंग का प्रकाश निकलकर टौर्च के प्रकाश की भांति मेरे अंगों को पवित्र कर रहा था। आनन्द के आधिक्य से मेरे रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठे। मैं अनुपम शान्ति से ओत-प्रोत था। आंखों से प्रेम के आंसू झर रहे थे। पांचवे ही क्षण वह सारा दृश्य न जाने कैसे छिप गया। मुझे बराबर उस ‘चार-क्षण’ की याद आती है, और उसे फिर से पाने के लिए मेरा अन्तर विह्वल होने लगता है। गुरुदेव! अनंत मातृ-स्नेह से भरे मेरे प्रभो! एकबार पुनः वह पावन दर्शन देकर सदा के लिये मुझे अपना लो।

* श्री भगवान दास मीतल, मथुरा से लिखते हैं—गायत्री मंत्र से तो मैं बहुत पहले से परिचित था, पर उसके महान ज्ञान एवं रहस्य से अनभिज्ञ था। कुछ समय पूर्व श्री आचार्य जी के संरक्षण में मुझे इसका समुचित ज्ञान लाभ प्राप्त हुआ। मैंने विशेष रूप से गायत्री जाप आरम्भ कर दिया। जब से मैंने विशेष साधना की है तब से अब तक मुझको बहुत सुख और बहुत शान्ति प्राप्त हुई है। जिस आर्थिक चिन्ता से हृदय नित्य प्रति दग्ध रहा करता था, उसमें महान शान्ति प्राप्त है और आत्म बल बहुत उन्नति की ओर बढ़ता जा रहा है। भगवत कृपा और निर्भयता का आनन्द अनुभव होता जा रहा है। इससे पूर्व भी जब जब मैंने गायत्री जप किया था, मुझे यही गुण और शक्तियां प्राप्त हुई थीं अतः मेरा यह अनुभव है कि निर्भयता और महान् शान्ति एवं विवेक बुद्धि के लिये यह गायत्री उपासना एक अद्वितीय महौषधि है।

* श्री गोविन्दलाल नृसिंह शाह, रामगंज से लिखते हैं—मेरा सवालक्ष का अनुष्ठान चल रहा था अरुणोदय की पुनीतारुण आभा, दिव्य जागरण के सन्देश से हृदय में घुसे से जा रहे थे। मैं खुली आंखों जप करता हुआ तल्लीन हो रहा था। सहसा अरुण रंग के मध्य से श्वेतोपम-आलोक का उदय हुआ और वह गायत्री माता की साक्षात प्रतिमा बन गयी। मैंने प्रणाम किया एवं अपनी भूल-चूक के लिये क्षमा याचना की। माता की आंखों से वात्सल्य के भाव विकीर्णित होकर मुझे स्पर्श करते से प्रतीत होते। धीरे-धीरे तिरोधान का क्रम उपस्थित हुआ। प्रेमोद्रेक से मेरी आंखें भर आयी थीं और उसी क्षण माता का रूप मेरी दृष्टि से न जाने कब तक के लिये तिरोहित हो गया। आज भी उस पुनीत—क्षण की याद, मुझे भाव विभोर कर देती है।

* श्री विष्णुदत्त जी, दरियागंज दिल्ली अपने पुरश्चरण काल में हुए अनुभवों को लिखते हैं—कुछ दिनों तक लगातार उपासना के बाद प्रथम बार मुझे भृकुटी के मध्य में प्रकाश का दर्शन हुआ प्रथम दीपक जैसा, पुनः बिन्दुसी ज्योति हो गयी। फिर तो नित्य रंग-बिरंगे प्रकाश, सूर्य, चन्द्र, अनन्त दिव्य प्रकाश दिखाई देता रहा। कभी कृष्ण, विष्णु, शिव एवं सूर्य देव साक्षात् से दीख पड़ते—कभी बड़े-बड़े सुन्दर महल, मन्दिर, हंस, बैल, हाथी, घोड़े भी दिखाई दिये। कई बार हृदय देश में अत्यन्त चमकीला प्रकाश भी देखा। कई दिन तो कुछ मित्रों के सामने दीवाल पर एक उज्ज्वल प्रकाश आकर स्थिर हो गया। वे लोग देखकर आश्चर्य चकित थे।

* श्री सत्य प्रकाश जी कुलश्रेष्ठ, सिकन्दरपुर, भाण्डेर अपनी जीवन दिशा बदलने का वर्णन करते हैं—कालेज की शिक्षा ने मुझे पूरा नास्तिक बना लिया था। पूजा-उपासना तो दूर—ईश्वर के अस्तित्व तक में मेरा विश्वास नहीं रह गया था।

एक स्वजन गायत्री उपासक का अनुभव सुनकर मैंने प्रयोग रूप में गायत्री जपना प्रारम्भ किया। एक लघु अनुष्ठान कर डाला। रात को स्वप्न में एक तेजोमयी कुमारिका ने मुझे आदेश दिया—तदुपरान्त मैंने विधि पूर्वक सवालक्ष का अनुष्ठान पूरा किया। इसके बाद तो अनेकों भविष्य में घटने वाली घटनाओं को मैं स्वप्नादि द्वारा जान लेने लगा। एक बार घर में डकैती होने का स्वप्न देखा। दो चार दिन बाद पिताजी के पत्र में स्वप्न देखी घटना का वर्णन पढ़ने को मिला। ऐसी अनेकों घटनायें मेरे जीवन में घटती ही जा रही हैं।

* श्री जयमंगल जी हजारीबाग से लिखते हैं—गायत्री उपासना करने के बाद से मैं अपना आत्मबल पर्याप्त बढ़ा हुआ अनुभव करता हूं। कैसी भी चिन्ता भरी परिस्थिति में, मेरा चित्त जरा भी क्षुब्ध और उद्विग्न नहीं होता, भयानक से भयानक परिस्थितियां जीवन में उपस्थित होकर अनायास ही उनका शमन भी हो जाता है। मन और शरीर में स्फूर्ति, बढ़ती हुई अनुभव करता हूं।

* श्रीमती मगनदेवी अध्यापिका, बिजनौर (यू.पी.) से लिखती हैं—पहले मेरा मन प्रायः अशांत रहा करता था। पर जब से गायत्री जप व हवन का नियम बना लिया है तब से एक अजीब प्रकार की शान्ति का अनुभव हुआ करता है और अब कठिन से कठिन काम या समस्या आ जाने से भी कोई अशांति पैदा नहीं हो पाती। माता की कृपा से एक चमत्कार का अनुभव हुआ करता है।

* श्री ताराचन्द अधरिया गांव सोनासिली (जि. रायपुर) से लिखते हैं—बचपन से मैं अनेक दुर्व्यसनों में फंस गया था। न मालूम किस आकर्षण से मैं गायत्री तपोभूमि मथुरा की तरफ खिंच गया और वहां 39 दिन में सवा-सवा लाख के तीन अनुष्ठान किये। इस बीच में एक दिन रात के आठ बजे गायत्री माता की मूर्ति के सामने बैठे-बैठे मुझे उन्माद सा हो गया और चीख मार कर माता के सामने गिर पड़ा तथा बीस मिनट के लगभग रोता हुआ पड़ा रहा। इस समय में मैं माता की अनोखी वाणी को भी सुनता रहा जिससे मेरी खराब आदतें सदा के लिये दूर हो गईं और मेरी समस्त शंकाओं का समाधान होकर मेरा जीवन ही बदल गया।

* श्री. सूर्यशरण गुप्त नवाबगंज (गोंडा) से लिखते हैं—4 वर्ष पूर्व श्रद्धेय आचार्य जी ने सहस्रांशु यज्ञ का अनुष्ठान प्रारम्भ किया था। सौभाग्यवश मैं भी उसमें सम्मिलित हो सका था। उस समय पत्र द्वारा आचार्य जी ने सूचित किया था कि इससे आपको परम शांति मिलेगी। वास्तव में उस अलौकिक शांति का अनुभव कुछ ही दिन बाद अपने पिता की मृत्यु के अवसर पर हुआ। मेरे जैसे अनुभवशून्य व्यक्ति के लिए पिता की मृत्यु किस प्रकार दुःखद हो सकती है यह समझ सकना कठिन नहीं है। पर गायत्री माता के प्रभाव से उस घटना का कुछ भी कुप्रभाव मेरे ऊपर नहीं पड़ा और मैं पूर्ण शान्त बना रहा। *** *** ***

* श्री मक्खनलाल जी दीक्षित, ‘‘साहित्य रत्न’’ दिगौड़ा से लिखते हैं—ता. 20, 21 अप्रैल को गायत्री परिवार, दिगौड़ा की ओर से देवरवा ग्राम में गायत्री-जप का विशेष आयोजन किया गया था। इस कार्य का संचालन करने के हेतु दादा दुर्गा प्रसाद जी टीकमगढ़ से निमंत्रित किये गये किन्तु किसी कारण वश वे प्रथम दिन न आ सके। उसी दिन रात को सोते समय किसी ने उनको आदेश दिया कि तुम शीघ्र ही आमन्त्रित स्थान पर जाओ। दादाजी चौंक पड़े और दूसरे ही दिन प्रातः देवरवा पहुंच गये। वहां के मंदिर में हनुमानजी की प्रतिमा थी वह सपाट पत्थर की तरह थी, उसी पर सिंदूर चढ़ा दिया जाता था। दादाजी ने हनुमानजी का दर्शन किया और प्रेम विभोर होकर उनको नया सिंदूर चढ़ाने लगे। अचानक मूर्ति पर वर्षों से चढ़ा अंगराग खसक पड़ा और भीतर से हनुमानजी की ऐसी सुरम्य और विशाल मूर्ति निकल पड़ी कि वैसी बहुत कम मन्दिरों में दिखाई पड़ती है। यह दृश्य देखकर जनता जय-जयकार कर उठी और सबके मुंह से यही निकलने लगा—‘‘प्रेम से प्रकट होंहि भगवाना।’’

* श्री लालमणि शर्मा, हापुड़ से लिखते हैं—जंगल में एक शिवजी का मन्दिर था। मैं बचपन में उसी मन्दिर मैं बैठकर नित्य प्रति जप किया करता था। अन्दर से किवाड़ों को बन्द कर लिया करता था। एक दिन जप करते समय एक बेले का ताजा फूल शिर पर से मेरे आगे गिरा। इसके थोड़ी देर बाद एक अंजलि ताजे खिले हुए पुष्पावलि पुनः मेरे शिर से आगे गिर पड़े। मैं विस्मय और आनन्द से भर उठा।

एकबार मैंने विधिपूर्वक नित्य पांच सहस्र गायत्री जपने का निश्चय किया। नित्य दोनों सन्ध्या जप करता था। उस समय जीविका के लिये कोई उद्यम नहीं कर रहा था। सो एक दिन हमारे पास की भोजन सामग्री समाप्त हो गयी। रात्रि में जप करते समय ख्याल आया—कल क्या भोजन होगा? उसी समय मुझे स्पष्ट रूप में आकाशवाणी सुनाई पड़ी—कल तुम्हें इतने रु. मिल जायेंगे, और प्रातः स्वतः एक सज्जन ने ठीक उतने ही रुपये मुझे दे दिये। वह आवाज इतनी मधुर और सुरीली थी कि आज भी उसकी याद से मैं पुलक भरी माधुरी से भर उठता हूं। मेरे पड़ोस के एक सज्जन चार वर्ष से एक मुकदमे के पीछे परेशान थे। इस वर्ष उन्होंने सवालक्ष गायत्री का अनुष्ठान किया। उसे पूरा होते-होते उस मुकदमे में विजय भी प्राप्त हो गयी।

* श्री पुरुषोत्तम दास, कलोल से लिखते हैं—इधर गुजरात में जरा भी वर्षा नहीं हुई। अकाल पड़ने के भय से सभी हा हा कार कर उठे। खेत के धान सूख गये, यहां तक कि मवेशियों को चरने के लिए कहीं स्थान नहीं रहा। भूख से तड़प-तड़प कर अनेकों गायें और भैंसें मर गयीं। अन्न की महंगाई बढ़ जाने से गरीब लोग व्याकुल होने लगे। मैंने इस अवसर पर ही संकटत्राता गायत्री माता की करुणा देखने का विचार किया और अन्न परित्यागपूर्वक गांव के बाहर एक मन्दिर में अपने एक अनन्य साथी दण्डे सहित गायत्री उपासना करना प्रारम्भ किया। जन कल्याण की हमारी भावना के कारण या स्वार्थ के कारण गांव की जनता ने भी वहां अखण्ड नाम कीर्तन, सत्संग आदि करना शुरू किया। एक-एक कर 6 दिन बीत गये, पर वर्षा की कहीं कोई सम्भावना नहीं दिखाई दी। फिर भी हम दोनों श्रद्धा, विश्वास सहित उपासना करते ही रहे। सातवें दिन माता ने हमारी पुकार सुनी और दल बादल न जाने कहां से उमड़ आये। इतनी वर्षा हुई कि सभी आनन्द से परिपूर्ण हो उठे। सभी के हृदयों के साथ खेतों में भी हरियाली छा गयी और जड़-चेतन दोनों ने अपने-अपने स्वर में माता का जय-जय कार मनाया।

* श्री चन्द्रपाल सिंह, अलीगढ़ से लिखते हैं—करुणामयी माता की उपासना को छोड़ते ही प्रेतों के उपद्रव खड़े हो गये। आधा भाद्रपद तक मेरी पत्नी को पर्याप्त कष्ट पहुंचाया। बन्धु दलवीर सिंह जी की प्रेरणा से पुनः गायत्री-उपासना प्रारम्भ की। दो तीन दिन के उपरान्त ही आश्चर्यपूर्ण दृश्य देखा। मैं जिस छत पर सोता था, उस पर रात में कभी-कभी मनुष्य की साक्षात् मूर्ति मुझे दिखाई देती। मैं उसे बुलाता तो उत्तर में वह कहता—‘‘अब मैं नहीं आ सकता।’’ एक दिन रात में मैं अपनी पत्नी को छत पर अकेली सोयी छोड़कर किसी कार्यवश नीचे उतरा, मुझे वापस आने में कुछ देरी हुई। इतने में उसने स्पष्ट सुना, देखो, तुम्हें अकेली छोड़ कर चला गया है। उसने आंखें खोली तो देखा—सिरहाने की ओर एक दिव्य मातृ मूर्ति खड़ी है। उसके एक हाथ में शंख है और दूसरे में कमण्डल, उज्ज्वल गौर अंग से जैसे ज्योति निकल रही हो। प्रेत की कल्पना से वह भयाकुल हो उठी। उसी समय माता ने उसके शिर पर हाथ रखते हुए कहा—‘‘बेटी! कोई भय नहीं, अब तो मैं तुम्हारी रक्षिका हूं। कोई तुम्हें अब नहीं सता सकता।’’ उसी समय मैं आ रहा था। मां तिरोहित हो गयी। अब मेरी पत्नी भी मुग्धभाव से नित्य पंचाक्षरी गायत्री का जप करती है। भूत प्रेत कभी नहीं दीख पड़ता है। हम दम्पत्ति नित्य माता के चरणों में फूलों से पूजा करते हैं।

* श्री जगतराम पस्तोरे गनेशगंज (टीकमगढ़) से लिखते हैं—मेरे जीवन का पिछला समय ऐसे वातावरण में व्यतीत हुआ है जहां नास्तिकता की ही प्रधानता थी। पूजा पाठ को ढोंग और बेवकूफी माना जाता था। पिछली बार परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा तो मेरे मित्र पं. छेदीलाल शर्मा ने बुद्धि वृद्धि एवं सांसारिक सुख शान्ति के लिए अचूक उपाय गायत्री मन्त्र बताया। विश्वास तो न होता था पर परीक्षा के रूप में नवरात्रि में एक अनुष्ठान, माला के अभाव में 108 कंकड़ गिन-गिन कर पूरा किया। परीक्षा में पास हुआ, उसी वर्ष ट्रेनिंग में भी नाम आ गया। अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होकर आज अच्छे ग्रेड पर अध्यापन कार्य कर रहा हूं। साथ ही गायत्री उपासना का क्रम भी चलता है। * श्री सुरेन्द्रनाथ द्विवेदी कोट पूतली से लिखते हैं—गत वर्ष परीक्षा में फेल हो गया, सारे सर्टिफिकेट तथा सारे सामान और रुपयों समेत बक्स चोरी चला गया, नौकरी के लिए सर्वत्र मारा मारा फिरा पर कहीं सफलता न मिली। इन परेशानियों से घबरा कर मैंने गायत्री अनुष्ठान आरम्भ किया। जप पूरा होते ही एक छोटी नौकरी मिल गई। श्रद्धा बढ़ी और सवालक्ष अनुष्ठान किया। अब मुझे साइन्स अध्यापक की अच्छी जगह मिल गई है। अधिक उन्नति होने की आशा है।

* श्री पुरुषोत्तम आत्माराम जी साखरे, जासलपुर से लिखते हैं—1955 की गुरुपूर्णिमा की सुपुनीति रात्रि में ब्राह्ममुहूर्त्त का आरम्भ हो चला था और मैं स्वप्न देख रहा था कि एक योगीराज एक हाथ से स्वादेन्द्रिय (जिह्वा) और दूसरे हाथ से शिश्नेन्द्रिय पकड़े मेरे सामने खड़े हैं और मुझसे पूछते हैं—‘‘क्या इसका अर्थ तुम समझते हो?’’ उत्तर देने के प्रथम ही मेरी नींद टूट गई। प्रातः ही सौभाग्य से उस योगीराज का दर्शन मिला। उन्होंने बिना पूछे ही मुझसे कहा—वत्स! जब तक तुम स्वप्न निर्देशित दोनों प्रधान इन्द्रियों पर काबू नहीं पा लेते तब तक इष्ट की प्राप्ति असम्भव है। एक और अपेक्षाकृत सूक्ष्म चाहना है—मान-प्रतिष्ठा। इस चाहना को भी छोड़ना अनिवार्य है। एक दिन वे मधुर स्वर लहरी में गायत्री हवन कर रहे थे। मैं भी सौभाग्यवश उपस्थित हुआ। यज्ञ से उठते ही उन्होंने मुझे गायत्री उपासना विधि बताई और कहा—इससे तुम्हारे सारे संकट दूर हो जायेंगे। आज हमारे जीवन में गायत्री उपासना के लाभ नित्य-प्रति प्रत्यक्ष हो रहे हैं।

* श्री मातादीन शर्मा, दोहद से लिखते हैं—मैं अपनी जन्म भूमि से छह सौ मील की दूरी पर रह रहा हूं। अपंगु हूं। गायत्री ही मेरी सब सार-सम्भाल करने वाली माता है। मेरी एकमात्र यही उपासना है। एक दिन मैं जप कर रहा था, सहसा देखता हूं कि ‘‘मेरा एक भाई क्षय रोग से मर गया है और हमारे मकान को नष्ट कर चचेरे भाइयों ने उस स्थान को अन्याय-पूर्वक कब्जा कर लिया है।’’ इसके दूसरे दिन ही पत्र आया, उसमें ध्यान में देखी सभी बातें ठीक 2 अंकित थी। यह माता की कृपा का ही प्रसाद था कि 600 मील की घटना को मैंने प्रत्यक्ष की भांति देखा। गायत्री उपासना के फल स्वरूप ऐसी दिव्य दृष्टि का खुलना एक चमत्कार ही है।

* सीमेंट फैक्टरी सवाई माधौपुर (राजस्थान) से श्री. रामनारायण जी लिखते हैं—यहां से कुछ ही दूर पर पहाड़ी में ‘महादेवजी की खोह’ नामक रमणीक स्थान है। यहां सदैव पानी की छोटी सी धारा शिवजी पर गिरती रहती है। ता. 14 जुलाई 57 को सभी गायत्री सदस्य टीलों और जंगलों को पार करके वहां पहुंचे और गायत्री-यज्ञ करने लगे। इतने में दिखाई दिया कि एक नागदेवता पास ही फन फैलाये खड़े हैं। जब तक यज्ञ होता रहा वे वहां से जरा भी न हटे। माता की आरती के बाद वे वहीं गायब हो गये। * तनोड़िया (शाजापुर) से श्री मुन्नालालजी माता की करुणा के विषय में सूचित करते हैं—मैं अपना पुरश्चरण पूर्ण कर रहा था। परंतु साथ ही यह भी चिन्ता थी कि पूर्णाहुति किस प्रकार की जावे। मैं बड़ा ही परेशान हो चला था। बहुत कुछ प्रयत्न करने के पश्चात् भी किसी सुदृढ़ मार्ग पर नहीं पहुंच सका। एक दिन मैं मन्दिर में बैठकर जप कर रहा था कि अचानक ही माता द्वारा प्रेरणा हुई कि अब से एक माह के उपरान्त श्रावण आ रहा है, उस समय मन्दिर में उपासक तथा अन्य व्यक्ति भी एकत्रित होंगे उनसे अखण्ड दीपक के लिए एक-एक रुपया एकत्रित कर लिया जावे। मैंने यथा समय ऐसा ही किया। प्रथम दिन केवल 30 ही एकत्र हुए। इसके पश्चात् क्रमशः कुलयोग 278 रुपया तक पहुंच गया। बड़ी धूमधाम के साथ पूर्णाहुति हुई। माता की ऐसी वात्सल्यता देखकर मैं तथा अन्य उपासक बड़े ही आकर्षित हुए। मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि माता की शरण में जाकर सभी कठिनाइयां सरल हो जाती हैं। *** *** ***

[गायत्री-उपासना बुद्धि के विकास में विशेष रूप से सहायक होती है। इसके प्रभाव से मन्दबुद्धि अथवा लापरवाही के कारण विद्याभ्यास में पिछड़े हुए व्यक्ति भी आकस्मिक रूप से अपूर्व प्रतिभा का परिचय देते देखे गये हैं। नीचे कुछ ऐसे ही विद्यार्थियों के अनुभव दिये जा रहे हैं।]

* श्री दिवाकर राव चिपड़े, बिलासपुर से लिखते हैं—इस वर्ष बिना किसी विशेष तैयारी के ही बी.ए. की परीक्षा देने के आग्रह को टाल न सका। इस समय पढ़ना भी सम्भव नहीं था इसीलिए, अध्ययन के बदले गायत्री-उपासना ही करता। परीक्षा दी। किसी तरह-परचे पूरे कर दिये। मुझे तो अपने किये परचों के आधार पर उत्तीर्ण होने की कोई भी आशा न थी। केवल मन ही मन माता की रट लगाये रहता। गंगा दशहरा में भी यही रट लेकर लघु अनुष्ठान किया। अन्तिम दिन लगातार उपासना करता रहा। घी के दीप जल रहे थे। पूजा समाप्त कर ज्यों ही नीचे आया कि हमारी शाला के दो शिक्षक आये, कहा—‘बधाई आपको। आप बी.ए. पास हो गये।’ मैंने उसे उपहास समझा और संकोच से झुक गया। मेरे मनोभाव को देखकर फिर दृढ़ गंभीरता से उन्होंने विश्वास दिलाया। विश्वास होते ही मेरा रोम रोम प्रसन्नता से उत्फुल्ल हो उठा। शिक्षक का सम्मान कर उन्हें विदाई दी और उपासना गृह में आकर माता के निकट घण्टों रोता रहा। यह रुदन माता की करुणा के प्रति श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता का उद्रेक था। माता की इस प्रत्यक्ष कृपा ने हमारे सारे परिवार का हृदय मुग्ध कर दिया। आज हमारे परिवार में सभी गायत्री उपासक हो गये। आगे तो परिवार की सारी आवश्यकता जैसे अनायास ही पूरी होती दीख रही है। मेरी छोटी बहिन का विवाह एक सम्पन्न परिवार में एक सुन्दर तरुण बी.ए. पास के साथ हो गया। उन लोगों ने विवाह में एक पैसा भी रीति-रिवाज, तिलक-दहेज का नहीं लिया। मेरे एक मित्र बिहारीलाल जी का भी इसी वर्ष बी.ए. का पेपर एक दम बिगड़ गया था। उसने अपने को अनुत्तीर्ण मान लिया था, फिर भी माता का भरोसा लेकर वे गायत्री तपोभूमि मथुरा गये और लघु अनुष्ठान किया। माता की कृपा से अनुष्ठान समाप्त होते ही उन्हें भी अपनी आश्चर्यकारी सफलता की सूचना तपोभूमि में ही मिल गयी। हमें तो विश्वास है कि गायत्री माता शीघ्र ही द्रवित होती हैं और अपने शरणागतों का सदा ही संरक्षण करती रहती हैं।

* श्री रामचन्द्र शर्मा, (प्रयाग) अपना अनुभव लिखते हैं—बचपन में मेरी बुद्धि इतनी बोदी थी कि मैं विद्यालय में मामूली-मामूली बातों में खूब मार खाता था। जीवन भार-सा लगता। मर जाने की इच्छा होती। एक बार सनावद अपनी आजी मां के यहां गया। उन्होंने मेरी दशा जान कर गायत्री उपासना की प्रेरणा दी और मैं उपासना करने लगा। मेरे पिता जी इन्कमटैक्स मेहक्मे में थे। मेरी कुछ दिन की उपासना के बाद ही उन्नत करके जबलपुर बदली कर दिये गये। यहां के विद्यालय में आते ही मेरी बुद्धि का प्रकाश दिनों-दिन बढ़ता ही चला गया। फिर तो कठिन से कठिन विषय मिनटों में समझ लेता था। फिर ऊंचे दर्जे से मैट्रिक पास कर सुसम्पन्न हुआ। तदुपरान्त सुशीला कन्या से विवाह सम्पन्न हुआ और अध्ययन करते हुए बिना परेशानी के, बी.काम., एम.ए. और एल.एल.बी. पास कर लिये। आज कल सरकारी मेहकमे में अच्छे पद पर हूं और जनता की सेवा करते हुए शान्त-उपासनामय जीवनयापन करता हूं। मेरे प्रसन्न-शान्त स्वभाव से मेरे सम्पर्क में आने वाले मुझे छोड़ना नहीं चाहते। माता की प्रेरणा से मुझे सभी प्राणियों में ईश्वर की झलक ही दीख पड़ती है और मैं आनन्द से उत्फुल्ल रहा करता हूं।

* विद्यार्थी सन्तोष कुमार श्रीवास्तव लिखते हैं—मैंने पांच-छह महीना मिड्ल वर्ग में पढ़कर विद्यालय छोड़ दिया क्योंकि मुझे पढ़ने में जरा भी मन नहीं लगता था। परिवार के सभी लोगों के बार-बार समझाने पर भी मैं नहीं गया। यहां तक कि मेरे पढ़ने के सारे सामान, जो मैं विद्यालय में ही छोड़ आया था, मेरे बड़े भाई साहब उठा लाये। अनुपस्थिति अधिक होने पर विद्यालय के रजिस्टर से मेरा नाम भी काट दिया गया। कुछ दिनों के उपरान्त मेरे चाचा साहब, जो गायत्री उपासक थे, आये। उन्होंने भी मुझे पढ़ने के लिये कहा। मैं जरा भी तैयार नहीं हुआ। वे चुप रहे। पुनः उन्होंने पता नहीं गायत्री माता से क्या प्रार्थना की और उसके दूसरे दिन उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए जाने को कहा और इस बार बिना कुछ विरोध किये, मैं विद्यालय चला गया। प्रधान अध्यापक जी ने कहा—अब तो परीक्षा के दिन एक महीने शेष हैं, अतः तुम्हें भर्ती करना व्यर्थ है। फिर कहा—डिप्टी साहब के कहने से ही मैं ऐसा कर सकता हूं। गायत्री माता की कृपा से पता नहीं किधर से कुछ देर में डिप्टी साहब भी आ गये। उनसे पूछने पर उन्होंने स्वीकृति दे दी।

उस दिन से मुझे भी गायत्री माता पर श्रद्धा हुई मैं भी यथा सम्भव उपासना करने लगा। मैं पढ़ने में इतना कमजोर था कि विद्यालय के सहपाठीगण मुझे गधा कहा करते थे और सबको विश्वास था कि मैं अवश्य फेल होऊंगा। परीक्षा काल आया। मैंने माता का स्मरण करते हुए सभी विषयों की परीक्षा दी। परीक्षा फल निकला। सबों ने आश्चर्य से देखा कि मेरा रोल नं. 355 भी उसमें अंकित....। मैंने माता के चरणों में प्रेम के आंसू चढ़ाये।

* मोहनलाल गालब, कोटा से लिखते हैं—रत्तीराम जी कोयला निवासी हैं। उनका लड़का हरिकिशन मिडिल में पढ़ता था। वह वर्ष में आठ महीना बीमार ही रहता था। स्वास्थ्य की भांति पढ़ाई भी कमजोर थी। वार्षिक परीक्षा देने के समय रत्तीराम जी ने परीक्षा शुल्क देना पैसे की बर्बादी समझ कर अस्वीकार कर दिया। हम लोगों ने गायत्री माता के नाम पर साढ़े सात रुपया परीक्षा शुल्क देने के लिये जोर दिया तो मान गये। जब लड़का परीक्षा देकर घर आया तो माता-पिता दोनों ने एक स्वर से कहा—हमारे साढ़े सात रुपये निश्चय ही बर्बाद चले गये। सदा ऐसी निराशा भरी वाणी निकालते रहते। जब जून में परीक्षा फल निकला तो हरिकिशन द्वितीय-श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। फिर तो रत्तीरामजी ने बड़े प्रेम से गायत्री उपासना प्रारम्भ की। उनकी पत्नी भी उनकी अनुगामिनी बनी। कुछ दिनों की उपासना के बाद उनका लड़का स्वस्थ रहने लगा और पढ़ने में उसकी बुद्धि विकसित होती चली गयी। अब वे लोग लगातार गायत्री उपासना कर रहे हैं।

* श्री माधुरी बाई, रायपुर से माता की वात्सल्य-कोमल भावना का वर्णन करती हुई अपनी बीती लिखती हैं अपनी कक्षा में सबसे कम समझ वाली तथा याद करने में भौंदी मैं ही थी। अध्यापिका जी का प्रश्न सदा मुझे कठिन जान पड़ता और मैंने कभी उसका उत्तर नहीं दिया परीक्षा के पांच महीने पहले मैं बीमार पड़ी और चार महीने के बाद स्वस्थ हो पायी। अब परीक्षा के पन्द्रह दिन ही शेष थे। वर्ग में उत्तर नहीं दे सकने के कारण अध्यापिका जी ने मुझे काफी फटकार दी। घर आकर बिना खाये सो गई। मैं नित्य थोड़ी-थोड़ी गायत्री उपासना किया करती थी, सो आज उस माता की याद कर बड़ी रोयी रोते-रोते सो गयी। स्वप्न में देखा—मैं परीक्षा कक्षा में बैठी सवाल को कठिन देखकर रो रही हूं। सहसा खिड़की की राह से माता आयीं और सान्त्वना के स्वर में कहा—माधुरी बेटी! रोती क्यों हो—मन लगा कर पढ़ती रहो। परीक्षा में तुम सर्व प्रथम और तेरी सहपाठिनी भूला द्वितीय होंगी। परीक्षा हुई और माता की स्वप्न की वाणी साकार हुई। ऐसी माता की सदा जय हो।

* श्री द्विजेन्द्र प्रसाद शर्मा, पाली (पटना) अपनी गायत्री उपासना के लाभों का वर्णन करते हैं—मैं नित्य टूटे-फूटे रूप से गायत्री जप लिया करता था। विद्यालय में स्कॉलरशिप की दरख्वास्तें पड़ रही थीं। मैं अयोग्य तो था ही, फिर भी दरख्वास्तें दे दिया करता था। जब वह रुपया आया तो स्वयं मुझे अपना नाम देखकर आश्चर्य हुआ और माता की कृपा की याद से परिप्लुत हो गया। अब पढ़ने और गायत्री उपासना में मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी थी। इस बार की परीक्षा देने के बाद मेरे सहपाठी मेरी खिल्ली उड़ाते—कहते तुम अपनी श्रेणी में सबसे ऊंचा नम्बर पाओगे। आज परीक्षा फल निकलने वाला था। स्कूल जाते ही मेरे सहपाठी गण हंसी उड़ाने के लिए मेरे चारों ओर जुट गये—उसी समय नम्बर सुनाने का अवसर आया। मेरे सहित सभी को मेरा प्रथम नम्बर से पास होना विस्मित कर रहा था।

* श्री सुदर्शन गुप्त, कोटा से लिखते हैं—मैंने जब से गायत्री मात का अंचल पकड़ा, तब से बराबर ही मुझे संकट के अवसर पर सहायता मिलती गयी है। बुद्धि भी पहले की अपेक्षा अधिक तीव्र हो गयी है। मेरे कुविचार क्रमश दूर होकर विनष्ट हो गये हैं। जब नवीं कक्षा में अनुत्तीर्ण होकर घर में सभी की उपेक्षा का पात्र बना तो मेरा उत्साह टूट गया। आगे पढ़ने की हिम्मत नहीं होती थी, पर गायत्री-उपासना करते ही मुझ में उत्साह की बाढ़ आ गयी और पढ़कर परीक्षा दी। अच्छे नम्बरों से पास हुआ परीक्षा के प्रथम मैं विशेष रूप से उपासना में संलग्न रहा था। इसी भांति माता की कृपा के बल से दसवीं-ग्यारहवीं कक्षा भी पास कर आज बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा हूं। प्रत्येक बार अच्छी तरह पास होते रहने के कारण अब घर में भी मेरा सम्मान बढ़ गया है। माता की कृपा से पढ़ना भी मेरे लिये सुन्दर और सरस हो गया है। चारों ओर मुझे माता की सहायता के हाथ दिखाई देते हैं।

* डा. राजाराम शर्मा, भार्थू (उ.प्र.) से लिखते हैं—गायत्री साक्षात् सरस्वती है। बुद्धि बढ़ाने की, स्मरणशक्ति को तीव्र करने की तथा विद्या-प्राप्ति के लिये सब प्रकार के साधन जुटा देने की उसमें विलक्षण शक्ति है। जो विद्यार्थी अपनी पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ी-बहुत उपासना किया करते हैं, उनकी उन्नति बड़े संतोषजनक ढंग से होती चलती है। परीक्षा के दिनों में इस महामंत्र का थोड़ा साधन करना भी बड़ा अच्छा रहता है। इससे परीक्षार्थी को पिछला पढ़ा हुआ आसानी से याद हो जाता है और परीक्षा काल में चित्त शान्त रहने से प्रश्नपत्र का तात्पर्य भली प्रकार समझने की सुविधा रहती है।

इस सम्बन्ध में अपने परिवार के ही कुछ अनुभव पाठकों के सम्मुख उपस्थित करता हूं। मेरी पुत्री सावित्री देवी ने आयुर्वेद की उच्च परीक्षा की तैयारी की, फार्म भर दिया और फीस भेज दी। पर परीक्षा से कुछ ही दिन पूर्व वह टाइफ़ाइड से ऐसी बीमार हुई कि घर में सब लोगों को बड़ी चिन्ता होने लगी। लड़की को अपनी बीमारी की उतनी चिन्ता न थी जितनी कि परीक्षा की। यह देखकर मैंने उसे सलाह दी कि ‘‘बेटी, मन ही मन गायत्री का जप व ध्यान करो।’’ मेरी सलाह को उसने बड़े उत्साह से माना और रोगशैया पर पड़े-पड़े ही मानसिक जप आरम्भ कर दिया। परिणाम बड़ा आशाजनक हुआ। बीमारी अपनी मियाद से पहले ही सुलझ गई। फिर भी कमजोरी बहुत अधिक थी। सावित्री ने उसी अवस्था में परीक्षा दी और अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण हो गई।

ऐसी ही घटना मेरे पुत्र की है। चि. व्यासदेव मैट्रिक की पढ़ाई के लिये आग्रह करता था। गांव में प्राइमरी स्कूल ही था और बाहर जाने का साधन न था। उसने गायत्री माता की उपासना की और उनकी कृपा से इलाहाबाद में उसकी पढ़ाई का सब प्रबन्ध आसानी से हो गया।
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