सांस्कृतिक पुनरुत्थान
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यही भारतीय संस्कृति है। उसका पुनरुत्थान आवश्यक है। हमारे नैतिक आन्दोलन की यही आधार शिला हो सकती है। अज्ञानान्धकार के मध्य युग में जबकि प्रत्येक क्षेत्र में बुराइयां और विकृतियां घुसीं उसी समय हमारा सांस्कृतिक क्षेत्र भी गंदला हो गया। उसमें ऐसे विचार, ऐसे आचार घुस पड़े जिनके कारण हमारी महान् सांस्कृतिक परम्परा विकृत होकर ऐसी हो गई जिनके कारण आत्मिक स्तर का ऊंचा होना तो दूर उलटे अनेकों प्रकार के अधःपतन उपलब्ध हुए।
जिस देश के लोग अपनी संस्कृति का सन्देश लेकर विश्व के कोने-कोने में जाते थे और वहां के भिन्न भाषा, भेष, भाव, आदर्श, आचार विचार, धर्म के लोगों को प्रभावित करके अपनी संस्कृति में दीक्षित करते थे, वहां के लोगों की परम्पराएं संकीर्णता में बंध कर इतनी हीन हो गई कि चंद मुसलमानों ने आक्रमण करके हमारे ही करोड़ों भाई हमसे छीन लिए—उनके लाख विलाप करने पर भी हम उन्हें अपने धर्म में वापिस न ले सके, फलस्वरूप पाकिस्तान के रूप में उसका दंड हमें चुकाना पड़ा। संकीर्णता, विवेक हीनता की अनेकों कुप्रथाएं आज भी उसी प्रकार हमारे सामाजिक एवं बौद्धिक क्षेत्र में डेरा डाले बैठी हैं। इन अविवेकपूर्ण अन्ध परम्पराओं से छुटकारा पाये बिना हमारी प्राचीन संस्कृति का रूप स्पष्ट नहीं हो सकता। आज तो हम दूसरे देश वासियों की दृष्टि में, विचारशील लोगों की दृष्टि में, कुरीतियों और संकीर्णताओं के पिटारे हैं। अपनी इन बुराइयों से छुटकारा प्राप्त करने के लिये सच्चा प्रयत्न करने की आवश्यकता है, तभी हमारा ऋषि युग को वापिस लाने का सांस्कृतिक पुनरुत्थान का लक्ष पूरा होगा।
यह पहले ही बताया जा चुका है कि गायत्री यज्ञ आंदोलन का लक्ष सत् विचारों और सत् आचारों का विस्तार करना है। यही भारतीय संस्कृति है। नैतिक पुनरुत्थान भी इसी को कहना चाहिए। हमारे देश की विचार-धारा भावना एवं परम्परा के अनुरूप राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण की जो रूप रेखा हो सकती है उसे सांस्कृतिक पुनरुत्थान नाम दिया जा सकता है। एक शब्द में कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति और सच्चरित्रता एक ही वस्तु है। मानवता के सारे आदर्श उसमें सन्निहित हैं।
सुख शान्ति की सारी संभावनाएं इस बात पर निर्भर हैं कि हम लोग किस सीमा तक अपने विचारों को पवित्र रखते हैं, कितना एक दूसरे के साथ सचाई, प्रेम एवं भलमनसाहत का व्यवहार करते हैं। मनुष्य जब एक दूसरे से सहयोग करता है, कठिनाइयों को घटाने एवं सुविधाओं को बढ़ाने में तत्पर होता है तो उसकी रचनात्मक शक्ति बढ़ जाती है, इस रचनात्मक शक्ति का लोकहित में उपयोग करने से प्रसन्नता आनन्द, उल्लास का—सुख साधनों की अभिवृद्धि का द्वार खुल जाता है। इसके विपरीत जब दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के कारण मनुष्य छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, पाप, पाखंड का, शोषण और आक्रमण का मार्ग अपनाता है तो दुख दारिद्र की क्लेश कलह की घटनाएं घुमड़ने लगती हैं। जब हम एक दूसरे को नीचा दिखाने, दुख देने के लिए जब तत्पर होते हैं तो अध पतन की सत्यानाशी संभावनाएं सामने आ खड़ी होती हैं।
संसार में शान्ति का क्षेत्र बढ़े, परस्पर सहयोग और सद्भाव पूर्वक सब लोग जीवन-यापन करें, इसके लिए यह आवश्यक है कि हर व्यक्ति के अन्तः प्रदेश में मनुष्य के अनुरूप आदर्शों के प्रति गहरी निष्ठा स्थिर रहे। मानव जीवन का गौरव और समाज की सुव्यवस्था इसी बात पर निर्भर है कि हर व्यक्ति दूसरों के साथ वैसा व्यवहार करे जैसा वह अपने लिए दूसरों से चाहता है। जिस प्रकार दूसरों के दुर्व्यवहार से अपने को कष्ट होता है, उसी प्रकार जब मन में यह अनुभूति होने लगे कि हमारे दुर्व्यवहार से दूसरों को भी कष्ट और असुविधा होती है तो हमारा मन बुराइयों से घृणा करने लगेगा। बुराइयों के प्रति घृणा और सत्प्रवृत्तियों के प्रति श्रद्धा जब बढ़ती है तो समझना चाहिए कि असुरता का विनाश और देवत्व का विकास हो रहा है। यही वह स्थिति है जिसे उत्पन्न करके इस पृथ्वी पर स्वर्ग अवतरित करने के स्वप्नों को साकार किया जा सकता है।
राष्ट्र को उन्नतिशील बनाने के लिए जो प्रयत्न चल रहे हैं उनकी सफलता के लिए प्रत्येक क्षेत्र में सच्चरित्रता की अभिवृद्धि होना आवश्यक है। नेता, सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, किसान, मजदूर, अध्यापक, चिकित्सक शिल्पी, धर्मजीवी सभी यदि अपने-अपने कर्तव्य को ठीक प्रकार पालन करने लगें, ईश्वर को सर्व व्यापक समझकर ईमानदारी और सचाई पर आरूढ़ हो जावें तो जितना कार्य अब बहुत धन खर्च करने पर भी अधूरा होता है उससे भी कहीं अधिक प्रगति कहीं कम धन और कहीं कम समय में पूरी हो सकती है।
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