प्रचार यात्रा
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गायत्री परिवार के प्रमुख कार्यकर्ताओं ने देश व्यापी दौरा करने और स्थान-स्थान पर विचार गोष्ठियां आयोजित करने का कार्यक्रम बनाया है। इस संस्था के प्रधान सेवक (आचार्यजी) ने अपनी पारिवारिक तथा अन्यान्य जिम्मेदारियों से छुटकारा पाकर देश भर में विचारशील लोगों के छोटे-छोटे सम्मेलनों का आयोजन करके राष्ट्र के नैतिक निर्माण के लिये विचार विनिमय करने तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इस लक्ष की पूर्ति करने वाले कुछ कार्य आरम्भ कराने का निश्चय किया है। यह धर्म प्रचार यात्रा बराबर जारी रहेगी और इस संस्था के प्रति, गायत्री और यज्ञ के प्रति या उससे संचालकों के प्रति जो अनुराग जनता में उत्पन्न हुआ है उसका पूरा उपयोग सद् विचारों के, सत्कार्यों के, बुराइयों से टक्कर लेने के क्षेत्र को विस्तृत करने में ही किया जायेगा।
इस समय संगठनात्मक एवं प्रचारात्मक दो ही कार्य हाथ में लिये गये हैं। पर आगे चल कर कुछ ऐसे रचनात्मक एवं आन्दोलनात्मक कार्यक्रम हाथ में लेने का विचार है जिससे बुराइयों के प्रति घृणा फैले और सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठा एवं प्रशंसा हो। जहां संभव हो वहां बुराइयों के, कुरीतियों के विरुद्ध असहयोग, प्रतिरोध संघर्ष एवं सत्याग्रह का उपयोग किया जाय। देवताओं के आगे पशुबलि जैसी कलंक पूर्ण धार्मिक प्रथाओं के विरुद्ध सत्याग्रह जैसे अस्त्रों को काम में लाया जा सकता है। मृत्युभोज का बहिष्कार हो सकता है। दहेज के विरुद्ध लड़के और लड़कियों से प्रतिज्ञा कराई जा सकती है कि यदि उनके अभिभावक ठहरौनी करें तो वे उस विवाह के लिए ही तैयार न हों। बाल विवाह के लिए शारदा कानून मौजूद है ऐसे विवाहों को रोकने के लिए उस कानून का सहारा लिया जाय। जातीय पंचायतें करके अलग-अलग जातियों में प्रचलित भिन्न-भिन्न प्रकार की कुरीतियों को कम किया जाय उन्हें बन्द न करने वालों को पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार करने का या कोई और दंड देने की व्यवस्था हो। इस प्रकार विभिन्न बुराइयों के विरुद्ध जनता में घृणा, विरोध और रोष पैदा करने तथा विभिन्न अच्छाइयों के प्रति आदर, प्रशंसा, प्रतिष्ठा एवं सामूहिक हर्ष सम्मान प्रदर्शन करने के आयोजन कराये जायं। धन की अपेक्षा यदि ‘‘श्रेष्ठता’’ के प्रति लोक मानस में सम्मान उत्पन्न हो जाय तो प्रचलित बुराइयों में से अधिकांश अपने आप समाप्त हो सकती हैं।
गायत्री यज्ञ आन्दोलन नैतिक एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान का ठोस प्रयत्न है। इसमें हमारी आध्यात्मिक एवं भौतिक सुख-शान्ति तथा सफलता के सभी बीजांकुर मौजूद है। संस्थान के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रत्येक गायत्री प्रेमी को निम्न कार्यक्रमों में से जितना अधिक कार्यभार अपने ऊपर लेना सम्भव हो, उसके लिए सच्चे मन से प्रयत्न करना चाहिए।
(1) अपनी गायत्री उपासना को निष्ठा पूर्वक चलावें। इसे नियमित, नियत संख्या में, नियत समय पर शान्त चित्त और विधिवत् करने का प्रयत्न करें।
(2) संगठित रूप से किया हुआ हर कार्य अधिक सफल होता है। एक दूसरे से प्रोत्साहन एवं मार्ग दर्शन मिलते रहने से लक्ष की ओर प्रगति और भी तीव्र गति से होती है। इसलिए आप इस साधना संगठन में सम्मिलित हों, गायत्री परिवार के सदस्य बनें।
(3) अपने यहां कम से कम 10 गायत्री उपासक बना कर गायत्री परिवार की स्थापना करें। संगठन के द्वारा धर्म प्रचार के पुनीत कार्य को आगे बढ़ाने में बहुत सुविधा होती है।
(4) अपने घर में गायत्री उपासना को आरम्भ कीजिए। आपका इष्ट कुछ भी हो वेद माता गायत्री की स्थापना अवश्य रहे। घर के सब लोग भोजन से पूर्व गायत्री उपासना कर लिया करें ऐसी परम्परा डालनी चाहिए।
(5) उपासना के साथ-साथ स्वाध्याय के लिए भी नित्य समय निकालिए। घर में गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित कीजिए, जिसमें सत्साहित्य मंगाने और उसे पढ़ने या दूसरों को पढ़ाने की व्यवस्था रहे।
(6) समय-समय पर सामूहिक उत्सवों, सत्संगों, विचार गोष्ठियों का आयोजन किया करें। बड़े यज्ञ आयोजन भी यदा-कदा होते रहें। अधिक लोगों को अपने विचारों का बनाने का प्रयत्न कीजिये।
(7) गायत्री तपोभूमि में चलने वाले सांस्कृतिक विद्यालय में अपने क्षेत्र से कुछ सुयोग्य शिक्षार्थी भेजिए जो वहां से लेखनी तथा वाणी के धनी होकर लौटें और सद्ज्ञान के विस्तार के लिये कुछ ठोस कार्य कर सकें।
सद्ज्ञान ही गायत्री है, सत्कर्म ही यज्ञ है। गायत्री और यज्ञ आन्दोलन में सहयोग देकर आप धार्मिक क्रांति के महान लक्ष को पूरा करने में सहायक हो सकते हैं।
***
*समाप्त*
इस समय संगठनात्मक एवं प्रचारात्मक दो ही कार्य हाथ में लिये गये हैं। पर आगे चल कर कुछ ऐसे रचनात्मक एवं आन्दोलनात्मक कार्यक्रम हाथ में लेने का विचार है जिससे बुराइयों के प्रति घृणा फैले और सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठा एवं प्रशंसा हो। जहां संभव हो वहां बुराइयों के, कुरीतियों के विरुद्ध असहयोग, प्रतिरोध संघर्ष एवं सत्याग्रह का उपयोग किया जाय। देवताओं के आगे पशुबलि जैसी कलंक पूर्ण धार्मिक प्रथाओं के विरुद्ध सत्याग्रह जैसे अस्त्रों को काम में लाया जा सकता है। मृत्युभोज का बहिष्कार हो सकता है। दहेज के विरुद्ध लड़के और लड़कियों से प्रतिज्ञा कराई जा सकती है कि यदि उनके अभिभावक ठहरौनी करें तो वे उस विवाह के लिए ही तैयार न हों। बाल विवाह के लिए शारदा कानून मौजूद है ऐसे विवाहों को रोकने के लिए उस कानून का सहारा लिया जाय। जातीय पंचायतें करके अलग-अलग जातियों में प्रचलित भिन्न-भिन्न प्रकार की कुरीतियों को कम किया जाय उन्हें बन्द न करने वालों को पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार करने का या कोई और दंड देने की व्यवस्था हो। इस प्रकार विभिन्न बुराइयों के विरुद्ध जनता में घृणा, विरोध और रोष पैदा करने तथा विभिन्न अच्छाइयों के प्रति आदर, प्रशंसा, प्रतिष्ठा एवं सामूहिक हर्ष सम्मान प्रदर्शन करने के आयोजन कराये जायं। धन की अपेक्षा यदि ‘‘श्रेष्ठता’’ के प्रति लोक मानस में सम्मान उत्पन्न हो जाय तो प्रचलित बुराइयों में से अधिकांश अपने आप समाप्त हो सकती हैं।
गायत्री यज्ञ आन्दोलन नैतिक एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान का ठोस प्रयत्न है। इसमें हमारी आध्यात्मिक एवं भौतिक सुख-शान्ति तथा सफलता के सभी बीजांकुर मौजूद है। संस्थान के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रत्येक गायत्री प्रेमी को निम्न कार्यक्रमों में से जितना अधिक कार्यभार अपने ऊपर लेना सम्भव हो, उसके लिए सच्चे मन से प्रयत्न करना चाहिए।
(1) अपनी गायत्री उपासना को निष्ठा पूर्वक चलावें। इसे नियमित, नियत संख्या में, नियत समय पर शान्त चित्त और विधिवत् करने का प्रयत्न करें।
(2) संगठित रूप से किया हुआ हर कार्य अधिक सफल होता है। एक दूसरे से प्रोत्साहन एवं मार्ग दर्शन मिलते रहने से लक्ष की ओर प्रगति और भी तीव्र गति से होती है। इसलिए आप इस साधना संगठन में सम्मिलित हों, गायत्री परिवार के सदस्य बनें।
(3) अपने यहां कम से कम 10 गायत्री उपासक बना कर गायत्री परिवार की स्थापना करें। संगठन के द्वारा धर्म प्रचार के पुनीत कार्य को आगे बढ़ाने में बहुत सुविधा होती है।
(4) अपने घर में गायत्री उपासना को आरम्भ कीजिए। आपका इष्ट कुछ भी हो वेद माता गायत्री की स्थापना अवश्य रहे। घर के सब लोग भोजन से पूर्व गायत्री उपासना कर लिया करें ऐसी परम्परा डालनी चाहिए।
(5) उपासना के साथ-साथ स्वाध्याय के लिए भी नित्य समय निकालिए। घर में गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित कीजिए, जिसमें सत्साहित्य मंगाने और उसे पढ़ने या दूसरों को पढ़ाने की व्यवस्था रहे।
(6) समय-समय पर सामूहिक उत्सवों, सत्संगों, विचार गोष्ठियों का आयोजन किया करें। बड़े यज्ञ आयोजन भी यदा-कदा होते रहें। अधिक लोगों को अपने विचारों का बनाने का प्रयत्न कीजिये।
(7) गायत्री तपोभूमि में चलने वाले सांस्कृतिक विद्यालय में अपने क्षेत्र से कुछ सुयोग्य शिक्षार्थी भेजिए जो वहां से लेखनी तथा वाणी के धनी होकर लौटें और सद्ज्ञान के विस्तार के लिये कुछ ठोस कार्य कर सकें।
सद्ज्ञान ही गायत्री है, सत्कर्म ही यज्ञ है। गायत्री और यज्ञ आन्दोलन में सहयोग देकर आप धार्मिक क्रांति के महान लक्ष को पूरा करने में सहायक हो सकते हैं।
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*समाप्त*

