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सद्विचारों का महत्व बताने और सत्कर्मों को बढ़ाने एवं बुराइयों को छोड़ने की जनसाधारण से प्रतिज्ञा कराने के लिए स्थान-स्थान पर छोटे बड़े सामूहिक यज्ञ आयोजन करने का कार्यक्रम बनाया गया है। जिस प्रकार गंगाजल की शीशी हाथ पर रखकर कसम खाने का अवसर आने पर साधारण धर्मभीरु मनुष्य उस कसम को अधिक महत्वपूर्ण मानता है। जिस प्रकार विवाह संस्कार के समय अग्नि देवता को साक्षी देकर वर-वधू जो प्रतिज्ञाएं करते हैं उनका महत्व मानते हैं, उसी प्रकार गायत्री जप करके, गायत्री यज्ञ में हवनकर्ता बनके, उपवास ब्रह्मचर्य आदि नियम पालन के उपरान्त जो लोग उपरोक्त बुराइयों को छोड़ने की प्रतिज्ञा करेंगे उनमें से अधिकांश उन्हें निभायेंगे भी, ऐसा विश्वास है। इस प्रकार ये छोटे बड़े यज्ञों के आयोजन सन्मार्ग में जनता की प्रवृत्ति बढ़ाने में बहुत सहायक होंगे।
प्रत्येक यज्ञ आयोजन के समय अधिकाधिक जनता को एकत्रित करने और उसे युग अनुरूप कई दिन तक प्रौढ़ विचार देने का कार्यक्रम चलाया जाय। इस प्रकार आध्यात्मिक उन्नति, वायु शुद्धि आत्मिक और शारीरिक आरोग्य, देव पूजा आदि धर्म प्रयोजनों की पूर्ति के अतिरिक्त लोक-शिक्षण की एक महत्वपूर्ण शृंखला चल पड़ेगी।
विचारों के परिवर्तन के लिए लेखनी और वाणी दो ही प्रधान औजार हैं। गायत्री सम्मेलनों, पारिवारिक सत्संगों, विचार गोष्ठियों द्वारा नैतिक पुनरुत्थान के विचार वाणी की सहायता से सर्वत्र फैलाये जायेंगे।
लेखनी के द्वारा भी यह कार्य होगा। संस्था अत्यन्त सस्ता लागत से भी कम मूल्य पर बेचने एवं मुफ्त वितरण करने के लिए भारी संख्या में साहित्य तैयार करेगी और उसे घर-घर पहुंचाने का प्रयत्न करेगी। विचार परिवर्तन के लिए इस प्रकार का साहित्य बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। ईसाई संस्थाएं इस माध्यम से बहुत कार्य करने में सफल भी हुई हैं। यह तरीका हमें भी अपनाना है। संस्था की ओर से ‘अखण्ड-ज्योति’ मासिक पत्रिका 20 वर्ष से बिक रही है। मासिक ‘गायत्री-परिवार-पत्रिका’ संगठनात्मक कार्यक्रम के लिए गत वर्ष से निकल रही है। अब ‘‘जीवन यज्ञ’’ नामक उच्च कोटि का पाक्षिक पत्र संसार की सत्प्रवृत्तियों का, सज्जनों द्वारा किये हुए प्रशंसनीय सत्कार्यों का, परिचय कराने के लिए और निकाला जा रहा है।
सद्विचार प्रसार कार्य के लिए उन कर्मठ कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता है जो योग्यता एवं पवित्रता की दृष्टि से इस कार्य के उपयुक्त हों। ऐसे कार्यकर्त्ता ढूंढ़ने और उन्हें निर्धारित लक्ष के लिए योग्य बनाने के लिए प्रयत्न आरम्भ कर दिया गया है। तपोभूमि में एक ऐसे विद्यालय की स्थापना की गई है जिससे लेखनी और वाणी द्वारा सद्विचार प्रसार का उद्देश्य पूर्ण करने के लिए वक्तृता, गायन, लेखन, साहित्य निर्माण की विधिवत् शिक्षा दी जाती है। जो लोग अपने भावी जीवन में विचार निर्माण का व्रत लेंगे वे ही इस विद्यालय में भर्ती किये जायेंगे और उन्हें मानव जाति की विभिन्न समस्याओं के संबंध में गहरा अध्ययन कराया जायगा, साथ ही लेखनी और वाणी को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए व्यवहारिक एवं कलात्मक अभ्यास भी कराया जायगा।
तपोभूमि में एक अच्छा प्रेस लगाया गया है जिसमें प्रेस कार्य की विभिन्न मशीनें हैं। इस विषय की शिक्षा पाना एक कुशल पत्रकार एवं साहित्यकार के लिए आवश्यक भी है अपना निज का प्रेस खोलने या प्रेस कर्मचारी बनकर आजीविका कमाकर स्वावलम्बी बनने के लिए भी यह शिक्षा आवश्यक है। इस प्रेस द्वारा अत्यन्त सस्ती विचारोत्तेजक पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएं, प्रचार-पत्रिका, पर्चे, पोस्टर, आदर्श वाक्य, चित्र, छापे जायेंगे और उन्हें लागत मूल्य पर या उदार लोगों द्वारा बिना मूल्य वितरण करा गायत्री-परिवार की 2000 शाखाओं द्वारा अधिकाधिक जन समाज तक पहुंचाने का प्रयत्न किया जायगा।
तपोभूमि के इस प्रचार विद्यालय में से निकले हुये छात्र यहां से जो भावनाएं और विचारधाराएं लेकर निकलेंगे उन्हें अपने क्षेत्र में क्रियात्मक कार्यक्रमों द्वारा फैलाने का प्रयत्न करेंगे। इनकी प्रवृत्तियों के केन्द्र ‘‘गायत्री ज्ञान मन्दिर’’ कहलावेंगे। पंचायती घरों की तरह, प्राइमरी स्कूलों की तरह, शिवालय, देवालयों की तरह ज्ञान मन्दिरों का जाल भी देश भर में पूरा जाय यह स्वप्न इस संस्था के हैं। श्रमदान एवं मुट्ठी-मुट्ठी आर्थिक सहयोग से छोटे-छोटे ज्ञान मन्दिर आसानी से बनाये जा सकते हैं। यह ज्ञान मन्दिर स्थानीय जनता को इकट्ठा होने, सामूहिक प्रार्थना एवं सत्संग करने, धार्मिक कथाएं एवं प्रौढ़ पाठशालाएं चलाने, पुस्तकालय, वाचनालय, व्यायामशाला एवं थोड़ी दवादारू की व्यवस्था रखने से बड़े उपयोगी सिद्ध होंगे। इन्हीं में क्षेत्रीय लोक सेवक के निवास की व्यवस्था होगी। मुट्ठी-मुट्ठी अन्न गायत्री परिवार का प्रत्येक सदस्य प्रतिदिन एक घड़े में डालते रहने की प्रक्रिया चलावेंगे जिससे इन ज्ञान मन्दिरों की अर्थ व्यवस्था आसानी से चलती रहेगी। यह ज्ञान-केन्द्र राष्ट्र के बौद्धिक निर्माण में आशाजनक योग देंगे ऐसा विश्वास है।
प्रत्येक यज्ञ आयोजन के समय अधिकाधिक जनता को एकत्रित करने और उसे युग अनुरूप कई दिन तक प्रौढ़ विचार देने का कार्यक्रम चलाया जाय। इस प्रकार आध्यात्मिक उन्नति, वायु शुद्धि आत्मिक और शारीरिक आरोग्य, देव पूजा आदि धर्म प्रयोजनों की पूर्ति के अतिरिक्त लोक-शिक्षण की एक महत्वपूर्ण शृंखला चल पड़ेगी।
विचारों के परिवर्तन के लिए लेखनी और वाणी दो ही प्रधान औजार हैं। गायत्री सम्मेलनों, पारिवारिक सत्संगों, विचार गोष्ठियों द्वारा नैतिक पुनरुत्थान के विचार वाणी की सहायता से सर्वत्र फैलाये जायेंगे।
लेखनी के द्वारा भी यह कार्य होगा। संस्था अत्यन्त सस्ता लागत से भी कम मूल्य पर बेचने एवं मुफ्त वितरण करने के लिए भारी संख्या में साहित्य तैयार करेगी और उसे घर-घर पहुंचाने का प्रयत्न करेगी। विचार परिवर्तन के लिए इस प्रकार का साहित्य बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। ईसाई संस्थाएं इस माध्यम से बहुत कार्य करने में सफल भी हुई हैं। यह तरीका हमें भी अपनाना है। संस्था की ओर से ‘अखण्ड-ज्योति’ मासिक पत्रिका 20 वर्ष से बिक रही है। मासिक ‘गायत्री-परिवार-पत्रिका’ संगठनात्मक कार्यक्रम के लिए गत वर्ष से निकल रही है। अब ‘‘जीवन यज्ञ’’ नामक उच्च कोटि का पाक्षिक पत्र संसार की सत्प्रवृत्तियों का, सज्जनों द्वारा किये हुए प्रशंसनीय सत्कार्यों का, परिचय कराने के लिए और निकाला जा रहा है।
सद्विचार प्रसार कार्य के लिए उन कर्मठ कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता है जो योग्यता एवं पवित्रता की दृष्टि से इस कार्य के उपयुक्त हों। ऐसे कार्यकर्त्ता ढूंढ़ने और उन्हें निर्धारित लक्ष के लिए योग्य बनाने के लिए प्रयत्न आरम्भ कर दिया गया है। तपोभूमि में एक ऐसे विद्यालय की स्थापना की गई है जिससे लेखनी और वाणी द्वारा सद्विचार प्रसार का उद्देश्य पूर्ण करने के लिए वक्तृता, गायन, लेखन, साहित्य निर्माण की विधिवत् शिक्षा दी जाती है। जो लोग अपने भावी जीवन में विचार निर्माण का व्रत लेंगे वे ही इस विद्यालय में भर्ती किये जायेंगे और उन्हें मानव जाति की विभिन्न समस्याओं के संबंध में गहरा अध्ययन कराया जायगा, साथ ही लेखनी और वाणी को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए व्यवहारिक एवं कलात्मक अभ्यास भी कराया जायगा।
तपोभूमि में एक अच्छा प्रेस लगाया गया है जिसमें प्रेस कार्य की विभिन्न मशीनें हैं। इस विषय की शिक्षा पाना एक कुशल पत्रकार एवं साहित्यकार के लिए आवश्यक भी है अपना निज का प्रेस खोलने या प्रेस कर्मचारी बनकर आजीविका कमाकर स्वावलम्बी बनने के लिए भी यह शिक्षा आवश्यक है। इस प्रेस द्वारा अत्यन्त सस्ती विचारोत्तेजक पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएं, प्रचार-पत्रिका, पर्चे, पोस्टर, आदर्श वाक्य, चित्र, छापे जायेंगे और उन्हें लागत मूल्य पर या उदार लोगों द्वारा बिना मूल्य वितरण करा गायत्री-परिवार की 2000 शाखाओं द्वारा अधिकाधिक जन समाज तक पहुंचाने का प्रयत्न किया जायगा।
तपोभूमि के इस प्रचार विद्यालय में से निकले हुये छात्र यहां से जो भावनाएं और विचारधाराएं लेकर निकलेंगे उन्हें अपने क्षेत्र में क्रियात्मक कार्यक्रमों द्वारा फैलाने का प्रयत्न करेंगे। इनकी प्रवृत्तियों के केन्द्र ‘‘गायत्री ज्ञान मन्दिर’’ कहलावेंगे। पंचायती घरों की तरह, प्राइमरी स्कूलों की तरह, शिवालय, देवालयों की तरह ज्ञान मन्दिरों का जाल भी देश भर में पूरा जाय यह स्वप्न इस संस्था के हैं। श्रमदान एवं मुट्ठी-मुट्ठी आर्थिक सहयोग से छोटे-छोटे ज्ञान मन्दिर आसानी से बनाये जा सकते हैं। यह ज्ञान मन्दिर स्थानीय जनता को इकट्ठा होने, सामूहिक प्रार्थना एवं सत्संग करने, धार्मिक कथाएं एवं प्रौढ़ पाठशालाएं चलाने, पुस्तकालय, वाचनालय, व्यायामशाला एवं थोड़ी दवादारू की व्यवस्था रखने से बड़े उपयोगी सिद्ध होंगे। इन्हीं में क्षेत्रीय लोक सेवक के निवास की व्यवस्था होगी। मुट्ठी-मुट्ठी अन्न गायत्री परिवार का प्रत्येक सदस्य प्रतिदिन एक घड़े में डालते रहने की प्रक्रिया चलावेंगे जिससे इन ज्ञान मन्दिरों की अर्थ व्यवस्था आसानी से चलती रहेगी। यह ज्ञान-केन्द्र राष्ट्र के बौद्धिक निर्माण में आशाजनक योग देंगे ऐसा विश्वास है।

