उन्मूलन करने योग्य बुराइयां
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स्वार्थपरता, बेईमानी, शोषण, निष्ठुरता, विलासिता, लोभ, अनुदारता, आलस्य, अज्ञान, अहंकार आदि व्यक्तिगत दुर्गुण मनुष्य की अधार्मिकता के कारण उत्पन्न होते हैं। यह दुर्गुण जब अनेक लोगों में फैल जाते हैं तब वे धीरे-धीरे सामाजिक कुप्रथा का, रिवाज एवं परम्परा का, रूप धारण कर लेते हैं। एक के देखा देखी दूसरा उन्हें अपनाता है। जन स्वभाव में वे बातें ऐसी शामिल हो जाती हैं कि उनमें कोई विशेष बुराई भी प्रतीत नहीं होती। इतना होते हुये भी वे कुप्रथाएं अपना हानिकारक प्रभाव तो छोड़ती नहीं। लोग उनके कारण दिन-दिन तबाह होते जाते हैं। इन सामाजिक बुराइयों को प्रबल जनमत जागृत करके, किसी संगठित समाज द्वारा उनका असहयोग या विरोध आंदोलन खड़ा करने से ही अभ्यस्त लोक मानस में परिवर्तन कराया जा सकता है। गायत्री परिवार ऐसे आन्दोलन की भी तैयारी कर रहा है जिससे लोगों के स्वभाव में घुल गई कुरीतियों को हटाना सम्भव हो सके।
मांसाहार, बीड़ी, हुक्का, भांग, गांजा, अफीम, चरस, शराब आदि खाने-पीने सम्बन्धी ऐसी कुरीतियां हैं जो सदाचार, स्वास्थ्य और धन को बर्बाद करती हैं।
जुआ, सट्टा, लाटरी, फीचर यह वे बुराइयां हैं जो बिना मेहनत किये धन प्राप्त करने के लालच से उत्पन्न होती हैं। दूध, घी, मसाले, दवाएं आदि में मिलावट करके उससे अनुचित लाभ उठाना, चोरी, ठगी, उठाईगीरी, जेबकटी, धोखेबाजी, बेईमानी, लूट, डकैती आदि के दुस्साहस, कम नापना, कम तौलना, अधिक मुनाफा लेना, बढ़िया बताकर घटिया चीज देना, कम मेहनत करके अधिक वेतन लेना, टैक्स चुराना, रिश्वत देना और लेना आदि आर्थिक भ्रष्टाचार से समाज का आर्थिक ढांचा लड़खड़ाने लगता है और इन बुराइयों में लगा हुआ व्यक्ति अन्य अनेकों बुराइयों की ओर अग्रसर होता है।
हिन्दू समाज की वैवाहिक व्यवस्था एक अभिशाप बन रही है। बाल विवाह, वृद्ध विवाह, अनमेल विवाह, दहेज, विवाह के समय सामर्थ्य से अधिक कीमती जेवर वस्त्र एवं दिखाये की चीजों की आवश्यकता, बरात चढ़ाने तथा प्रीति-भोज में अपव्यय आदि कारण ऐसे हैं जिनसे विवाह जैसा साधारण संस्कार हर हिन्दू के लिए एक सिर दर्द बना हुआ है। कितना ही कन्याओं को इन्हीं कुरीतियों की वेदी पर बलिदान होना पड़ता है।
भूत-पलीतों के नाम पर फैला हुआ अज्ञान समाज के लिए कलंक है। देवी के आगे भैंसे, बकरे, मुर्गे, सुअर आदि की बलि देने की प्रथा अभी भी अनेक प्रान्तों में जारी है और नवरात्रि के दिनों हजारों निर्दोष पशु पक्षियों का खून बहाया जाता है। भूत पलीत के नाम पर ‘सयाने दिवाने’ नाना प्रकार के अनाचार फैलाते हैं। धर्म व्यवसायी पंडित पुरोहित परलोक में कई गुना मिलने का प्रलोभन देकर भोली जनता को ठगते रहते हैं। मृत्यु भोज की घृणित प्रथा के कारण जिस घर में मृत्यु हुई है उसी में कुछ ही दिन बाद लोग माल मलाई उड़ाने को निस्संकोच तैयार हो जाते हैं। यह ऐसी प्रथाएं हैं जिनका बन्द होना जरूरी है।
फैशनपरस्ती, शौकीनी, फिजूल खर्ची, शान शौकत, शेखी खोरी, विलासिता, ऐयाशी, सिनेमाबाजी, कामुकता, गन्दगी तस्वीरें, गन्दी पुस्तकें, व्यभिचार, अमर्यादित काम सेवन, अप्राकृतिक व्यभिचार आदि बुराइयों के कारण हमारा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य चौपट हुआ जा रहा है।
उद्दंडता, उच्छृंखलता, गुण्डागीरी, अवज्ञा, अशिष्टता, असहिष्णुता, असंयम के उदाहरण घर-घर में मिल सकते हैं। नई पीढ़ी के लड़के और लड़कियों में यह प्रवृत्तियां और भी अधिक बढ़ रही हैं। मर्यादाओं पर रहना सबको बुरा लगता है। कृतज्ञता का स्थान कृतघ्नता लेती जा रही है।
महिलाओं की स्थिति भी दयनीय है। पर्दा प्रथा और सामाजिक हीनता के कारण वे शिक्षा तथा स्वावलम्बन से रहित बुरी स्थिति में पड़ी हुई है। गृह-व्यवस्था तथा शिशु-पालन भी उनके अज्ञान के कारण अस्त−व्यस्त हैं। राष्ट्र का आधा अंग इस प्रकार अपाहिज पड़ा हो तो यह भी प्रगति में एक बड़ी बाधा ही मानी जायगी।
यों हमारे समाज में अच्छाइयां भी बहुत हैं। अनेक देशों की अपेक्षा हमारा समाज एवं व्यक्तिगत चरित्र काफी ऊंचा है, फिर भी उपरोक्त बुराइयां कम महत्व की नहीं है। इन्हें दूर करने के लिए यदि कोई प्रयत्न नहीं किया गया तो जिस गति से प्रगति होनी चाहिए वह न हो सकेगी। आर्थिक दृष्टि से यदि हमारी उन्नति भी हुई तो वह सामाजिक हीनावस्था के कारण कुछ विशेष उपयोगी साबित न हो सकेगी। सरकारी शिक्षा पद्धति धीमी और अपूर्ण है। उसे तेज करने एवं उससे छटे हुए धार्मिक विषयों को पूरा करने के लिए गैर सरकारी प्रयत्न भी होने चाहिए।
इस प्रकार बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति के लिए एक बहुत बड़ा कार्य क्षेत्र पड़ा हुआ है। गायत्री परिवार के धार्मिक संगठन ने अब इन्हीं गुत्थियों को सुलझाने में आगे बढ़ कर काम करने का निश्चय किया है। धार्मिक वातावरण निर्माण करने का तात्पर्य सज्जनता, मानवता और कर्तव्य परायणता की स्थापना करना ही है। ईश्वर उपासना का सबसे बड़ा चिन्ह यही है कि हम बुराइयों से डरें और भलाइयों की वृद्धि करते हुए ईश्वर को प्रसन्न करें।
मांसाहार, बीड़ी, हुक्का, भांग, गांजा, अफीम, चरस, शराब आदि खाने-पीने सम्बन्धी ऐसी कुरीतियां हैं जो सदाचार, स्वास्थ्य और धन को बर्बाद करती हैं।
जुआ, सट्टा, लाटरी, फीचर यह वे बुराइयां हैं जो बिना मेहनत किये धन प्राप्त करने के लालच से उत्पन्न होती हैं। दूध, घी, मसाले, दवाएं आदि में मिलावट करके उससे अनुचित लाभ उठाना, चोरी, ठगी, उठाईगीरी, जेबकटी, धोखेबाजी, बेईमानी, लूट, डकैती आदि के दुस्साहस, कम नापना, कम तौलना, अधिक मुनाफा लेना, बढ़िया बताकर घटिया चीज देना, कम मेहनत करके अधिक वेतन लेना, टैक्स चुराना, रिश्वत देना और लेना आदि आर्थिक भ्रष्टाचार से समाज का आर्थिक ढांचा लड़खड़ाने लगता है और इन बुराइयों में लगा हुआ व्यक्ति अन्य अनेकों बुराइयों की ओर अग्रसर होता है।
हिन्दू समाज की वैवाहिक व्यवस्था एक अभिशाप बन रही है। बाल विवाह, वृद्ध विवाह, अनमेल विवाह, दहेज, विवाह के समय सामर्थ्य से अधिक कीमती जेवर वस्त्र एवं दिखाये की चीजों की आवश्यकता, बरात चढ़ाने तथा प्रीति-भोज में अपव्यय आदि कारण ऐसे हैं जिनसे विवाह जैसा साधारण संस्कार हर हिन्दू के लिए एक सिर दर्द बना हुआ है। कितना ही कन्याओं को इन्हीं कुरीतियों की वेदी पर बलिदान होना पड़ता है।
भूत-पलीतों के नाम पर फैला हुआ अज्ञान समाज के लिए कलंक है। देवी के आगे भैंसे, बकरे, मुर्गे, सुअर आदि की बलि देने की प्रथा अभी भी अनेक प्रान्तों में जारी है और नवरात्रि के दिनों हजारों निर्दोष पशु पक्षियों का खून बहाया जाता है। भूत पलीत के नाम पर ‘सयाने दिवाने’ नाना प्रकार के अनाचार फैलाते हैं। धर्म व्यवसायी पंडित पुरोहित परलोक में कई गुना मिलने का प्रलोभन देकर भोली जनता को ठगते रहते हैं। मृत्यु भोज की घृणित प्रथा के कारण जिस घर में मृत्यु हुई है उसी में कुछ ही दिन बाद लोग माल मलाई उड़ाने को निस्संकोच तैयार हो जाते हैं। यह ऐसी प्रथाएं हैं जिनका बन्द होना जरूरी है।
फैशनपरस्ती, शौकीनी, फिजूल खर्ची, शान शौकत, शेखी खोरी, विलासिता, ऐयाशी, सिनेमाबाजी, कामुकता, गन्दगी तस्वीरें, गन्दी पुस्तकें, व्यभिचार, अमर्यादित काम सेवन, अप्राकृतिक व्यभिचार आदि बुराइयों के कारण हमारा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य चौपट हुआ जा रहा है।
उद्दंडता, उच्छृंखलता, गुण्डागीरी, अवज्ञा, अशिष्टता, असहिष्णुता, असंयम के उदाहरण घर-घर में मिल सकते हैं। नई पीढ़ी के लड़के और लड़कियों में यह प्रवृत्तियां और भी अधिक बढ़ रही हैं। मर्यादाओं पर रहना सबको बुरा लगता है। कृतज्ञता का स्थान कृतघ्नता लेती जा रही है।
महिलाओं की स्थिति भी दयनीय है। पर्दा प्रथा और सामाजिक हीनता के कारण वे शिक्षा तथा स्वावलम्बन से रहित बुरी स्थिति में पड़ी हुई है। गृह-व्यवस्था तथा शिशु-पालन भी उनके अज्ञान के कारण अस्त−व्यस्त हैं। राष्ट्र का आधा अंग इस प्रकार अपाहिज पड़ा हो तो यह भी प्रगति में एक बड़ी बाधा ही मानी जायगी।
यों हमारे समाज में अच्छाइयां भी बहुत हैं। अनेक देशों की अपेक्षा हमारा समाज एवं व्यक्तिगत चरित्र काफी ऊंचा है, फिर भी उपरोक्त बुराइयां कम महत्व की नहीं है। इन्हें दूर करने के लिए यदि कोई प्रयत्न नहीं किया गया तो जिस गति से प्रगति होनी चाहिए वह न हो सकेगी। आर्थिक दृष्टि से यदि हमारी उन्नति भी हुई तो वह सामाजिक हीनावस्था के कारण कुछ विशेष उपयोगी साबित न हो सकेगी। सरकारी शिक्षा पद्धति धीमी और अपूर्ण है। उसे तेज करने एवं उससे छटे हुए धार्मिक विषयों को पूरा करने के लिए गैर सरकारी प्रयत्न भी होने चाहिए।
इस प्रकार बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति के लिए एक बहुत बड़ा कार्य क्षेत्र पड़ा हुआ है। गायत्री परिवार के धार्मिक संगठन ने अब इन्हीं गुत्थियों को सुलझाने में आगे बढ़ कर काम करने का निश्चय किया है। धार्मिक वातावरण निर्माण करने का तात्पर्य सज्जनता, मानवता और कर्तव्य परायणता की स्थापना करना ही है। ईश्वर उपासना का सबसे बड़ा चिन्ह यही है कि हम बुराइयों से डरें और भलाइयों की वृद्धि करते हुए ईश्वर को प्रसन्न करें।

