आत्म कल्याण की उपासना
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हमारे देश का हर धार्मिक प्रकृति का व्यक्ति अपनी धार्मिक महत्वाकांक्षाएं—स्वर्ग प्राप्ति, जीवन मुक्ति, ब्रह्म निर्वाण, ईश्वर प्राप्ति, ऋद्धि सिद्धि आदि के रूप में—व्यक्त करता है। धर्मकृत्यों में उसका लक्ष प्रायः यही सब होता है। इस लक्ष की प्राप्ति के लिए जो पूजा पाठ, तप त्याग, दान पुण्य, तीर्थ यात्रा, देव आराधना, स्वाध्याय सत्संग, व्रत उपवास कथा वार्ता, कीर्तन भजन ब्रह्मभोज आदि की परम्पराएं प्रचलित हैं उनका रूप भी ऐसा विकृत हो गया है कि उनका लाभ पुरोहित वर्ग की आजीविका चलने या व्यक्तिगत मन में संतोष कर लेने के अतिरिक्त, सामाजिक एवं नैतिक दृष्टि से कुछ नहीं होता। वैसे धर्मकार्यों की खरी कसौटी यही है कि उनके फलस्वरूप जन-समाज का नैतिक एवं बौद्धिक स्तर ऊंचा उठना चाहिए। जो कर्मकाण्ड, धर्म-कर्म इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते, उनके खरेपन पर सहज ही संदेह किया जा सकता है।
गायत्री उपासना इस दृष्टि से खरी उपासना है। गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों में से प्रत्येक में सद्विचारों की प्रेरणा है। गायत्री उपासक अपने प्रत्येक जप में जब मानव जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता, सद्विचार, सद्विवेक के लिए बार-बार ईश्वर से प्रार्थना करता है तो आखिर उसके अन्तःकरण में इस महान तत्व की—सद्भाव की—सदाचार की—श्रेष्ठता सुदृढ़ होने की लगती है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा बनता है। आन्तरिक श्रेष्ठता की महत्ता एवं आवश्यकता के प्रति घंटों चित्त को एकाग्र करके साधन करने वाला साधक निश्चय ही मंद या तीव्र वेग में अपने लक्ष की ओर अग्रसर होता ही है। उसके नैतिक एवं आत्मिक स्तर में श्रेष्ठता के तत्वों का विकास होता ही है।
आत्मा में सतोगुण और श्रेष्ठता बढ़ने से किसी भी मनुष्य का आन्तरिक एवं भौतिक जीवन सुख शान्तिमय बन सकता है, उसकी अनेकों उलझनें एवं समस्याएं सुलझ सकती हैं। गायत्री उपासना का महात्म्य बताने वाली अन्य पुस्तकों में यह बताया जा चुका है कि इस साधना से किस प्रकार भौतिक एवं अध्यात्मिक ऋद्धि सिद्धियां प्राप्त होती है। जहां सद्विचार बढ़ेंगे वह सत्कार्य होना स्वाभाविक है। जब सद्विचारों और सत्कार्यों के लिए जीवन क्रम में समुचित स्थान मिल गया तो सुख शान्ति, उन्नति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होने में संदेह की गुंजायश नहीं रहती।
सद्बुद्धि की—गायत्री की उपासना से—प्राप्त हुए सदाचार के फलस्वरूप जो आत्मबल बढ़ता है उससे हमारी धार्मिक महत्वाकांक्षाओं की सहज ही पूर्ति हो सकती है। आत्मिक पवित्रता, आध्यात्मिक सुस्थिरता के फलस्वरूप स्वर्ग प्राप्ति, जीवन मुक्ति, ब्रह्म निर्वाण, ईश्वर प्राप्ति, ऋद्धि सिद्धि आदि की उपलब्धि सम्भव है। अपनी आन्तरिक स्थिति में सुधार किये बिना केवल किसी मन्त्र विशेष, देवता विशेष या कर्मकाण्ड विशेष का विधान पूरा कर लेने से उपरोक्त उद्देश्यों की उपलब्धि नहीं हो सकती। इसलिए गायत्री उपासना ही सच्चे अर्थों में उन सब लाभों को प्राप्त कराने में समर्थ हो सकती है जिनकी हम लोग आमतौर से धर्म कर्म करते हुए आकांक्षा किया करते हैं। इस आध्यात्मिक लक्ष की ओर जैसे-जैसे हम अग्रसर होते हैं वैसे ही वैसे हमारी भौतिक उलझनें भी सुलझने लगती हैं।
अधिकांश आपत्तियों, चिन्ताओं कठिनाइयों का कारण हमारी अपरिष्कृत विचारधारा होती है, मनुष्य की अपनी निज की अनेकों बुरी आदतें, उलटी समझ, आलस्य, प्रमाद, ओछी मनोवृत्ति अहंमन्यता संकीर्णता, अनुदारता, शेखी खोरी, दोष दृष्टि, बेईमानी, कृतघ्नता, कंजूसी कर्तव्य हीनता परिस्थिति से अधिक महत्वाकांक्षा कटुता आदि बुराइयां बहुत सी कठिनाइयां एवं उलझनें पैदा करती रहती हैं। इन्हीं के कारण अनेकों शत्रु उत्पन्न हो जाते हैं, दूसरों के सहयोग का अभाव भी इन्हीं कमजोरियों के कारण रहता है। जब यह दुर्बलताएं दूर होने लगती हैं तो अनेकों समस्याएं भी सहज ही सुलझ जाती है। उदार दृष्टिकोण अपनाने से दूसरों का स्नेह, सद्भाव और सहयोग उपलब्ध होने लगता है, उन्नति का द्वार खुलता है और सुख सम्पत्ति की अभिवृद्धि तेजी से होने लगती है। इस प्रकार गायत्री उपासना का महत्व समझने वाले उसकी तह तक पहुंचने वाले—उसके सन्देश और आदर्श को हृदयंगम करने वाले व्यक्ति का आध्यात्मिक और भौतिक जीवन दिन-दिन अधिक पवित्र एवं सुख शान्तिमय बनता चला जाता है।
गायत्री उपासना व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की आध्यात्मिक और भौतिक सुख शान्ति को बढ़ाने में बहुत सहायक होती है। व्यक्तियों का समूह ही समाज या राष्ट्र है। किसी समाज के यदि अधिकांश लोग सज्जन बन जाय तो वह सारा समाज या राष्ट्र प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। जिस समय में अधिकांश व्यक्ति सन्मार्ग पर चलने वाले होते हैं वह समय सतयुग कहलाता है। गायत्री उपासना द्वारा व्यक्तिगत चरित्र निर्माण की प्रक्रिया अन्ततः राष्ट्रीय, सामाजिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान का हेतु बनती है।
किसी न किसी रूप में नित्य गायत्री उपासना एवं सुविधानुसार यज्ञ यजन करते रहना—गायत्री और यज्ञ में सन्निहित आदर्शों को हृदयंगम करते रहना—एक कल्याणकारी साधना है पर इसका स्वरूप यदि व्यक्तिगत पूजा तक ही सीमित रहे तो व्यापक क्षेत्र में युग निर्माण का लक्ष बहुत धीरे-धीरे पूरा होगा। प्रगति आशाजनक गति से हो इसके लिये इस कार्यक्रम को सुसंगठित रूप से सामाजिक उत्कर्ष के लिये सुव्यवस्थित रूप से चलाना होगा। संगठन ही शक्ति है। किसी विचारधारा एवं क्रिया पद्धति को विस्तृत क्षेत्र में सुप्रतिष्ठित करने के लिये एक मात्र आधार सुसंगठित प्रयत्न ही हो सकते हैं। इतिहास साक्षी है कि जब भी जन मानस को बदलने की कोई प्रक्रिया सम्पन्न हुई तो उसके पीछे संगठित प्रयत्न अवश्य रहे हैं। आर्य, धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म के फैलने की सफलता के पीछे अनेक प्रचारकों के प्रबल प्रयत्न ही प्रधान रूप में कार्य करते रहे हैं।
गायत्री उपासना इस दृष्टि से खरी उपासना है। गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों में से प्रत्येक में सद्विचारों की प्रेरणा है। गायत्री उपासक अपने प्रत्येक जप में जब मानव जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता, सद्विचार, सद्विवेक के लिए बार-बार ईश्वर से प्रार्थना करता है तो आखिर उसके अन्तःकरण में इस महान तत्व की—सद्भाव की—सदाचार की—श्रेष्ठता सुदृढ़ होने की लगती है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा बनता है। आन्तरिक श्रेष्ठता की महत्ता एवं आवश्यकता के प्रति घंटों चित्त को एकाग्र करके साधन करने वाला साधक निश्चय ही मंद या तीव्र वेग में अपने लक्ष की ओर अग्रसर होता ही है। उसके नैतिक एवं आत्मिक स्तर में श्रेष्ठता के तत्वों का विकास होता ही है।
आत्मा में सतोगुण और श्रेष्ठता बढ़ने से किसी भी मनुष्य का आन्तरिक एवं भौतिक जीवन सुख शान्तिमय बन सकता है, उसकी अनेकों उलझनें एवं समस्याएं सुलझ सकती हैं। गायत्री उपासना का महात्म्य बताने वाली अन्य पुस्तकों में यह बताया जा चुका है कि इस साधना से किस प्रकार भौतिक एवं अध्यात्मिक ऋद्धि सिद्धियां प्राप्त होती है। जहां सद्विचार बढ़ेंगे वह सत्कार्य होना स्वाभाविक है। जब सद्विचारों और सत्कार्यों के लिए जीवन क्रम में समुचित स्थान मिल गया तो सुख शान्ति, उन्नति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होने में संदेह की गुंजायश नहीं रहती।
सद्बुद्धि की—गायत्री की उपासना से—प्राप्त हुए सदाचार के फलस्वरूप जो आत्मबल बढ़ता है उससे हमारी धार्मिक महत्वाकांक्षाओं की सहज ही पूर्ति हो सकती है। आत्मिक पवित्रता, आध्यात्मिक सुस्थिरता के फलस्वरूप स्वर्ग प्राप्ति, जीवन मुक्ति, ब्रह्म निर्वाण, ईश्वर प्राप्ति, ऋद्धि सिद्धि आदि की उपलब्धि सम्भव है। अपनी आन्तरिक स्थिति में सुधार किये बिना केवल किसी मन्त्र विशेष, देवता विशेष या कर्मकाण्ड विशेष का विधान पूरा कर लेने से उपरोक्त उद्देश्यों की उपलब्धि नहीं हो सकती। इसलिए गायत्री उपासना ही सच्चे अर्थों में उन सब लाभों को प्राप्त कराने में समर्थ हो सकती है जिनकी हम लोग आमतौर से धर्म कर्म करते हुए आकांक्षा किया करते हैं। इस आध्यात्मिक लक्ष की ओर जैसे-जैसे हम अग्रसर होते हैं वैसे ही वैसे हमारी भौतिक उलझनें भी सुलझने लगती हैं।
अधिकांश आपत्तियों, चिन्ताओं कठिनाइयों का कारण हमारी अपरिष्कृत विचारधारा होती है, मनुष्य की अपनी निज की अनेकों बुरी आदतें, उलटी समझ, आलस्य, प्रमाद, ओछी मनोवृत्ति अहंमन्यता संकीर्णता, अनुदारता, शेखी खोरी, दोष दृष्टि, बेईमानी, कृतघ्नता, कंजूसी कर्तव्य हीनता परिस्थिति से अधिक महत्वाकांक्षा कटुता आदि बुराइयां बहुत सी कठिनाइयां एवं उलझनें पैदा करती रहती हैं। इन्हीं के कारण अनेकों शत्रु उत्पन्न हो जाते हैं, दूसरों के सहयोग का अभाव भी इन्हीं कमजोरियों के कारण रहता है। जब यह दुर्बलताएं दूर होने लगती हैं तो अनेकों समस्याएं भी सहज ही सुलझ जाती है। उदार दृष्टिकोण अपनाने से दूसरों का स्नेह, सद्भाव और सहयोग उपलब्ध होने लगता है, उन्नति का द्वार खुलता है और सुख सम्पत्ति की अभिवृद्धि तेजी से होने लगती है। इस प्रकार गायत्री उपासना का महत्व समझने वाले उसकी तह तक पहुंचने वाले—उसके सन्देश और आदर्श को हृदयंगम करने वाले व्यक्ति का आध्यात्मिक और भौतिक जीवन दिन-दिन अधिक पवित्र एवं सुख शान्तिमय बनता चला जाता है।
गायत्री उपासना व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की आध्यात्मिक और भौतिक सुख शान्ति को बढ़ाने में बहुत सहायक होती है। व्यक्तियों का समूह ही समाज या राष्ट्र है। किसी समाज के यदि अधिकांश लोग सज्जन बन जाय तो वह सारा समाज या राष्ट्र प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। जिस समय में अधिकांश व्यक्ति सन्मार्ग पर चलने वाले होते हैं वह समय सतयुग कहलाता है। गायत्री उपासना द्वारा व्यक्तिगत चरित्र निर्माण की प्रक्रिया अन्ततः राष्ट्रीय, सामाजिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान का हेतु बनती है।
किसी न किसी रूप में नित्य गायत्री उपासना एवं सुविधानुसार यज्ञ यजन करते रहना—गायत्री और यज्ञ में सन्निहित आदर्शों को हृदयंगम करते रहना—एक कल्याणकारी साधना है पर इसका स्वरूप यदि व्यक्तिगत पूजा तक ही सीमित रहे तो व्यापक क्षेत्र में युग निर्माण का लक्ष बहुत धीरे-धीरे पूरा होगा। प्रगति आशाजनक गति से हो इसके लिये इस कार्यक्रम को सुसंगठित रूप से सामाजिक उत्कर्ष के लिये सुव्यवस्थित रूप से चलाना होगा। संगठन ही शक्ति है। किसी विचारधारा एवं क्रिया पद्धति को विस्तृत क्षेत्र में सुप्रतिष्ठित करने के लिये एक मात्र आधार सुसंगठित प्रयत्न ही हो सकते हैं। इतिहास साक्षी है कि जब भी जन मानस को बदलने की कोई प्रक्रिया सम्पन्न हुई तो उसके पीछे संगठित प्रयत्न अवश्य रहे हैं। आर्य, धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म के फैलने की सफलता के पीछे अनेक प्रचारकों के प्रबल प्रयत्न ही प्रधान रूप में कार्य करते रहे हैं।

