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Books - गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध

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Language: HINDI
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गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध

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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य
धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।।

यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है। हमारे धर्म में जितनी महानता यज्ञ को दी गई है उतनी और किसी को नहीं दी गई। हमारा कोई भी शुभ अशुभ धर्म कृत्य यज्ञ के बिना पूर्ण नहीं होता। जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक 16 संस्कार होते हैं इनमें अग्निहोत्र आवश्यक है। जब बालक का जन्म होता है तो उसकी रक्षार्थ सूतक निवृत्ति तक घरों में अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है। नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारों में भी हवन अवश्य होता है। अन्त में जब शरीर छूटता है तो उसे अग्नि को ही सौंपते हैं। अब लोग मृत्यु के समय चिता जला कर यों ही लाश को भस्म कर देते हैं पर शास्त्रों में देखा जाय, तो वह भी एक यज्ञ है। इसमें वेद मन्त्रों से विधि पूर्वक आहुतियां चढ़ाई जाती हैं और शरीर को यज्ञ भगवान के अर्पण किया जाता है।

प्रत्येक कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, पर्व, त्यौहार, उत्सव, उद्यापन में हवन को आवश्यक माना जाता है। अब लोग उसका महत्व एवं विधान भूल गये हैं और केवल चिन्ह पूजा करके काम चल लेते हैं। घरों में स्त्रियां किसी न किसी रूप में यज्ञ की चिन्ह पूजा करती रहती हैं। वे त्यौहारों या पर्वों पर ‘‘अग्नि को निमाने’’ या ‘‘अग्यारी’’ करने का कृत्य किसी न किसी रूप में करती रहती हैं। थोड़ी सी अग्नि को लेकर उस पर घी डाल कर प्रज्ज्वलित करना और उस पर पक्वान्न के छोटे छोटे ग्रास चढ़ाना और फिर से उस अग्नि की परिक्रमा कर देना’’ यह विधान हम घरों में प्रत्येक पर्व एवं त्यौहार पर होते देख सकते हैं। पितरों का श्राद्ध जिस दिन होगा, उस दिन ब्राह्मण भोजन से भी पूर्व इस प्रकार अग्नि को भोजन अवश्य कराया जायगा। क्योंकि यह स्थिर मान्यता है कि अग्नि के मुख में दी हुई आहुति देवताओं एवं पितरों को अवश्य पहुंचती है।

विशेष अवसरों पर तो हवन करना ही पड़ता है। नित्य की चूल्हा, चक्की, बुहारी आदि से होने वाली जीवहिंसा एवं पातकों के निवारणार्थ नित्य मन्त्र यज्ञ करने का विधान है। उन पांचों में बलिवैश्व भी है। बलिवैश्व अग्नि में आहुति देने से होता है। इस प्रकार शास्त्रों की आज्ञानुसार तो नित्य हवन करना भी हमारे लिए आवश्यक है। त्यौहारों में भी प्रत्येक त्यौहार पर अग्निहोत्र आवश्यक है। होली तो यज्ञ का ही त्यौहार है। आज कल लोग लकड़ी, उपले जला कर होली मनाते हैं। शास्त्रों में देखा जाय तो यह यज्ञ है। लोग यज्ञ की आवश्यकता और विधि को तो भूल गये पर केवल ईंधन जला कर उस प्राचीन परम्परा की किसी प्रकार पूर्ति कर लेते हैं। इसी प्रकार श्रावणी, दशहरा, दिवाली आदि त्यौहारों पर किसी न किसी रूप में हवन अवश्य होता है। नवरात्रियों में स्त्रियां देवी पूजा करती हैं तो अग्नि मुख में देवी के निमित्त घी, लौंग, जायफल आदि अवश्य चढ़ाती हैं। सत्यनारायण व्रत कथा, रामायण परायण, गीता पाठ, भागवत सप्ताह आदि कोई भी शुभ आयोजन क्यों न हो, हवन उसमें अवश्य रहेगा।

साधनाओं में भी हवन अनिवार्य है। जितने भी पाठ पुरश्चरण, जप, साधन किए जाते हैं, वे चाहें वेदोक्त हों चाहे तान्त्रिक हवन, उनमें किसी न किसी रूप में अवश्य करना पड़ेगा। गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण में जप से दसवां भाग हवन करने का विधान है। परिस्थिति वश दसवां भाग आहुतियां न दी जा सकें तो शतांश (सौ वां भाग) आवश्यक है ही। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। उन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है जिसे ‘द्विजत्व’ कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विज कहते हैं। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म। जैसे अपने शरीर को जन्म देने वाले माता पिता की सेवा-पूजा करना मनुष्य का नित्यकर्म है, उसी प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता की पूजा भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है।

धर्म ग्रन्थों में पग-पग पर यज्ञ की महिमा का गान है। वेद में यज्ञ का विषय प्रधान है। क्यों कि यज्ञ एक ऐसा विज्ञान मय विधान है जिससे मनुष्य का भौतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से कल्याण कारक उत्कर्ष होता है। भगवान यज्ञ से प्रसन्न होते हैं। कहा गया है:—

यो यज्ञे यज्ञ परयैरिञ्चते यज्ञ संज्ञितः।
    तं यज्ञ पुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम्।।

जो यज्ञ द्वारा पूजे जाते हैं, यज्ञ मय हैं, यज्ञ रूप हैं, उन यज्ञ रूप विष्णु भगवान को नमस्कार है।

यज्ञ मनुष्य की अनेक कामनाओं को पूर्ण करने वाला तथा स्वर्ग एवं मुक्ति प्रदान करने वाला है। यज्ञ को छोड़ने वालों की शास्त्रों में बहुत निन्दा की गई है:—

कस्त्वा विमुञ्चति सत्वा विमुञ्चति कस्मैंत्व विमुञ्चति तस्मैं त्वं विमुञ्चति। पोषाय रक्षसा भार्गोऽसि।   —यजु. 2।23                                                                                                                        

सुख शान्ति चाहने वाला कोई व्यक्ति यज्ञ का परित्याग नहीं करता। जो यज्ञ को छोड़ता है, उसे यज्ञ रूप परमात्मा भी छोड़ देता है। सबकी उन्नति के लिए आहुतियां यज्ञ में छोड़ी जाती हैं जो नहीं छोड़ता वह राक्षस हो जाता है।

यज्ञेन पापैः बहुभिर्विमुक्तःप्राप्नोति लोकान् परमस्य विष्णोः।   —हारीत



यज्ञ से अनेक पापों से छुटकारा मिलता है। तथा परमात्मा के लोक की प्राप्ति होती है।

 पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम्।
         भार्यार्थी शोभनां भार्या कुमारी च शुभम् पतिम्।।
           भ्रष्ट राज्यम्तथा राज्यं श्री कामः श्रियमाप्नुयात्।
यं यं प्रार्थयेत् कामः सर्वे भवति पुष्कलः।
                                     निष्कामः कुरुते यज्ञ स परं ब्रह्म गच्छति।   -  मत्स्य पुराण 93।117


यज्ञ से पुत्रार्थी को पुत्र लाभ, धनार्थी को धन लाभ, विवाहार्थी को सुन्दर भार्या, कुमारी को सुन्दर पति, श्री कामना वाले को ऐश्वर्य प्राप्त होता है और निष्काम भाव से यज्ञानुष्ठान करने से परमात्मा की प्राप्ति होती है।

      न तस्य ग्रह पीड़ा स्यान्नच बन्धु धनक्षयः।
ग्रह यज्ञ व्रतं गेहे लिखितं यत्र निष्ठति।
      न तत्र पीड़ा पापानां न रोगो न च बन्धनम।
                         अशेषा यज्ञ फलदमशेपाघौघ नाशनम्। —कोटि होम पद्धति


यज्ञ करने वाले को ग्रह पीड़ा, बन्धु नाश, धन क्षय, पाप, रोग, बन्धन आदि की पीड़ा नहीं सहनी पड़ती। यज्ञ का फल अनन्त है।

         देवा सन्तोषिता यज्ञोर्लोकान् सम्वर्धयन्त्युत।
उभयोर्लोकयो देव भूतिर्यज्ञः प्रदृश्यते।
    तस्माद्यज्ञाद्दिवं याति पूर्वजैः सहमोदते।
           नास्ति यज्ञ समं दानं नास्ति यज्ञ समोविधिः।
                    सर्व धर्म समुद्देश्यो देवि यज्ञ समाहितः।   —महा भा.


यज्ञों से संतुष्ट होकर देवता संसार का कल्याण करते हैं। यज्ञ द्वारा लोक परलोक का सुख प्राप्त होता है। यज्ञ से स्वर्ण की प्राप्ति होती है। यज्ञ के समान कोई दान नहीं, यज्ञ के समान कोई विधि विधान नहीं, यज्ञ में ही सब धर्मों का उद्देश्य समाया हुआ है।

यज्ञेन हि देवादिवांगता यज्ञेनासुरा नपानुदन्तः यज्ञेन द्विषतो मित्रा भवन्ति, यज्ञे सर्व प्रतिष्ठितम् तस्माद्यज्ञं परमं वदन्ति।—महानारायणोपनिषद्



यज्ञ से ही देवताओं ने स्वर्ग का अधिकार प्राप्त किया और असुरों को हराया। यज्ञ से ही शत्रु मित्र बन जाते हैं। यज्ञ में समस्त लाभ भरे हुए हैं। इसलिये विद्वज्जन यज्ञ को महान् कहते हैं।

 असुराश्च सुराश्चैय पुण्यहेतोर्मख क्रियाम्।
     प्रयतन्ते महात्मानस्तस्माद्यज्ञाः परायणम्।
              यज्ञरेव महात्मानो वभृवुसधिकाः सुरा।  —महाभारत



असुर और सुर सभी पुण्य के मूल हेतु यज्ञ के लिए प्रयत्न करते हैं। सत्पुरुषों को सदा यज्ञ परायण होना चाहिए। यज्ञों से ही बहुत से सत्पुरुष देवता बने हैं।

                  यदिक्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्यो रन्तिकं नीति एव।
                                       तमाहरामि निऋते रूपस्था दस्यार्थमेनं शत शारदाय।  —अथर्व 3।11।2



यदि रोगी अपनी जीवनी शक्ति को खो भी चुका हो, निराशाजनक स्थिति को पहुंच गया हो, यदि मरणकाल भी समीप आ पहुंचा हो, तो भी यज्ञ उसे मृत्यु के चंगुल से बचा लेता है और सौ वर्ष जीवित रहने के लिए पुनः बलवान कर देता है।

     यज्ञै राप्यायिता देवा वृष्टयुत्सर्गेण वै प्रजाः।
                          आप्यायन्ते तु धर्मज्ञ यज्ञाः कल्याण हेतवः।। —विष्णु पुराण



यज्ञ से देवताओं को बल मिलता है। यज्ञ द्वारा वर्षा होती है। वर्षा से अन्न और प्रजा-पालन होता है। हे धर्मज्ञ, यज्ञ ही कल्याण का हेतु है।

     प्रयुक्तया यथ चेष्टया राजयक्ष्मा पुरोजितः।
                                    वां वेद विहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत्।।- चरक चि. खण्ड 8।122



तपैदिक सरीखे रोगों को प्राचीन काल में यज्ञ के प्रयोग से नष्ट किया जाता था। रोग मुक्ति की इच्छा रखने वालों को चाहिए कि उस वेद विदित यज्ञ का आश्रय लें।

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमोषधम्।
                    मन्त्रोऽहमहमेव ऽऽज्यमहमग्निंरहंहुतम्।।- गीता 9।16



मैं ही क्रतु हूं, मैं ही यज्ञ हूं, मैं ही स्वधा हूं, मैं ही औषधि हूं, और मन्त्र, घृत, अग्नि और हवन भी मैं ही हूं।

                            नायं लोकोऽस्त्व यज्ञस्यकुतोन्यः कुरु सत्तम।  - गीता 4।31



हे अर्जुन! यज्ञ रहित मनुष्य को इस लोक में भी सुख नहीं मिल सकता, फिर परलोक का सुख तो होगा ही कैसे?

             नास्त्य यज्ञस्य लोको वै ना यज्ञो विन्दते शुभम्।
                      अयज्ञो न च पूतात्मा नश्यन्तिश्छिन्न पूर्णवत्।। —शंख



यज्ञ न करने वाला मनुष्य लौकिक और पारलौकिक सुखों से वंचित हो जाता है। यज्ञ न करने वाले की आत्मा पवित्र नहीं होती और वह पेड़ से टूटे हुए पत्ते की तरह नष्ट हो जाता है।

   सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः।
    अनेन प्रसांविध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक्।।
  देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
  परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्म्यथ।।
                                इष्टान्भोगान्हिवो देवा दास्यन्ते यज्ञ भाविता। —गीता 3-10-11



ब्रह्माजी ने मनुष्यों के साथ ही यज्ञ को भी पैदा किया और उनसे कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुम्हारी उन्नति होगी, यह यज्ञ तुम्हारी इच्छित कामनाओं आवश्यकताओं को पूर्ण करेगा। तुम लोग यज्ञ द्वारा देवताओं को पुष्ट करो, वे देवता तुम्हारी उन्नति करेंगे। इस प्रकार दोनों अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए परम कल्याण को प्राप्त होंगे। यज्ञ द्वारा पुष्ट किए हुए देवता अनायास ही तुम्हारी सुख-शान्ति की वस्तुएं प्रदान करेंगे।

असंख्यों शास्त्र वचनों में से कुछ प्रमाण ऊपर दिये गए हैं। इनसे यज्ञ की महत्ता का अनुमान सहज ही हो जाता है। पूर्व काल में भी आध्यात्मिक एवं भौतिक उद्देश्यों के निमित्त बड़े बड़े यज्ञ हुआ करते थे। देवता भी यज्ञ करते थे, असुर भी यज्ञ करते थे, ऋषियों द्वारा यज्ञ किये जाते थे, राजा लोग अश्वमेध आदि विशाल यज्ञों का आयोजन करते थे, साधारण गृहस्थ भी अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार समय-समय पर यज्ञ किया करते थे। असुर लोग यज्ञों को विध्वंस करने का सदैव इसलिए प्रयत्न किया करते थे कि उनके शत्रुओं का लाभ एवं उत्कर्ष न होने पावे। इसी प्रकार असुरों के यज्ञों का ध्वंस भी कराया गया है। रामायण में राक्षसों के एक ऐसे यज्ञ का वर्णन है जिसे हनुमान जी ने नष्ट किया था। यदि यज्ञ सफल हो जाता तो राक्षस अजेय हो जाते।

राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके चार पुत्र पाये थे। राजा नृग यज्ञों के द्वारा स्वर्ग जाकर इन्द्रासन के अधिकारी हुए थे। राजा अश्वपति ने यज्ञ द्वारा सन्तान प्राप्त करने का सुयोग प्राप्त किया था। इन्द्र ने स्वयं भी यज्ञों के द्वारा ही पाया था। भगवान राम ने अपने यहां अश्वमेध कराया था। श्रीकृष्ण जी की प्रेरणा से पाण्डवों ने राजसूय यज्ञ कराया था जिसमें श्रीकृष्ण जी ने आगन्तुकों के स्वागत सत्कार का भार अपने ऊपर लिया था। पापों के प्रायश्चित स्वरूप अनिष्टों और प्रारब्ध जन्य दुर्भाग्यों की शान्ति के निमित्त, किसी अभाव की पूर्ति के लिए, कोई सुयोग या सौभाग्य प्राप्त करने के प्रयोजन से रोगनिवारणार्थ, देवताओं को प्रसन्न करने के हेतु, धन धान्य की अधिक उपज के लिए, अमृतमयी वर्षा के निमित्त, वायु मण्डल में से अस्वास्थ्यकर तत्वों का उन्मूलन करने के निमित्त हवन यज्ञ किए जाते थे। और उनका परिणाम भी वैसा ही होता था।

यज्ञ एक महत्वपूर्ण विज्ञान है। जिन वृक्षों की समिधाएं काम में ली जाती हैं, उनमें विशेष प्रकार के गुण होते हैं। किस प्रयोग के लिए किस प्रकार की हव्य वस्तुएं होमी जाती हैं। इसका भी विज्ञान है। उन वस्तुओं के आपस में मिलने से एक विशेष गुण संयुक्त सम्मिश्रण तैयार होता है जो जलने पर वायु मण्डल में एक विशिष्ट प्रभाव पैदा करता है। वेद मन्त्रों के उच्चारण की शक्ति से उस प्रभाव में और भी अधिक वृद्धि होती है। फलस्वरूप जो व्यक्ति उस यज्ञ में सम्मिलित होते हैं उन पर तथा निकटवर्ती वायु मण्डल पर उसका बड़ा प्रभाव पड़ता है। सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में जो नाना प्रकार की दिव्य शक्तियां काम करती हैं उन्हें देवता कहते हैं। इन देवताओं को अनुकूल बनाना, उनको उपयोगी दशा में प्रयुक्त करना, उनसे घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करना यही देवताओं को प्रसन्न करना है। यह प्रयोजन यज्ञ द्वारा आसानी से पूरा हो जाता है।

संसार में कभी किसी वस्तु का नाश नहीं होता, केवल रूपान्तर होता रहता है। जो वस्तु हवन में होमी जाती हैं वे तथा वेद मन्त्रों की शक्ति के साथ जो सद्भावनाएं यज्ञ द्वारा उत्पन्न की जाती हैं वे दोनों ही मिलकर आकाश में छा जाती हैं। उनका परिणाम समस्त संसार के लिए अनेक प्रकार से कल्याण कारक परिणाम उत्पन्न करने वाला होता है। इस प्रकार यज्ञ संसार की सेवा का विश्व में सुख शान्ति उत्पन्न करने का एक उत्तम माध्यम एवं पुण्य परमार्थ है। यज्ञ से याचक की आत्मा शुद्ध होती है, उसके पाप ताप नष्ट होते हैं, तथा शान्ति एवं सद्गति उपलब्ध होती है। सच्चे हृदय से यज्ञ करने वाले मनुष्यों का लोक और परलोक सुधरता है। यदि उनका पुण्य पर्याप्त हुआ तब तो उन्हें स्वर्ग या मुक्ति की प्राप्ति होती है अन्यथा यदि दूसरा जन्म भी लेना पड़ा तो सुखी, श्रीमान, साधन सम्पन्न उच्च परिवार में जन्म होता है ताकि आगे के लिए वह सुविधा के साथ सत्कर्म करता हुआ, लक्ष्य को सफलता पूर्वक प्राप्त कर सके।

यज्ञ का अर्थ है दान, एकता, उपासना। इन भावनाओं एवं मनोवृत्तियों को संसार में बढ़ाने के लिए यज्ञ का आयोजन स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यज्ञ का वेदोक्त आयोजन, शक्तिशाली मन्त्रों का विधिवत् उच्चारण विधि पूर्वक बनाये हुए कुण्ड शास्त्रोक्त समिधाएं तथा सामग्रियां जब ठीक विधान पूर्वक हवन की जाती हैं तो उसका दिव्य प्रभाव विस्तृत आकाश मण्डल में फैल जाता है। उस प्रभाव के फलस्वरूप प्रजा के अन्तःकरणों में प्रेम, एकता, सहयोग, सद्भाव, उदारता, ईमानदारी, संयम, सदाचार, आस्तिकता आदि सद्भावों एवं सद्विचारों का स्वयमेव आविर्भाव होने लगता है। पत्तों से आच्छादित दिव्य अध्यात्म वातावरण के दिनों में सन्तानें पैदा होती हैं वे भी स्वस्थ, सद्गुणी एवं उच्च विचार धाराओं से परिपूर्ण होती हैं। पूर्व काल में इसी दृष्टि से पुत्रेष्टि यज्ञ किये जाते थे। जिनके सन्तानें नहीं होतीं वे ही पुत्रेष्टि यज्ञ कराते हों सो बात नहीं जिनको बराबर सन्तानें होती थीं वे भी सद्गुणी एवं प्रतिभावान् सन्तान प्राप्त करने के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराते थे। गर्भाधान, सीमन्त, पुंसवन, जातकर्म, नामकरण आदि संस्कार बालक को जन्म लेते लेते अबोध अवस्था में ही हो जाते थे, इनमें से प्रत्येक में हवन होता था ताकि बालक के मन पर दिव्य प्रभाव पड़े और वह बड़ा होने पर पुरुष सिंह एवं महापुरुष बने। प्राचीन काल का इतिहास साक्षी है कि जिन दिनों इस देश में यज्ञ की प्रतिष्ठा थी, उन दिनों यहां महापुरुषों की, नररत्नों की कमी नहीं थी। आज यज्ञ का तिरस्कार करके अनेक दुर्गुणों, रोगों, कुसंस्कारों और बुरी आदतों से ग्रसित बालकों से ही हमारे घर भरे हुए हैं।

यज्ञ से अदृश्य आकाश में जो आध्यात्मिक विद्युत तरंगों फैलती हैं वे लोगों के मनों में से द्वेष, पाप, अनीति, वासना, स्वार्थपरता, कुटिलता आदि बुराइयों को हटाती हैं। फलस्वरूप उससे अनेकों समस्याएं हल होती हैं। अनेकों उलझनें, गुत्थियां, पेचीदगियां, चिन्ताएं, भय, आशंकाएं तथा बुरी संभावनाएं समूल नष्ट हो जाती हैं। राजा, धनी, सम्पन्न लोग, ऋषि, मुनि बड़े-बड़े यज्ञ कराते थे, जिससे दूर-दूर तक का वातावरण निर्मल होता था और देश व्यापी, समाज व्यापी, विश्व व्यापी बुराइयां तथा उलझनें सुलझती थीं। साधारण गृहस्थ छोटे-छोटे हवन कराते थे, जिससे उनके घर की, कुटुम्ब की, ग्राम की छोटी-छोटी समस्याएं हल होती थीं। व्यापक सुख, समृद्धि, वर्षा, आरोग्यता, सुख शान्ति के लिए बड़े-बड़े यज्ञों की आवश्यकता पड़ती है, पर छोटे-छोटे हवन भी अपनी छोटी सीमा और मर्यादा के भीतर अपने लाभों से प्रजा को लाभान्वित करते हैं। जितना खर्च हवन में होता है उससे हजारों गुने मूल्य की सुख समृद्धि की प्राप्ति एवं आपत्तियों से निवृत्ति मिलती है। इस तरह किसी भी प्रकार यज्ञ घाटे का सौदा नहीं रहता।

बड़े रूप में यज्ञ करने की जिनकी सामर्थ्य है उन्हें वैसे आयोजन करने चाहिए। अग्नि का मुख ईश्वर का मुख है। उसमें जो कुछ खिलाया जाता है वह सच्चे अर्थों में ब्रह्मभोज है। ब्रह्म अर्थात् परमात्मा, भोज अर्थात् भोजन, परमात्मा को भोजन कराना यज्ञ के मुख में आहुति छोड़ना ही है। भगवान हम सबको खिलाता है, हमारा भी कर्त्तव्य है कि अपने उपकारी के प्रति पूजा करने में कन्जूसी न करें। जिनकी आर्थिक स्थिति वैसी नहीं है वे कई व्यक्ति थोड़ा-थोड़ा सहयोग करके सामूहिक यज्ञों की व्यवस्था कर सकते हैं। जहां वैसा सुयोग न हो वहां यदा कदा छोटे छोटे हवन किए जा सकते हैं। अथवा जहां नियमित यज्ञ होते हैं वहां अपनी ओर से कुछ आहुतियों का हवन कराया जा सकता है। कोई अन्य व्यक्ति यज्ञ कर रहे हों तो उसमें समय, सहयोग एवं सहायता देकर उसे सफल बनाने का प्रयत्न करना भी यज्ञ में भागीदार होना ही है।

नित्य का अग्निहोत्र बहुत सरल है। उसमें कुछ इतना भारी खर्च नहीं होता कि मध्यम वृत्ति का मनुष्य उस भार को उठा न सके। जो लोग नित्य हवन नहीं कर सकते वे सप्ताह में एक बार रविवार को अथवा अमावस्या पूर्णमासी को अथवा महीने में एक बार पूर्णमासी को थोड़ा या बहुत हवन करने का प्रयत्न करें। विधि विधान भी इन साधारण हवनों का कोई कठिन नहीं है। ‘‘गायत्री यज्ञ विधान’’ पुस्तक में उसकी सरल विधियां बताई जा चुकी हैं। उनके आधार पर बिना पण्डित पुरोहित की सहायता के कोई भी द्विज आसानी से कर सकता है। जहां कुछ भी विधान न मालूम हो वहां केवल शुद्ध घृत की आहुतियां गायत्री मन्त्र के अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द लगाते हुए दी जा सकती हैं। किसी न किसी रूप में यज्ञ परम्परा को जारी रखा जाय तो वह भारतीय संस्कृति की एक बड़ी भारी सेवा है और उस छोटा सा कर्मकाण्ड भी अपने घर के वायुमण्डल शुद्ध करने और घर के सब लोगों पर सतोगुणी प्रभाव डालने में बड़ा सहायक होता है। जिन घरों में हवन होते रहते हैं वहां पाप कर्मों का प्रवेश नहीं होता, प्रेत पिशाच, दुख दुर्भाग्य, अभाव दारिद्र एवं क्लेश कलह का शमन होता रहता है। अग्निहोत्र से देवता प्रसन्न होते हैं और वे सुख शान्ति की वर्षा करते रहते हैं।

यज्ञ किसी भी प्रकार घाटे का सौदा नहीं है। साधारण रीति से किये हुए हवन में जो धन व्यय होता है, एक प्रकार से देवताओं की बैंक में जमा हो जाता है और वह सन्तोषजनक ब्याज समेत लौटकर अपने को बड़ी महत्वपूर्ण आवश्यकता के समय पर वापिस मिलता है। विधि पूर्वक, शास्त्रीय पद्धति एवं विशिष्ट उपचारों एवं विधानों के साथ किए हुए हवन तो और भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे यज्ञ एक प्रकार के दिव्य अस्त्र हैं। दैवी सहायताएं प्राप्त करने के अचूक उपचार हैं। पूर्व काल में यज्ञ द्वारा मनोवांछित वर्षा होती है! यज्ञ शक्ति से सुसज्जित होकर योद्धा लोग अजेय बनते थे। यज्ञ द्वारा योगी लोग अपनी तपस्या पूर्ण करके आत्म साक्षात्कार करते थे। यज्ञ समस्त ऋद्धि सिद्धियों का पिता है। यज्ञ को वेदों ने ‘‘कामधुक’’ कहा है वह मनुष्यों के अभावों को पूरा करने वाला और बाधाओं को दूर करने वाला है।

गायत्री उपासकों के लिए यज्ञ आवश्यक है उन्हें यज्ञ परम्परा जारी रखनी चाहिए। अपने घर का, अपनी मनोभूमि का वातावरण यज्ञमय रहे, यज्ञ भगवान की पूजा होती रहे यह प्रयत्न करना प्रत्येक द्विज के लिये आवश्यक है।

साधारण होम भी बहुत उपयोगी होता है, उससे घर की वायु शुद्धि, रोग निवृत्ति, अनिष्टों से आत्म रक्षा होती है। फिर विशेष आयोजन के साथ विधि विधान पूर्वक किये गये यज्ञ तो असाधारण फल उत्पन्न करते हैं। यज्ञ एक विद्या है पांचों तत्वों का हाल में एक वैज्ञानिक सम्मिश्रण होता है जिससे एक प्रचण्ड दुर्धर्ष शक्ति का आविर्भाव होता है यज्ञ की इस प्रचण्ड शक्ति का ‘‘द्वि मृर्धा, द्वि नासिक, सप्त हस्त, द्वि मुख, सप्त जिह्वा, उत्तर मुख, कोटि द्वादश कर्त्या, द्वि पञ्ज शत्कला युतम्’’ आदि विशेषणोयुक्त कहा गया है। इस रहस्य पूर्ण संकेत में यह बताया गया है कि यज्ञाग्नि की मूर्धा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों हैं। यह क्षेत्र सफल बनाये जा सकते हैं। स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति यज्ञ की नासिका है उस पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, सातों प्रकार की सम्पदाएं यज्ञाग्नि के हैं हाथ व मामर्ग और दक्षिण मार्ग ये दो मुख हैं। सातों लोक जिह्वाएं हैं, इन सब लोकों में जो कुछ भी विशेषताएं हैं वे यज्ञाग्नि के मुख में मौजूद हैं। उत्तर ध्रुव का चुम्बकत्व केन्द्र अग्नि मुख है। 52 कलाएं यज्ञ की ऐसी हैं जिनमें से कुछ को प्राप्त करके ही रावण इतना शक्तिशाली हो गया था। यदि यह सभी कलाएं उपलब्ध हो जायं तो मनुष्य साक्षात अग्नि रूप हो सकता है और विश्व के सभी पदार्थ उसके करतल गत हो सकते हैं। यज्ञ की महिमा अनन्त है। उसका थोड़ा आयोजन भी फलदायक होता है। गायत्री उपासकों के लिए तो यज्ञ पिता तुल्य पूजनीय है।

***

*समाप्त*




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