माता-पिता का सन्तान पर प्रभाव
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पिता और माता की स्थिति का असर बच्चों की मानसिक स्थिति पर पड़ता है। अधिकांश बालकों का मानसिक विकास वैसा ही होता है, जैसा कि गर्भावस्था में माता के विचार होते हैं और गर्भाधान के समय अथवा उससे पूर्व पिता के विचार होते हैं।
वीर नेपोलियन जब अपनी माता के पेट में था, तो उसकी माता तेज घोड़े पर चढ़ती थी, अपने पति के साथ युद्ध क्षेत्र में घूमती और युद्ध सम्बन्धी कार्यों में खूब दिलचस्पी लेती थी। इस स्थिति का असर नेपोलियन पर पड़ा और वह एक बड़ा भारी योद्धा हुआ। अभिमन्यु जब गर्भ में था, तो उसकी माता सुभद्रा को अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदन की विधि विस्तार सहित समझाई, फलस्वरूप उसने अल्प आयु में ही अपने पिता की तरह रण कौशल की योग्यता प्राप्त करली।
एक व्यक्ति एक बैंक में उच्च पद पर काम करते थे, उन्होंने परिस्थिति वश एक बार बैंक से कुछ धन चुराया। करते तो यह कार्य उन्होंने कर डाला, पर पीछे उनके मन में अपने कार्य पर बड़ा दुःख हुआ, इसी मानसिक स्थिति में उन्होंने एक पुत्र की रचना की, जो बड़ा होने पर नामी ग्रामी तस्कर हुआ। एक स्त्री को पति की बीमारी के कारण अपने बड़े कारोबार के हिसाब की देखभाल करने का कार्य करना पड़ा। वह अधिकांश समय हिसाब जांचने और गणित करने में लगाती। इस समय उसके पेट में गर्भ था, जिससे कन्या का जन्म हुआ, यह कन्या बड़ी होने पर प्रख्यात गणितज्ञ हुई। हिन्दुस्तान का प्रख्यात गायक बालक मनहर बरबे अपनी छः वर्ष की आयु में गान विद्या के आचार्यों की समता करता था और देश विदेशों के असंख्य प्रकार के बाजे बड़ी ही निपुणता पूर्वक बजा लेता था। उसकी बहिन भी अपनी छोटी आयु में ऐसी ही निपुण थी। इनकी आश्चर्यजनक उन्नति का कारण उनके माता-पिता को गाने बजाने का विशेष प्रेम था।
महात्मा चार्ल्स किंगस्ली की माता सांसारिक सुखों-भोगों को छोड़ कर साधुवृत्ति से रहती थी और अपना अधिकांश समय धर्म चिन्तन एवं ईश्वर आराधना में लगाती थीं, उन्होंने अपने उन्हीं गुणों के कारण संसार प्रसिद्ध महात्मा किंगस्ली को जन्म दिया।
एक महिला जिसने कई सन्तानें अपनी इच्छानुसार गुणों वाली पैदा की हैं लिखती हैं—मेरी इच्छा हुई कि अपनी एक संतान को प्रमुख वक्ता बनाऊं। जब मैंने गर्भ धारण किया तो मैं इसी इच्छा से सुयोग्य वक्ताओं के भाषण सुनने जाने लगी और उच्च कोटि के लेखों का अध्ययन करने लगी, इस बालक के बड़े होने पर डॉक्टर फाउलर ने जांचा और पाया कि उसमें भाषण सम्बन्धी योग्यता ही नहीं वरन् अन्य मानसिक शक्तियां भी असाधारण रूप से विकसित है। इसी स्त्री ने दूसरे पुत्र को चित्रकार बनाना चाहा और उसकी गर्भास्थिति के समय में प्रसिद्ध-प्रसिद्ध चित्रशाला का अवलोकन करती रही। चित्र प्रदर्शनियों में भाग लेती रही और प्राकृतिक सौंदर्य को दिलचस्पी के साथ देखने में विशेष समय लगाया। फलस्वरूप वह लड़का अद्वितीय चित्रकार निकला। इसी प्रकार के प्रयत्नों से उसने अपने तीसरे पुत्र को एक बड़ा भारी विद्वान और नेता बनाया। वह अपने अनुभवों के आधार पर लिखती हैं—‘‘मैं निश्चय पूर्वक कह सकती हूं कि सन्तान में इच्छानुसार गुणों का समावेश कर देना यह पूर्णतः माता के हाथ की बात है।’’
सन्तान में आप जिस प्रकार के गुण देखना चाहते हैं उन्हीं को स्वयं अपनाइये और माता को वैसी ही परिस्थिति में रखिये। यदि माता धार्मिक वातावरण में रहेगी तो उसकी सन्तान धर्मात्मा होगी और यदि उसे व्यवसाय में दिलचस्पी होगी तो बालक भी व्यवसाय बुद्धि लेकर उत्पन्न होगा। इसी प्रकार सदाचार, नम्रता, विनय, साहस, ईमानदारी, विद्वत्ता, वक्तृता आदि गुणों में विशेष रूप से दिलचस्पी लेकर माता पिता अपने यह गुण सन्तान को विरासत में दे सकते हैं।
माता पिता का प्रेम इतनी सुन्दर वस्तु है कि उसका बहुत ही गम्भीर प्रभाव बालकों के स्वास्थ्य, वर्ण एवं संस्कारों पर होता है। जो स्त्री पुरुष हृदय से एक दूसरे को प्रेम करते हैं और एक दूसरे की सुविधाओं का ध्यान रखते हैं उनके अन्तःकरण आपस में पूरी तरह मिल जाते हैं। जिस प्रकार उत्तम खाद और उत्तम पानी के मिलने से सुन्दर हरे-भरे पौध उगते हैं और उनकी भीतरी बाहरी सुन्दरता देखने ही योग्य होती है, उसी प्रकार माता और पिता निष्कपट प्रेम सम्बन्ध होने पर बालकों के शरीर और मन पुष्ट हो जाता है।
डॉक्टर जान कावेन के अनुभव में एक ऐसा बालक आया जो बहुत छोटी उम्र का होने पर भी मशीनों के काम में बहुत जानकारी और दिलचस्पी रखता था। उन्होंने उसके पिता से पूछ कर मालूम किया कि जिन दिनों वह बालक अपनी माता के पेट में था तब उसका पिता इंजीनियरिंग सम्बन्धी एक कार्य में बड़ी तत्परता से लगा हुआ था, वह जब काम पर से लौट कर आता तो अपनी गर्भिणी स्त्री से भी उसी सम्बन्ध की वार्तालाप करता, तदनुसार बालक की प्रवृत्ति भी उसी ओर झुकी हुई थी।
डॉक्टर फाउलर के कुछ अनुभव बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, वे अपनी पुस्तक में लिखते हैं—मैं एक दिन घूमने जा रहा था कि रास्ते में दो बहुत ही तन्दुरुस्त और सुन्दर बालकों को देखा। मेरी इच्छा, उनके सम्बन्ध में अधिक जानने की हुई। तलाश करता हुआ उनके घर पहुंचा और उनके माता पिता से उत्तम सन्तान प्राप्त करने के कारणों के सम्बन्ध में पूछ ताछ की। मालूम हुआ कि वे इस सम्बन्ध में किसी विशेष नियम का पालन नहीं करते, केवल उन दम्पत्ति में अत्यधिक प्रेम है। दोनों ने आपस में कभी किसी को कटु शब्द नहीं कहा और न कोई किसी से नाराज हुआ। इसी गुण के कारण उन्हें उत्तम सन्तानें प्राप्त हुईं।
इन्हीं डॉक्टर साहब के इलाज में एक ऐसा लड़का आया जो बहुत ही कमजोर और बुद्धिहीन था। उसकी माता यद्यपि बहुत तन्दुरुस्त और चलते पुर्जा थी, फिर भी ऐसी सन्तान क्यों उत्पन्न हुई, इससे डॉक्टर साहब को आश्चर्य हुआ उन्होंने उस स्त्री से पूछताछ की, तो मालूम हुआ कि दाम्पत्य प्रेम के अभाव के कारण ऐसी सन्तान हुई, इस स्त्री के साथ उसके पति की सदा अनबन बनी रहती थी।
इसी तरह की एक और कन्या को उन्होंने देखा जो बड़ी ही डरपोक और रोनी सूरत की थी। जवान होने पर भी उसे सांसारिक कार्यों की ओर बिलकुल रुचि न थी। सदा एकान्त में रहती और बाइबिल पढ़ा करती, कोई जरा भी कुछ कह देता तो आंसू नाक पर आ जाते। पूछने पर उसकी माता ने बताया कि जब यह लड़की गर्भ में थी तो उसका पति सदा उससे झगड़ता और रुलाता रहता था। माता दुःखी होकर एकान्त में पड़ी रहती और अपने दुःखी चित्त को धार्मिक गाथाएं पढ़ कर शान्त करती रहती थी। यही सब गुण उस कन्या में भी आ गये। डॉक्टर डे. का यह मत है कि माता पिता के आपसी प्रेम में जितनी अधिक घनिष्ठता होगी, बालक उतना ही अधिक उत्साही, स्फूर्तिवान और तेजस्वी होगा। कारण यह है कि गर्भ पलता तो माता के पेट में है, परन्तु उसका मूल बीज पिता के शरीर से आता है, इसलिये माता के द्वारा प्राप्त होने वाली वस्तुएं ही उसके लिए पर्याप्त नहीं है। मनुष्य स्थूल ही नहीं है। उसका जितना भाग स्थूल दिखाई पड़ता है, उसकी सूक्ष्मता उससे हजार गुनी अधिक है मनुष्य की गुप्त शक्तियां सूक्ष्म लोक से प्राप्त होती हैं। चूंकि बालक माता के बन्धन में होता है, इसलिये वह अपने योग्य सूक्ष्म तत्व उसी से प्राप्त कर सकता है, जिससे माता की विद्युत शक्ति आकर्षण रहती हो। यों तो माता के पास तो अन्य स्त्री-पुरुष भी रहते हैं, परन्तु आकर्षण केवल आन्तरिक प्रेम के द्वारा ही होता है। स्त्री को यदि अपने पति से पूर्ण प्रेम है तो अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा पति के सूक्ष्म तत्वों को खींच कर उदरस्थ बालक को देती रहेगी। इसी प्रकार यदि पति का पत्नी से अधिक स्नेह है, तो वह अपने तत्वों को उसकी ओर फेंकता रहेगा। इस प्रकार सूक्ष्म आकर्षण द्वारा बालक उन शारीरिक और मानसिक वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है, जिसकी उसे आवश्यकता है। पिता द्वारा यह गुण इसलिये आसानी से प्राप्त हो सकते हैं कि गर्भ अपने मूल स्थान की वस्तुओं का अभ्यासी होता है। शुक्र कीट जो अब गर्भ का रूप धारण किये हुए हैं, अपने उद्गम स्थान को भूल नहीं गया है जिस प्रकार बछड़ा अपनी माता का दूध आसानी से पी लेता है, और उसके लिए अधिक दूध निकाल देती है, इसी प्रकार पिता के तत्वों से ही गर्भ का अधिक मात्रा में मानसिक पोषण होना सम्भव है। स्त्री पुरुष में प्रेम की घनिष्ठता होने पर ही यह सूक्ष्म वस्तुएं प्राप्त हो सकती हैं। यदि ऐसा न हो और इसके विपरीत दम्पत्ति में अनबन या उदासीनता रहती हो, तो गर्भ का पूरा पोषण नहीं हो पाता और जिस प्रकार भोजन मिलने पर पानी न मिलने या पानी मिलने पर भोजन न मिलने से अपूर्णता रहती है—पेट नहीं भरता और संतोष नहीं होता, उसी प्रकार पिता के तत्वों के अभाव में बालक का शारीरिक और मानसिक संगठन अपूर्ण रह जाता है। चाहे उसके शारीरिक अंग देखने में पूरे भले ही प्रतीत होते हैं परन्तु वास्तव में उसके अन्दर बहुत सी दुःखदायी त्रुटियां रह जाती हैं, जो कि बड़े होने पर प्रगट होती हैं।
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*समाप्त*

