गर्भ में पुत्र या पुत्री की पहिचान
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वैज्ञानिक अनुसंधान से प्रकट हो चुका है कि स्त्री और पुरुषों के दाहिने भाग में पुरुषत्व सूचक वृत्तियां और बांए भाग में स्त्रीत्व सूचक वृत्तियां रहती हैं। गर्भ में यदि लड़का होता है, तो उसे अधिकांश सामग्री दाहिने भाग से और लड़की होती है, तो बांए भाग से लेनी पड़ती है इसलिए अंगों का भारीपन देखकर यह पता लगाया जा सकता है कि गर्भ में लड़का है या लड़की। जब गर्भ में पुत्र होता है, तो दाहिना पैर और पेट अधिक भारी हो जाता है। गर्भिणी जब बैठकर उठती है, तो दाहिने हाथ का सहारा लेकर उठती है। खड़े होकर पैर आगे बढ़ाती है, तो बांया पैर आगे बढ़ाती है, क्योंकि यही अंग हलका होता है। पेट पर दाहिने भाग में नीली-नीली नसें अधिक उभरी होती हैं और बोझ भी इसी तरफ अधिक प्रतीत होता है। भार का संतुलन ठीक रखने के लिए वह बांए करवट लेटने की इच्छा अधिक करती है। पेट भार के कारण इस तरफ की नाड़ियां खिंच जाती हैं, इस खिंचाव का असर आंखों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिसका दाहिना अंग भारी होगा, उसकी दाहिनी आंख, बांई की अपेक्षा कुछ बड़ी मालूम देगी। दाहिना स्तन अधिक बड़ा प्रतीत होता है और उसमें दूध की मात्रा कुछ अधिक आ जाने के कारण खुजली सी उठा करती है। भारतीय ऋषियों के खाद्य पदार्थों का नामकरण बहुत ही बुद्धिमानी और अन्वेषण के साथ किये हैं, इस प्रकार की अद्भुत खोज अन्य किसी देश में वस्तुओं के नामकरण में नहीं पाई जाती। खाद्य पदार्थों में धन और ऋण विद्युत की न्यूनाधिक मात्रा को देखते हुए ही उनके नाम स्त्रीवाची या पुरुषवाची रखे गये हैं। गर्भिणी की इच्छाएं अकेली उसी की नहीं होती वरन् उसमें बालक की इच्छायें भी सम्मिलित होती हैं आवश्यकता ही इच्छा है। गर्भिणी जो इच्छा करती है, उसका अर्थ करीब-करीब यही है कि इसकी उसे आवश्यकता है। गर्भ में यदि लड़का है, तो उसे अपनी अंग वृद्धि के लिये धन विद्युत वाले—पुरुषवाची पदार्थों की आवश्यकता अधिक होती है। तदनुसार स्त्री इन्हीं की इच्छा करती है स्त्री को किन खाद्य पदार्थों में विशेष रुचि है, इसकी एक सूची बनानी चाहिये और देखना चाहिए कि इनमें पुरुषवाची वस्तुएं अधिक हैं या स्त्रीवाची। यदि पुरुषवाची वस्तुएं अधिक हों जैसे खरबूज, तरबूज, अंगूर, अखरोट, छुआरा आदि तो पुत्र समझना चाहिए और यदि स्त्रीवाची अधिक हों जैसे ककड़ी, लीची, नाशपाती, मिश्री, किशमिश, तो कन्या की सम्भावना अधिक रहती है। इसी प्रकार स्वप्न में पुरुषवाची दृश्य या पदार्थ अधिक दिखाई पड़ें तो पूर्व की ओर स्त्रीवाची दृश्य देखें तो कन्या की अधिक आशा होती है। एक बात और भी देखी जाती है कि लड़कों में सर्व गुण और लड़कियों में चन्द्र गुण विशेष होता है यदि पेट में पुत्र है, तो उसका तेज माता के चेहरे पर प्रतिबिम्बित होता है। देखने में माता का मुख चमकता है और इस पर तेज की झलक प्रतीत होती है। निद्रा कम आती है, गर्मी अधिक रहती, उत्साह और चैतन्यता नहीं घटती, चरपरे और उष्णपेज 38 उपलब्ध नहींपेज 39 उपलब्ध नहींपेज 40 उपलब्ध नहींपेज 41 उपलब्ध नहींपेज 42 उपलब्ध नहींपेज 43 उपलब्ध नहींपेज 44 उपलब्ध नहींपेज 45 उपलब्ध नहींपेज 46 उपलब्ध नहींपेज 47 उपलब्ध नहींपेज 48 उपलब्ध नहींअलवर्ट आल्स ने अपने अनुभव में आई हुई एक घटना का वर्णन किया है। वह कहते हैं कि एक व्यक्ति अपनी स्त्री सहित समुद्र की यात्रा कर रहा था। कारणवश दोनों में झगड़ा हो गया। पति ने नाराज होकर पत्नी के ऊपर तलवार से प्रहार किया। लोगों ने उसे बचा तो लिया पर चपेट में स्त्री की उंगलियां कट गईं कालान्तर में दोनों का झगड़ा शान्त हो गया और गृहस्थी चलाने लगे। सहवास के समय स्त्री को अचानक अपनी उंगलियां कटने की घटना स्मरण हो आयी, उस स्त्री के पेट से जो सन्तान हुई उसकी उंगलियां कटी हुई थीं। डाक्टर चेपीन लिखते हैं—एर्विस्टन नगर में एक स्त्री गर्भावस्था में एक मूर्ति पर विशेष रूप से अनुरक्त रहती थी। निदान उसकी सन्तान भी वैसी ही हुई। एक शराबी मनुष्य की स्त्री ने अपनी सन्तान के सम्बन्ध में अपना अनुभव बताते हुये कहा कि विवाह के आरंभिक दिनों में हम दम्पत्ति में बड़ा प्रेम था, इसलिये पहला बालक बहुत हंसमुख, और सुंदर हुआ इसके बाद पति देव मद्य पान करने लगे, जिससे मुझे खिन्नता और उदासीनता रहने लगी, इसलिए दूसरा बच्चा दुर्बल और डरपोक पैदा हुआ। इसके बाद पति ने मद्य पान में घर का सारा पैसा, जेवर जमीन-जायदाद नष्ट कर डाला, इससे मुझे बड़ा दुःख रहने लगा, इन दिनों भी एक बालक गर्भ में आया, जो बहुत ही रोगी और रोनी शक्ल का हुआ। एक अपनी स्वस्थ कन्या और अस्वस्थ पुत्र का कारण वह बताती है कि जब कन्या पेट में थी, तब उसे किसी प्रकार की चिन्ता न थी, किन्तु जब पुत्र पेट में था, तो घर के कई व्यक्ति बीमार हुए और उनकी सेवा शुश्रूषा का सारा भार उसी पर पड़ा। इससे परिश्रम अधिक करना पड़ता था और बीमारों की दुःख पूर्ण स्थिति के कारण स्वयं भी दुःखी रहना पड़ता था। एक स्त्री ने भूल से अपने बच्चे को गलत दवा पिलादी, फलस्वरूप वह मर गया, इस पर उसे अपनी भूल पर बड़ा भारी पश्चाताप हुआ। यह शोक कई वर्ष तक बना रहा, इन दिनों में उसे दो बच्चे हुए, इनमें से एक अपाहिज था, दूसरा पागल। डाक्टर ज. हक्सले लिखते हैं—गर्भिणी की तन्दुरुस्ती का बहुत खयाल करना चाहिये, परन्तु उससे भी अधिक ख्याल उसकी मानसिक तन्दुरुस्ती का रखना चाहिए। यदि कोई स्त्री दुःखी, चिंतित या उद्विग्न रहती है, इसका यह परिणाम होना निश्चित है कि उसकी बीमार या बुद्धिहीन सन्तान उत्पन्न हो। डाक्टर फाउलर लिखते हैं—‘‘गर्भावस्था में स्त्री यदि दुःखी और चिंतित रहे, तो उसके पेट में बच्चे को बड़ी हानि होती है। बच्चे के मस्तक में (Dropsy of the Brain) पानी भरने की बीमारी हो जाती है। मैंने इस प्रकार के हजारों बच्चे अपनी आंखों देखे हैं। उनके मस्तक बड़े होते हैं और उनमें स्थिरता, धैर्य, सहन-शक्ति आदि का अभाव होता है। सोते वक्त उनके सिरों से बेहद पसीना टपकता है।’’ माता को अपना आहार-विहार ऐसा रखना चाहिए, जिससे किसी बीमारी का सामना न करना पड़े। यदि कोई रोग हो, तो अधिक दवाओं की भरमार करने की अपेक्षा प्राकृतिक नियमों से ही बीमारी अच्छी कर लेनी चाहिए। सुपाच्य, स्वास्थ्यकर और भूख से कम भोजन करने पर बीमारियों से आसानी से छुटकारा मिला रहता है। दुःखदायी और कष्टकर परिस्थितियों से बचना चाहिए। यदि एक किसी घटना का सामना भी करना पड़े, तो सन्तान के भविष्य का ध्यान रखते हुए, शोक और क्रोध जहां तक हो सके कम करना चाहिए। प्रसन्न चित्त और निरोग माताओं की सन्तानें प्रायः बलवान और सुन्दर स्वास्थ्य वाली ही होती हैं।

