पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि
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क्या यह अपने हाथ में है?जिस प्रकार अन्यान्य दैनिक कार्यों को हम स्वेच्छा पूर्वक करते और उनका परिणाम भोगते हैं, इसी प्रकार संतान के सम्बन्ध में भी कर सकते हैं। केवल पुत्र या पुत्री का लिंग विभाजन ही नहीं, वरन् उनके वर्ण, स्वास्थ्य, विचार संस्कार भी निश्चित प्रकार से बना सकते हैं। पूर्व जन्मों के कर्म फल और संस्कार एक भूमिका है। जैसे वस्त्र मन चाहे रंग में रंग देना रंगरेज का काम है। गर्भ में जो जीव आता है वह माता पिता के माध्यम द्वारा आता है। जैसा माध्यम होगा वैसा ही वस्तु ग्रहण करेगा। पुष्प में से भिन्न-भिन्न जीव गंध, पराग आहार, मधु एवं विष अपनी माध्यम शक्ति के अनुसार प्राप्त करते हैं। निखिल विश्व की चेतनाओं में से माता पिता प्रायः वैसे ही संस्कार और स्वभाव वाले प्राणी को गर्भ में धारण करते हैं जैसे कि वे स्वयं होते हैं। इसके अपवाद भी मिलते हैं पर बहुत कम और उनका कुछ विशेष कारण होता है। कहते हैं कि जीव अपने पूर्व संस्कारों को लेकर गर्भ में आता है और वैसा ही रहता है। उन्हें जानना चाहिये कि जीव अपने स्वभाव की ही परिस्थितियों की ओर आकर्षित होते हैं और माता पिता अपने स्वभाव वाले जीवों को ही आकर्षित करते हैं। सन्तान के अदृष्ट कर्म फल को चाहे न भी बदल सकें तो भी उसके अधिकांश गुणों को अपने सांचे में ढालने का माता पिता को पूरा पूरा अधिकार है। हमारे समाज में एक ऐसी मनोवृत्ति चल पड़ी है कि लोग कन्या की अपेक्षा पुत्र को अधिक महत्व देते हैं एवं लोग पुत्र की उत्पत्ति की इच्छा करते हैं। इस प्रकार की इच्छा का कारण हमारी सामाजिक कुरीतियां हैं। सच बात तो यह है कि लड़का और लड़की दोनों ही माता पिता के लिये समान रूप से उपयोगी हैं। केवल जननेन्द्रिय के भेद और गर्भ धारण की योग्यता से न तो किसी का महत्व घटता है और न बढ़ता है। दोनों के शारीरिक और मानसिक अवयव समान हैं। लड़कों की भांति लड़कियां भी सारे महत्वपूर्ण काम कर सकती हैं। योरोप, अमेरिका आदि देशों की स्त्रियां पुरुषों से पीछे नहीं हैं। भारतवर्ष का इतिहास अनुसूया, गार्गी, गौमती, लीलावती, द्रोपदी, मन्दोदरी, सीता, कुन्ती, कैकयी, लक्ष्मीबाई, मीराबाई जैसी विदुषी, शूरवीर, भक्त और शास्त्रज्ञ महिलाओं के दिव्य चरित्रों से भरा हुआ है। प्राचीन समय में स्त्रियों को पुरुषों से ऊंचा स्थान प्राप्त था। मनु ने ‘यंत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते.......’ स्त्रियों को पूजनीय बताया है। किन्तु पिछली कुछ शताब्दियों से हमारी सर्वतोमुखी अवनति और कुरीति ग्राहकता के कारण स्त्रियों पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाकर उनका विकास नष्ट कर दिया गया और उन्हें अपंग पशु बनाकर घर की चहार दीवारी के पिंजड़े में बन्द कर दिया गया। ऐसी दशा में स्वाभाविक ही है कि अपंग और मूक प्राणियों की अपेक्षा पुरुष को अधिक महत्व दिया जाय। माता पिता देखते हैं कि कन्या का जन्म होने से हमें कुछ सहारा मिलना तो दूर हर प्रकार का भार ऊपर पड़ेगा। विवाह में दहेज की रकम देनी पड़ेगी, वर ढूंढ़ने में दौड़ धूप करनी होगी और तत्पश्चात उस पर इतना भी अधिकार न रहेगा कि बिना उसके पति की मर्जी के कुछ दिन के लिये उसे घर वापिस भी बुला सकें। इसके विपरीत पुत्र घर के काम काजों में मदद देता है और कमाई करके घर में रखता है। अतएव सब लोग पुत्र की इच्छा करते हैं। किन्तु इस प्रकार की विकृत इच्छाएं पूरा करना परमेश्वर को अभीष्ट नहीं है। आध्यात्मिक दृष्टि से तो कन्या का उत्पन्न होना प्रभु की प्रसन्नता का विशेष चिन्ह है। कन्यादान को यज्ञ कहा गया है। वैसे तो सभी दान यज्ञ हैं पर कन्या दान का महत्व विशेष है। निःस्वार्थ भाव से लालन-पालन एवं शिक्षा-दीक्षा करते हुए अपनी संतान को धन सहित दान करने से कितना उच्चकोटि का पुण्य है। मनोविज्ञान की दृष्टि से कन्यादान करने वाले माता-पिता के हृदय में उदारता, त्याग, दान, निस्वार्थता और प्रेम की गहरी छाप बैठती है, जो उसके जीवन को पवित्रता की दिशा में प्रवाहित करती है। कोई भी विवेकवान और भावुक पिता इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है कि कन्यादान के दिनों में उसका अन्तःकरण कितना उदार एवं पवित्र हो जाता है, यदि इन भावनाओं को योंही नष्ट न होने दिया जाय, तो वे मनुष्य को महात्मा बना सकती है। हिन्दू विवाह पद्धति के अनुसार किसी भी कन्या का कन्यादान उससे बड़े सभी लोग करते हैं, चाहे वे सगे सम्बन्धी भले ही न हों। ऐसा विधान करने में शास्त्रकारों की इच्छा यह है कि कन्यादान से उत्पन्न होने वाली उदारता-त्याग भावना द्वारा आत्मोन्नति का लाभ केवल माता-पिता ही नहीं वरन् अन्य लोग भी उठावें। इस प्रकार पाठक देखेंगे कि कन्या का जन्म, पुत्र जन्म की अपेक्षा अधिक प्रसन्नता की बात है। वे मूर्ख हैं जो कन्या रत्न को पाकर दुखी होते हैं, वे पापी हैं जो पुत्रों की अपेक्षा कन्या के लालन-पालन की शिक्षा में त्रुटि करते हैं। वे कायर हैं जो दहेज ठहराव के लिए विवाह करते हैं वे कोढ़ी हैं जो अपनी संतान को पैसों के लिए बेचते हैं। हमें चाहिए कि संतान को सुयोग्य बनावें और उन्हें लालची धनवानों की अपेक्षा सुयोग्य कंगालों के यहां ब्याह दें। याद रखना चाहिए कि कन्या को सुख धनी घर में ब्याही जाने से नहीं, वरन् सुयोग्य पति के साथ मिलता है। यदि इन बातों पर अमल किया जाय तो हर किसी के मुंह से सुनी जाने वाली ‘हाय पुत्र’ की असम्भव रट बन्द हो जायगी और कन्याएं सन्ताप का हेतु प्रतीत न होंगी। उपरोक्त दूषित पहलुओं से पुत्र या कन्या की इच्छा करना बहुत बुरा है। किन्तु इसका एक सात्विक पहलू भी है। जिस प्रकार वाटिका की शोभा केवल एक ही प्रकार के फूलों से नहीं होती, इसी प्रकार घर में केवल पुत्र ही पुत्र या केवल पुत्रियां ही पुत्रियां होने से भी नहीं होती। गृहस्थी का सौंदर्य इसमें है कि कुछ पुत्र और कुछ पुत्रियां हों। जिनके यहां केवल पुत्र ही पुत्र उत्पन्न होते हों, वे पुत्री की और जिनके यहां सब कन्याएं ही हो वे पुत्र की इच्छा कर सकते हैं इसके विपरीत स्वार्थमय भावनाओं से केवल पुत्र की ही इच्छा करके ईश्वर के सृष्टि क्रम में बाधा पहुंचाना अनुचित है। मरने के बाद अपने धन का चौकीदार छोड़ जाने के लिए पुत्र की इच्छा करना नीच श्रेणी का स्वार्थ है। यदि किसी को सन्तान न हो तो उसे धर्म कार्यों में अपना धन लगा देना चाहिये। हां, जो व्यक्ति अपनी स्थिति पसंदगी के अनुसार पुत्र या कन्या जिसे सुयोग्य बनाकर अपने स्मारक और संसार के लिए एक सुन्दर भेंट की तरह विशेष रूप से छोड़ जाना चाहता है उन्हें अपनी पसंदगी और योग्यता के अनुसार पुत्र या पुत्री की इच्छा करने का अधिकार है।

