भारतीय विद्वानों के मत
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
आयुर्वेद के तत्वदर्शी आचार्य सुश्रुत का कथन है कि रजोदर्शन से ऋतुस्नान तक की रात्रियां त्याज्य हैं इनके अतिरिक्त रजोदर्शन से गिनी हुई सम रात्रियां (4, 6, 8, 10 आदि) में गर्भाधान करने से पुत्र और विषम रात्रियों 5,7, 9, 11 आदि) में गर्भाधान करने से कन्या उत्पन्न होती है। महर्षि वाग्भट्ट का मत है कि स्त्री तथा पुरुषों के दाहिने अंगों की प्रधानता से पुत्र एवं बाएं अंगों की प्रधानता से कन्या उत्पन्न होती है। चरक कहते हैं कि यदि वीर्य की अधिकता हो तो पुत्र और रज की अधिकता हो, तो कन्या उत्पन्न होती है। विदेहाचार्य उपरोक्त दोनों मतों का एकीकरण करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार सूर्य, चन्द्र की शक्तियों से समुद्र में ज्वार भाटा आता है, उसी प्रकार सम रात्रियों में रज की कमी और विषम रात्रियों में अधिकता रहती है, इसी कारण सम में रज अधिकता के कारण कन्या और विषम में न्यूनता के कारण पुत्र उत्पन्न होता है। भाव मिश्र का मत इनसे भिन्न है, वे कहते हैं कि स्त्री की जननेन्द्रिय में समीरण, चान्द्रमसी और गौरी नाम की तीन नाड़ियां हैं। समीरण नाड़ी में गर्भ स्थापित नहीं होता, कदाचित हो भी जाय, तो गर्भपात होता है, या नपुंसक आदि अस्वाभाविक संतान पैदा होती है। चान्द्रमसी नाड़ी के मुख में वीर्यपात होने से कन्या और गौरी के मुख में वीर्यपात होने से पुत्र उत्पन्न होता है। आगे वे कहते हैं कि असाधारण रति सेवन से चान्द्रमसी खुलती है और कन्या का जन्म होता है, किन्तु यदि स्त्री की काम वासना बहुत प्रबल हो तो गौरी का मुख खुल जाता है और गर्भ में पुत्र की स्थिति होती हैं। पं. कोक का कथन है कि अधिक मैथुन करने वालों के लड़कियां अधिक होती हैं, जैसा कि वैश्याओं के अधिकांश लड़कियां होती देखी जाती हैं। एक दूसरे विद्वान का कथन है कि यदि पुरुष को शीघ्रपतन की व्यथा हो तो उसके वीर्य से पुत्रियों का जन्मने की अधिक सम्भावना है। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि स्त्री के गर्भाशय में एक मास लड़के का अण्डा और दूसरे मास लड़की का अण्डा पहुंचता है और उस मास की गर्भ स्थापना से अंडा की जाति के अनुसार सन्तान पैदा होती है। ज्योतिष-शास्त्रों में इस सम्बन्ध में भी कुछ विवरण मिलता है। एक स्थान पर कहा गया है कि मंगल, सोमवार और शनिवार की गर्भ स्थापना से कन्या एवं रविवार, गुरुवार, बुधवार और शुक्रवार के आधान से पुत्र होता है। दूसरे स्थान पर बताया गया है कि कृष्ण पक्ष की सन्तान पुत्र होगा शुक्ल पक्ष की कन्या होगी। कविराज हरिनाम दास बी.ए. लिखते हैं—सम्भोग के समय यदि पुरुष दिन भर का थका मांदा होगा और स्त्री आराम का दिन बिता चुकी होगी तो लड़का उत्पन्न होगा। अंगरेज डाक्टरों का भी अनेक बार का यही अनुभव है। परिश्रम से सूर्य गुण प्राप्त होता है। संभोग के समय सूर्य गुण की अधिकता लड़का उत्पन्न करती है। गर्भ-स्थिति की रात्रि को यदि पुरुष थका होगा तो पुत्र और स्त्री थकी होगी तो पुत्री होगी। मरवत के पठान लोग इसी कारण उन दिनों अपनी स्त्रियों से खेती कटवाते हैं। वे अक्सर अपनी युवा लड़कियां रुपया लेकर विवाहते हैं। स्वर योग के आचार्यों का मत है कि जब पुरुष की इड़ा नाड़ी का उदय होता है अर्थात् बांया स्वर चलता है उस समय गर्भाधान करने से कन्या उत्पन्न होती है और जब पिंगला का उदय होता है अर्थात दाहिना स्वर चलता है, उस समय गर्भाधान से पुत्र का जन्म होता है। सुषुम्ना के उदय अर्थात् दोनों स्वर चलने के समय प्रायः गर्भ स्थिर नहीं होता या नपुंसक सन्तान जन्मती है।

