गर्भ क्या है?
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वीर्य, शरीर की अन्तिम धातु है। रस, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि आदि पकने के बाद भोजन का सारा भाग वीर्य है। यह तत्त्व पकने के बाद सूक्ष्म रूप से विद्युत प्रवाह की तरह पुनः वापिस लौट जाता है और शरीर के सम्पूर्ण अंग प्रत्यंगों एवं धातु—उपधातुओं को पुष्ट एवं सतेज करने में लगा रहता है। मूत्राशय के नीचे एक छोटी सी थैली में यह साधारणतः करीब दो-ढाई तोले की मात्रा में जमा रहता है। जिस प्रकार दही को रई द्वारा मथ कर मक्खन निकाला जाता है, इस प्रकार रक्त में से अंड कोषों द्वारा मथ कर वीर्य निकलता है। यदि कभी अंड कोष ठीक प्रकार काम न करें, तो वास्तविक वीर्य निकलना बन्द हो जायगा और संतान होना रुक जायगा। यदि वे मंथन करने की क्रिया अधूरी रखें, तो रकत को अधकच्चा ही निकाल दें, ऐसी दशा में वीर्य लाली लिये हुए आता देखा गया है। स्खलित होते समय जो सफेद-सफेद चिकनी वस्तु निकलती है, वह सबकी सब वीर्य नहीं हैं। उसमें अधिकांश भाग अल्व्यूमिन, फास्फेट, क्षार आदि होते हैं, वास्तविक वीर्य का भाग इसमें थेाड़ा सा ही होता है। जिस वस्तु को वीर्य कहना चाहिए, उसमें संतान उत्पन्न करने वाले बहुत ही छोटे कीटाणु, इतने छोटे जो सूक्ष्म दर्शक यंत्र की सहायता बिना नहीं देखे जा सकते, एक बार के वीर्य-पात में यह करोड़ों की संख्या में निकल जाते हैं। इन कीटाणुओं में से ही हर एक गर्भ स्थापित कर सकता है। जब किसी प्राणी के अंडकोषों की वीर्य वाहिनी नस काट दी जाती है और वह मैथुन करता है, तो स्खलित होते समय सफेद-सफेद वीर्य जैसी वस्तु तो निकलती है, परन्तु वह वास्तविक वीर्य जिसमें गर्भकारक कीटाणु पाये जाते हैं, नहीं होता, फलस्वरूप किसी खस्सी नर के सहवास से मादा गर्भ धारण नहीं कर सकती।जिस प्रकार स्खलित होते समय पुरुष का वीर्यपात होने से इन्द्रियों में फड़कन होती है, वैसे ही स्त्री के स्खलित होते समय योनि में फड़कन होती है, परन्तु उसे वीर्य पात नहीं होता। उस समय कुछ लसदार पदार्थ बहुत थोड़ी मात्रा में निकलता तो है, पर उसमें कोई गर्भ कारक कीटाणु नहीं होते। जिस प्रकार पुरुषों के अंडकोष होते हैं, वैसे ही पेट में भीतर गर्भाशय के पास स्त्रियों के भी अंडकोश होते हैं। उन अंडकोषों से एक-एक नाड़ी निकल कर गर्भाशय के भीतर चली जाती है। रजस्वला होने के उपरान्त इन अंडकोषों द्वारा एक छोटा सा अंडा जो खुली आंखों से नहीं दिखाई देता, किन्तु पुरुष के वीर्य कीटाणुओं से कई गुना बड़ा होता है, पैदा होता है और वह डिम्बनाली द्वारा गर्भाशय में पहुंच जाता है। रजोदर्शन के दिनों में यह अंडा आगे बढ़ता है और ऋतुस्नान तक गर्भाशय में पहुंच जाता है, कभी-कभी इससे आगे पीछे भी। यह अंडा प्रायः पन्द्रह सोलह दिन तक गर्भ की प्रतीक्षा करता है और इसके बाद यह योनि मार्ग से निकल जाता है। यों तो कभी-कभी पूरे महीने तक भी यह बना रहता है, परन्तु ऐसे उदाहरण कम ही देखने में आते हैं। जब यह अंडा निकल जाता है, तो फिर गर्भ की संभावना नहीं रहती क्योंकि एक महीने में केवल एक ही अंडा गर्भाशय में आता है। यदि कदाचित दो अंडे आ जावें और उन तक शुक्रकीट पहुंच जावे तो दो बालक एक साथ पेट में पड़ जाते हैं। स्त्री अंड में कुछ रासायनिक पदार्थ होते हैं जो शुक्र कीटों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। मैथुन के समय गर्भाशय का मुख खुलता है और पुरुष का वीर्य उसमें चला जाता है। शुक्र कीटाणुओं को स्त्री अंड के लिए बड़ा आकर्षण होता है और वे उसे टटोलते हुए इधर उधर भटकते हैं। जब किसी कीट को अंड से भेंट हो जाती है, तो वह उससे चिपट पड़ता है और यह दो वस्तुएं मिल कर एक हो जाती हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि केवल एक ही कीट स्त्री अंड में प्रवेश करता है और शेष लौट आते हैं, किन्तु कई लोग ऐसा भी कहते हैं कि अनेक वीर्य कीट अंड में घुस जाते हैं और यदि उनकी संख्या अधिक हो तो पुत्र और कम हो तो कन्या का जन्म होता है। स्त्री, पुरुषों के कीटाणु जब मिल जाते हैं, तो उन दोनों के स्वरूपों में रूपान्तर होना शुरू हो जाता है। यह गर्भ है। इसका पोषण शुरू होता है और स्त्री गर्भवती हो जाती है।

