लड़का या लड़की कब होते हैं?
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
चार्ल्स डार्विन का मत है कि हर जाति अपनी वंश वृद्धि करने के लिए प्रकृतितः प्रयत्नशील है। वे कहते हैं कि पुरुष और स्त्री में से जिसकी आयु अधिक होगी, उसी की जाति की संतान उत्पन्न होने की अधिक सम्भावना है। चार्ल्स के मत की पुष्टि उन अनुसन्धानों से भी होती है जो जर्मन डॉक्टर हाफकर ने बहुत दिनों की खोज के साथ किये हैं। उन्होंने जांच करके अपना अनुभव इस प्रकार प्रकाशित किया है— पिता से माता की आयु बड़ी होने पर 100 पुत्रियां और 90 पुत्र पिता और माता की आयु सम होने पर 100 पुत्रियां और 92 पुत्र पिता से माता 1 से 6 वर्ष छोटी होने पर 100 पुत्रियां और 103 पुत्र पिता से माता 6 से 9 वर्ष छोटी होने पर 100 पुत्रियां और 125 पुत्र पिता से माता 9 से 12 वर्ष छोटी होने पर 100 पुत्रियां और 144 पुत्र पिता से माता 18 वर्ष छोटी होने पर 100 पुत्रियां और 100 पुत्र हिपोक्रिटस का अभिमत है स्त्री के डिम्ब कीट बलवान होने पर पुत्री और पुरुष के शुक्र कीट बलवान होने पर पुत्र उत्पन्न होता है। इसका समर्थन करते हुए भी मान्सथ्यूरी कहते हैं कि रजस्वला होने पर स्त्री के रज में बहुत अधिक चैतन्यता होती है और यह उत्तरोत्तर घटती जाती है, इसलिये ऋतु स्नान स्त्री से आरम्भिक दिनों में ही गर्भाधान किया जाय, तो कन्या उत्पन्न होगी और जितने अधिक दिन बाद गर्भ स्थापन होगा, उतनी ही पुत्र की अधिक सम्भावना रहेगी। मेयर भी इस अभिमत से पूर्णतः सहमत हैं। डॉक्टर ट्राल उपरोक्त मत के पक्ष से अपना तर्क पेश करते हैं कि रजस्वला होने के समय स्त्री अंड बहुत दूर होता है इसलिए उस तक शुक्रकीट अधिक संख्या में नहीं पहुंच सकते। परन्तु ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है, स्त्री अंड गर्भाशय की ओर खिसकता आता है, तब उस तक शुक्रकीटों की पहुंच आसान हो जाता है। इस तरह स्त्री अण्ड से अधिक शुक्र कीटों का मेल हो जाने पर पुत्रोत्पत्ति की सम्भावना अधिक रहती है। ऐरिस्टाटोल, डॉक्टर पी.एच. सिक्ट डॉक्टर बेलहिंग और डॉक्टर तीथा के मत से स्त्री पुरुषों के दाहिने अंग के प्रभाव से पुत्र और बांए अंगों से कन्या उत्पन्न होती है। डॉक्टर सिक्ट ने इस सम्बन्ध में बहुत समय तक अन्वेषण करने में अपना समय लगाया है। उन्होंने अपने अनुभव विवरण में लिखा है कि—‘‘स्त्री पुरुषों में दाहिनी और बांई ओर दो-दो अंडकोष होते हैं। इन दोनों की शक्ति अलग-अलग है। यदि ऐसा न होता, तो कुदरत दो अंडकोष अलग-अलग न बनाकर केवल एक ही रहने देती। वास्तव में इन दोनों के रहस्यमय कार्य अलग-अलग हैं। मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि इस सम्बन्ध में कोई गहरी खोज करूं। मैंने उन्हीं दिनों खस्सी किये हुए सुअर के दो बच्चे खरीदे। जब वे बड़े हुए, तो मैंने देखा कि उनमें से एक पूरी तरह खस्सी नहीं है और उसका बांया अंडकोष कूटने से रह गया है। मैंने उसी जाति की एक मादा सूकरिया खरीदी और अपने प्रयोग के लिए दोनों को साथ-साथ रखा। समयानुसार उसके एक साथ आठ बच्चे हुए, जो सबकी सब मादा थीं। दूसरी बार उस जोड़े से 11 बच्चे हुए, यह भी सबकी सब मादा थे, इसी प्रकार के अनुसंधान मैंने दूसरे पशुओं पर भी किये। दो कुत्तों के दाहिने अंड कोष काट कर उन्हें जोड़े के साथ रखा गया, इनकी भी कुल संतानें स्त्री जाति की थी। तीन जोड़े खरगोशों में से तीनों नरों के दाहिने अंडकोष काट दिये गये। इन के बच्चों में भी कुल मादा थे। नरों पर यह प्रयोग करना सरल था, क्योंकि उनके अंडकोष बाहर होते हैं और आसानी से काटे जा सकते हैं। मादाओं के अंडकोष पेट चीर कर निकालने पड़ते हैं, इससे मृत्यु का भय अधिक रहता है। मैंने यही प्रयोग, अनेक कुतियों पर किया, पर चीर फाड़ में मुश्किल से दो बच पाईं। इसके दाहिने अण्डकोष निकाले गये थे। जब यह कुतियां गर्भिणी हुईं तो दोनों ने ही पिल्लियां पैदा कीं। अपने इन प्रयोगों की सूचना मैंने अन्य सहयोगी डाक्टरों को दी और उनसे भी जांच करने का अनुरोध किया। डॉक्टर होजलर आदि ने भी मेरी ही तरह प्रयोग किये और वे सब उन्हीं परिणामों पर पहुंचे जिन पर मैं पहुंचा हूं।’’ डॉक्टर सिक्ट ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है कि स्त्री पुरुष के बाएं अण्डकोषों में कन्या का उत्पन्न करने का और दाहिने में पुत्र उपार्जन की शक्ति है। यह सिद्धान्त केवल पशुओं पर ही परीक्षित हुआ हो सो बात नहीं है मनुष्यों पर भी यही परिणाम निकला है। प्रिंस आफ डेल वर्ग के एक मुसाहिब को रेलिंग पर से गिर पड़ने के कारण बाईं ओर के अंडकोष में भारी चोट लगी। डॉक्टर रूलमेन ने बड़े प्रयत्न से इलाज करके उनके प्राण तो बचा लिये, पर कुचले हुए बाएं अंडकोष को ठीक न किया जा सका, वह निकम्मा ही बना रहा। कुछ समय बाद वे बिलकुल चंगे हो गये और गृहस्थ धर्म पालन करने लगे। उनके 5 बच्चे हुए जो सबके सब लड़के थे। उनके मृत शरीर की डॉक्टर लियो ने परीक्षा की और पाया कि उनका बांया अंडकोष बिलकुल बेकार था। इससे यह निश्चय किया गया कि इसी कारण उन्हें सब पुत्र हुए थे। इसी तरह डा. बेलहिन के अस्पताल में एक ऐसी स्त्री की मृत्यु हुई, जिसने 9 पुत्र ही पुत्र उत्पन्न किये थे। डॉक्टर ने परीक्षा के लिए उसके शव को चीर कर देखा तो पाया कि उसका दाहिना अंडकोष ठीक था, किन्तु बांया किसी कारण से सूख कर बेकार हो गया था। इस अनुभव से भी उपरोक्त मत को ही समर्थन मिला। डॉक्टर लियोपोल्ड ने दो प्रथक ही सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है, वे जोरदार शब्दों में कहते हैं कि स्त्री का वीर्य बलवान होने से पुत्र और पुरुष का वीर्य बलवान होने पर पुत्री का जन्म होता है। दूसरा मत उनका यह है कि जिस स्त्री के पेशाब में शकर की मात्रा अधिक होती है, उनके पेट से पुत्रियां होती हैं और जिनके मूत्र में शकर का परिणाम कम होता है वे पुत्र उत्पन्न करती हैं। डॉक्टर लियो पोल्ड की दलील है कि शकर के अधिक मात्रा में जाने से स्त्री का वीर्य अच्छी तरह पक नहीं पाता और निर्बल बना रहता है, ऐसे कमजोर वीर्य से वे कन्या ही बन सकता है। एक दूसरे डॉक्टर का मत है कि रजोदर्शन के आरंभिक काल में स्त्री की कामेच्छा बहुत प्रबल रहती है और प्रबलता के कारण स्त्री तत्व जागृत होकर अपनी वंश वृद्धि का प्रयत्न करता है अर्थात् रजस्वला होने के बाद शीघ्र ही रति करने पर पुत्री होना संभव है। इसके पश्चात् जितना विलम्ब होता जाता है, उतनी ही स्त्री की वासना मन्द होती जाती है, तदनुसार पुत्र की सम्भावना अधिक रहती है। एक अन्य डॉक्टर का कथन है कि स्त्री के अधिक कामातुर होने से पुत्र उत्पन्न होते हैं और अधिक कामातुर होना स्त्री के स्वास्थ्य के ऊपर निर्भर है। जिन युवतियों का स्वास्थ्य जैसा अच्छा होगा, उन्हें वैसी ही तीव्र कामेच्छा होगी। यह समझना ठीक नहीं कि स्त्री का स्वास्थ्य अच्छा होने से कन्या उत्पन्न होगी। अनुभव यह बतलाता है कि स्त्री के अधिक कामातुर होने पर पुत्र की संभावना अधिक है। कारण यह है कि आतुरता के कारण पुरुष उनकी ओर अधिक आकर्षित होते हैं और ऐसी दशा में स्वभावतः उनका वीर्य अधिक मात्रा में निकल जाता है। पुत्र या पुत्री उत्पन्न होने के सम्बन्ध में देशी विदेशी विद्वानों की विचित्र सम्मतियां हैं। डॉक्टर क्रोशन कहते हैं—गर्भ स्थापना के आरम्भिक दिनों से यदि ठीक और रुचिकर भोजन किया जाय, तो पुत्र की उत्पत्ति होती है। डॉक्टर हाफकर कहते हैं—माता से पिता की आयु अधिक होने एवं उसका वीर्य परिपुष्ट होने से पुत्र पैदा होता है। डॉक्टर फ्रेंकलिन का कथन है गर्भ स्थिति के आरम्भिक दिनों में बलवर्धक भोजन करने से लड़का और कमजोर पदार्थ खाने से लड़की का जन्म होता है। हिप्होक्रेटिस ऐवेक्टेगोरास मोन्सथ्यूरी और मेयर की राय है कि ऋतु स्नान के आरम्भिक एक सप्ताह में गर्भाधान करने से कन्या तदुपरान्त पुत्र की सम्भावना अधिक होती है। चार्ल्स डार्विन पिता की आयु अधिक होने से पुत्रोत्पत्ति मानते हैं। डॉक्टर सेड कहते हैं कि सन्तानोत्पत्ति में स्त्री वीर्य का महत्व अधिक है, यदि स्त्री का वीर्य बलवान होगा, तो पुत्र, और निर्बल होगा तो पुत्री जन्मेंगी। वे कहते हैं कि प्रकृति के नियमानुसार प्रत्येक जाति अपनी प्रतिकूल जाति को उत्पन्न करती है। मनुष्य जाति के विकास का अन्वेषण करते रहने वालों ने अलग सिद्धान्त निर्धारित किये हैं। वे बतलाते हैं कि आव हवा और कुछ जातियों में उत्पन्न करने का विशेष गुण होता है। इंगलैंड में लड़कियां अधिक उत्पन्न होती हैं। भारत के पंजाब प्रान्त में लड़कों की अधिकता रहती है, किन्तु यू.पी. और बंगाल में लड़कियों की संख्या अधिक है। एक किम्वदन्ती है कि कान्य कुब्ज ब्राह्मणों में लड़कियां अधिक होती हैं और लड़के कम इसी से लड़के वाले मनमाना दहेज ठहराते हैं। एक दूसरे अन्वेषक का कथन है कि आहार-विहार की उचित सुविधा न होने एवं प्रसव वेदना के कारण स्त्रियों की आयु पुरुषों की अपेक्षा कम होती है। बीमा कम्पनियां भी पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का शीघ्र मरना स्वीकार करती हैं। प्रकृति का नियम है कि जो जाति जल्दी मरती है, वह उत्पन्न भी अधिक होती है इसलिए सर्वत्र प्रायः पुत्रों की अपेक्षा कन्याओं का बाहुल्य देखा जाता है। एक बार दो पड़ोसी किसानों के पास करीब दो दो दर्जन गायें थीं। इनमें से एक की गाये अक्सर बछड़े देती और दूसरे की बछिया। कारण तलाश करने पर मालूम हुआ कि जिस किसान की गायें बछड़े देती थीं, वह अपने पास छांट-छांट कर जवान गायें रखता था। उसके झुंड में कोई सांड़ न था। सांड़ को वह गायों के साथ नहीं चरने देता था। जब कोई गाय कामातुर होती, तो सांड़ को अपने बाड़े में लाता और एक बार मिला कर अलग कर देता। सांड़ के चुनाव में यह उसे पसन्द करता, जो गायों से उम्र में छोटा होता किन्तु दूसरा किसान जिसके यहां बछिया अधिक होती थी उसका प्रबन्ध इससे उलटा था। गायें कम उम्र की थीं सांड़ बूढ़ा था। सांड़ साथ-साथ चरता था और बार-बार भोग के ऊपर कोई प्रतिबन्ध न था, दूसरे सांड़ से मिलने का स्थान बहुत दूर था, जहां पहुंचने तक गायें थक जाती थीं। एक दूसरा उदाहरण है कि एक से शरीर वाली शूकरियां एक साथ कामातुर हुईं। उन्हें तृप्त करने के लिए कुछ दूर एक स्थान पर भेजा गया। जाने का रास्ता अच्छा न था, इसलिए वे बहुत थक कर वहां पहुंची। जाते ही एक शूकरी से सुअर मिलाया गया, उस समय शूकरी तो थक गई थी, किन्तु सुअर कामातुर था। दूसरी शूकरी थक कर एक खेत में घुस गयी और आराम करने लगी। बहुत देर बाद वह मिली, तब उसे भी सूअर से मिलाया गया। इस समय शूकरी स्वस्थ थीं, किंतु सूअर की आतुरता तृप्त हो चुकने के कारण मन्द थी। जब दोनों के प्रसव हुआ, तो पहली शूकरी के पेट से 6 मादा और 2 नर तथा दूसरी के पेट से 7 नर और 2 मादा पैदा हुईं। एक व्यक्ति अपनी नव युवावस्था में बहुत स्वस्थ था, किन्तु पीछे उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया और दुर्बल रहने लगा। उसके सन्तान हुईं, उनमें से स्वस्थ अवस्था की पहली 2 कन्याएं थीं और निर्बल अवस्था के पिछले 5 पुत्र थे। पिंसलूनिया निवासी एक व्यक्ति अपने कार्य वश सुदूर नगर हेरिस वर्ग में रहता था। जाड़े के दिनों में छुट्टी मिलती तब कहीं घर जाता। उसके कई पुत्र हुए। इसमें कारण यह समझा गया कि चिरकालीन वियोग के कारण उसकी पत्नी अपने पति के आने पर बहुत प्रसन्न होती थी और अपने संचित प्रेम का इन थोड़े दिनों में खूब प्रदर्शन करती। सहवास की इच्छा भी इन दिन में प्रबल रहती, तदनुसार सबकी सब सन्तान पुत्र हुई। एक दूसरे डॉक्टर अपनी खोज के आंकड़े प्रकट करते हुए कहते हैं कि शहरी स्त्रियों की अपेक्षा देहाती स्त्रियों के और अमीर स्त्रियों से गरीब स्त्रियों के पुत्र अधिक होते हैं। कारण यह है कि शहरी और अमीर स्त्रियां शारीरिक परिश्रम नहीं करती, इसलिए उनका रंग रूप भले ही अच्छा हो, पर स्वास्थ्य उनका अच्छा नहीं होता, इसलिए उनकी निर्बलता के कारण पुत्रियां अधिक होती हैं। इसके विपरीत देहातों में रहने वाली और गरीब स्त्रियों को परिश्रम करना पड़ता है, इसलिए उनके अंग सुदृढ़ और शरीर बलवान होता है, तदनुसार वे पुत्र प्रसव करती हैं। ऐसे ही अनेक उदाहरणों के आधार पर यह मत निर्धारित किया गया है कि ‘कामातुर और स्वस्थ स्त्री यदि ब्रह्मचारी पुरुष के साथ स्वल्प मैथुन करे तो उसके पुत्र होगा और दुर्बल, धार्मिक स्वभाव की, अनुत्साही, उदास रहने वाली, भोली लड़कियां जिन्हें काम क्रिया में विशेष रुचि नहीं होती, पुत्री प्रसव करेंगी। पाठक पाश्चात्य विद्वानों के इन मतों से बहुत कुछ जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

