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Magazine - Year 1940 - February 1940

Media: TEXT
Language: HINDI
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ईमानदारी का आर्थिक पहलू

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(ले. श्री राजवैद्य सत्यपाल गुप्त, एटा)

ऐसे आदमियों की कमी नहीं जिन्हें होशियार , बुद्धिमान, चालाक, वाक पटु, हाजिर जवाब, मिलनसार या कमाऊ पूत कहा जा सके, पर ऐसे आदमियों को चिराग लेकर ढूंढ़ना पड़ेगा, जिन्हें ईमानदार कहा जा सके। लोग समझते हैं कि वाक पटु और चालाक होना अच्छा है, इससे धन कमाया जाता है और लोग प्रशंसा करते हैं। वे धन कमाकर सुख प्राप्त करना चाहते हैं और समाज में अग्रणी कहलाना चाहते हैं। परन्तु अपने अमूल्य जीवन की महत्वपूर्ण घड़ियाँ व्यतीत करने के बाद-अपने कार्य का फल प्रत्यक्ष देख लेने के बाद- उन्हें अनुभव होता है कि असल में वे भ्रम में थे। चालाकी से कितनों ने धन कमाया है? सयाने कौओं ने कितनी नियामतें चखी हैं। आज इसे ठगा तो कल उसे ठगा। जिसे एक बार ठग लिया जीवन भर को उसका दरवाजा बन्द हो गया। फिर वहाँ दुबारा दाल नहीं गल सकती। काठ की हाँडी में इतनी दम नहीं होती कि वह दुबारा भी चढ़ सके। यह मार्ग धन कमाने का और उन्नति करने का नहीं है। ऐसे दुकानदार, जिनके यहाँ से एक बार चीज खरीद कर पछताना पड़ता है कितने स्थायी ग्राहक बना सकते हैं ? एक बार जो भूल से उधर फँस गया दुबारा फिर उलट कर नहीं आवेगा। फिर भला वे धन पति किस किस प्रकार हो सकते हैं ? यश के बारे में भी उनकी जो आशा थी वह भी निर्मूल सिद्ध होती है। खुशामदी, स्वार्थी लोग अपना काम निकालने की गरज से मुँह पर तारीफ भले ही करें या विचित्र आचरण को देखकर कौतूहल वश कोई वाह-वाह भले करे, पर पीठ पीछे सब जगह उनकी कड़ी आलोचना होती है। यदि कोई बड़ी संपत्ति नहीं कमा पाये तब तो साधारण लोग भी मुँह पर ही उनकी कटु आलोचना कर डालते हैं और पीछे गालियाँ देते हैं। सब के मन में ऐसे लोगों के प्रति घृणा के भाव भरे रहते हैं।

यदि इन चालाक व्यक्तियों में से कोई धनी बन गया तो भी वह न तो समाज का अग्रणी बन सकता है और न यश ही कमा सकता है। सेठ लक्ष्मीचंद के पास बीस लाख रुपये की पूँजी है पर उनका आदर सुदामा पंडित के बराबर नहीं होता। सेठ जी के यहाँ मोटर है, कोठी है, नौकर चाकर हैं, हथियार हैं, जेवर हैं, खजाना है पर पड़ौसियों को इससे क्या? सुदामा पंडित एक प्याऊ में छै रुपया महीना पर पानी पिलाने की मजदूरी करता है, काम से आते ही पड़ौसियों के दुख दर्द में शामिल होता है। ऐसे लोग जिनका कोई नहीं है, बीमारी के वक्त रात भर उसे अपने पास बैठा पाते हैं, मुहल्ले की कई अनाथ विधवाएं हैं जिनके कातने के लिए रुई और पीसने को अनाज दूसरे लोगों के यहाँ से वह ला देता है और काम पूरा होने पर बाजार से उनकी मजदूरी लाकर उन्हें दे देता है, महीने में कई भूखे प्यासे अतिथि उसकी रोटी में से हिस्सा बाँटते हैं और उसकी झोंपड़ी में पड़े हुए पुआल पर लेट कर रात काटते हैं। भले ही सुदामा पंडित गरीब है पर उसका दिल सेठ लक्ष्मीचंद से ज्यादा अमीर है। उसे सेठ जी से अधिक यश प्राप्त है। बेटों की फिजूल खर्ची, स्त्री के दुराचार, नौकरों की चोरी, मित्रों की दगा-बाजी, व्यापार में घाटे होने की बात सोचते सोचते सेठ जी को सारी रात नींद नहीं आती पर वह गरीब चक्रवर्ती राजा की तरह सुख की निद्रा में सोता है।

इस बेईमानी के पैसे को भी यहीं छोड़ कर खाली हाथ कर जाना पड़ेगा यह सोचकर चित्त उद्विग्न हो उठता है। सिकन्दर महान जब मरने लगा तो उसने अपनी सारी दौलत का आँखों के सामने ढेर लगवाया, पर वह एक हसरत भरी निगाह डालने के अतिरिक्त साथ कुछ न ले जा सका-एक पाई भी उसके साथ न गई। सेठ जी अपने जीवन की बहुमूल्य घड़ियों पर, कोठी खजाने पर, धर्म अधर्म पर जब एक विहंगम दृष्टि डालते हैं तो उनकी छाती पर साँप लोटने लगता है। और सुदामा पंडित-उसके मन में आनन्द की गंगा बहती रहती है। अपने अकिंचन जीवन का मैं कैसा सदुपयोग कर लेता हूँ, मुझसे दूसरों की भी कुछ सेवा बन पड़ती है यह सोचते सोचते उसकी छाती फूल उठती है। हर क्षण एक दैवी आनन्द उसके हृदय में छाया रहता है। छै रुपये महीने कमाने वाले इस गरीब के पास जितना सुख, स्वास्थ्य और आनन्द है उतना सेठ जी अपनी सारी सम्पत्ति के मोल में भी नहीं खरीद सकते।

अब दुनिया बहुत चालाक हो गई है। उसकी तेज निगाह से आपकी चालाकी बहुत दिन छिपी नहीं रह सकती, एक दिन कलई खुलेगी और आपका बालू का महल गिर पड़ेगा। सुख और शान्ति, बेईमानी का काम आरंभ करते ही गायब हो जाएगी। हर क्षण यह चिन्ता लगी रहेगी, कहीं मेरी कलई न खुल जाय। कोई किसी के बारे में बात करेगा पर आपको यही मालूम पड़ेगा कि मेरे ऊपर तानाकशी की जा रही है। जरा सा खटका होते ही मन का चोर आँखों के सामने राक्षस बन कर आ खड़ा होगा। दुराचारी लोगों के पाँव काँपते रहते हैं और ऐसा मालूम पड़ता रहता है कि यह पेड़, पत्थर, दीवारें, पशु पक्षी मुझे चिढ़ा रहे हैं और मेरी सब गुप्त बात जान गये हैं। ऐसी जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है? जिसमें हर घड़ी आशंका, दुराव, धड़कन, चिन्ता और जलन हो। वह जीवन प्रेत जीवन है। दुराचार के साथ साथ यह सब विघ्न आते हैं और मनुष्य की हँसती खेलती जिन्दगी को कड़ुवी और भार स्वरूप बना देते हैं।

आर्थिक दृष्टि कोण से देखिये तब भी ईमानदारी का महत्व कम नहीं है देखा जाता है कि कोई व्यापारी किसी के चालू कारबार को मोल लेता है तो ऊँची रकम देकर उसके नाम को भी खरीद लेता है। क्योंकि उस नाम की ईमानदारी ने लोगों के दिलों में स्थान प्राप्त कर लिया है जिससे आकर्षित होकर ग्राहक बहुत अधिक तादाद में उस से चीज खरीदने आते हैं। अमेरिका को एक प्रसिद्ध धन कुबेर का कथन है कि ‘हमारे कारोबार ने इतनी उन्नति, खरे व्यवहार के कारण की है। हमने खराब माल देकर और अधिक कीमत वसूल कर के आज तक किसी ग्राहक को नाराज नहीं किया।’ एक दूसरे पर कारखाने दार का कहना है कि ‘कम मुनाफा अच्छा माल और सद्व्यवहार ही वह गुप्त सिद्धान्त है जिन्हें अपना कर हमारा छोटा सा कारखाना इतना बड़ा हो गया है।’ बाजार का विश्वास, जिसके बल पर माल उधार मिल जाता है क्या बिना ईमानदारी के प्राप्त हो सकता है? थोड़े समय में अधिक लाभ की हविस से बेईमानी का व्यवहार करने वाला उस मूर्ख का भाई है जिसने एक साथ मालामाल हो जाने के लोभ में रोज एक सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट चीर डाला था।

आप कोई कारोबार कर रहे हैं जिसमें ग्राहकों को धोखा देना पड़ता है, आप कोई ऐसी नौकरी कर रहे हैं जिसमें ग्राहकों को ठगने में अपना तन, मन लगाना पड़ता है तो आप आज ही उस काम को छोड़ दीजिए। यदि आत्मा की आवाज को कुचल कर ही आप रोटी कमाते हैं तो भूखों मर जाइये। आत्मा का माँस काट काट कर शरीर को खिलावेंगे तो वह भूखों मर जाने से महंगा पड़ेगा। रेशमी कपड़े मत पहनिये गाढ़े का टुकड़ा लपेट लीजिए, षटरस भोजन मत कीजिए रूखी रोटी खाकर पानी पीजिए; आलीशान कोठी में मत रहिए एक झोंपड़ी में गुजर कर लीजिए; पर अधर्म का पैसा मत लीजिए। सत्कर्म में भी यदि उतना ही श्रम किया जाए तो कुछ ज्यादा नुकसान न रहेगा पर यदि नुकसान रहे तो भी बिल्कुल मुक्त मिलने वाले बेईमानी के पैसे से वह लाख दर्जे अच्छा है।

क्या आप धनवानों जैसी अशान्ति जिन्दगी-मय जिन्दगी जीना पसंद करते हैं? क्या आपको अधर्मोपार्जित धन लेकर ऐश आराम करने की इच्छा है? यदि हाँ, तो मैं कहता हूँ आप भारी धोखे में हैं, यह अनुभव बड़ा महँगा पड़ेगा जिस प्रकार सोने की छुरी से भी आप अपना हाथ कटवाना पसंद नहीं करते उसी प्रकार उसे चाँदी के टुकड़ों को जो जिन्दगी का सारा मजा लूट लें, लेना पसंद न करना चाहिए। आप ईमानदार रहिये, अपने चरित्र की रक्षा कीजिए, लालच के वशीभूत होकर कुमार्ग में पैर मत दीजिए। ईमानदारी की सुदृढ़ शिला पर खड़े होकर लौह पुरुष की भांति निश्चिंत मन से यही विचार करते रहिए मुझे सच्चा आनन्द प्राप्त करना है, मुझे आत्मा और पर-आत्मा के सामने जवाब देना है, ऐसी भावना के साथ साथ आपकी आत्मा में एक दिव्य प्रकाश प्रादुर्भूत होगा, जिसके नीचे बैठकर आप अपने अन्दर छिपे हुए देवत्व की झाँकी कर सकेंगे और परम संतोष तथा शान्ति उपलब्ध कर सकेंगे।

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Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
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February 1940
Type: TEXT
Language: HINDI
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