सर्वोत्तम तीर्थ
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(ले.-श्री तुलसीराम शर्मा, हाथरस) (महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 108 से) युधिष्ठिर उवाच- यद्वरं सर्वतीर्थानाँ तन्मेब्रूहि पितामह।
यत्रचैवपरं शौचं तन्मेव्याख्यातु मर्हसि॥1॥ युधिष्ठिर ने पूछा- हे पितामह! जो तीर्थ सब से उत्तम हो और जहाँ परम पवित्रता प्राप्त हो सके उसका मुझसे वर्णन कीजिए। भीष्म उवाच- सर्वाणिखलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणः।
यत्तुतीर्थं च शौचं च तन्मे श्रृणुसमाहितः॥ 2॥ विद्वान पुरुषों को सब तीर्थ गुण देते हैं। परन्तु इनमें भी जो तीर्थ अधिक पवित्र करने वाला है उसको तू सावधान होकर सुन। अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिह्रदे।
स्नातव्यं मानसेतीर्थे सत्त्वमालंव्य शाश्वतम्॥3॥ निरन्तर रहने वाले सत्य का सहारा लेकर अगाध, निर्मल शुद्ध, सत्य रूपी जल से भरे हुए धैर्य रूप झरने वाले मानस तीर्थ में स्नान करना चाहिए। तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम्।
अहिंसा सर्वभूतानामानृंशंस्यं दमः शमः ॥ 4॥ अयाचकता (माँगने की आदत न होना) सरलता, (मन, वाणी शरीर का एक व्यवहार) सत्य बोलना, कोमलता, हिंसा न करना, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह) और शम (मन की शान्ति) ये पवित्र करने वाले तीर्थ हैं। निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुँजते॥ 5॥ ममता और अहंकार से रहित, सुख दुख मान अपमान हानि लाभ में एक, परिग्रह (संग्रह) रहित तथा भिक्षावृत्ति से आजीविका करने वाले पुरुष पवित्र और तीर्थ रूप माने जाते हैं। तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते।
शौचलक्षणमेतत्ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः॥ 6॥ तत्त्ववेत्ता और अहंकार रहित पुरुष उत्तम तीर्थ कहलाते हैं तीर्थ का अवलोकन करने वाले तुझसे यह तीर्थ का लक्षण कहा। रजस्तमःसत्वमथो येषाँ निर्धोतमात्मनः।
शौचाशौचसमायुक्ताः स्वकार्यपरिमागिणः॥ 7॥ जिनका मन सत्व, रज और तम से रहित है अतएव जो बाहरी पवित्रता और अपवित्रता से संयुक्त रहते हैं अर्थात् बाहरी पवित्रता और अपवित्रता पर ध्यान नहीं देते हैं अपने ब्रह्मविचार रूपी कार्य का विचार किया करते हैं। सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः।
शौचेन वृत्त्शौचार्थास्ते तीर्थाः शुचयश्चे ये॥ 8॥ सब प्रकार का त्याग करने में प्रसन्न रहते हैं सर्वज्ञ होते हैं सम दृष्टि रखते हैं शुद्ध आचरण और शुद्ध रहते हैं वे पुरुष तीर्थरूप कहलाते हैं। नोदक क्लिन्न गात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नातःस बाह्मम्भ्यन्तरः शुचिः॥ 9॥ जिसका गात्र जल से भीगा है उसने वास्तविक स्नान नहीं किया है जिसने दम से (इन्द्रियनिग्रह से) स्नान किया है उसको बाहर भीतर से स्नान किया हुआ जानो। अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः।
शौचमेव परं तेषाँयेषाँ नोत्पद्यते स्पृहा॥ 10॥ जो पुरुष विगत कार्यों की अपेक्षा नहीं रखते हैं और जो अपने पास के पदार्थों पर ममता नहीं रखते हैं, तथा जो इच्छा रहित हैं उन्होंने ही उत्तम तीर्थों में स्नान किया है। वृत्तशौचं मनःशौचं तीर्थशौचमतः परम्।
ज्ञानोत्पन्न च यत्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम्॥ 11॥ सदाचार शुद्धि, मन की शुद्धि तथा तीर्थ शुद्धि इस प्रकार तीन प्रकार की शुद्धि कही हैं इनमें ज्ञान से जो शुद्धि होती है उसको उत्तम शुद्धि समझना चाहिए।
यत्रचैवपरं शौचं तन्मेव्याख्यातु मर्हसि॥1॥ युधिष्ठिर ने पूछा- हे पितामह! जो तीर्थ सब से उत्तम हो और जहाँ परम पवित्रता प्राप्त हो सके उसका मुझसे वर्णन कीजिए। भीष्म उवाच- सर्वाणिखलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणः।
यत्तुतीर्थं च शौचं च तन्मे श्रृणुसमाहितः॥ 2॥ विद्वान पुरुषों को सब तीर्थ गुण देते हैं। परन्तु इनमें भी जो तीर्थ अधिक पवित्र करने वाला है उसको तू सावधान होकर सुन। अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिह्रदे।
स्नातव्यं मानसेतीर्थे सत्त्वमालंव्य शाश्वतम्॥3॥ निरन्तर रहने वाले सत्य का सहारा लेकर अगाध, निर्मल शुद्ध, सत्य रूपी जल से भरे हुए धैर्य रूप झरने वाले मानस तीर्थ में स्नान करना चाहिए। तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम्।
अहिंसा सर्वभूतानामानृंशंस्यं दमः शमः ॥ 4॥ अयाचकता (माँगने की आदत न होना) सरलता, (मन, वाणी शरीर का एक व्यवहार) सत्य बोलना, कोमलता, हिंसा न करना, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह) और शम (मन की शान्ति) ये पवित्र करने वाले तीर्थ हैं। निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुँजते॥ 5॥ ममता और अहंकार से रहित, सुख दुख मान अपमान हानि लाभ में एक, परिग्रह (संग्रह) रहित तथा भिक्षावृत्ति से आजीविका करने वाले पुरुष पवित्र और तीर्थ रूप माने जाते हैं। तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते।
शौचलक्षणमेतत्ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः॥ 6॥ तत्त्ववेत्ता और अहंकार रहित पुरुष उत्तम तीर्थ कहलाते हैं तीर्थ का अवलोकन करने वाले तुझसे यह तीर्थ का लक्षण कहा। रजस्तमःसत्वमथो येषाँ निर्धोतमात्मनः।
शौचाशौचसमायुक्ताः स्वकार्यपरिमागिणः॥ 7॥ जिनका मन सत्व, रज और तम से रहित है अतएव जो बाहरी पवित्रता और अपवित्रता से संयुक्त रहते हैं अर्थात् बाहरी पवित्रता और अपवित्रता पर ध्यान नहीं देते हैं अपने ब्रह्मविचार रूपी कार्य का विचार किया करते हैं। सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः।
शौचेन वृत्त्शौचार्थास्ते तीर्थाः शुचयश्चे ये॥ 8॥ सब प्रकार का त्याग करने में प्रसन्न रहते हैं सर्वज्ञ होते हैं सम दृष्टि रखते हैं शुद्ध आचरण और शुद्ध रहते हैं वे पुरुष तीर्थरूप कहलाते हैं। नोदक क्लिन्न गात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नातःस बाह्मम्भ्यन्तरः शुचिः॥ 9॥ जिसका गात्र जल से भीगा है उसने वास्तविक स्नान नहीं किया है जिसने दम से (इन्द्रियनिग्रह से) स्नान किया है उसको बाहर भीतर से स्नान किया हुआ जानो। अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः।
शौचमेव परं तेषाँयेषाँ नोत्पद्यते स्पृहा॥ 10॥ जो पुरुष विगत कार्यों की अपेक्षा नहीं रखते हैं और जो अपने पास के पदार्थों पर ममता नहीं रखते हैं, तथा जो इच्छा रहित हैं उन्होंने ही उत्तम तीर्थों में स्नान किया है। वृत्तशौचं मनःशौचं तीर्थशौचमतः परम्।
ज्ञानोत्पन्न च यत्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम्॥ 11॥ सदाचार शुद्धि, मन की शुद्धि तथा तीर्थ शुद्धि इस प्रकार तीन प्रकार की शुद्धि कही हैं इनमें ज्ञान से जो शुद्धि होती है उसको उत्तम शुद्धि समझना चाहिए।

