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Magazine - Year 1940 - February 1940

Media: TEXT
Language: HINDI
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क्रोध या भयंकर विषधर?

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(ले.-डा. पूनमचन्द्र खत्री, बीकानेर)

क्रोध एक प्रकार का मानसिक रोग है। जिस प्रकार जल अग्नि आदि से मिश्रित वायु की उत्तेजना पाकर मृगी के दौरे आ जाते हैं उसी प्रकार जरा सी भी प्रतिकूल परिस्थिति सामने आते ही क्रोध का दौरा आ जाता है। खाँसी की बीमारी जिसे हो उसके समीप सूखी तम्बाकू का चूरा उड़ा दिया जाय तो बेचारे का बुरा हाल हो जायगा। यदि यह चीजें न उड़ाई जातीं तो सम्भव था कि कुछ देर खाँसी का बीमार चैन से बैठा रहता, पर परिस्थिति अनुकूल पाते ही दौरा अवश्य हो जाता।

जिन लोगों को बार बार असफलता मिलती है, बार-बार अपमान सहना पड़ता है और बार बार मनोवांछाएं अधूरी छोड़नी पड़ती हैं उनके गुप्त मन में एक प्रकार का आघात पहुँचता है और एक प्रकार का मानसिक जख्म हो जाता है। इस आघात की चोट मस्तिष्क की श्वेत बालुका पर पहुँचती है और उनमें एक विशेष तरह की गर्मी पैदा हो जाती है। जिस प्रकार बिजली बहाने वाले तार जब आपस में लड़ जाते हैं तो एक सनसनाहट पैदा हो जाती है और चिनगारियाँ सी उड़ने लगती हैं उसी प्रकार मस्तिष्क की वह उष्ण श्वेत बालुका जरा सी बाहरी कारण मिलते ही झनझना जाती है और शरीर के ज्ञान जंतु उत्तेजित हो उठते हैं। यह उत्तेजना रक्त के दौरे को अत्यन्त तीव्र करती हुई इतनी बढ़ जाती है कि मस्तिष्क के शासन सूत्र अपना कार्य भार संभाले रहने में असमर्थ हो जाते हैं। राजा की गरदन पर एक साथ दस दस सिपाही चढ़ बैठें तो वह उस वक्त कुछ नहीं कर सकता उसे झुकना ही पड़ता है। यही दशा मस्तिष्क की हो जाती है। रक्त की गति और गर्मी की असाधारण वृद्धि के कारण मन के हाथ पाँव फूल जाते हैं, और शरीर जो चाहता है करता रहता है।

क्रोध की दशा में लोग असभ्य गाली बकना, मारपीट करना और कभी कभी तो हत्या जैसे कुकर्म कर डालते हैं। कहते हैं कि क्रोध में आदमी अंधा हो जाता है। गीता कहती है ‘क्रोधात् भवति संमोह, संमोहात् स्मृति विश्राम स्मृति भ्रंशाद्बुद्धिनाशो, बुद्धि नाशात् प्रणाष्यति”॥ अर्थात् क्रोध से क्रमशः संमोह, स्मृति विश्राम, बुद्धिनाश और सर्वनाश होते हैं। क्रोध में किये हुए अनुचित कार्यों के लिए पीछे पछताते और शर्मिंदा होते हैं। बुद्धिमान लोग क्रोध में कहे हुए वाक्यों को यह समझ कर क्षमा कर देते हैं कि उस समय उसका शरीर काबू से बाहर था। जैसे सन्निपात ग्रस्त रोगी यदि कोई अनुचित बात कह देता है या अनुचित कार्य कर बैठता है तो उस पर ध्यान नहीं दिया जाता वैसे ही विचारशील लोग क्रोध में कहे गये वाक्यों को भी समझते हैं।

दुर्बल और अशक्त, अविवेकी और हीनता की भावना रखने वाले लोगों को गुस्सा जल्दी आता है। क्रोध जब तक दूसरे पर ही आता है तब तक वह उग्र नहीं होता। उसका विकट रूप तब होता है जब अपने ऊपर गुस्सा भी उसमें शामिल होता है। बच्चों पर या अपने से कमजोर आदमी पर जो गुस्सा आता है वह हलका होता है क्योंकि मन यह महसूस करता है कि इसे अभी मजा चखा सकता हूँ लेकिन जब आदमी यह महसूस करता है कि मेरी शक्ति इतनी नहीं है कि इससे बात की बात में बदला ले सकूँ तब उसे अपने ऊपर भी क्रोध आता है। अपने ऊपर और दूसरों के ऊपर किया हुआ क्रोध जब एकत्रित होता है तो एक-एक मिलकर ग्यारह का काम देते हैं। अपने ऊपर क्रोध आने वाली बात अत्यंत सूक्ष्म है यह इतने गुप्त प्रकार से होती है कि क्रोधी स्वयं भी उसको जान नहीं पाते। क्रोध का ही दूसरा पहलू कायरता है। स्वाभिमान पर चोट पड़ने से गुप्त मन पर जो प्रतिक्रिया होती है उसमें दोनों बातें हो सकती हैं या तो वह भड़क उठे या दब जाय। यह भड़क उठने की प्रतिक्रिया हुई तब तो कोधा का विकार उत्पन्न हो जाता है। यदि दबने की प्रतिक्रिया हुई तो कायरता, पस्त हिम्मती और निराशा आ जाती है। क्रोध चूँकि गरम चीज है इसलिए लोगों को अधिक दिखाई पड़ती है परंतु कायरता ठंडी होती है इसलिए उसके शिकार हुए असंख्य लोगों का पता किसी को नहीं लग पाता। अपने ऊपर ज्यादती होने पर क्रोध आवे ऐसे लोगों की अपेक्षा ऐसे लोग आपको अधिक मिलेंगे जो उस ज्यादती से डर जायँ और उलटी खुशामद कर के जान की खैर मनावें। इस स्थल पर कायरता वाले पहलू पर प्रकाश न डाल कर क्रोध के बारे में ही पाठकों को कुछ बताना था इसलिए उसी का उल्लेख किया जाता है।

क्रोध का मानसिक रोग किसी कठिन शारीरिक रोग से कम नहीं है। दमा, यकृत-वृद्धि, गठिया आदि रोग जिस प्रकार आदमी को घुला घुला कर मार डालते हैं उसी प्रकार क्रोध का कार्य होता है। कुछ ही दिनों में क्रोधी के रक्त में कई प्रकार के विष उत्पन्न हो जाते हैं जिनकी तीक्ष्णता से धड़ के भीतरी अवयव गलने लगते हैं। गुस्से के समय खून में एक प्रकार की विषैली शकर बहुत बढ़ जाती है। न्यूयार्क के वैज्ञानिकों ने परीक्षण करने के लिए गुस्से में भरे हुए मनुष्य का कुछ बूँद खून लेकर पिचकारी द्वारा खरगोश के शरीर में पहुँचाया। नतीजा यह हुआ कि बाईस मिनट के बाद खरगोश आदमियों को काट के दौड़ने लगा, पैंतीसवें मिनट पर उसने अपने को काटना शुरू कर दिया और एक घंटे के अन्दर पैर पटक पटक कर मर गया। यह विषैली शकर खून को बहुत अशुद्ध कर देती है अशुद्धता के कारण चेहरा और सारा शरीर पीला पड़ जाता है, पाचन शक्ति बिगड़ जाती है। दिल की धड़कन बढ़ जाती है, नसें खिंचती हैं, एवं गर्मी, खुश्की का प्रकोप रहने लगता है। सिर का भारीपन, आँखों तले अंधेरा छाना, कमर में दर्द, जरा सा काम करते ही हांफने लगना, पेशाब पीला होना, यह क्रोध जन्य उपद्रव हैं। अन्य अनेक प्रकार की व्याधियाँ उसके पीछे पड़ जाती हैं। एक अच्छी होती है तो दूसरी उठ खड़ी होती है और दिन-दिन क्षीण होकर मनुष्य अल्पकाल में ही काल के गाल में चला जाता है।

डॉक्टर अरोली और केनन के अनेक परीक्षणों के बाद यह घोषित कर दिया गया है कि क्रोध के कारण अनिवार्यतः उत्पन्न होने वाली रक्त की विषैली शर्करा हाजमा बिगाड़ने के लिए सब से अधिक भयानक है। आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी के स्वास्थ्य निरीक्षक डॉ0 हेमनवर्ड ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि “इस वर्ष परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों में अधिकाँश चिड़चिड़े मिज़ाज के थे।” पागलखानों की रिपोर्ट बताती है कि “क्रोध से उत्पन्न होने वाले मस्तिष्क रोगों ने अनेकों को पागल बना दिया। डॉक्टर जे0 एस्टर का कथन है कि “पन्द्रह मिनट क्रोध करने इसमें शरीर की इतनी शक्ति खर्च हो जाती है जितनी से आदमी साढ़े नौ घण्टे परिश्रम कर सकता है। बाइबिल कहती है ‘‘क्रोध को लेकर सोना अपनी बगल में जहरीले सांप को लेकर सोना है।’’ सचमुच क्रोध की भयंकरता सब दृष्टियों से बहुत अधिक है।

इस महाव्याधि का शरीर और मन पर जो दूषित असर होता है वह जीवन को पूरी तरह असफल बना देता है। अशान्ति, आशंका और आवेश उसे घेरे रहते हैं। पास पड़ोसियों की दृष्टि में वह घृणा का पात्र बन जाता है। गृह कलह छिड़ा रहता है। काम काज और रोजगार में ग्राहक असन्तुष्ट रहते हैं और यदि कही नौकर है तो मालिक अप्रसन्न होता है। एक दिन ऐसी परिस्थिति हो जाती है कि सर्वत्र उसे हानि और असफलता का ही सामना करना पड़ता है एवं जीवन भार प्रतीत होता है। प्रसिद्ध दार्शनिक सेनाका कहते हैं- ‘‘क्रोध शराब की तरह मनुष्य को विचार शून्य तथा दुर्बल एवं लकवे की तरह शक्तिहीन कर देता है। दुर्भाग्य की तरह जिसके पीछे यह पड़ता है उसका सर्वनाश करके ही छोड़ता है।’’

क्रोध की महाव्याधि यदि पीछे पड़ गई है तो उससे छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिए यह कैसे मिल सकता है यह जानने के लिए पाठक अगले अंक की प्रतीक्षा करें।

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Type: SCAN
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February 1940
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