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Magazine - Year 1940 - February 1940

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स्मरण शक्ति और उसका विकास

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(ले. श्री गिरराज किशोर जी विशारद, चिरहौली)

विभिन्न प्रकार की मानसिक शक्तियों में स्मरण शक्ति का स्थान बड़ा महत्त्वपूर्ण है। बिना इस शक्ति के जीवन में कोई उन्नति करना तो दूर साधारण दैनिक कार्यक्रम भी नहीं चलाया जा सकता। यदि पिछला सब अनुभव और ज्ञान विस्मरण हो जाय तो मनुष्य नवजात शिशु के समान हो जाय। हमारा महत्व पिछली जानकारी के आधार पर है। जो जितना अधिक जानता ह वह उतना ही बड़ा महापुरुष है। श्रेष्ठ अध्यापक, वकील या डाक्टर वही कहा जा सकता है जिसे अपने विषय का ज्ञान तुरन्त स्मरण हो आवे। अध्यापक अगर अपने पाठ्य विषयों को मस्तिष्क में धारण न किये हुए हो तो उसकी क्या उपयोगिता रहेगी? वकील को यदि कानून की धाराऐं याद नहीं, उनकी मंशा और परिभाषा भूल गया हो तो उसे कौन टके सेर पूछेगा? डाक्टर को यदि रोगों का निदान और चिकित्सा विस्मरण हो गया हो तो उसमें और एक घसहेरे में कोई फर्क नहीं रह जाता। जितने भी व्यापार हैं उन सब में कामयाबी और उन्नति तभी होती है जब उनके संचालक की स्मरण शक्ति ठीक होती है, अवसर आते ही मौके के उपयुक्त बात तुरन्त सूझ आती है।

किसी अवसर के आने पर उसका ठीक हल हम यों ही अचानक नहीं सोच लेते। देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि फल खरीदते समय हम दूकानदार से दो मिनट में सौदा कर लेते हैं पर इस दो मिनट में स्मरण शक्ति द्वारा अनेक सूक्ष्म कार्य हो जाते हैं। फल अच्छे हैं या खराब? कल ऐसे फल किस भाव लिये थे? आज बाजार में यह फल मँहगे हैं या सस्ते? हमारे लिए कितने फल पर्याप्त होंगे? इन बातों के सम्बन्ध में अब से कुछ पूर्व समय से लेकर कई दिन और पिछले बहुत समय का स्मरण हो आता है। उस दिन फटे हुए फलों का गूदा बहुत सड़ा निकलता था। परसों आठ आना सेर अंगूर खरीदा था, पिछले दशहरे को तरबूज की बिक्री अधिक थी और वह मँहगा था। पिछले हफते दो सेर सेब ले गया था उनसे ठीक काम चल गया था, आदि पिछली बातें एक क्षण भर में मस्तिष्क में घूम जाती हैं और आज की परिस्थिति, अपनी आवश्यकता आदि का अनुभव होता है। इन दो मिनटों की सूक्ष्म क्रियाओं का यदि विशेषण किया जाय तो पता लगेगा कि कम से कम पचास बातें इस सम्बन्ध की मस्तिष्क न सोची तब सौदा पक्का किया। यदि स्मरण शक्ति न होती या कम होती तो निश्चय ही खराब और मँहगे फल लेने पड़ते। हिसाब लगाने की विधि ठीक याद न आती तो सब नौ आने के जगह सवा तेरह आने दे आते। तात्पर्य यह है कि बुद्धि की कुशाग्रता, स्मरण शक्ति के तीक्ष्ण होने पर निर्भर करती है। और बुद्धि की कुशाग्रता ही मनुष्य के स्थान को ऊँचा बढ़ाने वाली है यदि यह न होती तो पापी पुण्यात्मा का भेद ही न रहता। सब धान बाईस पसेरी हो जाते और सब भेड़े एक ही लाठी से हाँकी जाती।

यो तो कुछ न कुछ स्मरण शक्ति मनुष्य मात्र में है पर किसी में उसकी अधिकता और किसी में न्यूनता पाई जाती है। प्रथम श्रेणी में पास होने वाले और हर साल फेल होते जाने वाले छात्रों में यह भेद स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पहला छात्र एक बार किताब पढ़ कर ही उसे याद कर लेता है तो दूसरा बार बार पढ़ने पर भी स्मरण नहीं रख पाता। छोटे और बड़े वकीलों में यही भेद होता है। एक को अपने पेशे की सारी बातें अवसर के अनुरूप स्मरण हो आती हैं किन्तु दूसरा बैठा सोचता रहता है कि मुझे क्या करना चाहिए। वह किताबों के पन्ने उलटता है, ढ़ूँढ़ता है पर वह विषय किताब में भी दिखाई नहीं देता। ऐसे लोग अपने आप पर झुँझलाते रहते हैं और अपने दुर्भाग्य पर रोया करते हैं। कई लोगों को अपने अन्दर की यह कमी दिखाई नहीं पड़ती और बहर की परिस्थितियों पर दोष थोपा करते हैं। शनिश्चर की दशा है, मंगल आठवें में हैं, देवता का प्रकोप है, अमुक व्यक्ति मेरे काम में बाधक बनता है, अमुक ने मेरे साथ बेइन्साफी की, आदि शिकायतें करीब- करीब ऐसी ही होती हैं। अपनी कमी को दूसरों पर लादने और झूठा आत्म सन्तोष करने के लिए ऐसे ही वाक्य गढ़े जाते हैं।

स्मरण शक्ति की कमी एक मानसिक बीमारी है। जिस प्रकार आँख से धुँधला दिखाई देना एक रोग है उसी प्रकार पिछली बातों की याद न उठना भी है। प्रतिदिन जो कुछ ज्ञान होता है उसकी रेखायें मस्तिष्क पटल पर अंकित होती रहती हैं। अनेक विषयों की ऐसी असंख्य रेखायें प्रतिदिन खिंचती चली जाती हैं। यहाँ यह आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि इतनी अगणित रेखाऐं कहाँ तक होती जाती होंगी और जब सारा पटल भर जाता होगा तो कहाँ जाती होगी। इस प्रश्र का विस्तृत उत्तर देने के लिए मस्तिष्क रचना और उसकी कार्य शक्ति पर प्रकाश डालने के लिए फिर किसी दिन पाठकों के समक्ष उपस्थित होंगे। लेख के कलेवर का ध्यान रखते हुए यहाँ इतना ही कह देना पर्याप्त होगा कि मस्तिष्क में असंख्य सूक्ष्म परमाणु हैं और उनमें से प्रत्येक पर असंख्य रेखाऐं अंकित हो सकती हैं। जिनके मस्तिष्क के कोष अधिक सजीव और चैतन्य होते हैं उनकी रेखाऐं अधिक स्पष्ट और गहरी होती हैं। भरी मोटे और शुष्क कोषों पर यह रेखाऐं उथली और अस्पष्ट अंकित होती हैं। गीली मिट्टी पर एक लकीर खींच दी जाय तो वह वैसी ही बनी रहेगी किन्तु गुदगुदी रबड़ पर खींची जाय तो कुछ ही देर में दबी हुई रबर फिर ऊपर उभर आवेगी और रेखा को बहुत धुँधली कर देगी। यहाँ यह कह देना भी आवश्यक है कि ये रेखाऐं किसी के भी मस्तिष्क में पूरे तौर से नहीं मिटती। वे धुँधली होकर अचेतन अवस्था में पड़ी रहती हैं और जब तक उनके जगाने में अत्यन्त परिश्रम न किया जाय तब तक प्रायः उसी गुप्त दशा में पड़ी रहती हैं। मन की इच्छानुसार मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु झंकृत होकर उस विषय की रेखाओं के पास चेतना ले जाते हैं और उन रेखाओं को उत्तेजित करके कार्यशील बनाते हैं। पर यदि यह ज्ञानतन्तु निर्बल या रोगी हुए तो अपना कार्य पूरा करने में असफल रहते हैं, फलस्वरूप चेतना निश्चित स्थान तक नहीं पहुँचती और काम अधूरा ही छूट जाता है। ग्रामोफोन पर चढ़े हुए अच्छे रिकार्ड को भी टूटी सुई ठीक नहीं बजा सकती उसी प्रकार अच्छी रेखाओं को भी मस्तिष्क के निर्बल ज्ञान तन्तु ठीक प्रकार कार्यशील नहीं बना पाते।

मोटे तौर पर यह जान लेना कठिन है कि मस्तिष्क किस सूक्ष्म क्रिया में कितनी खराबी पैदा हो गई है। यह काम तो लाखों रुपयों में मिलने वाले वैज्ञानिक यन्त्रों या अत्यन्त उच्च कोटि की दिव्य दृष्टि से ही जानी जा सकती है। पेट के किस भाग में क्या और कितनी खराबी है, यह बात हम लोग नहीं जान सकते, पर इतना स्वयं सत्य ज्ञान सबकों प्राप्त है कि कड़ी भूख लगने पर सुपाच्य पदार्थ भली भाँति चबाकर खाने से पेट ठीक रहता है और छोटी मोटी बीमारियाँ स्वयं चली जाती हैं। पेट में कुछ भी गड़बड़ हो गरम पानी की बोतल फेरना या मिट्टी की पुल्टस बाँधना लाभकर सिद्ध होगा। वहाँ पाठकों को किसी मस्तिष्क सम्बन्धी गहन अनुसंंधान के लिएस नहीं घसीटा जा रहा है वरन् कुछ ऐसे सुलभ उपाय सम्मुख रखे जा रहे हैं जो स्मरण शक्ति को बढ़ाने के लिए लाभप्रद साबित हो चुके हैं। इन क्रियाओं द्वारा मस्तिष्क के सूक्ष्म कण और ज्ञान तन्तु दोनों की ही कसरत होती है और जिस भाग में भी खराबी होती है ठीक हो जाती है। सर्वांगासन का अभ्यास करने वाला यदि यह न जान सके कि मेरी आतें खराब थी या आमाशय, तो कोई हर्ज नहीं। उस आसन के करने से पेट की सारी तकलीफें जब दूर हो जाती हैं तब वह यही कहता है मुझे आम खाने है, पेड़ गिनने से क्या मतलब। हमारे अनुभूत उपाय ऐसे ही आम खिलाने के साधन हैं। रूकी हुई नाली में बाँस डालकर सफाई करा देना काम चलाने के लिए काफी है, उसमें मिट्टी जमा हो गई थी या तिनके? इसकी विवेचना के लिए अवकाश न हो तो न सही।

अभ्यास नं. १

ताशों के उपयोग से स्मरण शक्ति बढ़ाने का अभ्यास किया जा सकता है। पहले दिन बूँदों वाले एक ही रंग के पाँच ताश लीजिए। और पाँच बार यह देख लीजिए कि वे कौन कौन से हैं। अब उनमें से बिना देखे एक उलट कर नीचे रख दीजिए। फिर देखिये कि कौन सा ताश नहीं है। यदि ठीक बता सकें तो फिर दूसरे पाँच ताश लीजिए और उन्हें चार बार देखिये, एक को बिना देखे उलट कर रख दीजिए अब देखिये कि जा ताश निकाल दिया गया है से ठीक बता सकते हैं या नहीं। ठीक बता दिया हो तो फिर अन्य और पाँच लेकर तीन बार ही देखिये। इसके बाद और लेकर दो बार, तदुपरान्त एक बार देखकर छिपाया हुआ ताश बताने का अभ्यास कीजिये। जितनी कम बार देखने पर आम भूलते हो, उसी संख्या पर ठहर कर अभ्यास बढ़ाईये। जैसे आप दो बार पाँच ताशों को देखकर छिपे हुए एक पत्ते को बताने में भूल करते हैं और तीन बार देख कर ठीक बता देते हैं तो दो बार का क्रम ही जारी रखिये। जब दो बार का अभ्यास ठीक हो जाय तो एक बार का अभ्यास आरंभ कीजिए। पाँच ताशों को एक बार देखकर छिपा हुआ पत्ता बता देने का अभ्यास पूरा हो जाय तो छै ताश लेकर एक बार देखने का क्रम चलाइये। फिर सात, फिर आठ, फिर नौ। इसी प्रकार पूरे बावन पत्तों तक का अभ्यास ले जाने की कोशिश करते रहिए।

इस क्रिया द्वारा मस्तिष्क के सूक्ष्म कणों और ज्ञान तन्तुओं पर काफी जोर पड़ता है और उनका अच्छा व्यायाम होता है। खेल मनोरंजक है और कोई परीक्षक साथी न हो तो अकेले भी हो सकता है। आरम्भ में आधा घंटा समय इसके लिए काफी है। मस्तिष्क निर्बल हो तो कम समय ही करना चाहिए। अन्त में एक घंटे तक अभ्यास करना पर्याप्त है। बीच- बीच में थकावट आने पर ठहरा जा सकता है। आरम्भ में ही अधिक समय तक अभ्यास करना ठीक नहीं क्योंकि बहुत अधिक कसरत कराने पर मस्तिष्क बहुत थक जाता है और शिर में दर्द होने लगता है।

(अन्य अभ्यास क्रमशः दिये जायेंगे)

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