अखण्ड ज्योति परिवार
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तात तुम्हारा अन्तर चूमूँ, हृदय लगाऊँ आओ।
मेरी पीड़ा उमड़ी, तुम भी चुल्लू भर पी जाओ।। पाठक आओ। आज हृदय खोलकर अपनी कुछ कह सुन लें। हमारा आपका सम्बन्ध मामूली दुकानदार और बाजारी ग्राहक का नहीं। हम कागज छाप कर बेचने वाले और आप वक्त काटने के लिए अखबार मोंल लेने वाले नहीं है। हम आप एक महान पथ के पथिक के रूप में अपना सम्बन्ध स्थापित करते हैं। अखण्ड ज्योति हम लोगों के विचारों, अनुभवों और जिज्ञासाओं को एक दूसरे के पास पहुँचाने वाली सन्देश वाहिका सेविका है। हम लोग अपनी एक छोटी दुनियाँ अलग बसाते हैं, हम आना एक परिवार अलग कायम करते हैं। हो सकता है कि आप सेठ, साहूकार, राजा, धनी, विद्वान, बलवान, शक्तिशाली, अधिकारी, उच्च पद प्राप्त, सौभाग्यशाली अथवा दीन, दरिद्र, अशिक्षित, रोगी, निर्बल, दुखी, शक्तिहीन, पीड़ित, चिन्तित और साधन हीन हों। पुरुष अथवा स्त्री, बालक अथवा बालिका का रूप धारण किये हों, पर यह सब भेद भाव बाहरी है। यह सब बाहरी आवरण मात्र हैं। मान लीजिए कि सब प्रकार की बाहरी स्थितियाँ एक प्रकार के कपड़े हैं। क्षण भर के लिए अपने इन सब कपड़ों को उतार कर बाहर रख दीजिए और बिल्कुल नंगे होकर मेरी कुटी में चले आइये। अब हम सब एक समान हैं। न तो हममें से कोई राजा है और न रंक, न कोई विद्वान है न कोई अशिक्षित, न कोई सशक्त है न कोई रोगी, स्त्री पुरुष का भेद और आयु का भेद भी हम लोगों के बीच नहीं है। सब उस एक अखण्ड अमर और आदि अन्त रहित, सच्चिदानन्द महान तत्व के अंश हैं, जिसे राम, रहीम या चाहे जिस नाम से पुकारा जा सकता है। ‘‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’’ हम शरीर धारी जीव मनुष्य उसी महासूर्य की किरणें हैं, उसी एक अखण्ड ज्योति की प्रकाश रश्मियाँ हैं। हम सब केवल भाई, सहोदर, साथी और मित्र ही नहीं वरन् इससे भी कुछ अधिक हैं। सूर्य की एक किरण से दूसरी का जो सम्बन्ध है, रूपये की एक पीठ से दूसरी का जो सम्बन्ध है, शरीर के एक अंग से दूसरे का जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध हम लोगों के बीच में हैं। दो बर्तनों में भरे हुए वायु के अंश, क्या एक दूसरे से अलग हैं? क्या उनके बीच कोई अलग सम्बन्ध स्थापित करने की जरूरत पड़ेगी? नहीं, वह एक ही हैं। स्थूल बुद्धि से अलग दिखाई देते हैं पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। आप हमसे बहुत दूर स्थान पर बैठे हुए हैं, हमसे भिन्न स्थिति में हैं परन्तु हम आप एक हैं, आत्मीय हैं, अभिन्न हैं। इस पृथ्वी के विकास और विनाश में असंख्य युग लगेंगे ऐसी असंख्य असंख्य पृथ्वियों का विकास विनाश हुआ और होने वाला हैं। अब जरा लम्बी दृष्टि पसार का भूत और भविष्य के जीवन काल को देखिए। उसमें इतने युगों का समय निहित है जिसकी गणना ही यदि जीवन भर की जाय तो हो नहीं सकती। फिर हम आदि अंत हीन जीवों के इस छोटे जीवन का समय तो उसे देखते हुए इतना है जितना समस्त पृथ्वी के मुकाबले में धूलि का नन्हा सा परमाणु। इतने छोटे जीवन की परिस्थिति भिन्नता के कारण ही क्या हम एक दूसरे से अलग हो सकते हैं? नहीं। हम सब एक हैं। जीवन के चंचल और क्षण भंगुर आवरण हमारे आपके बीच में किसी प्रकार की खाई पैदा नहीं कर सकते। इसलिए हे अभिन्न, हम आप आपस में पूर्ण एैक्य का अनुभव करते हुए एक नई दुनियाँ बसाते हैं, एक नया परिवार बनाते हैं। नई दुनियाँ क्यों? नया परिवार क्यों? जब हम सब सनातन और शाश्वत है तो नयापन क्यों? यह प्रश्न स्वाभाविक हैं, परन्तु जरा गंभीरता से विचार करने पर इनका समाधान हो जाता है। नयापन तब आता है या लाया जाता है जब प्राचीनता में कुछ दोष आ जाता है। निर्दोष प्राचीनता में कोई नवीनता लाई ही नहीं जा सकती। आज हमारी प्राचीनता कुछ सदोष हो गई है। हम लोग जिस स्थिति में है वह दुखदायी हो गई है। हमारी आत्मा आनन्दमय है, स्वभावतः हमें आनन्द मिलना चाहिए। आनन्द के लिए हमारा जन्म हुआ है, हमारे चारों ओर आनन्द का महा समुद्र लहलहा रहा है, परन्तु सदोष प्राचीनता के आवरण ने मुँह पर ऐसी पट्टी बाँध दी है कि सामने रखे हुए अमृत को चख नहीं पाते और भूख के मारे त्राहि- त्राहि चिल्ला रहे हैं। जो घोड़े हमें चढ़ने को मिले थे वे हमारे ऊपर सवार हो गये हैं? नौकरों ने बादशाहत अख्तियार कर ली है। हथियारों ने हमें अपना चौकीदार बना लिया है। मनोविनोद की शतरंज के सिपाही, प्यादे, घोड़े, ऊँट एक फौज बना कर लड़ने के लिए सामने आ खड़े हुए हैं। और हम इन परिस्थितियों को देख कर अज्ञानी बालक की तरह सकपका गये हैं तथा अपने को भेड़ियों के सुपुर्द कर दिया है। फलस्वरुप आनन्द से वंचित हो गये हैं और चारों ओर दुख ही दुख दिखाई पड़ता है। यही प्राचीनता का दोष है। वर्तमान परिस्थितियों ने हमारी दृष्टि ऐसी बहिर्मुखी बना दी है कि अपनापन बिलकुल भूल गये हैं। बिल्ली को देखकर हँसते है और ऊँट को देखकर रो पड़ते हैं। पुत्र, धन, यश प्राप्त हुए तो उछलते हैं, नष्ट हुए तो रोकर घर भर देते हैं। किसी ने कुछ हानि पहुँचाई तो बदले की भावना से हृदय में भट्टी जल उठती है। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, ममता, मद, मत्सर, लोभ रूपी नटों हाथ में पड़कर कठ पुतली की तरह हम नाचा करते हैं और थकान एवं दुख से छटपटा रहे हैं। मान लिया कि आप भाग्यशाली हैं आपके पास जर, जोरू, जमीन है, पर जब सन्तोष नहीं तो आप किस प्रकार अपने को भिखारी से अधिक मानते हैं? सदोष प्राचीनता से हमारा तात्पर्य इसी भूतकाल से लिपटी हुई विकार और अविवेकपूर्ण स्थिति से है। इसी प्रचीनता से छुटकारा पाने के लिए हम नई दुनियाँ, नया परिवार बनाते हैं। अब हम दुखों की कटीली झाड़ियों में भटकते हुए आजिज आ गये हैं, शान्ति के उद्यान में विश्राम करने की इच्छा करते हैं। इस शान्ति मन्दिर की टोह में चलते हुये जो साथी हमें मिल जाते हैं वे ही हमारे परिवारी हैं। अखण्ड ज्योति परिवार उन जिज्ञासु, ज्ञान पिपासु और आनन्द खोजी पथिकों का जखीरा बनना चाहता है। इस जखीरे के सब रास्तागीर, जितना जिससे बन पड़ेगा आनन्द मार्ग, ईश्वर, भक्ति पथ और सदाचार की राह पर चलते हुए सच्चा शान्ति ढ़ूँढ़ने का प्रयत्न करेंगे। सब साथी एक दूसरे को अपना अनुभव बताने और सहयोग देने को तत्पर रहेंगे।तब क्या यह कोई संस्था है? नहीं। विलायती प्रजातन्त्र की नकल करके जिस प्रकार की संस्थायें आजकल बन रही हैं ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ हरगिज उस तरह की कोई संस्था नहीं है। हमारे कुटुम्ब में दस आदमी हैं वे सब एक दूसरे के हित को अपना हित समझते हुये सम्मिलित स्वार्थ होकर रहते हैं, यदि यह कुटुम्ब संस्था है तो अखण्ड ज्योति परिवार भी संस्था हो सकती है।हमें परवाह नहीं कि आपकी उदरपूर्ण कैसे होती है। हमें परवाह नहीं कि आप धनी हैं या निधन। जो कुछ आप हैं रहिये। अधिक धन है तो उसे सत्कर्मों में लगाइये, निर्धन हैं तो परिश्रम करके अधिक कमाइये। हमारी चिंता केवल एक है वह यह कि आप अनन्त आनन्द से वंचित न रहें, आपका हृदय विकारों की भट्टी न बना रहे। धन, दौलत, जमीन, जायदाद, पुत्र, स्त्री, सुन्दरता के भण्डार हमारे पास नहीं हैं यह चीजें हम आपको नहीं दे सकते, पर आप चाहें तो उस खजाने को उंगली के इशारे से बता सकते हैं जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। यह खजाना आपके अपने अन्दर हैं। अन्तर्मुख हूजिये, अपने गरेबां में मुँह डालिये, आत्म निरीक्षण कीजिए। एकान्त में बैठकर अपने को सब से अलग एकाकी अनुभव कीजिये और खयाल कीजिए कि शरीर रूपी कपड़े को उतार कर अलग रख दिया है। अब एक कुशल डाक्टर की भाँति अपने सूक्ष्म शरीर का परीक्षण कीजिए, अच्छी तरह तलाश कीजिए कि इसमें कौन- कौन शैतान के दूत छिपे बैठे हैं। उनका रूप भली प्रकार परखिए और सोचिए कि असल में आप हैं क्या? और किस प्रकार क्या बन गये हैं?कुछ समय तक लगातार अन्तर्मुख होने के बाद आप की पीड़ा मेरी तरह उमड़ पड़ेगी तब आप अखण्ड ज्योति परिवार के सच्चे सदस्य होंगे। ऐसे सदस्यों की आत्मा को चूमता हुआ उनके हृदय से लग जाने के लिए मैं व्याकुल हो रहा हूँ।
मेरी पीड़ा उमड़ी, तुम भी चुल्लू भर पी जाओ।। पाठक आओ। आज हृदय खोलकर अपनी कुछ कह सुन लें। हमारा आपका सम्बन्ध मामूली दुकानदार और बाजारी ग्राहक का नहीं। हम कागज छाप कर बेचने वाले और आप वक्त काटने के लिए अखबार मोंल लेने वाले नहीं है। हम आप एक महान पथ के पथिक के रूप में अपना सम्बन्ध स्थापित करते हैं। अखण्ड ज्योति हम लोगों के विचारों, अनुभवों और जिज्ञासाओं को एक दूसरे के पास पहुँचाने वाली सन्देश वाहिका सेविका है। हम लोग अपनी एक छोटी दुनियाँ अलग बसाते हैं, हम आना एक परिवार अलग कायम करते हैं। हो सकता है कि आप सेठ, साहूकार, राजा, धनी, विद्वान, बलवान, शक्तिशाली, अधिकारी, उच्च पद प्राप्त, सौभाग्यशाली अथवा दीन, दरिद्र, अशिक्षित, रोगी, निर्बल, दुखी, शक्तिहीन, पीड़ित, चिन्तित और साधन हीन हों। पुरुष अथवा स्त्री, बालक अथवा बालिका का रूप धारण किये हों, पर यह सब भेद भाव बाहरी है। यह सब बाहरी आवरण मात्र हैं। मान लीजिए कि सब प्रकार की बाहरी स्थितियाँ एक प्रकार के कपड़े हैं। क्षण भर के लिए अपने इन सब कपड़ों को उतार कर बाहर रख दीजिए और बिल्कुल नंगे होकर मेरी कुटी में चले आइये। अब हम सब एक समान हैं। न तो हममें से कोई राजा है और न रंक, न कोई विद्वान है न कोई अशिक्षित, न कोई सशक्त है न कोई रोगी, स्त्री पुरुष का भेद और आयु का भेद भी हम लोगों के बीच नहीं है। सब उस एक अखण्ड अमर और आदि अन्त रहित, सच्चिदानन्द महान तत्व के अंश हैं, जिसे राम, रहीम या चाहे जिस नाम से पुकारा जा सकता है। ‘‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’’ हम शरीर धारी जीव मनुष्य उसी महासूर्य की किरणें हैं, उसी एक अखण्ड ज्योति की प्रकाश रश्मियाँ हैं। हम सब केवल भाई, सहोदर, साथी और मित्र ही नहीं वरन् इससे भी कुछ अधिक हैं। सूर्य की एक किरण से दूसरी का जो सम्बन्ध है, रूपये की एक पीठ से दूसरी का जो सम्बन्ध है, शरीर के एक अंग से दूसरे का जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध हम लोगों के बीच में हैं। दो बर्तनों में भरे हुए वायु के अंश, क्या एक दूसरे से अलग हैं? क्या उनके बीच कोई अलग सम्बन्ध स्थापित करने की जरूरत पड़ेगी? नहीं, वह एक ही हैं। स्थूल बुद्धि से अलग दिखाई देते हैं पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। आप हमसे बहुत दूर स्थान पर बैठे हुए हैं, हमसे भिन्न स्थिति में हैं परन्तु हम आप एक हैं, आत्मीय हैं, अभिन्न हैं। इस पृथ्वी के विकास और विनाश में असंख्य युग लगेंगे ऐसी असंख्य असंख्य पृथ्वियों का विकास विनाश हुआ और होने वाला हैं। अब जरा लम्बी दृष्टि पसार का भूत और भविष्य के जीवन काल को देखिए। उसमें इतने युगों का समय निहित है जिसकी गणना ही यदि जीवन भर की जाय तो हो नहीं सकती। फिर हम आदि अंत हीन जीवों के इस छोटे जीवन का समय तो उसे देखते हुए इतना है जितना समस्त पृथ्वी के मुकाबले में धूलि का नन्हा सा परमाणु। इतने छोटे जीवन की परिस्थिति भिन्नता के कारण ही क्या हम एक दूसरे से अलग हो सकते हैं? नहीं। हम सब एक हैं। जीवन के चंचल और क्षण भंगुर आवरण हमारे आपके बीच में किसी प्रकार की खाई पैदा नहीं कर सकते। इसलिए हे अभिन्न, हम आप आपस में पूर्ण एैक्य का अनुभव करते हुए एक नई दुनियाँ बसाते हैं, एक नया परिवार बनाते हैं। नई दुनियाँ क्यों? नया परिवार क्यों? जब हम सब सनातन और शाश्वत है तो नयापन क्यों? यह प्रश्न स्वाभाविक हैं, परन्तु जरा गंभीरता से विचार करने पर इनका समाधान हो जाता है। नयापन तब आता है या लाया जाता है जब प्राचीनता में कुछ दोष आ जाता है। निर्दोष प्राचीनता में कोई नवीनता लाई ही नहीं जा सकती। आज हमारी प्राचीनता कुछ सदोष हो गई है। हम लोग जिस स्थिति में है वह दुखदायी हो गई है। हमारी आत्मा आनन्दमय है, स्वभावतः हमें आनन्द मिलना चाहिए। आनन्द के लिए हमारा जन्म हुआ है, हमारे चारों ओर आनन्द का महा समुद्र लहलहा रहा है, परन्तु सदोष प्राचीनता के आवरण ने मुँह पर ऐसी पट्टी बाँध दी है कि सामने रखे हुए अमृत को चख नहीं पाते और भूख के मारे त्राहि- त्राहि चिल्ला रहे हैं। जो घोड़े हमें चढ़ने को मिले थे वे हमारे ऊपर सवार हो गये हैं? नौकरों ने बादशाहत अख्तियार कर ली है। हथियारों ने हमें अपना चौकीदार बना लिया है। मनोविनोद की शतरंज के सिपाही, प्यादे, घोड़े, ऊँट एक फौज बना कर लड़ने के लिए सामने आ खड़े हुए हैं। और हम इन परिस्थितियों को देख कर अज्ञानी बालक की तरह सकपका गये हैं तथा अपने को भेड़ियों के सुपुर्द कर दिया है। फलस्वरुप आनन्द से वंचित हो गये हैं और चारों ओर दुख ही दुख दिखाई पड़ता है। यही प्राचीनता का दोष है। वर्तमान परिस्थितियों ने हमारी दृष्टि ऐसी बहिर्मुखी बना दी है कि अपनापन बिलकुल भूल गये हैं। बिल्ली को देखकर हँसते है और ऊँट को देखकर रो पड़ते हैं। पुत्र, धन, यश प्राप्त हुए तो उछलते हैं, नष्ट हुए तो रोकर घर भर देते हैं। किसी ने कुछ हानि पहुँचाई तो बदले की भावना से हृदय में भट्टी जल उठती है। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, ममता, मद, मत्सर, लोभ रूपी नटों हाथ में पड़कर कठ पुतली की तरह हम नाचा करते हैं और थकान एवं दुख से छटपटा रहे हैं। मान लिया कि आप भाग्यशाली हैं आपके पास जर, जोरू, जमीन है, पर जब सन्तोष नहीं तो आप किस प्रकार अपने को भिखारी से अधिक मानते हैं? सदोष प्राचीनता से हमारा तात्पर्य इसी भूतकाल से लिपटी हुई विकार और अविवेकपूर्ण स्थिति से है। इसी प्रचीनता से छुटकारा पाने के लिए हम नई दुनियाँ, नया परिवार बनाते हैं। अब हम दुखों की कटीली झाड़ियों में भटकते हुए आजिज आ गये हैं, शान्ति के उद्यान में विश्राम करने की इच्छा करते हैं। इस शान्ति मन्दिर की टोह में चलते हुये जो साथी हमें मिल जाते हैं वे ही हमारे परिवारी हैं। अखण्ड ज्योति परिवार उन जिज्ञासु, ज्ञान पिपासु और आनन्द खोजी पथिकों का जखीरा बनना चाहता है। इस जखीरे के सब रास्तागीर, जितना जिससे बन पड़ेगा आनन्द मार्ग, ईश्वर, भक्ति पथ और सदाचार की राह पर चलते हुए सच्चा शान्ति ढ़ूँढ़ने का प्रयत्न करेंगे। सब साथी एक दूसरे को अपना अनुभव बताने और सहयोग देने को तत्पर रहेंगे।तब क्या यह कोई संस्था है? नहीं। विलायती प्रजातन्त्र की नकल करके जिस प्रकार की संस्थायें आजकल बन रही हैं ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ हरगिज उस तरह की कोई संस्था नहीं है। हमारे कुटुम्ब में दस आदमी हैं वे सब एक दूसरे के हित को अपना हित समझते हुये सम्मिलित स्वार्थ होकर रहते हैं, यदि यह कुटुम्ब संस्था है तो अखण्ड ज्योति परिवार भी संस्था हो सकती है।हमें परवाह नहीं कि आपकी उदरपूर्ण कैसे होती है। हमें परवाह नहीं कि आप धनी हैं या निधन। जो कुछ आप हैं रहिये। अधिक धन है तो उसे सत्कर्मों में लगाइये, निर्धन हैं तो परिश्रम करके अधिक कमाइये। हमारी चिंता केवल एक है वह यह कि आप अनन्त आनन्द से वंचित न रहें, आपका हृदय विकारों की भट्टी न बना रहे। धन, दौलत, जमीन, जायदाद, पुत्र, स्त्री, सुन्दरता के भण्डार हमारे पास नहीं हैं यह चीजें हम आपको नहीं दे सकते, पर आप चाहें तो उस खजाने को उंगली के इशारे से बता सकते हैं जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। यह खजाना आपके अपने अन्दर हैं। अन्तर्मुख हूजिये, अपने गरेबां में मुँह डालिये, आत्म निरीक्षण कीजिए। एकान्त में बैठकर अपने को सब से अलग एकाकी अनुभव कीजिये और खयाल कीजिए कि शरीर रूपी कपड़े को उतार कर अलग रख दिया है। अब एक कुशल डाक्टर की भाँति अपने सूक्ष्म शरीर का परीक्षण कीजिए, अच्छी तरह तलाश कीजिए कि इसमें कौन- कौन शैतान के दूत छिपे बैठे हैं। उनका रूप भली प्रकार परखिए और सोचिए कि असल में आप हैं क्या? और किस प्रकार क्या बन गये हैं?कुछ समय तक लगातार अन्तर्मुख होने के बाद आप की पीड़ा मेरी तरह उमड़ पड़ेगी तब आप अखण्ड ज्योति परिवार के सच्चे सदस्य होंगे। ऐसे सदस्यों की आत्मा को चूमता हुआ उनके हृदय से लग जाने के लिए मैं व्याकुल हो रहा हूँ।

