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Magazine - Year 1940 - February 1940

Media: TEXT
Language: HINDI
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मरने के बाद हमारा क्या होता है?

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ले. श्री प्रबोधचन्द्र गौतम साहित्य रत्न, कुर्ग

मरने के बाद हमारा क्या होता है? इस प्रश्र का उत्तर विभिन्न धर्मों की पुस्तकें विभिन्न उत्तर देती हैं। स्वर्ग नरक का वर्णन अपने- अपने मतानुसार सब धर्माचार्यों ने किया है। इस लेख में किसी धर्म के अनुसार मृत्यु के उपरान्त होने वाली दशा का वर्णन करके उन वैज्ञानिकों के अनुभवों का उल्लेख करेंगे जिन्होंने इस सम्बन्ध में गहरी खोज की है और इसी अन्वेषण में जीवन खपा दिये हैं।

इस बात में सब वैज्ञानिक एक मत हैं कि दुनियाँ के किसी भी पदार्थ का नाश नहीं होता। समय चक्र उनका रूपान्तर करता रहता है। किसी वस्तु को नष्ट कर दिया जाय तो उसके पूर्व रूप की ही टूट- फूट होती है, वे मूल तत्व जिनके इकट्ठे होने के कारण उसका निर्माण हुआ था, केवल अपनी शकल बदल लेते हैं। जब शरीर में से प्राण निकल जाता है तो शरीर के सारे अंग अपना काम छोड़ देते हैं, भीतर की मशीन बन्द हो जाती है। अब इस मृत शरीर का रूपान्तर होना आरम्भ होता है। लोग मुर्दें को जला देते हैं, जल में प्रवाहित कर देते हैं या गाड़ देते हैं। जला देने पर शरीर के रासायनिक पदार्थ कुछ तो वायु में मिल जाते हैं, कुछ भस्म में रह जाते हैं। गाड़ देने या जला देने पर वह जीव जन्तुओं का भोजन बन जाता है और उनके शरीर में शामिल हो जाता है। पड़ा रहा तो सड़- गल कर भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाता हुआ घास पात के रूप में प्रकट होता है। निदान शरीर के तत्त्व इस एक संरचना को तोड़कर अलग- अलग बिखर जाते हैं और फिर किसी शृंखला में जुड़कर नई शक्ल बनाता है। पुरानी शृंखला टूटने और नई बनने का यह क्रम अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा, पर उस बेचारे पंछी का क्या होता है?

कुछ वैज्ञानिकों का मन है कि जीवात्मा कोई चीज नहीं। पंचतत्व के बने हुए शरीर की जो क्रिया है उसका एकत्रीकरण ही जीव के रूप में दिखाई देता है। वह वास्तव में कुछ नहीं। पंच भूतों के विशृंखलित होते ही प्राण भी नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि जब हमारे यन्त्रों से जीवित और मृत मनुष्य के प्राण का अनुभव नहीं होता तो वह हो ही नहीं सकता। इन वैज्ञानिकों का मत उपहासास्पद है।

अभी वैज्ञानिकों के यन्त्रों ने प्रकृति का सम्पूर्ण रहस्य नहीं खोज डाला है। जिन विद्वानों ने उस महातत्व की झांकी की है उन्होंने यह कहा है कि हम लोगों का सम्पूर्ण ज्ञान अभी रज कण के बराबर भी नहीं है। ऐसे अधूरे ज्ञान के आधार पर बने हुए सिद्धान्त और यन्त्र यदि उस अखण्ड ज्योति को नहीं जानते तो इससे उसकी असिद्धि नहीं होती। वह जीव जो इतनी आशाऐं करता है, आत्म चिन्तन में इतना लीन रहता है, सोते समय न जाने कहाँ कहाँ घूम आता है, गहन समस्याओं के हल करने में शरीर की सुध- बुध भूल जाता है, अभ्यास द्वारा शरीर की स्वाभाविक क्रियाओं में आश्चर्य जनक घट- बढ़ कर लेता है क्या वह शारीरिक क्रियाओं की स्फुरण मात्र है? मैस्मरेजम, योगशास्त्र, तन्त्र विज्ञान द्वारा जो अद्भुत चमत्कार देखने में आते हैं, भूत प्रेतों के कभी- कभी दर्शन होते हैं, कुछ लोग अपने पूर्व जन्म की कथा सप्रमाण बताते हैं, किन्हीं- किन्हीं बालकों में जन्म जात अद्भुत प्रतिभा होती है यह बातें क्या जीव के अभाव में भी हो सकती हैं? हमारा अन्तःकरण इसे स्वीकार नहीं करता। पूर्वजों के स्मारक बनाने, उनकी कीर्ति को अमर रखने, मृतक के साथ सहानुभूति प्रकट करने की प्रथा बुद्धि विरुद्ध नहीं है। अनादि काल से मनुष्य जीव का अस्तित्व मानता आ रहा है, उसका खण्डन केवल यह कहकर नहीं किया जा सकता है कि वैज्ञानिक यन्त्र से अभी सिद्ध नहीं कर पाये हैं।

सब देशों के अधिकांश आध्यात्म विद्या के अन्वेषक जीव के अस्तित्व को मानते हैं। और वे सूक्ष्म शरीर की सत्ता को भी स्वीकार करते हैं। जिस प्रकार हमारा यह स्थूल शरीर है उसी प्रकार का एक सूक्ष्म शरीर का अनुभव किया जा सकता है। स्वप्र की अवस्था में हमें यही भान होता है कि शरीर सहित काम कर रहे हैं, मरने से कुछ समय पूर्व कुछ लोग यह बता देते हैं कि अब मैं मर जाऊँगा। कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व शक्ति निकल जाती है। असल में सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर का सम्बन्ध अधिकांश टूट चुका होता है तब जीव स्वयं अनुभव करता है कि सब बातें मुझमें बदस्तूर हैं, कोई भारी कष्ट भी नहीं है पर एक महत्वपूर्ण चीज से मैं रहित हो गया हूँ। जिस चीज के बिना शरीर छूँछ जैसा लगता है वही सूक्ष्म शरीर है। योगी महात्मा अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर यह बता देते हैं कि अमुक व्यक्ति इतने समय बाद मर जायेगा। वे यही जान लेते हैं कि स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध कितना कमजोर है और उसके पूर्ण रूप से टूटने में कितना समय लगेगा। शरीर के पुर्जों के निकम्मे हो जाने पर भयंकर व्याधि से पिस जाने पर या दुर्घटना द्वारा असामयिक मृत्यु होने पर जीवात्मा स्थूल शरीर से अलग हो जाता है, फिर भी वह स्थूल शरीर की ही भाँति सूक्ष्म शरीर धारण किये रहता है। यद्यपि इस शरीर पर भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी तथा मल मूत्र त्याग आदि का असर नहीं होता पर मोटी मोटी शारीरिक आदतों को छोड़कर शेष मनोविकार प्रायः ज्यों के त्यों बने रहते हैं।

कठिन काम करने के बाद जिस प्रकार हम थक कर सो जाते हैं उसी प्रकार जीव अपनी थकान उतारने और नवीन विकास की तैयारी के लिए अर्ध चेतनावस्था में पड़ जाते हैं और बहुत काल तक अपना क्रमिक विकास करने के लिए उसी दशा में पड़े रहते हैं। नीच श्रेणी के अल्प बुद्धि वाले अविकसित जीव नीचे लोकों में छोटी भूमिकाओं में रहते हैं। यह लोक ऐसे ही जीवों से भरा रहता है। विकसित जीव ऊँची कक्षाओं में चले जाते हैं। जिनके आत्मा अत्यन्त उच्च और उज्ज्वल हो गए होते हैं वे सर्वोच्च कक्षाओं में पहुंचकर विश्राम करते हैं।

जीवों की योग्यता के अनुसार उन्हें कई लोकों में जाना पड़ता है। ऐसे लोकों में कई- कई विभाग होते हैं। यहाँ यह समझना भूल होगी के जीवों के रहने के लिए स्थूल चीजों के बने हुए इसी प्रकार के मकान, बैठक, पेड़ ऋतु, जंगल आदि होंगे जैसे इस पृथ्वी पर हैं। उन लोकों में सुख दुख की सूक्ष्म सामग्री रहती है। जिसका वे उपयोग करते है। हैजे के स्थान में सूक्ष्म रोग कीट वायु घूमते रहते हैं और गन्दगी के वातावरण में फलते फूलते एवं फिनायल आदि की तीक्ष्ण गन्ध से मर जाते हैं। रोग कीटों की यह पोषक और मारक क्रिया सूक्ष्म हैं। उसके लिए यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य को मारने के लिये जैसी लम्बी छुरी की जरूरत होती है वैसी ही रोग कीटों को मारने के लिए फिनायल की गन्ध के पास भी हों। वहाँ भी भरण पोषण या सुख दुख की एक सूक्ष्म प्रक्रिया चलती है। नीचे के लोकों की अपेक्षा ऊँचे लोगों में ऐसा वातावरण अधिक होता है, जिनमें जीव पूर्ण विश्राम कर सके, और उत्तम आनन्द का अनुभव कर सके। ऊँचे लोकों के जीव स्वेच्छानुसार नीचे की कक्षाओं में तथा पृथ्वी पर आ सकते हैं, पर नीची कक्षाओं के ऊपर के लोकों की ओर उड़ने की शक्ति नहीं रखते।

मरने के बाद कुछ समय तक सूक्ष्म शरीर ज्यों का त्यों बना रहता है। आरम्भ के दिनों में तो साधारण श्रेणी के जीवों को यह भी पता नहीं चलता कि वे मर गये हैं और उनका क्या हो गया है। वे बहुत दिनों तब अपने घर के सगे सम्बन्धियों के आस पास मंडराते रहते हैं। उच्च जीवों का शीघ्र और नीच जीवों का देर में यह सूक्ष्म शरीर भी मर जाता है। जिस प्रकार साँप केंचुली को छोड़ देता है उसी प्रकार जीव कालान्तर में सूक्ष्म शरीर को भी छोड़ देता है।

सांसारिक लोगों से भी जीव प्रभावित होते है। जिन्होंने अपने जीवन काल में अपने आत्मा को महान बना लिया है वे अपना कर्तव्य समझकर ही सांसारिक लोगों की कुछ सात्विक मदद करने को कभी कभी आते हैं किन्तु छोटी श्रेणी के लोग सांसारिक लोगों पर अपना राग द्वेष प्रकट करने के लिये अधिक उत्सुक रहते हैं। अपने जीवन काल के मित्र शत्रुओं के सुख दुख में वे दुखी भी होते हैं और उनके कार्य में सहायता या शक्ति देते के लिये प्रयत्न करते हैं। ऐसे जीव अपनी विश्रामदायी अर्धनिद्रा में से बार बार जाग पड़ते हैं और अतिशीघ्र ही अपने इच्छित लोगों के समीप किसी के मोह बन्धन में बंधकर जन्म धारण कर लेत हैं या अपने ही शरीर को अधिक दृढ़ बनाकर पृथ्वी के ही किसी विशेष स्थान में आ ठहरते हैं। यह बात प्रत्यक्ष हो चुकी है कि कुछ जीव अपने सूक्ष्म शरीर को लिए हुए शताधिक दिनों अपने इष्ट मित्रों के आस पास के स्थानों में डेरा डाले पड़े रहते हैं और अपनी उपस्थिति का परिचय किसी न किसी रूप में अपने सम्बन्धियों को देते रहते हैं।

आत्मघात या दुर्घटनाओं से मरा हुआ जीव यदि साधारण श्रेणी का है तो उसकी बड़ी विचित्र दशा होती है। अचानक शरीर छूट जाने के कारण और मृत्यु समय में भारी कष्ट होने के कारण उसकी दशा बहुत अस्वाभाविक होती है वह आधे कटे हुए बकरे की तरह चारों ओर फड़फड़ाता फिरता है और जीव लोक में एक कुहराम खड़ा कर देता है। अपने पूर्व सम्बन्धियों के पास दौड़ा जाता है और फिर उलट कर इधर उधर भटकता है। पृथ्वी और जीव लोक में इनके द्वारा कोई भयंकर उत्पात भी किए जाते रहते हैं।

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Type: SCAN
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February 1940
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