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Magazine - Year 1940 - February 1940

Media: TEXT
Language: HINDI
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हमेशा हँसते रहिए।

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(ले.-श्री हनुमतप्रसाद जी ‘कुसुम’, सीकर)

आप अपने जीवन को उच्च और पवित्र बनाना चाहते हैं तो प्रसन्नता को अपनाइये। सुन्दर तस्वीर के आस पास जिस प्रकार छोटे बच्चे ललचाते फिरते हैं उसी प्रकार प्रसन्नता के आस पास अन्य छोटे बड़े सद्गुण सदा आ जाते हैं। प्रसन्नता वह सुगंधित फल है जिसके आस पास सफलता और सद्गुणों की मक्खियाँ सदा भिन-भिनाती रहती हैं।

जिस व्यक्ति के चेहरे पर मुसकराहट नाचती रहती है, उसके मन में ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता और कुढ़न को स्थान नहीं मिल सकता। यह दोष उन्हीं स्थानों में अपना घर बनाते हैं, जहाँ उन्हें सम्मान के साथ रखा जाता है। आपका किसी आदमी से झगड़ा हो जाता है और उसके प्रति द्वेषभाव मन में आते हैं। अगले दिन वह रास्ते में मिलता है और आप खिलखिलाकर हँसते हुए उससे हाथ मिलाते हैं। बस, सारा बैर-भाव बात की बात में मिट गया। यदि आपके स्वभाव में प्रसन्नता शामिल न होगी तो निश्चय ही द्वेष भावना मन के भीतर डेरा डालकर बैठ जाती और धीरे धीरे बढ़ती रहती। विरोधी को आप जो नुकसान पहुँचाते उससे कई गुना नुकसान अपना हो गया होता। बुरे भाव की आग ने मन और शरीर के इतने पोषक तत्व जला दिए होते जिनकी हानि साधारण हानि नहीं कही जा सकती। विरोधी के मन में भी वैसे ही भाव जमे रहते तो वह स्वतः हानि उठाता हुआ कभी आपको भी हानि पहुँचा सकता था। प्रसन्नता ही वह शीतल जल था जिसने आपके भी आपके विरोधी के मनों के विकारों को धोकर साफ कर दिया।

प्रसन्न मुख रहने वाले सब को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। हँसते हुए बच्चे हमें कितने प्यारे लगते हैं उनके साथ खेलने में स्वर्ग का आनंद आता है। मुसकराता चहरा एक वशीकरण मंत्र है। वह कहीं भी हो, किसी भी परिस्थिति में हो, अपनी खुशी का कारण निकाल लेता है। यदि दुख की स्थिति में है तो दुख उसके लिए तिनका हो जाता है और सुख में है तो अपने आनंद को हजारों गुना बढ़ा लेता है। विचारकों ने प्रसन्नता को इसलिए सर्वश्रेष्ठ गुण बताया है कि इससे न केवल अपने को ही आनंद मिलता है अपितु साथियों पर भी अमृत बरसता है। देखा गया है कि इस गुण से सम्पन्न व्यक्तियों की उपस्थिति से दूसरों के रोग-शोक आधे रह जाते हैं।

सब लोग अपनी कार्य शक्ति बढ़ाने के और सफलता दायक साधनों की तलाश में रहते हैं पर प्रसन्नता से बढ़ कर उन्हें और कोई अधिक उपयोगी चीज नहीं मिल सकती। थकान मिटाने के लिए लोग विभिन्न प्रकार के खर्चीले मनो विनोदों और कीमती दवाओं को ढूंढ़ते हैं। क्या ही अच्छा होता यदि उन्होंने प्रसन्नता का महत्व समझा होता। थकान है क्या? असल में थकान का मनोवैज्ञानिक अर्थ है किसी काम पर से मन उचट जाना। वैसे हमारे शरीर और मन का संगठन इस प्रकार का है कि उसमें थकने की कोई गुंजाइश ही नहीं। तब हम आराम करते हैं या सो रहे होते हैं। तब भी शरीर और मन कुछ न कुछ काम कर रहे होते हैं, दिल, फेफड़े, आमाशय, जिगर आँतें, मस्तिष्क कब अपना काम बन्द करते हैं ? हाथ पैर निश्चेष्ट होकर होकर पड़े नहीं रहते। आराम के समय भी हाथ पैर इधर उधर चलते रहते हैं। मन में स्वप्न आदि क्रियायें होती रहती हैं। देखा जाता है कि मजदूर आठ घंटे मिल का काम करके जब लौटता है तो थक जाता है। पर वह सोता सिर्फ छः घंटे ही है। मिल के आठ घंटे और सोने के छः घंटे छोड़ कर शेष 10 घंटे वह क्या करना है? इस समय में भी वह काम ही करता है। भोजन करता है, किताब पढ़ता है, ताश खेलता है, कपड़ा धोता है, क्या यह काम नहीं है? उन्हें करने में क्यों नहीं थकता? मजदूर से पूछा जाय कि ‘भाई, थके होने पर भी तुम दस घंटे अतिरिक्त काम किस प्रकार कर लेते हो, तो यही उत्तर देगा कि, और मैं कुछ काम नहीं करता। बाकी समय तो अपनी खुशी के कामों में-मन बहलाव में लगाता हूँ।’ सचमुच उसे यह भान ही नहीं होता कि उसे प्रतिदिन 18 घंटे हलका भारी परिश्रम करना पड़ता है। थकान का एक ही कारण है-काम को भार समझना। खुशी खुशी तो लोग बहुत काम कर डालते हैं। जब हमारे घर में ब्याह शादी होती है तो रात दिन जुट कर काम करते हैं। हिसाब लगाया जाय तो मालूम पड़ेगा कि एक आदमी प्रायः तीन आदमियों की बराबर उन दिनों काम कर लेता है और थकान बिल्कुल भी नहीं आती। डाक्टरों ने हिसाब लगाकर बताया है कि पड़े रहने पर जितनी शक्ति खर्च होती है काम करते रहने पर उसकी सवाई ताकत खर्च होती है। दस घंटे पड़े रहने में उतनी शक्ति व्यय होगी जितनी आठ घंटा काम करने में, क्यों कि पड़े रहने पर भी शरीर और मन को काम करना पड़ता है।

इन सब बातों पर दृष्टि पात करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रसन्नता, कार्यशक्ति को बढ़ाती है। प्रसन्नता पूर्वक काम करने वालों को अपना कार्य, भार नहीं मालूम पड़ता बल्कि एक मनोरंजन का साधन बन जाता है। मनोरंजन में थकान कहाँ? और थकान न आना ही श्रेष्ठ कार्य शक्ति है। तात्पर्य यह है कि प्रसन्नता सर्वोत्तम टानिक औषधि है। एक बार खिलखिलाकर हँस लेने पर जितनी स्फूर्ति आती है उतनी एक प्याला पीने से नहीं आ सकती। हँसमुख लोगों के पास कुछ दिन रहकर देखिये वे बहुत अधिक कार्य करते हुए मिलेंगे। उन्हें इस बात की याद भी नहीं आती कि हमें काम करना पड़ रहा है और ढेरों काम कर जाते हैं, जब कि एक रोनी सूरत-महाशय जरा सा काम करने पर ‘हाय, काम के मारे मरा’ ‘हाय काम के मारे मरा’ कहकर रोया करते हैं।

कोई भी साँसारिक काम ऐसा नहीं है जिसमें दूसरों के साथ व्यवहार न करना पड़े। सफलता और असफलता का परिणाम बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि लोग आपका आदर करें, आप से प्रेम करें, आपकी बात का विश्वास करें और आपके व्यक्तित्व को ऊंचा समझें। यह चारों ही बातें प्रसन्नता से सम्बन्धित हैं। हँसता चेहरा लेकर किसी आदमी के पास जाइए, वह आपकी बात सुनेगा आपको उचित परामर्श देगा और आपकी मदद करेगा। पैसा खर्च करके जो काम सुगमता से नहीं हो सकते वह हँसते चेहरे से हो जाते हैं। आप दुकानदार, वकील, अध्यापक, वैद्य, व्यापारी, मजदूर, फैक्टरी-मालिक, पुरोहित, भिखारी कोई भी हैं, हँसते रहिए। आपके आसपास ग्राहकों की भीड़ लगी रहेगी। ऊंची योग्यता धन और चतुराई होते हुए भी लोग तरक्की नहीं कर सके पर प्रसन्न मुख लोगों ने पहाड़ों पर अपने लिए जगह बनाली।

एक महापुरुष का कथन है कि ‘खुदा ने कामयाबी की नियामत खुश मिज़ाज लोगों के लिए बनाई और बदकिस्मती का तराना गाने वालों को लानत बख्शी।’ बात ठीक सी है, आप अपनी गरीबी, दुर्भाग्य, घर वालों की शिकायत, घाटा, अपमान, दुख की कहानी लेकर लोगों के सामने जाइए; बहुत हुआ तो कोई चार शब्द आपको सहानुभूति के कह देगा। वरना हर तरफ लानत बरसेगी। दुनिया में किसी को इतनी फुरसत नहीं है कि आपका रोना सुने और अपने को रंजीदा बनावे। खुद हँसिए तो लोग आपके साथ हँसेंगे, रोइए तो दुत्कार कर अलग कर देंगे। इसलिए जरूरत नहीं कि आप हर वक्त अपनी बदकिस्मती के गीत गावें, यदि सचमुच कोई मुसीबत आप पर है तब भी हँसते रहिए। जगहँसाई से बचे रहेंगे और अपने दुख को हल्का कर लेंगे। प्रसन्नता एक कला है, एक अमर सौंदर्य है। आप कुरूप हैं, कोई हर्ज नहीं जरा मुस्कराइए तो सही, आपके मुँह से फूल बरसने लगेंगे।

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Type: SCAN
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February 1940
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