
गंगा की गौरव गाथा अकारण नहीं गाई जाती
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गंगा भारत भूमि की सर्व प्रधान रक्त धमनी है। उसके धार्मिक आध्यात्मिक महत्व पर कोटि-कोटि धर्म प्रिय भारतीय विश्वास करते हैं। उसके संपर्क सान्निध्य में शान्ति प्राप्त करते और प्रेरणा ग्रहण करते हैं। उसकी मान्य पवित्रता को, सद्ज्ञान की गरिमा के साथ जोड़ते हुए तत्वदर्शी लोग ज्ञान गंगा की तुलनात्मक चर्चा करते हैं।
आर्थिक दृष्टि से उसके द्वारा होने वाली, सिंचाई नौका नयन, भूमि को उपजाऊ बनाने जैसे कितने ही महत्व है। स्वास्थ्य की दृष्टि से विचार किया जाय तो उसका जल अमृत है और समीपवर्ती क्षेत्रों में जो वातावरण बनता है उसका अपना महत्व है। तटवर्ती क्षेत्र में उगे हुए वृक्ष, गुल्म और वनस्पति न केवल आर्थिक दृष्टि से वरन् स्वास्थ्यकर वायु प्रदान करने की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है।
पदार्थ विज्ञान के बाल्यकाल में वस्तुओं की रासायनिक स्थिति को ही मान्यता दी गई थी यह नहीं स्वीकारा गया था कि-”उनका प्रभाव मनुष्य के मनः स्तर को उठाने गिराने में भी सहायक होता है। उपयोग की दृष्टि से अमुक वस्तु जितनी लाभदायक होती है वह उतनी ही प्रिय लगती हैं और उसी अनुपात से उसका मूल्य आँका जाता है” पदार्थ किसी की चेतनात्मक उत्कृष्टता-निष्कृष्टता को प्रभावित कर सकते हैं तब ऐसा नहीं माना जाता था। यही कारण है कि माँस और शराब जैसे पदार्थों के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को ही सब कुछ माना जाता था और उनका किसी की आन्तरिक भावनात्मक या मानसिक स्थिति पर कोई प्रभाव पड़ेगा, यह नहीं स्वीकारा जाता था। पर अब ऐसी बात नहीं रही। खाद्य पदार्थ मन को भी प्रभावित करते हैं इस आध्यात्मिक मान्यता के निकट ही अब विज्ञान खिंचता चला आ रहा है और फासला बहुत कुछ पट चुका है।
गौ जैसे पशु वट, पीपल, आँवला जैसे वृक्ष तुलसी जैसे पौधे मनुष्य की चेतना में शान्ति एवं शालीनता की वृद्धि करते हैं इसका परीक्षण खुली चुनौती की तरह किया जा सकता है। नशे, मसाले मनुष्य को क्रोधित एवं उद्विग्न बनाते हैं। यह तथ्य अब किसी को अस्वीकार्य नहीं, गंगा जैसे जल प्रवाह न केवल शारीरिक, आर्थिक प्रभाव रखते हैं वरन् उनकी क्षमता मनुष्य के मानसिक संतुलन को उच्चस्तरीय बनाये रखने में भी योगदान देती है। धार्मिक क्षेत्र की यह मान्यता अब विज्ञान के क्षेत्र में भी उपहासास्पद नहीं हैं। उसे क्रमशः अधिक तथ्य पूर्ण माना जा रहा है। गंगा स्नान, गंगा तट पर निवास, गंगा जल पान का महात्म अब मात्र श्रद्धा का विषय ही नहीं है उसके पीछे अनेक तथ्य, तर्क और प्रमाण भी जुड़ते जा रहे हैं।
गंगा के आध्यात्मिक, मानसिक एवं शारीरिक प्रभावों को मात्र हिन्दू धर्मावलम्बी ही स्वीकार करते हों सो बात नहीं, भूतकाल में उसकी विशेषताओं को अन्य धर्मावलम्बी भी स्वीकार करते रहे हैं। अब उसमें कभी नहीं वरन् वृद्धि ही हो रही है। गंगा की गरिमा को सार्वभौम और सर्वजनीय स्तर पर मान्यता मिल रही है। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में उसकी बहुमुखी विशेषताओं को और भी अच्छी तरह समझा जायगा और जन साधारण द्वारा उसका और भी अधिक लाभ उठाया जायगा।
इतिहास के पृष्ठ बताते हैं कि गंगा जल को बिना किस धार्मिक भेदभाव के किस तरह उपयोगी एवं महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
इब्नबतूता नामक एक भ्रमणशील लेखक अफ्रीका महाद्वीप, एशिया की लम्बी यात्रा करते हुए भारत भी आया था। उसने जो स्मरण लिखे हैं उनका गिव्स ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। इस पुस्तक में तत्कालीन सुल्तान मुहम्मद तुगलक के शासन का विस्तृत वर्णन है। उसमें यह भी उल्लेख है कि बादशाह गंगा जल पीते थे। उनके लिए दैलतावाद गंगा-जल पहुँचाने में 40 दिन लग जाते थे।
अबुल फजल ने अपने ग्रन्थ “आईने अकबरी” में लिखा है अकबर को गंगा जल से भारी प्रेम था। उन्हें नित्य गंगा जल मिलता रहे इसके लिए उन्होंने 20 व्यक्तियों का दल नियुक्त किया। जब बादशाह आगरा या फतेहपुर सीकरी रहते हैं तब गंगा जल सोरों से आता है और जब वे पंजाब जाते हैं तब हरिद्वार से।
फ्रांसीसी यात्री बर्नियर सन् 1456 से 1467 तक आठ वर्ष भारत रहा। उसने शाहजादा दाराशिकोह की चिकित्सा भी की थी। औरंगजेब के भोजन के साथ गंगा जल भी रहता है। बादशाह ही नहीं अन्य दरबारी भी गंगाजल का नियमित प्रयोग करते हैं। यात्रा में भी वे ऊँटों पर लदवा कर गंगा जल अपने साथ ले जाते थे।
एक दूसरे फ्रांसीसी यात्री टैवर्नियर ने लिखा है हिन्दुस्तान के राजे और नवाब समान रूप से गंगा जल का दैनिक उपयोग करते हैं।
ब्रिटिश कप्तान एडवर्ड मूर ने अपने स्मरणों में लिखा है, शाहनवर के नवाब केवल गंगा जल पीते थे इसके लिए उन्होंने काफिला तैनात कर रखा था।
इतिहासकार गुलाम हुसैन ने अपनी पुस्तक ‘रियाजु स-सलातीन’ में लिखा, हिन्दुओं की तरह इस देश के अन्य धर्मावलम्बी भी गंगा जल की बड़ी कद्र करते हैं और उसे स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी मानते हैं।
पेशबाओं के पीने का पानी गंगा जल ही होता था। गढ़मुक्तेश्वर तथा हरिद्वार से वहँगियों द्वारा उनके लिए गंगा जल पहुँचता था।
दक्षिण भारत के राजा कृष्णराव को सन् 1925 में कोई असाध्य रोग हो गया था। उन्होंने सब दवाएँ छोड़कर केवल गंगा जल लेना आरंभ किया और वे उसी से अच्छे हो गये।
अंग्रेजी शासन के दिनों वैज्ञानिक हैकिन्स ने गंगा जल की विशेषताओं के संबंध में प्रचलित किंवदंतियों पर शोध कार्य किया था। उन्होंने काशी नगर के गन्दे नालों का जल जाँचा जिसमें हैजे के असंख्य कीटाणु भरे हुए थे। वही नाला जब गंगा में मिला तो उसमें रहने वाले विषाणु तत्काल भर गये। सड़े हुए मुर्दों की लाश से निकलने वाला विष भी गंगा में घुलते ही अपनी हानिकारक प्रकृति खो बैठता है। कुँए में तथा अन्य जलों में हैजा के कीटाणु डाले गये तो वे तेजी से बढ़े किन्तु गंगा जल में मिलते ही स्वयमेव नष्ट हो गये।
नन्दा देवी, गुरला, मान्धाता, धौलागिर, गोसाई थान, कंचन चंगा, एवरेस्ट जैसे संसार के सबसे ऊँचे गिरी शिखरों का पिघलता हुआ बर्फ हिमालय में इधर उधर चक्कर काटता हुआ गोमुख पर एकत्रित होकर गंगा जल के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इन विशिष्ट भू क्षेत्रों की धातुएँ तथा रासायनिक वस्तुएँ ऐसी हैं जो गंगाजल को मानवी उपयोग के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं।
रसायन विज्ञानी प्रो.एन.एन. गोडवोले ने गंगाजल की विशेषताओं का कारण ढूँढ़ने के लिए लम्बी रासायनिक छान-बीन की। उन्होंने गंगा जल में कुछ ऐसे विशेष ‘प्रोटेक्टिव कालौइड’ पाये जो उसे सदा पवित्र एवं कीटाणु रहित बनाये रहते हैं। यह तत्व अन्य नदियों में बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। गोडवोले ने अपने शोध निष्कर्ष में लिखा है, गंगाजल जीवाणु वृद्धि को रोकता ही नहीं वरन् उनका विनाश भी कर देता है। उनका यह भी कथन है गंगा जल का वास्तविक स्वरूप प्रयाग तक ही पाया गया, बाद में कई बड़ी नदियाँ मिल जाने से उसके वह गुण नहीं रहते जो इससे ऊपर पाये जाते हैं।
आयुर्वेद शास्त्र में गंगा जल को शारीरिक और मानसिक रोगों का निवारण करने वाला और आरोग्य तथा मनोबल बढ़ाने वाला बताया गया है।
गंगा वारि सुधा समं बहु गुणं पुण्यं सदायुष्करं,
सर्व व्याधि विनाशनं बलकरं वर्ण्यं पवित्रं परम्।
ह्वद्य दीपन पाचनं सुरुचिम्मिष्टं सु पथ्यं लघुस्वान्तध्वान्त निवारि बुद्धि जननं दोष त्रयध्नं वरम्।
अर्थात् गंगा का जल अमृत के तुल्य बहु गुण युक्त पवित्र उत्तम, आयु का बढ़ाने वाला, सर्व रोगनाशक, बलवीर्य वर्द्धक, परम पवित्र, हृदय को हितकर, दीपन, पाचन, रुचिकारक, मीठा उत्तम पथ्य और लघु होता है तथा भीतरी दोषों का नाशक, बुद्धि-जनक, तीनों दोषों का नाश करने वाला सब जलों में श्रेष्ठ है।
गंगा का भौतिक परिचय भी कम महत्व का नहीं। वह अनेक नदियों का सहयोग अपने में समन्वित कर सकने में सफल हुई है। एकाकी सत्ता कितनी ही समर्थ क्यों न हो वह नगण्य, दुर्बल और स्वल्प प्रयोजन पूरा कर सकने में ही समर्थ हो सकेगी। बड़े कार्य समन्वय से ही संभव होते हैं। गंगा एक पवित्र नदी है। उसका गौरव इस बात में भी है कि उसने अपने में एक बड़ा परिवार घुलाया और आत्म-सात किया है। यही कारण है कि उसका विस्तार वैभव इतने बड़े क्षेत्र को जल सुविधा देते हुए भी घटा नहीं वरन् बढ़ता ही गया है। बंगाल में पहुँचते-पहुँचते उसकी अनेक धाराएँ हो गई हैं और वे सभी जल राशि से सदा भरी पूरी रहती हैं।
समुद्र तल से 13800 फुट की ऊँचाई पर अवस्थित गंगोत्री से निकल कर 1557 मील की यात्रा करती हुई गंगा अनन्त सागर में विलीन होती है। इन दिनों जहाँ गंगोत्री तीर्थ है वहाँ से 10 मील ऊपर गोमुख नामक स्थान से गंगा की धारा निकलती है, पर वह समूचा क्षेत्र गंगोत्री ही कहलाता है।
गंगा में कितनी ही छोटी बड़ी नदियाँ मिलती हैं। इनमें से कितनी ही उल्लेखनीय है। यथा-नन्द प्रयाग में विष्णु गंगा, स्कंद प्रयाग में पिण्डर, रुद्र प्रयाग में मन्दाकिनी, देव प्रयाग में अलकनन्दा, प्रयाग में यमुना, आगे चलकर गोमती, घाघरा, सोन, गण्डक कोसी, सरयू, ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियाँ उसी में जा मिलती हैं। राम सागर, बागमती, महानंदा आदि अन्य कई नदियाँ भी उसी में मिली हैं।
गंगा तट पर मैदानी इलाके में काशी और प्रयाग तीर्थ प्रसिद्ध हैं। हिमालय क्षेत्र में कई काशी और कई प्रयाग हैं। जैसे गुप्त काशी-उत्तर काशी। रुद्र प्रयाग, विष्णु प्रयाग, सोन प्रयाग, देव प्रयाग, कर्ण प्रयाग, नन्द प्रयाग आदि।
गंगा से कितनी सिंचाई होती है कितने बाँध तालाब भरे जाते हैं, उससे कितनी उपलब्धियाँ मिलती हैं इसका लेखा-जोखा आश्चर्य चकित करता है वह भारत की अर्थ समृद्धि में भी भारी योग दान देती है। अपनी सूक्ष्म दिव्य शक्ति के कारण उसकी विशिष्ट गौरव गरिमा तो यथा स्थान है ही।
गंगा का कुल जल ग्रह क्षेत्र 9 लाख 97 हजार वर्ग किलोमीटर है। गंगा नहरों से इन दिनों 6 लाख 95 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। सिंचाई के अतिरिक्त गंगा की प्रवाह शक्ति का उपयोग करके भद्रावाद, मुहम्मद पुर और पथरी पर विशाल काय बिजली घर बने हैं। वर्षा में गंगा का फालतू पानी जो व्यर्थ ही बह कर समुद्र में चला जाता है, उसे दक्षिण की कावेरी नदी में मिलाने की योजना विचाराधीन है। यदि वह नहर संभव हो सकी तो वह छह राज्यों को पानी देती हुई दक्षिण भारत की जल व्यवस्था में भी बहुत योगदान देगी।
धन्य हैं हम भारत वासी जिन्हें गंगा जैसी सर्वगुण सम्पन्न माता के पयपान करने का अवसर मिलता है।