संगठन तो बनें, पर सज्जनों के ही
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समझा जाता है कि संस्थाएँ ही बड़े−बड़े काम कर सकती हैं। उनके पास जन−शक्ति और धन−शक्ति सहज ही जुट जाती है। फलतः वे व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक बड़े काम कर सकती हैं। यह बात एक सीमा तक ही सच है, सर्वांश में नहीं। गहराई से खोजने पर तथ्य कुछ दूसरे तरह के ही सामने आते हैं। बड़ी−बड़ी संस्थाओं के मूल में सूत्र संचालक कुछ ही मनस्वी व्यक्ति रहे हैं। उन्हीं की प्रबल प्रेरणा से संस्थाएँ बनती काम करती हैं और सफल होती देखी गई हैं। विद्वान एमर्सन ने इस प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए लिखा है− महान् संस्थाएँ प्रायः उनके मूल में काम करने वाले प्राणवान् व्यक्तियों की विशालकाय छाया भर पाई गई है। जिस प्रकार प्रातः या सायंकाल की छाया मूल व्यक्ति की अपेक्षा कई गुनी लम्बी होती है उसी प्रकार महान व्यक्तियों के व्यक्तित्व विशालकाय संस्था के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं।
थियोडोर रूजवेल्ट की ऐसी संस्थाओं में गहरी दिलचस्पी थी जिन्होंने अमेरिकी सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निवाही। वे कहते हैं इन महान् संस्थाओं के मूल में प्रायः एक−एक ही प्राणवान् व्यक्ति की प्रधान भूमिका देखी गई है। अन्य सहयोगियों ने तो अनुकरण और अनुगमन भर किया है।
जार्ज बर्नार्डशा ने संस्थाओं के प्रसंग में चुटकी लेते हुए एक बार कहा था−आदर्श संस्थाएँ प्रायः तीन आदमियों से मिलकर बनी होती हैं। जिनमें से दो व्यक्ति प्रायः बीमार जैसे होते हैं।
विद्वान रेनाल्ड केरे ने लिखा है−मनुष्यों की बाहरी और भीतरी संरचना में बहुत थोड़ा अन्तर होता है। तो भी उनमें से कितने ही बहुत ऊँची स्थिति तक जा पहुँचते हैं और कितने ही गई−गुजरी स्थिति में पड़े रहते हैं। इस अन्तर का कारण इतना ही है कि कुछ ने अपनी आन्तरिक ज्योति को पहचाना और उसे प्रज्वलित रखने के लिए घनघोर प्रयत्न किया जब कि दूसरे उससे अनजान बने रहे और उपेक्षा बरतते रहे। हम चाहें तो आत्म−ज्योति को प्रखर रख सकते हैं और उसके प्रकाश में जीवन के हर क्षेत्र को प्रगति के आलोक से भर सकते हैं।
आज व्यक्तियों से कुछ करने और कराने की आशा की जाती है। संगठन को महत्व दिया जाता है और उनको संयुक्त शक्ति का जो परिणाम निकल सकता है उसे ध्यान में रखते हुए संगठित आन्दोलनों का ढाँचा खड़ा किया जाता है। एकता पर बहुत जोर दिया जाता है और मिल जुलकर काम करने का महत्व बताया जाता है। इस प्रयास की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। अच्छे उद्देश्यों की प्रशंसा ही की जा सकती है। इन प्रयत्नों के साथ एक आरम्भिक कड़ी और जुड़ी रहनी चाहिए कि कर्तृत्व उभारने से पहले व्यक्तित्वों को सही किया जाय, ऊँचा उठाया जाय। अन्यथा जिस प्रकार श्रेष्ठता की सम्मिलित शक्ति से सत्प्रयोजन सिद्ध होते हैं, उसी प्रकार दुर्जनों का संगठन विनाश का विस्तार करेगी। एक चोर जो हानि पहुँचता है। उनका संयुक्त गिरोह बड़े दुस्साहस कर सकता है। एकत्रीकरण जिस उद्देश्य के लिए किया गया है उसे उसी तक सीमित रखा जा सके ऐसा कोई उपाय नहीं है। सज्जन जब मिलते हैं तो मिलन प्रयोजन के अतिरिक्त अन्य प्रकार की सत्प्रवृत्तियों के लिए सोचते और करते हैं। संगठन जैसे श्रेष्ठ कार्य की उपयोगिता तभी है जब वह सत्प्रयोजनों के लिए हो तथा सज्जनों के एकीकरण का तथ्य भी उससे जुड़ा रखा जाय।
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