आत्म−निर्माण से ही आत्म−कल्याण सम्भव।
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स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, शान्ति सद्गति के लिए प्राथमिक साधना आत्मशोधन की है। आत्म निरीक्षण, आत्म समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास की सीढ़ियाँ पार करते हुए ही जीवन लक्ष्य प्राप्ति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना सम्भव होता है।
उपासना के रूप में प्रयुक्त होने वाले कर्मकाण्डों के पीछे सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की ही प्रेरणा है। साधना में अपने ही कुसंस्कारों का अनगढ़पन दूर करने का प्रयोजन सन्निहित है। जीवन क्रम से लोक व्यवहार की सभ्यता और व्यक्तित्व के परिष्कार की संस्कृति की समाविष्टि के लिए किये जाने वाले प्रयत्न ही आत्मोत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करते हैं। योगाभ्यास, तपश्चर्या एवं साधनात्मक धर्मानुष्ठानों के साथ उच्चस्तरीय चरित्र−निष्ठा नितान्त आवश्यक है। इस समावेश के बिना मात्र पूजा−पाठ भर से कोई वास्तविक आत्मिक प्रगति का लाभ नहीं ले सकता। आत्म कल्याण के पथिक को चरित्रवान बनने के लिए संकल्पपूर्वक तत्पर होना चाहिए। इस प्रयास में ही आत्मोत्कर्ष की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। शास्त्र कहता है−
आत्मशुद्धि बिना कर्तुर्जपहोमादिकाः क्रियाः।
निष्फलास्तातु विज्ञेयाः कारण श्रुतिनोदितम्॥
−गायत्री तन्त्र
‘बिना आत्म शुद्धि के जप, होम आदि समस्त कर्म काण्ड निष्फल हो जाते हैं, यही सत्शास्त्रों का मत है।’
स्वशरीरे स्वयंज्योति स्वरूपं परमार्थिकम्।
क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः॥
−पाशुपत ब्रह्मोपनिषद्
अपने शरीर में अवस्थित, आत्मा की दिव्य ज्योति का साक्षात्कार वे करते हैं जिनके दोष क्षीण हो गये। माया से घिरे लोगों को उसका दर्शन नहीं होता।
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो ना समाहितः।
ना शान्तमानसो वापि प्रज्ञाने नैनमाप्नुयात्॥
−कठोपनिषद्
जो मनुष्य पाप से निवृत्त नहीं हुआ है, अथवा जो केवल इन्द्रिय परायण है एवं जो असमाहित अशान्त है वह कभी आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता।
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा।
सम्यज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्॥
−मुण्डक
सत्य, तप, जप, प्रभृति कर्म भी ब्रह्म जिज्ञासु के लिए अनुष्ठेय हैं। अर्थात्−सत्य भाषण, ब्रह्मचर्य और तपस्या के द्वारा यह आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च सिद्धिं विन्दति मानवः॥
−गीता
जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
एवमाचरतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम्।
सर्वस्य तपसोमूल माचारं जगृदुः परम्॥
− वायु पुराण
मुनि आचारवान और धर्मात्मा होते हैं। सदाचार ही तपस्या का मूल है। योगीजन उसे ही अपनाते हैं।
दृढ़कारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन्।
अहिंवस्त्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्ग तथावृतः॥
-मनु॰
दृढ़ वृत्ति वाला, निष्ठुरता रहित, जितेन्द्रिय, क्रूर आचरण वाले मनुष्यों का साथ छोड़ता हुआ हिंसा रहित पुरुष इन्द्रिय संयम और दान से स्वर्ग को जीतता है।
अवैग येत्वानायासा मैत्री चित्तरताः सदाः।
सर्वभूत दयावन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः॥
−महा॰
जो अनायास ही किसी से वैर नहीं करते, जिनके मन सदा मित्रता का भाव रहता है और जो सदा सब प्राणियों पर दया करते हैं, वे पुरुष स्वर्ग को जाते हैं।
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