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Magazine - Year 1978 - Version 2

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जीवन का माधुर्य सहकारिता में है।

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क्या वास्तव में ही प्रकृति में बड़ों के बड़े महत्व का सिद्धान्त कार्य करता है प्रिन्स क्रोपाटकिन ने जान स्टुअर्टमिल के इस उपयोगितावाद (डयूटेलिरिज्म) सिद्धान्त की शव परीक्षा का निश्चय किया। वे प्रकृति की पुस्तक खोल कर बैठ गये फिर उन्होंने जो पढ़ा और जो निष्कर्ष निकाले वे न केवल उक्त तथ्य का खण्डन, प्रकृति में सहयोग और सहजीवन के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं अपितु उन घटनाओं से जो उनने अपनी पुस्तक सहयोग और संघर्ष में संकलित की है, पढ़ कर मानव मन को जीव मात्र के प्रति उदारता की, सहयोग की, सहायता की प्रेरणा मिलती है।

ऐसे उदाहरण स्थान−स्थान पर, प्रत्येक जीव की सृष्टि में देखने को मिलते हैं−जिनसे पता चलता है यह संसार परस्पर विश्वास, आत्मीयता, सहयोग तथा जियो और जीने दो के सिद्धान्त का पालन करता है। सामूहिकता की भावना चीतलों में बहुत अधिक पाई जाती है। देहरादून के समीप बने कार्बेट नेशनल पार्क में देखा गया है कि कई बार गांवों से चरने आये जानवरों में भी वे अपनी इसी भावना के साथ घुल मिल जाते हैं और साथ−साथ चरने लगते हैं।

चीतलों और बन्दरों की दोस्ती भी दिलचस्पी होती है। गर्मियों के दिनों में जब जंगल में तरह के फल लगते हैं यह मैत्री अत्यन्त प्रगाढ़ हो जाती है। मित्रता प्रायः चीतल ही करते हैं। उसका कारण यह है कि यह बन्दर पेड़ों पर चढ़ जाते हैं, चीतल चढ़ नहीं पाते। बन्दर उनके लिये ऊपर से फल गिराते हैं जिन्हें मित्र चीतल मण्डली प्रेमपूर्वक खाती है। बन्दर चीतल समुदाय की दोस्ती ठुकरा सकते हैं किन्तु वे इस बात को नहीं भूलते कि एक ही जंगल में रहने के नाते वे भी उनके भाई और सहयोग के पात्र हैं।

राजगीध आकाश में एक सांकेतिक गति से उड़ान भर कर दूर−दूर तक के अपने साथियों को मृतक जीव की दावत का संकेत देते हैं। थोड़ी ही देर में सैकड़ों गिद्ध एकत्र हो जाते हैं किन्तु भोज की शुरुआत वही गीध करता है जो अन्यों को आमन्त्रित करता है। यही नहीं मृतक जीव के शरीर का कोमल भाग उसे ही खाने को मिलता है शेष शरीर के अन्य अंगों के मांस पर सन्तोष करते हैं।

पारिवारिक भावना शेरों में भी होती है साथ ही अनुशासन की प्रवृत्ति भी। अक्सर हठ या चंचलता व्यक्त करने वाले बालक को शेरनी ही डपटती है, पर कई बार शेर भी दंगा करने वाले की पिटाई कर देता है। बन्दरिया अपने बच्चे की ताड़ना हलकी चिकोटी काट कर करती है। अनुशासन के नाम पर दण्ड दिया जाना अमानवीय कृत्य नहीं वरन् वह तो आवश्यकता है और उससे भी प्रकारान्तर से अन्यों के प्रति भलाई की ही भावना का पोषण होता है।

किसी समय भारतीय परिवार सम्मिलित कुटुम्ब प्रणाली के लिये विश्व विख्यात थे किन्तु आज यह परम्परा धीरे-धीरे नष्ट हो चली। आधुनिक सभ्यता के नाम पर नव दंपत्ति न केवल अलग पसन्द करते हैं अपितु वे परिवार के बुजुर्गों यहाँ तक कि अपने माता पिता को भी अनुपयोगी कहकर उनसे घृणा करने लगे है। किन्तु यह वृद्ध कितने उपयोग होते हैं इसका पता नव गृहिणी के प्रसव आदि के समय चलता है जब कि दादी−मातायें ही उन्हें शिशु−पोषण के इस कठिन दायित्व से मुक्त रखती और बच्चों के पोषण जैसे दुस्तर कार्य को वे खुशी−खुशी, भावनापूर्वक मेहतरानी की तरह करती हुई भी प्रसन्न और प्रफुल्ल रहती हैं वे कितना बड़ा बोझ उठाती हैं यह सहज समझ में आने वाली बात है।

मनुष्य जाति इस प्रथा को भूलकर अमानवीय आचरण पर उतर रही है किन्तु अनेक जीव अब भी इस उपयोगी परम्परा को कायम किये हैं। सम्भवतः वे अन्त तक इस कार्य में निष्ठा बनाये रखेंगे। डाल्फिन जाति की मछलियों से चिरकाल से यह परम्परा चली आ रही है। डाल्फिन जब गर्भावस्था में होती है तब उसी जाति की कोई वृद्ध मादा बहू और नाती की सुरक्षा के लिये उन्हें अपनी पीठ पर तब तक चढ़ाये घूमती है जब तक शिशु जन्म न ले ले। शेरों में ऐसी प्रथा है कि दूसरी शेरनी प्रसूता की सहायता करती और उसके बालकों की देखभाल करती है कदाचित कभी शेरनी का निधन हो जाये तो वही पालिका उनकी माँ बन जाती है और उनका पालन विमाता की तरह नहीं सगी माता की तरह व्यवस्था और लाड़−प्यार से करती है किन्तु मनुष्यों में विमाता के प्रति सामान्य दृष्टि कितनी संकीर्ण है यह सभी जानते हैं सभी मामलों में यह भले ही न हो तो भी प्रायः वैसा ही होता है जैसी मान्यता बन गई है।

बोनीलिया मादा नर की अपेक्षा इतनी बड़ी होती है कि वर्षों तक जीव शास्त्री इन्हें दो जाति के जन्तु समझते रहे। मादा अपने स्तर को आजीवन अपने पेट की थैली में रखती है यहीं उसे आहार विश्राम आदि सभी कुछ मिलता रहता है। इस गुण के कारण ही वर्षों अध्ययन के बाद यह पता लगाया जा सका कि दोनों ही जन्तु एक ही जाति के नर व मादा हैं।

अपेक्षाकृत अपने से कृशकाय पति का भार आजीवन ढोने वाली बोनीलिया सहकारी जीवन का एक अनूठा उदाहरण है और इस बात की प्रेरणा कि संसार में मैत्री का आधार समान हित समान स्वार्थ साधक ही नहीं कष्ट सहकर भी दूसरों का कल्याण भावनात्मक आदान−प्रदान होना चाहिये उससे जीव में कहीं अधिक गति और रस आता है।

“लाइकेन” जीव−विज्ञान का एक ऐसा शब्द है जो प्रकृति सहजीवन का उद्घोष करता है। बरसात के दिनों में जहाँ-तहाँ उगने वाले कुकुरमुत्तों को तुलसीदास ने सुकृत की उपमा दी है। वास्तव में यह है भी ऐसा ही। देखने में तो यह लगता है कि कुकुरमुत्ता जिस पेड़ पर या पत्थर की चट्टान पर उगा है वही उसका आश्रय और पोषक है पर तथ्य इससे विपरित है इसके कोमल तने के अन्दर जल शैवाल नाम का कोष−समुदाय निवास करता है वह कुकुरमुत्ते के भीतर न केवल सुरक्षित बना रहता है अपितु कुकुरमुत्ते के इस उपकार का बदला वह उसे प्रकृति से जीवन तत्व खींचकर कुकुरमुत्ते को दे देता है जिससे उसका भी विकास होता रहता है। इसी तरह का सम्बन्ध घोंघे में रहने वाले कर्कट तथा सी एनीमोन के बीच पाया जाता है। कर्कट आजीवन इन्हें पीठ पर बैठाये घूमता रहता है। यह जीवन इस उपकार का बदला कर्कट की जीवन रक्षा में सहायता के रूप में करते हैं। कर्कट अनेक जल जीवों का प्रिय भोजन है किन्तु यह एनीमोन अपने शरीर से एक प्रकार का विषैला द्रव निकालते रहते हैं जिसके भय से आक्रामक जीव कर्कट से कोसों दूर भागते हैं।

जैसा कि नाम से जाना जा सकता है फ्रांस में पाया जाने वाला मेल मिड वाइफ टोड नामक मेंढक मादा को, बच्चे को सोने का कष्ट नहीं देता। यह अंडों को स्वयं अपनी टाँगों में तब तक चिपकाये रहता है जब तक उनसे बच्चे न निकल आयें इस तरह वह न केवल अपनी पारिवारिकता का परिचय देता है। अपितु आदर्श दाम्पत्य निष्ठा का भी। परस्पर एक दूसरे के प्रति इस तरह उदार और सहायक बने रहने से इस मेढ़क परिवार की तरह चाहें तो मनुष्य भी अपने पारिवारिक जीवन को आदर्श और आनन्दपूर्ण बनाये रख सकते हैं।

जिराफ और जेबरा की दोस्ती जीव जगत की एक अनोखी घटना है। जिराफ जेबरे को खाना खिलाता है जेबरा न केवल संकट के समय जिराफ को उसकी पूर्व जानकारी देता है अपितु उसकी प्राण देकर भी सहायता करता है।

पानी में तैरते दरियाई घोड़े की पीठ पर बैठी चिड़ियों से दोस्ती भी ऐसी है। चिड़िया उसकी पीठ पर बैठ कर केवल अपने लिये आहार प्राप्त करती है अपितु सैर का भी आनन्द लेती है। दरियाई घोड़े का भी उसमें अपना स्वार्थ है अपने शरीर और मुँह पर लगे अवांछनीय तत्वों की सफाई वह इन चिड़ियों से करा लेता है इस तरह उनकी यह मैत्री प्रगाढ़ रूप में चलती रहती है।

सहयोग का यह क्षेत्र जीव−जीव तक ही सीमित नहीं मनुष्य और जीव समुदाय परस्पर भी इस मैत्री और उदार सहकारिता के पुष्प फल लम्बे वर्षों से प्राप्त करते चले आ रहे हैं। तोते और मैनाओं के द्वारा चोरों से मालिक की सुरक्षा के दृश्य तो कभी−कभी देखने में आते हैं पर खाकी रंग की 5 इंच की छोटी सी चिड़िया हनी गाइड का उपकार तो मनुष्य के साथ वर्षों से जुड़ा है। हनीगाइड शहद ढूंढ़ने वालों के लिये गाइड का काम करती है वह जैसे ही किसी सहरिये (शहद निकालने वाले) को देखती है एक विशेष प्रकार की आवाज करती है उसे अपनी ओर आकर्षित करती है अब वह आदमी उसके पीछे−पीछे चलने लगता है। हनीगाइड इसी तरह चहचहाती एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक चलती हुई उसे उस स्थान तक पहुँचा देती है जहाँ शहद का छत्ता लगा होता है।

इसमें उसका अपना भी स्वार्थ है। मधु−छत्ते का मोम उसका विशेष प्रिय भोजन है। यह सहयोग वह इसी के लिये करती है किन्तु कदाचित सहरिये ने यह भूल को कि छत्ते का मोम उसे खाने के लिये नहीं छोड़ा तो फिर वह उसे जंगल में बहकाकर किसी ऐसे स्थान पर पहुँचा देगी जहाँ कोई खूंखार सर्प या भयानक जंगली जीव होगा। इस भय से मनुष्य को उसके साथ विश्वासघात की हिम्मत नहीं होती। आदमी स्वयं ढूंढ़े और हनीगाइड भी वहाँ पहुँच जाये पर मोम न मिले तो वह यह असहिष्णुता नहीं दिखायेगी वह विशुद्ध अपने परिश्रय का ही लाभ लेने की इच्छुक रहती है पर ऐसी परिस्थिति में भी वह व्यक्ति को पहचानने और भविष्य में उससे दोस्ती जोड़ने की दूरदर्शिता से भी चूकती नहीं।

हनीगाइड के शरीर में कोई ऐसा तत्व है जो मोम को पिघला देने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी तक उस तत्व की खोज नहीं कर पाये। जब ऐसी आशा बंधी है कि हनीगाइड सम्भव है। इस कठिनाई का निराकरण कर दे ऐसा हुआ तो ‘आर्टरियों स्कले रोसिस’ धमनियों के सख्त हो जाने जैसी असाध्य बीमारियाँ का निदान सम्भव हो जायेगा।

मनुष्य जीवन अपनी सभ्यता के आदि काल से ही जिन मनुष्येत्तर प्राणियों से उपकृत हुआ पारावत या कबूतर उनमें से एक है। मनुष्य के उपकार के लिये उसने अपार संकट सहे, कष्ट झेले पर उसकी सहिष्णुता और कर्त्तव्य−निष्ठा को रत्ती भर आँच नहीं आई। 1870-71 में जर्मनी ने फ्रांस में घेरा डाला उस समय पेरिस में कबूतरों की एक विधिवत सिगनल ब्रिगेड स्थापित की गई थी, संकट ग्रस्त और युद्ध पीड़ित क्षेत्रों में सन्देशवाहक का कार्य यह ब्रिगेट ही करती थी। कहना न होगा कि जर्मनी के पंजे से फ्रांस को मुक्ति दिलाने का श्रेय इन कपोतों को ही है। ग्रीक वासी कपोतों को लम्बे अर्सों तक अपने डाकियों के रूप में प्रयुक्त करते रहे। भारत के उपनिवेशों में सन्देश भेजने, पाने का कार्य पुर्तगाली शासक इन कबूतरों से ही कराते थे।

इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि ग्रीक के राजकुमार एंड्रोक्लीस ने एक बार एक शेर के बच्चे के पाँवों से काँटा निकाला था। कुछ दिन बाद शेर बड़ा होकर राजकीय चिड़ियाघर में आ गया इस बीच एंड्रोक्लीस को किसी अपराध में सजा दी गई। उसे मृत्यु दण्ड के बतौर उसी शेर के पिंजड़े में फेंका गया किन्तु खूँखार शेर ने राजकुमार के शरीर की सुगन्ध से अपने उपकारी को पहचान लिया, कृतज्ञता उमड़ पड़ी। चाटने लगा जैसे बहुत दिनों बाद कोई बिछड़ा बालक अपनी माँ से मिला हो। खूँखार जानवरों में भी जब इस तरह की प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं तो मानने के लिये विवश होना पड़ता है कि जीवन की गहराइयाँ जिन तत्वों से बनी है वे मूलतः भाव−संवेदनाएं हैं। मैत्री, प्रेम, दया, करुणा और उदारता हर किसी को प्रिय है भले ही भौतिक दृष्टि से उसका कुछ भी मूल्यांकन क्यों न किया गया हो।

प्रेम, दया, करुणा, उदारता और सहअस्तित्व की तरह प्राणियों में ईर्ष्या की भावना भी कम नहीं पाई जाती किन्तु वह विशुद्ध स्पर्धा के रूप में कई बार तो उनमें यह स्पर्धा भी अत्यन्त सिद्धान्तपूर्ण होती है। लोडस्टर (एक प्रकार की मछली) जाति की मादा के शरीर पर एक प्रकार का कड़ा आवरण चढ़ा होता है। गर्म धारण से पूर्व वह अपना वह खोल उतार फेंकती है। उसे इस स्थिति में पाकर मादा में ईर्ष्या से जलभुन उठती है। यह तथ्य इस बात से सिद्ध होता है कि उस पर केवल मादायें ही चारों तरफ से आक्रमण कर देती हैं कोई भी नर ऐसा नहीं करता।

जीवों में प्रतिस्पर्धा सिद्धान्त रूप में ही होती है वे न तो जन्मजात बैर बांधते हैं न देर तक उस गैर को मन में रखते हैं एक शेर दूसरे को चित्त कर दे बस उनका फैसला अन्तिम हो गया फिर लड़ाई समाप्त और सन्धि का रास्ता साफ है।

शेर अपने लिये एक क्षेत्र नियत करके रखते हैं और एक−दूसरे की सीमा का अतिक्रमण नहीं करते यदि एक शेर किसी नये स्थान पर जाये और उसे यह ज्ञात हो जाये कि यहाँ का साम्राज्य किसी और का है तो वह बिना कोई अपमान अनुभव किये उस क्षेत्र को तुरन्त छोड़ देता है। शेर अपने क्षेत्र की पहचान वृक्षों पर लगाये गये नाखून के निशानों से तथा एक विशेष प्रकार की गन्ध से करते हैं। स्थान−स्थान पर पेशाब करके उसकी गन्ध से भी शेर अपनी सीमा निर्धारित करते पाये गये हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि प्रवासी शेर पंजों के निशान की ऊंचाई से पूर्व निवासी शेर की शक्ति का अनुमान करते हैं और यदि उन्हें यह ज्ञात हो जाये कि अधिष्ठित दुर्बल श्रेणी का है तो वह भिड़ने के लिये भी तैयार हो जाता है, पर ऐसा बहुधा नहीं होता।

बहुत बुरी तरह ही भूखा न हो तो शेर प्रायः अकेले शिकार खाना पसन्द नहीं करते। शिकार के बाद शेर एक विशेष प्रकार की आवाज से समीपवर्ती जंगल के शेर−शेरनियों को दावत में सम्मिलित होने के लिये आमन्त्रित करता है। प्रत्युत्तर में दूसरा शेर स्वीकृति के स्वर में उसी की तरह की आवाज करता है। आमंत्रित शेर को तब वहाँ तक पहुँचने में कुछ समय भी लगे पर भोज उनके एकत्र हो जाने के बाद ही प्रारम्भ होता है। इस दावत में बच्चों को पूर्ण अनुशासित रहना पड़ता है। यदि वे कुछ चंचलता या ढिठाई करें तो उन्हें शेरनी की ताड़ना का भी सामना करना पड़ता है। शेर एकाकी रहने वाला जीव है पर उसकी सामूहिकता और पारिवारिकता भी प्रौढ़ किस्म की है।

तुच्छ कहे जाने वाले इन जीवों की जीवन दृष्टि बड़ी व्यापक बड़ी उदार होती है उसे देखकर ही प्रिन्स क्रोपाटकिन ने लिखा है−हमारा जीवन के प्रति मोह इस कारण से है कि उसमें आत्मा को आह्लाद प्रदान करने वाले तत्व अधिक है। तभी वह जीवन के लिये संघर्ष करता है यदि उपयोगितावाद हो प्रकृति का सत्य रहा होता तो फिर इस सृष्टि में रहना कौन पसन्द करता है।

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