दृष्टिकोण एवं जीवन क्रम में संतुलन का समन्वय
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जो मन से स्वस्थ है वह शरीर−स्वास्थ्य साध लेता है। यदि मनःक्षेत्र उद्विग्न, आवेशपूर्ण हो तो पौष्टिक आहार और पर्याप्त उपचार की व्यवस्था भी व्यर्थ ही सिद्ध होगी तथा रोग अकारण ही उत्पन्न होते रहेंगे। मनःस्वास्थ्य का आधार है सन्तुलन।
व्यक्ति−जीवन हो या सामाजिक जीवन, सन्तुलन ही सही गतिशीलता को जन्म देता है। गर्मी−सर्दी का असन्तुलन पर्यावरण में आँधी तूफान की सृष्टि करना है और मनःस्थिति के उतार−चढ़ाव का असन्तुलन व्यक्ति के भीतरी क्षेत्र को झकझोर कर रख देता है। समाज में व्यवस्था और भावना का सन्तुलन ही जन−जीवन को सामान्य रीति से चलाता रहता है। विकृतियों और अवांछनीयताओं की वृद्धि क्रान्ति धर्मी आन्दोलनों− अभियानों को जन्म देती है।
व्यक्ति के मानसिक असन्तुलन की विक्षुब्ध प्रतिक्रिया ज्ञानतन्तुओं के माध्यम से शरीर के अंग−अवयवों तक पहुँचकर वहाँ भी विष−वृद्धि करती है।
‘इकॉलाजी’ की मान्यता है कि सृष्टि सन्तुलन पर टिकी है। परस्परावलंबन (इन्टरडिपेन्डेन्स) मर्यादा (लिमिटेशन) और सम्मिश्रता (काम्प्लैक्सिटी) इन तीन आधारों पर प्रकृति व्यवस्था गतिशील है।
व्यक्ति−जीवन में सन्तुलन का आधार यही तीनों माने जा सकते हैं। परस्परावलम्बन का अर्थ हुआ प्रकृति की हर वस्तु अन्य सब वस्तुओं के साथ जुड़ी है। व्यक्ति जीवन में भी सभी बातें परस्पर अंतर्संबद्ध और परस्परावलम्बी है। सुख−दुःख, संयोग−वियोग परस्पर जुड़े हैं। ऐसे में मात्र प्रिय एवं अनुकूल परिस्थितियों की ही आशा करना दुराशा ही सिद्ध होने वाला है । अतः उभय स्थितियों में सन्तुलन बनाए रखना आवश्यक है।
मर्यादा तो सन्तुलन का आधार है। जब तक व्यक्ति अपनी सीमाओं (लिमिटेशन्स) को नहीं पहचानेगा, वह जीवन में न तो प्रगति कर सकेगा, न शान्ति पा सकेगा। संसार में अनुकूलताएँ प्रतिकूलताएँ, भलाई−बुराई भरी पड़ी हैं। हममें इतनी शक्ति नहीं कि हम उन्हें सर्वथा परिवर्तित कर सकें। दुनिया में काँटे भी रहने ही वाले हैं। उनका सम्पूर्ण उन्मूलन हमारे लिए असम्भव है हमारी सीमा यही है कि हम स्वयं जूते पहन कर काँटों से पैर लहूलुहान हो जाने से बचा लें। हम न तो यात्रा बन्द कर सकते, न ही काँटों को बीन फेंकने के बाद यात्रा प्रारम्भ करने की योजना बनाकर चल सकते हैं।
सम्मिश्रता का सिद्धान्त तो सन्तुलन की और अधिक प्रेरणा देता है। यह सिद्धान्त इस तथ्य का प्रतिपादक है कि जिनके साथ हमारा प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है, उनसे भी परोक्ष सम्बन्ध होता है। समाज की अवांछनीयताएँ दुर्बलताएँ हमारे भीतर की कमजोरियों का भी परिणाम हैं। जितने अंशों में हम अपना परिष्कार करेंगे, उतने अंशों में, हमारी तुलनात्मक सामर्थ्य के अनुसार समाज में भी श्रेष्ठ परिवर्तन अवश्य होगा। हम जो सुविधाएँ भोग रहे हैं और प्रगति के अवसर प्राप्त कर रहे हैं, वह भी सामाजिक परिवेश का ही अंश है। ऐसे में प्रिय वस्तुओं−व्यक्तियों को अपनाता और अप्रिय की कल्पना से भी त्रस्त हो जाना हास्यास्पद ही है। अधिक अच्छा यही है कि धैर्यपूर्वक अप्रिय वस्तुओं−परिस्थितियों का भी स्वरूप समझें और जितना सम्भव हो, उनमें वांछित परिवर्तन लाने का प्रयास करें।
सम्मिश्रता−सिद्धान्त का ही एक पहलू यह भी है कि एक का सुख दूसरे के लिए दुःख का कारण हो सकता है। एक ही सुविधा का अधिक विस्तार, दूसरे की न्यूनतम आवश्यकताओं को भी छीन रहा होता है अतः सुख−दुःख दोनों में मन को सन्तुलित रखें और अपनी सुविधाओं को भी मर्यादित ही रखें। अन्यथा विषमता की प्रतिक्रिया हमारे लिए महँगी पड़ेगी।
वस्तुतः इकॉलाजी के निष्कर्ष प्रत्येक दिशा में मर्यादा और सन्तुलन पर बल देते हैं। उसके अनुसार अमर्यादित उत्पादन और अवाँछनीय उपयोग विज्ञान के अवैज्ञानिक उपयोग की चेष्टा है और इस चेष्टा के दुस्साहस को स्वयं प्रकृति ही कुचल देगी। औद्योगिकी तथा भौतिकता प्रधान सभ्यता के अनियन्त्रित विस्तार से न केवल जड़ जगत तथा प्राणी जगत में घातक असन्तुलन उभरा है अपितु मानव−अस्तित्व भी संकटग्रस्त हो गया है।
व्यक्ति−जीवन में भी असन्तुलन त्रास और पीड़ा का ही कारण बनता है। अपनी परिस्थितियों का सही−सही विश्लेषण कर निर्दिष्ट दिशा में धैर्य एवं अध्यवसायपूर्वक बढ़ते रहने पर उल्लास, आनन्द एवं सफलता प्राप्त होती है। जबकि दूसरों के साथ अपनी तुलना करते रहकर मन की निरंकुश घुड़दौड़ को बढ़ावा देने से तृष्णा, उद्विग्नता विफलता और निराशा ही पल्ले पड़ती है।
क्रियाशीलता के क्षेत्र में सन्तुलित लक्ष्य निर्धारण की जितनी आवश्यकता होती है, उतनी ही भावनात्मक अनुभूतियों के क्षेत्र में भी। वस्तुतः सुख−दुःख की समस्त अनुभूतियाँ सापेक्ष होती है। दुर्भाग्य-सौभाग्य की धारणाएँ तक हमारे अपने दृष्टिकोण का परिणाम होती हैं। खिन्नता, शिकायत और अभियोग की प्रवृत्ति बन जाय, तो उपलब्ध साधन−सुविधाएँ सदैव−कम ही दिखती रहती हैं और समाज में अपने को सर्वाधिक दुःखी व्यक्ति ही मान लेने को जी करता है। जबकि प्रसन्नता की प्रवृत्ति अभावों के बीच भी, अपने से भी दुःखी तथा आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों की स्थिति देखकर कष्टों को हँसते−खेलते सहने की प्रेरणा देती है।
सत्य तो यह है कि संसार में अधिक महत्व घटनाओं परिस्थितियों का नहीं, अपने ही दृष्टिकोण का है। असन्तुलित दृष्टिकोण सदा अशान्ति और दुःख देता है। सन्तुलित दृष्टिकोण जीवन में आशा−उल्लास बनाए रखता है। सुख−दुःख में वास्तविकता का अंश भी होता है, पर उन वास्तविकताओं के बीच सही मार्ग भी तभी निश्चित किया जा सकता है जब मनःस्थिति सन्तुलित हो। फिर इन वास्तविकताओं से कहीं बहुत अधिक दुःख−दारिद्रय, दुर्भाग्य−असन्तोष की अनुभूतियाँ तो काल्पनिक ही होती हैं असन्तुलित मनःस्थिति सदैव आधारहीन कल्पनाओं के बीच झूलती रहती है। उपलब्ध साधनों और प्रस्तुत परिस्थितियों में सरसता का अनुभव कर पाना। उसके लिए सम्भव ही नहीं होता। असन्तुलित मनःस्थिति वाला व्यक्ति अनिष्ट की आशंकाओं से ही आक्रान्त रहा आता है, विकट परिस्थितियों से संघर्ष का क्षण उपस्थित होने की कल्पना से ही वह घबराता रहता है।
सन्तुलित दृष्टिकोण ही प्रगतिशील जीवन का आधार है। हानि−लाभ का क्रम जो जीवन में अनवरत रूप से चलता ही रहा है। इस तथ्य को स्मरण रखा जाय, तो विषम से विषम परिस्थिति और बड़ी से बड़ी क्षति भी हँसकर झेली जा सकती है। सुख दुःख की सापेक्षता का भी ध्यान रखा जाय, तब तो कहना ही क्या? अधिकांश दुःखों को अस्तित्व ही मिट जाय और सुख भी सामान्य ही प्रतीत हो उनके कारण आचरण में उच्छृंखलता, दर्प या आवेश न उत्पन्न हो। सन्तुलन ही जीवन का केन्द्रीय नियम है। उसे सदा बनाये रखने में ही सब प्रकार से कल्याण है।
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