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Magazine - Year 1978 - Version 2

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बुढ़ापे का भी अपना आनन्द है।

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बचपन में कितनी ही क्षमताएँ नहीं होतीं, वे समयानुसार बढ़ती हैं। कोई चिन्ता नहीं करता कि बच्चों में प्रौढ़ों जितनी योग्यताएँ क्यों नहीं है। फिर इसी बात की चिन्ता क्यों की जाय कि बुढ़ापे में कितनी ही क्षमताएँ घट रही हैं। परिवर्तन ही जीवन है। परिवर्तन का पूर्वार्ध विकास है और उत्तरार्ध अवसाद। सूर्य दोपहर तक चढ़ता है फिर ढलने लगता है। इस पर किसी को न आश्चर्य होता है और न दुःख। सृष्टि का यह बुद्धिमत्तापूर्ण उपक्रम है कि वह वस्तुओं को एक सीमा तक विकसित करे और फिर मदारी की तरह अपने करतबों को सेट कर भानमती की पिटारी में बन्द कर ले। यह कौतूहल देखने योग्य है और रस लेने योग्य। बुढ़ापे के अवसाद को देखकर खिन्न होने की आवश्यकता नहीं है। बसन्त के नव−पल्लवों का उदय एक ढंग का सौन्दर्य है। पतझड़ में पीले पत्तों को भूमि पर गिरना ये भी उससे कम सुन्दर नहीं है। स्वर्ग से देवताओं द्वारा पुष्प बरसाये जाने के कथा प्रसंगों का प्रत्यक्ष दर्शन हम पतझड़ के पीत पत्रकों को भूमि पर गिरते हुए इन्हीं आँखों से कर सकते हैं। बसन्त के उल्लास की तरह हेमन्त का अवसाद भी क्यों न हमारे लिए आनन्ददायक हो। दुहरा आनन्द क्यों न लिया जाय। बसन्त को लाभ और हेमन्त को हानि बनाकर क्यों हम खाली हाथ रहें और पश्चाताप की उदासी सिर पर ओढ़े। उठती हुई आयु की किशोरावस्था की तरह ही ढलती आयु की वृद्धावस्था भी क्यों न हमारे लिए आनन्ददायक और उल्लास भरी हो। प्रातःकाल उठने की उमंगों की तरह की रात्रि की सुखद निद्रा की कल्पना भी हमें क्यों आनन्द विभोर न करे।

बचपन अपने हाथ से चला गया वह लौट नहीं सकता, फिर भी शैशव इस दुनिया में मौजूद ही रहता है। दूसरे अनेक बालकों में उसे किलकारियाँ लेते हुए आँखों के सामने विद्यमान देखा जा सकता है। यदि शैशव सुहाता हो तो उसे अपने पेड़ पर से उतरकर सामने के असंख्य पौधों पर सामने ही खड़ा देखकर आनन्द लिया जा सकता है। अपने हाथों कई कार्यों का शुभारम्भ करते हैं, आगे चलकर उन्हें दूसरे चलाने लगते हैं। इसमें प्रसन्नता होती है दुःख नहीं। कोई समझदार आरम्भकर्त्ता ऐसा नहीं सोचता कि इसे अन्त तक चलाते रहने का काम भी उसी को करना है। जीवन की प्रियताएँ अपने हाथों से खिसककर यदि दूसरों के द्वारा अपने आस्तित्व और विकास का परिचय दे रही है तो खोया क्या, गया क्या, जो प्रिय था वह सामने ही विद्यमान है, पर खेद किस कारण किया जाय?

प्रातःकाल का उदीयमान सूर्य सुहावना लगता है, पर सायंकाल को उसके ढलने की शोभा को भी यदि कला दृष्टि से निहारा जा सके तो उसकी शोभा भी कम नहीं होती। निस्सन्देह उदय और अस्त के दृश्यों में अन्तर रहता है। उस अन्तर में प्रकृति के परिवर्तन प्रयासों का कौतुक कौतूहल निहारा जा सकता है। फिर भी सौन्दर्य की मूल स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। जीवन और मरण दोनों ही परिस्थितियों में उत्साहवर्धक परिवर्तन है। माता की उदर दरी से निकलकर इस विशाल विश्व की भागीदारी का अवसर मिलना एक सौभाग्य है। शरीर के कोटर से निकलकर उन्मुक्त आकाश में उड़ने की क्षमता मिलने पर जब पक्षी शावक खेद नहीं मानते तो मरणोत्तर जीवन की विशालता हमारी कल्पना का सुखद आधार क्यों न बने? शरीर के पिंजड़े में बाधित रहने पर ऐसा क्या आनन्द मिलता है जो उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की मरणोत्तर स्थिति में हमें नहीं मिल सकता। प्रगति का स्वागत क्यों न करें? हर पैर आगे बढ़ाते समय पिछला पैर अपनी जगह पर से छूटता ही है। जहाँ के तहाँ जमे रहने की बात पर यदि पैरों का आग्रह हो तो वे प्रगति पथ पर अग्रसर कैसे हो सकेंगे? सराय में डेरा डालकर कौन मुसाफिर बैठता है? आगे की योजनाएँ उसे बढ़ चलने के लिए प्रोत्साहित करती है। जीवन के प्रगति क्रम में वृद्धावस्था से लेकर मरण परिवर्तन को भी सम्मिलित रखा जा सके तो इसमें न तो कुछ अटपटा लगेगा और न खेदजनक। समुद्र की लहरें आगे ही आगे बढ़ती हैं। पीछे का तो छूट गया−अब का छूटने जा रहा है। इस प्रकार का खेद करने लगें, तो समुद्र की लहरें अपना प्रवास आनन्द ही गँवा बैठेंगी।

फिल्म देखने के लिए सिनेमा घर में प्रवेश करते समय उत्सुकता होती है और देखकर हाल से बाहर निकलते समय सन्तुष्टि। किसी दर्शक को सिनेमा हाल छोड़ने का दुःख नहीं होता। जीवन को सिनेमा घर समझा जा सके तो खेल समाप्त होने की घण्टी सुनकर सन्तोष की साँस ही ली जा सकेगी। सब कुछ गुम गया। यह सोच कर सिर धुनने की आवश्यकता क्यों पड़ेगी? विद्यालय में प्रवेश करने के दिन पट्टी पूजन का प्रसंग उत्साहवर्धक होता है, पर उत्तीर्ण करके प्रमाण पत्र लेकर विदाई के दिन भी कौन खेद मनाता है। वृद्धावस्था में मरण की निकटता समीप आ रही हो और उदासी छा रही हो तो उन बच्चों से कुछ सीखना चाहिए जो पढ़ाई पूरी करके विद्यालय छोड़ते समय तनिक भी निराश नहीं दिखाई पड़ते।

विकासोन्मुख जीवन क्रम में भूतकाल की स्मृतियाँ संजोये रहने और उन्हें महत्व देने की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् चिन्तन को−भावी निर्माण को−सुखद कल्पनाओं में नियोजित रखना पड़ता है। किशोर की दृष्टि में बचपन का अनगढ़पन चला जाना हानिकारक नहीं समझा जाता। प्रौढ़ावस्था आने पर किशोर काल की अनुभव हीनता समाप्त होने का दुःख नहीं मनाया जाता। वयोवृद्ध अपनी परिपक्वता पर गर्व करते हैं और प्रौढ़ों की अनुभवहीनता के लिए प्रताड़ना देते हैं। बच्चे किशोरावस्था की प्रतीक्षा करते हैं। किशोरों में प्रौढ़ावस्था की समर्थता पाने का उत्साह रहता है। फिर वृद्धों को आग की सुखद सम्भावनाएँ सोचने की अपेक्षा ऐसा क्यों समझना चाहिए कि जो सुखद था वह चला जा रहा है और दुःखद आ रहा है। निषेधात्मक चिन्तन ही भूत बनकर डराता है यदि विचारों में विधेयात्मक स्तर पर सोचने की कला जुड़ सके तो उसके क्रमिक विकास के प्रकृति क्रम को ध्यान में रखते हुए उज्ज्वल भविष्य के लिए सोचना बन पड़ेगा। तब निराशा का कोई कारण न रहेगा। आशा की अभिनव किरणें सदा आगे बढ़ने का उत्साह भरती रहेंगी। शरीर के जीर्ण होने या कलेवर बदल जाने जैसे सामान्य से प्रकृति परिवर्तन पर किसी को खेद करने की आवश्यकता नहीं।

जिस प्रकार साइकिल की चाल अपने पैरों के इशारों से बढ़ाई या घटाई जा सकती है उसी प्रकार बुढ़ापे का आगमन जल्दी भी हो सकता है और उसे दूर भी धकेला जा सकता है। स्वास्थ्य रक्षा के नियम पालन करने और मानसिक सन्तुलन बनाये रहने से उसे निरोग, बलिष्ठ और दीर्घजीवी बनाये रखा जा सकता है। सबसे बड़ी बात है कि जीवन का स्वरूप और बिताने का ढंग समझा जाय तो शरीर और मन दोनों को सुदृढ़ बनाये रखा जा सकता है और बुढ़ापे को ऐसा रखा जा सकता है जिसमें कुछ भी कष्टकारक प्रतीत न हो वरन् जीवन के अगणित रसों में से एक अनोखा स्वाद बुढ़ापे का भी चखा जा सके ।

बुढ़ापे में उपलब्धियों का अहंकार बढ़ जाता है। उत्साह शिथिल पड़ने से जिज्ञासा के द्वार बन्द होते हैं और अनावश्यक अहंकार से लदा हुआ मन भारी रहने लगता है। आशाएं छोड़ बैठने और अन्धकारमय नीरस भविष्य की कल्पना करते−करते निराश रहने की आदत पड़ जाती है। इस बोझिल और नीरस मनःस्थिति का प्रभाव शरीर पर पड़ता है। उसमें शिथिलता आ जाती है। उत्पन्न होने वाले मलों के निकलने में कठिनाई पड़ती है। रक्त से स्वच्छता की मात्रा घटती ओर मलीनता का अनुपात बढ़ता है। यही मरण की दिशा में अग्रगमन। यदि मनःस्थिति वैसी ही बनाये रखी जाय जैसी बालकों की होती है तो उसका प्रभाव शरीर पर पड़ेगा। स्फूर्ति, सक्रियता, उमंग, आशा, जिज्ञासा, नम्रता बनी रहने से मानसिक सन्तुलन और उत्साह बना रहेगा। फलतः बुढ़ापा उस बुरे रूप से न आवेगा जैसा कि आमतौर से आता है। विशेषज्ञों के अनुसार आमतौर से बुढ़ापे को जिस अभिशाप के रूप में देखा जाता है वह एक मानसिक रोग की प्रतिक्रिया है, जो अपने लक्षण−शरीर को जरा−जीर्ण और मस्तिष्क को अस्त−व्यस्त बनाती हुई प्रकट होती है। इस मनोरोग का नाम है−सेनाइल डिमेनशिया इसमें प्रगति अवगति की ओर वापिस लौटती है और बुड्ढा फिर बालकों जैसा अविकसित, अदूरदर्शी बनता चला जाता है। इस स्थिति को विचारपूर्वक रोका जा सकता है।

जो जीवित हैं वे चलते हैं। यह सोचने की अपेक्षा यह समझा जाना चाहिए, जो चलता है सो जीवित रहता है। सफलताओं और असफलताओं में प्रसन्नता होती है। इस मान्यता में परिवर्तन किया जाना चाहिए कि जो प्रसन्न रहता है उसके समीप अनुकूलताएँ और सफलताएँ खिंचती चली जाती है। हम वर्तमान को प्रसन्नता से भरें, इसलिए आवश्यक है जो सामने है उसका महत्व समझें और उपयोग ढूंढ़ें। बचपन का−यौवन का −अपने ढंग का आनन्द था। वृद्धावस्था में भी स्थिति के अनुरूप कितने ही ऐसे आधार हैं। जिनके लिए गर्व किया जा सकता है। रस लिया जा सकता है और अधिक अच्छा पाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। गुजारे की और परिवार की जिम्मेदारियों से निवृत्ति मिली तो खाली होने और सूनेपन की नीरसता क्यों अपनाई जाय? लोक मंगल का इतना विशाल क्षेत्र सामने पड़ा है कि उसमें व्यस्त रहकर कमाने की जिम्मेदारी पूरी करने से भी अधिक सक्रिय रहा जा सकता है। शरीर कम काम करता हो, इन्द्रियाँ साथ देती हों तो चिन्ता की कोई बात नहीं। परिपक्व व्यक्तित्व और परिष्कृत अनुभव की सम्पदा का उपयोग करके घटने वाली शरीर क्षमता की भर पाई आसानी से हो सकती है।

सदा एक ही कोठरी में कैद रहना पड़ेगा इस कल्पना मात्र से कोई कांपने लगेगा। परिभ्रमण करने की इच्छा बाल वृद्ध सभी को बनी रहती है। फिर एक ही शरीर की कोठरी में−एक ही ढर्रे का जीवन जीते रहने में किसे सन्तोष रह सकता है। एक यूनानी दार्शनिक से किसी ने पूछा−आपको यदि अमर बना दिया जाय तो कैसा लगेगा? उसके उत्तर में उन्होंने कहा−मैं घबराकर आत्म−हत्या कर लूँगा। सुविधा एक चीज है और स्वच्छन्दता दूसरी। आत्मा मुक्ति पाना चाहता है इसका एक अर्थ यह भी है कि वह एक ही पिंजड़े में सदा कैदी बन कर नहीं रहना चाहता।

यदि नींद को आनन्ददायक माना जा सकता है तो महा निद्रा के समय मिलने वाला ऐसा विश्राम क्यों कष्टकर लगे? जिसमें लम्बी जिन्दगी की थकान दूर करने और अगली यात्रा के लिए शक्ति संचय का अवसर मिलता है।

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