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Magazine - Year 1978 - Version 2

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अन्तःकरण में प्रेम सम्वेदना उभरे

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आत्मीयता भरी सद्भावनाओं का नाम प्रेम है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। उसके दाता को अपार सन्तोष मिलता है और उपलब्ध कर्ता कृतकृत्य होता है प्रेम को व्यवहार भर के लिए−किन्हीं मित्र स्वजनों के लिए सीमित रखने से काम नहीं चलता । वह तो चतुरता या घनिष्ठता भर कही जा सकती है। वह चरित्र और स्वभाव में सम्मिलित होना चाहिए। फूल का स्वभाव ही प्रसन्नता और सुगन्ध है इसके लिए उसे किसी बनावट या प्रशिक्षण की जरूरत नहीं पड़ती । प्रेम इसी प्रकार का−इसी स्तर का होना चाहिए। नर−नारी के बीच पाया जाने वाला यौन आकर्षण प्रेम से सर्वथा भिन्न प्रकार का आकर्षण है। इसमें वंश वृद्धि के लिए नियोजित प्रकृति प्रेरणा भर काम करती है यह उमंग पशु-पक्षियों और कृमि कीटकों में भी पाई जाती है। कामोत्तेजना नर−नारियों के बीच एक विचित्र प्रकार का उत्साह भरती है और वह अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के बाद नशे की तरह ठंडा हो जाता है। प्रेम इससे सर्वथा भिन्न प्रकार की वस्तु है। वह किसी भौतिक विनिमय पर आधारित नहीं होता वरन् उच्चस्तरीय आध्यात्मिक आदान−प्रदान करता है। इस मार्ग पर प्रथम कदम बढ़ाने वाले को उत्सर्ग करना पड़ता है और उपलब्ध कर्ता को अपने अनुदानी की गरिमा पर आंच न आने देने का पूरा−पूरा ध्यान रखता है। दोनों एक−दूसरे को उठाते हैं, गिराता कोई किसी को नहीं। जिस घनिष्ठता के फलस्वरूप आदर्शों के परिपालन में बल मिले, उत्कृष्टता उभरे और सन्मार्ग पर चल पड़ने में सहयोग मिले उसी घनिष्ठता को प्यार कहना चाहिए। ऐसे तो प्यार के नाम पर आज पतन ही पतन गली चौराहों पर बिकता फिर रहा है। प्रेम आत्मा का गुण है, शरीर गत आकर्षण नहीं। उसमें पाने की नहीं देने की ही आतुरता रहती है। आकुलता छलकती है। लगाव आकर्षण, दुलार−मनुष्यों के बीच होता है और वह प्रायः नीति मर्यादाएँ छोड़कर प्रेमी से कुछ पाने के लिए ताना बाना बुनता है पर प्यार में, ऐसी कोई बात नहीं है। सन्तान के प्रति माता का प्यार आदर्श माना गया है। इसमें भावनात्मक आदान−प्रदान है। प्रत्यक्ष व्यवहार में तो प्रेम की अग्रिम पंक्ति में जो हो, उसे घाटा ही घाटा है क्योंकि उत्तरदायित्व भी उसी का बड़ा है। प्यार करने का व्यवहार उठाने की प्रक्रिया में ही परिणत होता है। माता बच्चे को गोदी में और पिता−कन्धे पर उठाये फिरते हैं। यह उठाने का−वात्सल्य जहाँ जितना उभरता देखा जाय, वहाँ उतने ही सच्चे प्रेम की स्थिति आँकी जा सकती है।

प्रेम वस्तुतः आदर्शों से किया जाता है। आत्मा की प्यास जिस उत्कृष्टता की है−उसी को परमेश्वर कहते हैं। प्रेम का केन्द्र परमेश्वर है। उसमें स्थिरता है और अभीष्ट उद्देश्यों की पूर्ति भी। भौतिक प्यार के साथ कई प्रकार के स्वार्थ जुड़े रहते हैं। उसमें प्रतिफल की अपेक्षा रहती है। कमी वेशी पड़ने पर उस उन्माद में ज्वार भाटे आते रहते हैं। आज के मित्र, कल शत्रु होते देखे गये हैं। यह प्यार व्यवहार या व्यवसाय है। जिसके लाभ में आकर्षण और हानि में विकर्षण होना स्वाभाविक है शाश्वत प्रेम में केवल लाभ ही लाभ है। यह अनुदान एकांगी होता है उसमें प्रतिदिन की अपेक्षा नहीं की जाती । मूर्ति पूजा के माध्यम से यही अभ्यास किया जाता है। भक्ति द्वारा प्रतिमा की सदा आराधना, अभ्यर्थना की जाती रहती है। बदले में मूर्ति कभी मुस्कराती तक नहीं। अपनी स्तब्धता ही बनाये रहती है। फिर भी भक्त इस रुखाई से तनिक भी विचलित नहीं होता और अपनी एकांगी उपासना करता रहता है। यही भक्त का स्वावलम्बन है जिनमें न कोई आशा है न अपेक्षा। इसमें कभी कोई बाधा, व्यवधान भी नहीं आ सकता। तथाकथित प्रेम पात्र के लिए ऐसा नहीं कहा सकता। जब देव मन्दिर में प्रतिष्ठापित प्रतिमा निष्ठुरता धारण किये रह सकती है तो घर बाजार में रहने वाले सामान्य व्यक्ति यदि उतार−चढ़ाव का परिचय दे−कभी पतंग की तरह आसमान पर चढ़ते और कभी जमीन पर गिरते दिखाई पड़े तो उसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है। प्रतिदान के लिए लालायित प्रेम का निराश होना निश्चित है। काबू तो अपने ऊपर ही रखा जा सकता है, किसी दूसरे पर अपना क्या वश है। प्रेम की आराधना ऐसी नहीं है जो किसी दूसरे की कृपा के सहारे सफल-असफल होती हो। वह अपने भीतर से ही उगती है और अपने तक ही सीमित रहती है। दूसरे उसमें सहयोग दें, न दें यह उनकी मर्जी पर निर्भर है । प्रेमी को आरम्भ से ही उसकी अपेक्षा नहीं रहती है अन्ततः प्रतिदान की उपेक्षा करता रहता है। शाश्वत प्रेम इससे कम में हो नहीं सकता और इससे अधिक वह और कुछ है भी नहीं। अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता को−उदात्त भाव सम्वेदना को उभारना ही प्रेम है। उसके विकास परिष्कार के लिए किन्हीं दृश्य अदृश्य आधारों की सहायता भर ली जाती है। माता−बालक, पति−पत्नी, सखा−स्वजन, गुरु−शिष्य आदि के बीच ऐसी ही मैत्री होती है जिसमें स्वार्थों का आदान−प्रदान नहीं, स्नेह−सौजन्य का उच्चस्तरीय अभ्यास ही अभीष्ट होता है। इसमें प्रिय पात्र के लिए अनन्य सद्भाव रहता है। भूलों को सुधारने और आदर्शों में निष्ठा रखने का आग्रह तो रहता है, पर अपेक्षा कुछ नहीं रहती। ऐसी दशा में प्रेम के आन्तक शिखर तक जा पहुँचने में किसी प्रकार के संशय की गुंजाइश नहीं रहती।

व्यक्ति प्रेम साधना के लिए प्रतीक प्रतिमाओं की तरह उपकरण हो सकते हैं लक्ष्य नहीं। पति के मार जाने पर पतिव्रता के पति प्रेम में रत्ती भर भी कमी नहीं आती। शरीर न रहने या दूर रहने पर भी किसी आत्मा के साथ अति घनिष्ठता बनाये रखने में कुछ अन्तर नहीं आता। इस दृष्टि से परमात्मा का प्रेम पूर्णतया व्यावहारिक है। इसमें आत्म समर्पण ही प्रधान है। ईश्वर अनुग्रह की प्रतीक्षा करते रहने की उसमें तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ती । अपना आत्म निवेदन ही अनन्त अन्तरिक्ष से प्रतिध्वनित होकर अपने पास शब्दबेधी बाण की तरह वापिस लौट आता है। प्रेम भी प्रतिध्वनि से लक्ष्य बेध होता है− प्रतिध्वनि से सारा ब्रह्माण्ड गूँजता है और भाव सम्वेदनाओं के अनेक गुनी होकर वापिस लौटने से अपना अन्तरात्मा आनन्द विभोर हो जाता है। इसमें प्रेम−पात्र का योगदान तो यत्किंचित् ही रहता है। वास्तविक उपलब्धि तो अपनी ही प्रेम भावनाओं के सम्वर्द्धन द्वारा उपलब्ध होती है। उसमें किसी दूसरे सहयोग न तो विशेष सहायक होता है और न असहयोग बाधक। अपनी अन्तःवृत्ति को अपने बलबूते एकांकी विकास की ही तपश्चर्या को प्रेम साधना कहा गया है। भक्तियोग यही है−इसी के सहारे आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त अध्यात्म उपहार उपलब्ध होते हैं। मनुष्य में देवत्व के उदय और परमेश्वर के प्रकटीकरण की पूरी-पूरी सम्भावना इस प्रेम योग की साधना पर अवलम्बित है। ईश्वर के सान्निध्य में−समर्पण में जो आनन्द आता होगा उसी अनुभूति भाव भरी प्रेम सम्वेदनाओं के उभार में भली प्रकार की जा सकती है।

परमेश्वर की स्वरूप रचना मानवी कल्पना है। इसमें उपासनात्मक सुविधा एवं ध्यान धारणा के लिए−जीवन लक्ष्य निर्धारण के लिए−प्रतीक स्थापना का उद्देश्य पूरा होता है। वस्तुतः उसका कोई रूप है नहीं। यदि रूप हो सकता है तो उसमें इतनी छूट और जोड़कर रखनी होगी कि हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुरूप किसी भी आकृति प्रकृति की प्रतिमा गढ़ सके। हाँ उसमें इतना ध्यान अवश्य रखना होगा कि इस प्रतीक के साथ उत्कृष्ट आदर्शवादिता जुड़ी हुई हो, निकृष्टता एवं दुष्टता को परमेश्वर के स्वभाव एवं चरित्र में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। भ्रष्ट परिकल्पना का समन्वय करते ही ईश्वर के ईश्वरत्व का अन्त हो जाता है। चरित्र भ्रष्ट भगवानों की मान्यता से साधक के भी उसी ढाँचे में ढल जाने की आशंका बनी रहेगी। जिन देवताओं को मद्य मांस, दुराचार, भ्रष्टाचार से आपत्ति नहीं उनकी उपासना से भक्ति योग का परम लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता।

भगवान की आकृति कुछ भी बनाई अपनाई जा सकती है, पर उसकी प्रकृति में उत्कृष्ट आदर्शवादिता के अतिरिक्त और किसी तत्व का समावेश नहीं होना चाहिए। निराकार मानना हो तो उस सत् चित् आनन्द को सत्यं शिवं सुन्दरम् का केन्द्र, सद्ज्ञान का प्रकाश पुंज माना जा सकता है। सविता यह अनुदान भर परमेश्वर है। प्रातःकालीन सूर्य उसका प्रतीक है। आदर्शवादी उत्कृष्टता के रूप में−इसकी परिकल्पना की जा सकती है। श्रद्धा और भक्ति के रूप के सहारे उसके साथ तादात्म्य स्थापित किया जा सकता है। श्रद्धा का अर्थ है श्रेष्ठता से असीम प्यार। और भक्ति कहते हैं−उदार आत्मीयता और सहृदय सेवा सज्जनता को यही है सचेतन परमेश्वर का भावात्मक पूजा−पाठ । इन्हीं को योग और तप कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्ष्य श्रद्धा और भक्ति के समन्वय से ही होता है। इसी एकीकरण को प्रेम कहते हैं। प्रेम योग की साधना ही सर्वोपरि है। कर्मयोग और ज्ञान योग के सोपानों पर चढ़ते हुए परम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रेम योग की साधना करनी पड़ती है। इसका तत्काल प्रतिफल मिलता है। जिस अनुभूति के लिए अध्यात्म शास्त्र में रस शब्द आता है−जिसके रसास्वादन से आत्मा को असीम तृप्ति होती है उसे रस कहा गया है। यह रस प्रेम रस के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। ईश्वर का साक्षात्कार अन्तःकरण से शाश्वत प्रेम का अनन्त निर्झर फूट पड़ने के रूप में ही होता है।

प्रेम का अभ्यास परमेश्वर की उपासना, आराधना द्वारा भक्ति योग के माध्यम से किया जाता है। यह व्यायामशाला में किया गया उपार्जन है। प्रयोगशाला पाठशाला, पाठशाला में ही ऐसी ही उपलब्धि उपार्जित की जाती है फिर उस उपार्जन का व्यापक क्षेत्र में उपयोग होगा। पाठशाला में सम्पादित किया गया ज्ञान छात्र द्वारा जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रयुक्त होता है। प्रयोगशाला की उपलब्धियों से असंख्य व्यक्ति लाभ उठाते हैं। व्यायामशाला में बलिष्ठ हुआ पहलवान अनेक क्षेत्रों में अपनी समर्थता का परिचय देते हैं। ठीक इसी प्रकार प्रेम योग का भक्ति साधना के अभ्यास करने वाले अपने अन्तरंग में भावनात्मक और बहिरंग में क्रियात्मक प्रेम तत्व की दिव्य सम्वेदनाओं का परिचय देते हैं सत्कर्मों से भरा−पूरा कर्म क्षेत्र− सद् विचारणाओं में निमग्न ज्ञान संस्थान पर ही किसी की प्रेम साधना की सफलता एवं सार्थकता आँकी जा सकती है।

शरीर को जिस प्रकार अपने निर्वाह के लिए आहार की आवश्यकता पड़ती है ठीक उसी तरह आत्मा की तृप्ति प्रेम की भाव भरी सम्वेदनाओं पर निर्भर रहती है। व्यवहार में जो प्रसन्नता, उल्लास, आशा, उमंग आदि के रूप में सुखद सम्वेदन होता है उसी के उच्चस्तरीय अनुभूति प्रेम है। वस्तुओं अथवा प्राणियों के ऊपर जब प्रेम का आरोपण होता है तो वे परम प्रिय लगने लगती है। वह वस्तुओं का व्यक्तियों की विशेषता नहीं वरन् आत्मीयता के आरोपण की प्रतिक्रिया भी है।

जिन्हें हम शत्रु अथवा पराया मानते हैं उनका रूप, सौन्दर्य, व्यवहार, गुण, स्वभाव अच्छा होते हुए भी उपेक्षा बनी रहती है और कई बार तो निन्दा करने तक का प्रसंग आ जाता है। इसके विपरीत आत्मीय समझे जाने वाले व्यक्तियों में विशेषताएँ ही दृष्टिगोचर होती है उनके प्रति प्रशंसा के ही उद्गार निकलते हैं।

लगता है दूसरे हमें प्रेम करते हैं। बहुत बार ऐसा होता भी है किन्तु यह प्रेमानुभूति वस्तुतः अपना ही उत्पादन है जो सामने वालों से टकरा कर वापिस लौटती है और उस अपने ही प्रतिबिम्ब को सामने खड़ा देखती है। अपने भीतर प्रेम तत्व की जितनी न्यूनता होती है उसी अनुपात से दूसरे भी नीरस दीखते हैं।

मनुष्यों में गुणों की तरह दोष भी होते हैं और वे अपनी प्रकृति वश प्रेमी को भी हानि पहुँचाने से नहीं चूकते। पर यदि अपना अन्तःकरण प्रेम से लबालब भरा हो तो इस प्रकार के उपकार से हानि भर उठानी पड़ती है। विक्षोभ कारी अशान्ति नहीं उभरती। अपने बच्चे भी तो दिन भर गड़बड़ी करते और हानि पहुँचाते हैं। स्वजन भी रोगी होने पर हैरानी उत्पन्न करते और कष्ट तथा घाटा देते हैं, इतने पर भी उन्हें सहन किया जाता और सँभाला जाता है। यह आत्मीयता ही है जो दूसरों के व्यवहार की समीक्षा न करके अपने कर्तव्य धर्म का पालन करती रहती है। आत्मा प्रेममय है इसलिए यदि वह अपनी सही स्थिति में हो तो आत्म परिचय के रूप में उसे प्रेम व्यवहार ही करना पड़ेगा। यहाँ यह और भी ध्यान रखने योग्य बात है कि किसी की इच्छापूर्ति करने में नहीं उसके हित साधन की दूरदर्शिता में आत्मीयता प्रकट है। प्रेम के नाम पर पतन का समर्थन होने लगे और अनाचार का समर्थन चल पड़े तो समझना चाहिए प्रेम के स्थान पर किसी व्यामोह जैसे अनात्म तत्व को अपना लिया गया।

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