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Magazine - Year 1978 - Version 2

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बसन्त पर्व पर नये गायत्री नगर का शिलान्यास

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परिवार निर्माण की दशा में एक अनुपम एवं अद्भुत प्रयोग

युग निर्माण अभियान तीन भागों में विभक्त है−व्यक्ति निर्माण, परिवार−निर्माण और समाज−निर्माण इन तीनों मोर्चों पर सृजन सेना के सैनिक विगत तीस वर्षों से अविचल निष्ठा के साथ जूझते और अपनी तिलतिल सामर्थ्य को युग देवता के चरणों में गीध, गिलहरी की तरह प्रस्तुत करे चले आ रहे हैं। प्रगतिक्रम के अनुसार युग दूतों में अपने उत्तरदायित्व−सही रीति से निभा सकने की सामर्थ्य उत्पन्न करना आवश्यक समझा गया। शान्ति कुञ्ज की भूमिका इसी प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में रही है।

व्यक्ति निर्माण के लिए प्राण प्रत्यावर्तन और जीवन साधना सब चलते रहे हैं। परिवार निर्माण के लिए कन्या प्रशिक्षण और महिला सत्रों की व्यवस्था की गई । समाज निर्माण के ऐसे शिल्पियों की आवश्यकता थी जो अपनी परिष्कृत आत्म शक्ति से दूसरों के अन्तःकरणों को प्रकाशवान बना सकने में समर्थ एवं सफल हो सकें। इसके लिए उपयुक्त शिक्षण ब्रह्मवर्चस आरण्यक के रूप में अभी−अभी आरम्भ होने जा रहा है।

इसके उपरान्त भी एक कमी यह प्रतीत होती थी कि नवयुग के सृजन शिल्पी निश्चिन्ततापूर्वक अपना कर्त्तव्य ठीक तरह पूरा कर नहीं पर रहे थे। उनका मन प्रायः परिवार व्यवस्था जुटाने और उसकी समस्याएँ सुलझाने में लग जाता था और इच्छा रहते हुए भी जितना समय चाहिए उतना दे नहीं पाते थे। जितना मन लगाना चाहते थे उतना लग नहीं पाता था। कर्तव्य बाहर पुकारता था परिस्थितियाँ पीछे घसीटती थीं। जितने समय बाहर रहना होता था, उतने समय स्त्री बच्चों को स्नेह और सुव्यवस्था न मिलने की शिकायत बनी रहती थी। देखा यह भी गया है कि सार्वजनिक कार्यकर्ताओं के बालक अव्यवस्थित हो जाते हैं। पिता लोक सेवा के कार्यों में व्यस्त रहने के कारण उनकी उचित देखभाल नहीं कर पाता फलतः वे कुसंगति में फँसते और आवारा−गर्दी करते हैं स्वभावतः उनके ऊपर यह लाँछन आता है कि समाज निर्माण तो किया पर परिवार निर्माण की उपेक्षा क्यों हुई? आवश्यक है कि लोक सेवी अपने व्यक्तित्व के साथ साथ अपने परिवार को भी अपने सृजन कौशल का प्रमाण बना कर प्रस्तुत करें। यह न बन पड़ने पर असमंजस होना और ग्लानि अनुभव करना स्वाभाविक ही है।

युग निर्माण परिवार के असंख्य भाव−भरे व्यक्तित्व जो नव निर्माण के लिए अपनी प्रतिभा श्रद्धा और परिपक्वता का समुचित लाभ समाज को दे सकते थे, कुछ कर नहीं पा रहे हैं। असमंजस उन्हें आगे पीछे घसीटता रहता है। इस समस्या का समाधान आवश्यक समझा गया फलतः उसका हल भी निकला है।

इसी बसन्त पर्व पर एक विशाल गायत्री नगर बसाया जा रहा है। शांतिकुंज से बिलकुल सटी हुई बीस बीघे जमीन फिलहाल खरीदी गई है। दस पाँच बीघे और भी खरीदने की बात सोची जा रही है। इस गायत्री नगर में लोक सेवियों के परिवारों को बसाया जायगा ताकि उसकी सुव्यवस्था के सम्बन्ध में लोक सेवी पूर्ण निश्चिन्त होकर अपना काम कर सकें। पत्नियों को जो लोग बहुत प्रयत्न करने पर भी लोक मंगल की उपयोगिता न समझा सके और सहमत होने, साथ देने के लिए बहुत प्रयत्न करने पर भी सफल न हो सके उनकी समस्या का समाधान यहाँ बस जाने पर सहज ही सम्भव हो सकेगा। इसी प्रकार जो लोग चाहते हैं कि अपने बालकों को सुसंस्कारी बनायें, उनकी इच्छा पूर्ति के लिए भी गायत्री नगर एक प्रकार से वरदान ही सिद्ध होगा । संस्कार दिलाने के लिए लोग अपने बच्चों पर काफी खर्च भी करते हैं, पर उन्हें सफलता नहीं के बराबर ही मिलती है। गुरुकुलों की स्थिति दयनीय हो चली है। पब्लिक स्कूलों में तथाकथित शिष्टाचार ही सिखाया जाता है। भावनाएँ भरने का न वहाँ प्रबन्ध है न वातावरण। बाल निर्माण की दृष्टि उपयुक्त शिक्षण संस्थाएँ ढूंढ़े नहीं मिलतीं। जो है उनमें प्रवेश कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में युग निर्माण परिवार के मध्यवर्ती लोगों के लिए यह भी कठिन पड़ता है कि वे बच्चों को अन्यत्र भेजें। कुछ कर न पाने से उनका मन उदास ही बना रहता है। गायत्री नगर में बस जाने पर उनकी समस्या का सहज समाधान निकल आवेगा।

नवीन नगर में छोटे परिवार ही बसाये जायेंगे पत्नी तथा दो तीन बच्चे तक ही रह सके इतने भर के लिये नये क्वार्टर बनाये जायेंगे। नगर के भीतर ही महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध होगा। बच्चों के लिए हाईस्कूल स्तर तक ही शिक्षा का प्रबन्ध भी रहेगा। महिलाओं और बच्चों की शिक्षा में उन सभी तत्वों का समावेश रहेगा जो व्यक्तित्व को सुविकसित, समुन्नत एवं सुसंस्कारी बनाने के लिए आवश्यक है। अपने परिवार को गायत्री नगर में बसाने के उपरान्त परिवार के स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कार, स्नेह दुलार की उपयुक्त आवश्यकता भली प्रकार पूरी होती रहेगी। इसकी निश्चिन्तता रखी जा सकती है। यह सुविधा बन जाने से वे परिजन जो युग परिवर्तन की पुण्य बेला में कुछ भाव भरा पुरुषार्थ करना चाहते हैं−कहने लायक योगदान देना चाहते हैं। अपने मार्ग का सबसे बड़ा अवरोध दूर होते और अभीष्ट सुविधा अनुभव करेंगे।

अभी केवल वे ही लोग बसाये जायेंगे जो आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी है। परिवारों का निर्वाह भार उठा सकने की स्थिति अभी नहीं बन सकी है। जिनके पास जेवर, जमीन, फण्ड, पेन्शन आदि की पूँजी बैंक में जमा करके इसकी ब्याज से अपने परिवार का गुजारा कर सकने की स्थिति है प्रथम चरण में उन्हीं को आमन्त्रित किया गया है। द्वितीय चरण में वे लोग बुलाये जायेंगे। जिनके पास कुछ पूँजी तो अपनी है और जिन्हें थोड़ी-सी कमी हो मिशन से पूरी करानी पड़ेगी। तीसरे अन्तिम चरण में यह प्रबन्ध भी किया जायगा कि गायत्री नगर में कुटीर उद्योग लगाये जायं और स्त्री बच्चे उस माध्यम से अपने निर्वाह के लिए आवश्यक उपार्जन स्वयं कर लिया करें। यह क्रमिक चरण है। साधनों के साथ−साथ व्यवस्था बनती और बढ़ती चली जायगी। इस नवीन शुभारम्भ को उन सभी लोगों को अपने लिए विशेष वरदान मानना चाहिए जो परिवार के निर्वाह के बारे में तो निश्चिन्त है पर व्यवस्था की दृष्टि से अपने को विवश अनुभव करते हैं। यहाँ परिवार की उसमें अच्छी ही देखभाल हो सकती है, उससे अधिक ही स्नेह संस्कार मिल सकता है जैसा कि वे स्वयं करने के इच्छुक थे किन्तु कर नहीं पाते थे।

गायत्री नगर से एक और बड़ी आवश्यकता की पूर्ति यह होगी कि महिला सत्र के लिए अधिक संख्या में शिक्षा प्राप्त करने के लिए युग निर्माण परिवार की महिलाएँ आ सकेंगी और इच्छानुसार अधिक समय भी रह सकेंगी। अब तक सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि बच्चों समेत ठहरने की यहाँ बिलकुल व्यवस्था नहीं थी फलतः छोटे बालकों वाली महिलाओं के लिए तो प्रायः उस शिक्षण का द्वार ही बन्द था। जिनके बालक थोड़े बड़े हो गये थे वे उन्हें छोड़कर तो आती थी, पर याद घर की बनी ही रहती थी। माता का छोटे बालकों के प्रति जो वात्सल्य होता है उसे कोई भी भावुक हृदय भली−भाँति जान सकता है। बच्चे घर छूट जाने और स्वयं यहाँ पढ़ने सीखने की स्थिति में आन्तरिक असन्तोष तो बना ही रहता था । फलतः महिला शिक्षण का वह लाभ नहीं मिल पाता था जो मिलना चाहिए था। अब महिला सत्र की छात्राओं के लिए भी नया द्वार खुलता है। वे एक दो बच्चे भी साथ लेकर आ सकेंगी। शिक्षण, मात्र उनका हो नहीं उनके बच्चों का भी होता रहेगा।

शान्ति कुञ्ज के भोजनालय में मासिक व्यय 70) पड़ता है। जो देश भर के सभी भोजनालयों से सस्ता है। दोनों समय, रोटी, दाल, चावल, शाक। दो समय चाय, अच्छा भोजन इससे सस्ता कहीं मिल सकता हो ऐसा सुनने में नहीं आया। अच्छा और सस्ता होने का यह कीर्तिमान है। फिर भी जिन्हें अधिक कठिनाई रहती है उनके लिए इतना भार भी कठिन पड़ता है। क्योंकि इसमें पकाने का श्रम भी जुड़ा हुआ है। अपने हाथ से पकाने पर स्वभावतः इसमें कमी हो सकती है। खाद्य पदार्थों का भी अन्तर करके मूल्य कम हो सकता है। गायत्री नगर में बनने वाले क्वाटरों में भोजनालयों की भी व्यवस्था रहेगी ताकि इच्छा एवं स्थिति के अनुरूप अपना भोजन खर्च कम या अधिक किया जा सके। बच्चों समेत आने तथा भोजन व्यय घटा लेने की सुविधा के कारण अब महिला शिक्षण−सत्र में परिजन अपने घरों की महिलाओं को अधिक सुविधापूर्वक भेज सकेंगे।

लार्जरी फैमिली विशाल परिवार के प्रचलन की चर्चा कई बार की जा चुकी है और उसे परिवार निर्माण आन्दोलन का महत्वपूर्ण अंग बताया जाता रहा है। वह प्रयोग गायत्री नगर में सुविधापूर्वक हो सकेगा। मिल जुलकर भोजन पकाना, मिल−जुलकर बच्चे पालन, मिल जुलकर सहकारी स्टोर चलना तथा जीवन चर्या के अन्य कार्यों को मिल−जुलकर करने से समय और मन की भारी बचत होती है साथ ही सहकारिता के रूप में व्यावहारिक अध्यात्म की सत्प्रवृत्ति का अभ्यास अनुभव बढ़ता है। इस आधार को अपनाने पर परिवार के प्रत्येक सदस्य को सर्वतोमुखी प्रगति के लिए अधिक अवसर मिलता है यह प्रयोग छोटे से गायत्री नगर में चलाया और उसे व्यापक बनाया जायगा।

ब्रह्म वर्चस आरण्यक की विशेषता उस पर छाये हुए वातावरण के अनुरूप ही आँकी जायगी। वह आश्रम आत्म−शक्ति सम्वर्धन की साधना तपश्चर्या करने के लिए है । यह नया गायत्री नगर सर्वसाधारण के लिए− घर परिवार के लिए−परिष्कृत वातावरण प्रदान कर सकने के लिए उपयुक्त अनुकूल सिद्ध हो सकने जैसा बनाया, बसाया जा रहा है। इसे एक महती आवश्यकता की पूर्ति समझा जाना चाहिए। अब तक गायत्री तपोभूमि, शान्ति−कुञ्ज, ब्रह्म वर्चस् अपने−अपने ढंग से नव−निर्माण के पुण्य प्रयोजनों में उपयोगी भूमिका निभा रहे थे। इस चौथे निर्माण−गायत्री नगर से −इतनी विस्तृत एवं इतनी महत्वपूर्ण युग आवश्यकता पूरी हो सकेगी जिसकी आज तो कल्पना करना भी कठिन है। युग शिल्पियों को नई पीढ़ी विनिर्मित करने का इसे अभिनव प्रयास कहना चाहिए।

परिवार सहित लोक साधना का द्वार खुलने के संदर्भ में एक प्रसंग ब्रह्म वर्चस् साधकों के लिए भी इन्हीं दिनों जुड़ रहा है। वह है कि निवृत्त लोग अपनी पत्नी समेत अधिक समय तक या सदा के लिए रहने को भी आ सकें ऐसा नया प्रबन्ध कर दिया गया है। सामान्यतया एक कमरे में एक ही साधक के रहने की परम्परा है, पर अब नई व्यवस्था के अनुसार ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में भी 16 कमरों का एक अलग प्रखण्ड बनाया गया है जिसमें पति−पत्नी साथ रह सकें एवं अपना भोजन स्वयं पका सकें।

ब्रह्म वर्चस् में दो−दो महीने के सत्र इसलिए रखे गये हैं कि व्यस्त व्यक्ति भी उस स्वल्प अवधि में यथा सम्भव साधना कर सकें और थोड़ा−थोड़ा करके अपनी आत्म सम्पदा को बढ़ाने का अवसर प्राप्त कर सकें। वस्तुतः यह समय−साध्य प्रक्रिया है और अभीष्ट प्रगति के लिए अधिक समय की आवश्यकता है। दो महीने तो न्यूनतम अवधि है। इससे कम में इतने महान प्रयोजन का ताना−बाना ही खड़ा नहीं हो सकता था। इसमें और कमी की गुंजाइश थी नहीं अन्यथा थोड़ा −थोड़ा करके अधिक लोगों को−अधिक लाभ देने के सिद्धान्त को−ध्यान में रखते हुए इससे भी कम समय का शिक्षण क्रम रखे जाने की बात सोची जाती।

ब्रह्म वर्चस् शिक्षण वस्तुतः वानप्रस्थ की साधना पद्धति है। उसी स्थिति में निश्चिन्तता पूर्वक उसका सधना सम्भव होता है। वानप्रस्थ भारतीय गरिमा का मेरुदण्ड है। उस ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता समझी गई और तदनुरूप उपयुक्त साधनों से युक्त ब्रह्म वर्चस् बनाया गया। उसके पाठ्यक्रम में साधना क्रम में −लगभग वे ही तत्व है जो वानप्रस्थ तपश्चर्या में होते हैं। प्रातः तीन घण्टे योग तप मध्याह्न तीन घण्टे ब्रह्म चिन्तन, आत्म चिन्तन सायंकाल तीन घण्टे लोक सेवा शिक्षण। यही नौ घण्टे की दैनिक वर्चस् साधना है । वानप्रस्थ तपश्चर्या में आर्य परम्परा के अनुसार इन्हीं तीन तथ्यों का अभ्यास अवगाहन करना पड़ता है इन संगतियों के आधार पर कोई चाहे तो ब्रह्म वर्चस् को वानप्रस्थ साधनाश्रम भी कह सकता है। थोड़े−थोड़े समय के छोटे−छोटे सत्र बना देने से ही यह प्रतीत होता है कि यह शिक्षण वानप्रस्थ साधना से कोई भिन्न वस्तु है। उसे थोड़े−थोड़े समय की वानप्रस्थ साधना एवं उसकी पूर्व तैयारी कहा जाय तो भी कुछ अनुचित न होगा।

वानप्रस्थ में पत्नी समेत रहने की छूट है। संन्यास में दोनों को पृथक् रहना पड़ता है। युग निर्माण परिवार के अनेक परिजन ऐसे हैं जो सेवा निवृत्त हो चुके। बच्चे स्वावलम्बी बन गये। पेन्शन आदि के सहारे अपने निर्वाह का प्रबन्ध जिनके पास है। वे चाहते हैं कि जीवन का अन्तिम अध्याय इस प्रकार सम्पन्न हो जिसमें आत्म शान्ति और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का अवसर प्राप्त हो सकें। उनके लिए इससे अच्छा अवसर, स्थान और वातावरण और कोई हो ही नहीं सकता जैसा कि ब्रह्म वर्चस् में विद्यमान है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, प्रखर संरक्षण, अनुभवी मार्गदर्शन तथा भाव भरा वातावरण इन पाँचों विशेषताओं से भरी सुविधा अन्यत्र दीपक लेकर खोजने पर भी कहीं न मिल सकेगी। जो लोक ऐसे वातावरण में शेष, सारा या अधिकांश जीवन बिताने के इच्छुक थे उनके लिए ब्रह्म वर्चस् एक सुयोग सौभाग्य ही सिद्ध हो सकता है।

जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे हो चुके हैं, या हलके है, ऐसे निवृत्त एवं अर्ध निवृत्त व्यक्तियों के लिए ब्रह्म वर्चस् आश्रम अपने ढंग का अनोखे साधना एवं प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में विकसित हो रहा है। ऐसे व्यक्ति, जो स्वाभाविक रूप से, अपनी वैराग्य परक प्रवृत्ति के कारण गृहस्थ के जंजाल में उलझे ही नहीं है, उन्हें भी इस प्रयोग परीक्षण का लाभ उठाने का अवसर मिल सकता है। गायत्री नगर बन जाने से उन गृहस्थों के लिए भी व्यवस्था बन सकेगी, जो अभी पारिवारिक उत्तर−दायित्वों से मुक्त होने की स्थिति में नहीं है। इस प्रकार अपने विशाल परिवार के हर स्तर के व्यक्ति के प्रशिक्षण एवं विकास का मार्ग प्रशस्त होता चला जा रहा है।

ध्यान रहे कि हर स्तर के परिजनों के लिए उपयुक्त साधना प्रशिक्षण की सुविधाएँ तो जुटाई जा रही है, किन्तु अनुशासन एवं मर्यादाओं में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जायेगी। मर्यादाएँ नयी नहीं हैं, किन्तु परिजनों को स्मरण दिलाने के लिए उनका उल्लेख संक्षेप में यहाँ किया जा रहा है।

ब्रह्म वर्चस् एवं गायत्री नगर को धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रयोगशाला के रूप में विकसित किया जा रहा है। अस्तु उसके अनुरूप सज्जन−अनुशासन प्रिय, वातावरण को उत्कृष्ट बनाने में योगदान दे सकने योग्य व्यक्तियों का ही स्वागत किया जा सकेगा। अधिक समय तक रहने के इच्छुक व्यक्तियों को भी एक बारगी स्वीकृति नहीं दी जायगी। उनके आचरण एवं व्यवहार को देखते हुए क्रमशः एक−एक माह की स्वीकृति बढ़ाई जाती रहेगी । शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से रुग्ण व्यक्तियों को भी स्वीकृति नहीं दी जायेगी । गलत स्वीकृति मिल जाने पर उसे रद्द भी किया जा सकेगा। पूर्व शिविरों की तरह शिविरार्थियों के लिए निवास एवं प्रशिक्षण तो निःशुल्क रहेगा, किन्तु भोजन व्यय का भार उन्हें स्वयं ही वहन करना होगा। कुछ घण्टे कहीं कुछ काम करने अपना निर्वाह व्यय जुटा लेने जैसी व्यवस्था भी अभी नहीं है। आवेदन भेजते समय इन मर्यादाओं का पूरा−पूरा ध्यान रखना चाहिए।

उपरोक्त दोनों संस्थानों में अपना स्थान सुरक्षित कराने के लिए आवेदन पत्र भेजने का क्रम अभी से आरम्भ किया जा सकता है। यों गायत्री नगर के निर्माण का कार्य बसन्त पर्व के शुभ मुहूर्त में ही आरम्भ किया जायगा। ब्रह्म वर्चस् पूरा होते-होते निर्माण की वर्तमान शक्ति को उसी नये सृजन में मोड़ दिया जायगा। सम्भव है उसमें निवास का प्रबन्ध आगामी गुरु पूर्णिमा से चल पड़े । ब्रह्म वर्चस् में पत्नी सहित रहने वाले वानप्रस्थों को सुविधा तो अभी से उपलब्ध हो सकेगी।

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