चिरयौवन हेतु जानें, निज के रसायनशास्त्र को
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मानवी सत्ता की रहस्यमय पिटारी में एक से बढ़ कर एक अद्भुत संरचनाएँ भरी पड़ी हैं । विविध कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों की बनावट, कार्यपद्धति और उपलब्धियाँ असामान्य हैं । इसी तरह उनसे सम्बन्धित जीवकोषों, ज्ञानतंतुओं, गुच्छकों, रसस्रावों, गुण सूत्रों की अपनी-अपनी रहस्यमयी गतिविधियाँ हैं । वैज्ञानिकों ने जितना अधिक इस अद्भुत संरचना का अध्ययन किया है उससे यह तथ्य सामने आये हैं कि शारीरिक अंग अवयवों में जो गतिशीलता दिखाई पड़ती है, उनका संचालन न केवल प्राणचेतना से होता है, वरन् इस प्रक्रिया में हारमोन रसायनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । मनुष्य की भावनाओं से इनका गहरा सम्बन्ध होता है । भावनाओं का विचारणाओं का स्तर जैसा भी अच्छा-बुरा या उत्कृष्ट होता है वैसे ही जीवन रस की उत्पत्ति भी होती है और तद्नुरूप ही व्यक्तित्व का स्तर भी गठित होता चला जाता है ।
अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने अब हारमोन ग्रंथियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त कर ली है । इसकी एक बूँद से भी कम मात्रा में स्राव शरीर में किस प्रकार अद्भुत परिवर्तन ला देता है, यह देखकर आश्चर्यचकित रह, जाना पड़ता है । इस संदर्भ में प्रख्यात मनःशास्त्री एडलर ने गहन खोजें की है । अपने विविध प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर निकाले गये निष्कर्ष में उनने बताया है कि सुन्दर, आकर्षक और कमनीयता की मूर्ति होते हुए भी कितने ही नर-नारी पुरुष प्रवृत्ति तथा नारी सुलभ उमंगों से सर्वथा रहित पाये जाते हैं । कई दुर्बलकाय व्यक्ति सफल खिलाड़ी, लेखक, वैज्ञानिक आदि तथा बौनी महिलाओं ने कुशल कलाकार के रूप में ख्याति अर्जित की है । कई लोग महँगी पौष्टिक माल-मलाई खाकर भी जर्जरकाय बने रहते हैं, जबकि अनेकों रूखे-सूखे आहार पर जीवन व्यतीत करने वाले स्थूलकाय एवं बलिष्ठ होते हैं ।
मनुष्य शरीर में हारमोन बनाने वाली संरचनाओं को अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ कहते हैं । इनकी संख्या सात हैं- पिट्यूटरी थाइराइड पैराथाइराइड थाइमस, एड्रीनल तथा गोवेड्स (जननग्रन्थियाँ) इनसे स्रवित रसायन सीधे रक्त में मिलते और शरीर की प्रत्येक क्रिया-प्रक्रिया एवं मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं । शरीर पर जब रोगाणुओं का आक्रमण होना है तो इन ग्रन्थियों से उत्पन्न हुए रसायन रक्त कणों में रोगाणुओं से लड़ने की शक्ति उत्पन्न कर देते हैं और स्वयं भी उनसे संघर्ष करते हैं । इस संघर्ष के कारण ही रुग्णावस्था में बेचैनी, अशान्ति और क्षुब्धता उत्पन्न होती है । इसी प्रकार ये ग्रन्थियाँ भावनाओं से प्रभावित होकर ऐसे विशिष्ट प्रकार के रसायन भी उत्पन्न करती हैं जो हर्ष , उमंग, साहस , भीरुता, सक्रियता आदि के लिए उत्तरदायी होते हैं । यही कारण है कि हारमोन रसायनों के द्वारा अब यह वैज्ञानिक प्रयास किये जा रहे हैं कि इनके प्रयोग से मनुष्य की आदतों एवं व्यवहार को कैसे बदला जाय ? भावनाओं और रसायनों का सम्बन्ध खोजकर विशिष्ट रसायन की मात्रा को कैसे बढ़ाया और व्यक्ति को निरोग एवं व्यक्तित्ववान बनाया जाय इस क्षेत्र में वैज्ञानिकों को कुछ सफलता भी मिली है ।
स्नायु रसायनविदों का कहना है कि अंतःस्रावी ग्रन्थियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पीनियल व पिट्यूटरी ग्रन्थियाँ हैं । कारण इनकी सक्रियता से स्रवित हारमोन मात्र यौन गतिविधियों का ही नियंत्रण नहीं करते, वरन् व्यक्ति के सोचने-विचारने निर्णय लेने की क्षमता एवं दिक्-काल सम्बन्धी उसकी धारण को भी संचालित और नियंत्रित करते हैं । यौवन लाने के लिए उत्तरदायी यह रसायन मनुष्य की बौद्धिक एवं ज्ञानार्जन क्षमता से भी गहरा सम्बन्ध रखती है । पाया गया है कि एण्ड्रोजन जो पिट्यूटरी के कारण स्रवित होता है, जैसे रसायन भी पुँसत्व के साथ ज्ञानार्जन क्षमता को भी प्रभावित करते हैं ।
शरीरशास्त्रियों के अनुसार पिट्यूटरी ग्रन्थि नाक की जड़ के पीछे अवस्थित होती है । इसका सम्बन्ध एक ओर जहाँ मनुष्य शरीर की लम्बाई की बढ़ोत्तरी या बौनेपन एवं यौवन के उतार-चढ़ाव तथा प्रजनन सम्बन्धी गतिविधियों से होता है , वही दूसरी ओर बौद्धिक प्रखरता आत्मनियंत्रण, उत्साह आदि से भी होता है । योगविद्या-विशारद इसका सम्बन्ध सहस्रार चक्र से जोड़ते हैं जहाँ से व्यष्टि चेतना ब्रह्माण्डव्यापी समष्टिगत परम चेतना से अपना सम्बन्ध स्थापित करती है । इसके विपरीत पीनियल ग्रन्थि को शरीर और मस्तिष्क मध्य की कड़ी बताया गया है । विख्यात फ्रेंच दार्शनिक रेने देसकार्ते के अनुसार यह ग्रन्थि मस्तिष्कीय चेतना और जड़ परार्थ के मध्य संपर्क सूत्र का काम करती है । इसी के माध्यम से दिव्य चेतना मनुष्य में अवतरित होकर अपना कार्य करती है ।
पीनियल ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य भाग में सेरीबेलम एवं थैलमस के बीच स्थित शंकुरुप में चने के आकार की संरचना वाली महत्वपूर्ण दूसरी अंतःस्रावी ग्रन्थि है । चिकित्सा विज्ञानी इसके समुचित कार्यप्रणाली को जानने के लिए निरन्तर अनुसंधानरत हैं । इससे उत्पन्न हार्मोन रसायन को ‘मिलैटोनिन’ कहते हैं । माना जाता है कि यह रसायन अँधेरे से प्रतिक्रिया करता है और दिन एवं रात के प्रत्यावर्तन से सम्बन्धित सरकैडियन बायोरिद्म के नियमन में सक्रिय भूमिका निभाता है । इसके अतिरिक्त यह तत्व निद्रा प्रक्रिया से सम्बन्धित स्नायु कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है । प्रकाश के प्रक्रिया संवेदनशीलता इसका प्रमुख गुण है ।इसलिए इसका सम्बन्ध योगशास्त्रों में वर्णित तृतीय नेत्र से बिठाया जाता है । सुप्रसिद्ध ग्रीक शरीरशास्त्री हेरोफिलस ने पीनियल ग्रन्थि को बहुत पहले ही विचार प्रवाह का नियमन करने वाली अवरोधित शक्ति कहा था । गुह्यवेत्ताओं के अनुसार यहीं से तर्क एवं न्याय बुद्धि का नियमन होता है । आधुनिक मनीषी इसे दिव्य क्षमताओं का केन्द्र मानते हैं ।
पाया गया है कि वयस्कों की अपेक्षा शिशुओं में पीनियल ग्रन्थि आकार में अपेक्षाकृत अधिक बड़ी होती है । पुरुषों की तुलना में महिलायें अधिक भावनाशील होती हैं । यही कारण है कि महिलाओं में भी इस ग्रन्थि को अधिक विकसित पाया जाता है । मूर्धन्य वैज्ञानिक मनीषी वर अलेक्जेन्डर कैनन ने स्वयं के द्वारा किये गये अनेकों अन्त्य परीक्षणों का निष्कर्ष प्रस्तुत करते गये अनेकों अन्त्य परीक्षणों का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए अपने अनुसंधानपूर्ण ग्रन्थ-द पावर विदिन” में कहा है कि भावनाशील एवं आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत महापुरुषों में पीनियल ग्रन्थि सामान्य मनुष्यों की तुलना में अधिक बड़ी एवं विकसित होती है । मनुष्य जब तक बाल्यावस्था में होता है तब तक दुनियादारी के तमाम मकड़जालों से दूर निर्मल मन एवं पवित्र अंतःकरण वाला होता है । बच्चों जैसा खिलखिलाता निश्छल जीवन बड़ी उम्र में विरले मनुष्य ही जी पाते हैं । यही कारण है कि आयुवृद्धि से साथ-साथ सामान्य जनों की पीनियल ग्रन्थि सिकुड़ती जाती है । भावनाओं का इस पर गहरा प्रभाव पड़ता है ।
यही तथ्य अन्यान्य जीवनदायी रस उत्पन्न करने वाली ग्रन्थियों पर भी लागू होता है । गले में स्थित थाइराइड ग्रन्थि मस्तिष्कीय संतुलन एवं स्वभाव निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देती है । भावना तथा व्यक्तित्व का विकास बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है । आलस्य तथा उत्साह के लिए भी बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है । आलस्य तथा उत्साह के लिए भी बहुत कुछ यही केन्द्र उत्तरदायी है । इसी तरह स्नायु संस्थान से निकट का सम्बन्ध रखने वाले पैराथाइराइड ग्रन्थि अवांछनीयता से जूझने का साहस उभारती है । कोशिका निर्माण, स्नायुतंत्र का गठन, स्फूर्ति , रोग प्रतिरोधी क्षमता का भण्डार इसी केन्द्र में भरा होता है ।
थाइमस ग्रन्थि वक्षस्थल के ऊपरी भाग में होती है । इसे विकास ग्रन्थि भी कहते हैं । भ्रूणावस्था से लेकर किशोरावस्था तक के विकास में इसी का योगदान रहता है । आपत्ति के समय उचित समाधान ढूँढ़ने और साहसिक कदम बढ़ाने की प्रेरणा गुर्दे के ऊपर स्थित एड्रीनल ग्रन्थि से मिलती है । वीरता और कायरता का इससे घनिष्ठ सम्बन्ध हैं । लिंग परिवर्तन की जो घटनायें होती रहती हैं, उसमें इसी ग्रन्थि के स्रावों की उलटी-पुलटी करतूतें झाँकती रहती है । जननग्रंथियों का सम्बन्ध यौवन एवं प्रजनन से होता है ।
जब से हारमोन रसायनों के संबंध में गहराई से जानकारी मिली है , तब से यह समझा जाने लगा है कि हृदय , गुर्दे आदि तो शाखा, टहनी मात्र हैं, शरीर रूपी वृक्ष की जड़ें तो अन्तःस्रावी ग्रन्थियों में गहराई से घुसी बैठी हैं । विचारणाओं-भावनाओं का खाद-पानी देकर हर कोई अपने अंतःस्रावी हारमोन तंत्र को सक्रिय एवं जीवन्त बनाये रख सकता है और शारीरिक सुदृढ़ता सुन्दरता, स्फूर्ति, इन्द्रिय क्षमता, जीवनीशक्ति से लेकर मानसिक प्रखरता तथा चिरयौवन का लाभ जीवन पर्यन्त तक उठाता रह सकता है ।

