गायत्री उपासना सफल कब होती है?
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अग्निपुराण में उल्लेख है-एहि कामुष्यिकं सर्व गायत्री जपतो भवेत।” अर्थात् गायत्री जप से सभी साँसारिक कामनायें पूर्ण होती हैं। अन्यत्र भी गायत्री को ‘सकल काम फल प्रदाम्’ सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला कहा गया है। सभी साधना ग्रन्थों में गायत्री उपासना के सत्परिणामों की चर्चा की गयी है और कहा गया है कि जिनने भी इस महामंत्र का आश्रय लिया उन्होंने आशाजनक और उत्साहवर्धक फल पाया है। प्राचीनकाल से लेकर अब तक ऐसी अनेकों घटनायें घटित होती रही हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि कभी भी किसी भी साधक की गायत्री उपासना निष्फल नहीं जाती। वह साधारण से साधारण और असाधारण से असाधारण समस्याओं को सुलझाने से लेकर सुख-सम्पदा ऋद्धि एवं स्वर्ग-मुक्ति तक के चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करती रही है।
प्राचीन युगों में प्रायः सभी ऋषि-मनीषियों ने इसी महामंत्र के आधार पर अपनी योग-साधनाओं एवं तपस्याओं की ओर आप्तकाम बने हैं। सप्तऋषियों को प्रधानता गायत्री द्वारा ही मिली। बृहस्पति इसी शक्ति को दक्षिणमार्गी साधना करके देवगुरु बने। शुक्राचार्य ने इस महामंत्र का वाममार्गी भाग अपनाया और वे असुरों के गुरु हुए। साधारण ऋषि, मुनि उन्नति करते हुए महर्षि, ब्रह्मर्षि एवं देवर्षि का पद प्राप्त करते थे। इन ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रन्थों में गायत्री की मुक्त कण्ठ से एक स्वर से महिमा गायी है और बताया है कि गायत्री उपासना के लाभ असंदिग्ध है। यदि इसे नित्य नियमित रूप से किया जाता रहे तो उपासना के सत्परिणाम सुनिश्चित दिखाई देते हैं।
किन्तु कई बार नियमपूर्वक की गई साधना अनुष्ठान के
भी आशाजनक परिणाम नहीं दिखाई देते तो निराशा होती है और इस महाशक्ति से अविश्वास होने लगता है। पर ऐसी स्थिति के साधक को अधीर नहीं होना चाहिए। कई बार साधना का एक अंश पूर्व जन्मों के पाप निवारण में लग जाता है। श्रीमाध्वाचार्य एवं स्वामी विद्यारण्य जैसे महान साधकों के जीवन में इस घटनाक्रम को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘माधवनिदान’ के रचयिता श्रीमाध्वाचार्य वृन्दावन में कठोर गायत्री उपासना करने में संलग्न थे। लगातार तेरह वर्ष उन्हें विधिपूर्वक पुरश्चरण करते हुए बीत गये, पर कोई विशेषता उन्हें अपने में दिखाई न पड़ी। तप का कोई फल दृष्टिगोचर न हुआ तो वे खिन्न रहने लगे और अपनी असफलता से खीझकर वे वृन्दावन छोड़ काशी जा पहुँचे।
उदासी उन्हें घेरे हुए थी। मणिकर्णिका घाट पर बैठे हुए सोच-विचार में मग्न थे कि उसी श्मशान में रहने वाला एक कापालिक अघोरी उनके पास आया और उदासी एवं चिन्ता का कारण पूछने लगा। श्रीमाध्वाचार्य ने वस्तुस्थिति कह सुनाई। अघोरी ने कहा-योग की दक्षिणमार्गी वैदिक साधनायें देर में फल देती है। बरगद की तरह वे धीरे-धीरे बढ़ती हैं, समय पर परिपक्व होकर साधक का कल्याण करती हैं और चिरस्थायी फल देती हैं। इसमें धैर्यवान् साधक ही सफल होते हैं। पर तांत्रिक साधना में यह बात नहीं है। उसमें लाभ तो निम्न स्तर का ही मिलता है और वह ठहरता भी थोड़े दिन है, पर मिलता जल्दी है। जिन्हें धैर्य नहीं उन आतुर लोगों के लिए जल्दी लाभ दिखाने वाली तांत्रिक साधना लाभदायक हो सकती है। आपको चमत्कार देखने की जल्दी हो तो श्मशान साधना करो। विधि में बता दूँगा।’
श्रीमाध्वाचार्य सहमत हो गये और वे उसी स्थान पर रहकर कापालिक की बताई हुई अघोर क्रिया के अनुसार तंत्र साधना करने लगे। उन्हें नित्य डरावने और प्रलोभन भरे आकर्षण दिखाई देते, पर कापालिक के निर्देशानुसार वे उनसे तनिक भी विचलित हुए बिना साधना में संलग्न रहे। एक वर्ष बीत गया। एक दिन अदृश्य से आवाज आई कि तुम्हारा मंत्र सिद्ध हो गया, कुछ उपचार-वरदान माँगो। पहले तो उनका उधर ध्यान नहीं गया, पर जब बार-बार यही आवाज सुनाई दी तो उनने पूछा-आप कौन हैं? किस प्रकार का उपहार दे सकते हैं उत्तर मिला हम भैरव हैं। तुम्हारी सफल साधना से प्रसन्न होकर वरदान देने आये हैं। श्रीमाध्वाचार्य ने कहा विश्वास नहीं होता, इसलिए पहले कृपया सामने आइये और दर्शन दीजिये ताकि मैं वस्तु स्थिति समझ सकूँ।
भैरव ने कहा-गायत्री उपासना से तुम में इतना ब्रह्मतेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता मैं सहन नहीं कर सकता अतः सामने भी नहीं आ सकता। जो कहूँगा पीछे से ही कहूँगा। इस पर श्रीमाध्वाचार्य को भारी आश्चर्य हुआ और उनने प्रश्न किया कि-यदि गायत्री उपासना का ऐसा ही महत्व है तो कृपया बताइये कि तेरह वर्ष तक कठोर तप करते रहने पर भी मुझे कोई अनुकूल अनुभव क्यों नहीं हुआ। आप इसका रहस्य बता सकें तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त होगा।
जिज्ञासा का समाधान करते हुए भैरव ने श्रीमाध्वाचार्य को नेत्र बंद करके ध्यान भूमिका में जाने को कहा। उन्हें तत्काल पूर्व जन्मों के दृश्य दिखाई पड़ने लगे। पिछले तेरह जन्मों के दृश्य दिखाई पड़ने लगे। पिछले तेरह जन्मों में उनने एक से एक भयंकर पाप किये थे। इस दृश्य को जब से देख चुके तब भैरव ने कहा-तुम्हारे तेरह वर्ष की साधना पिछले 13 जन्मों के पापों के शमन में लग गयी। जब तक दुष्कर्म जन्य कुसंस्कार दूर नहीं होते तब तक गायत्री उपासना उसी की सफाई में खर्च होती रहती है। तुम्हारी विगत साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान किया है और अब नये सिरे से पुनः उसी पुरश्चरण साधना को आरंभ करने से सफलता मिलेगी। समाधान पाकर प्रसन्न मन श्रीमाध्वाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये और गायत्री उपासना आरंभ की। फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ। भगवती का साक्षात्कार हुआ और वे कृतकृत्य हुए।
श्रीमाध्वाचार्य से ही मिलता-जुलता कथा प्रसंग स्वामी विद्यारण्य जी के जीवन में परिलक्षित होता है। दक्षिण भारत के इस महान संत को नाम धार्मिक एवं संस्कृत साहित्य से परिचय रखने वाला कौन नहीं जानता कि जिसने वेद, उपनिषद् एवं ब्राह्मण ग्रन्थों के भाष्य से लेकर ब्रह्मगीता, सर्वदर्शन संग्रह, पंचदशी आदि अनेक कृतियों का निर्माण कर अपने को अमर तो किया ही साथ ही संस्कृत वांग्मय को भी धनी बना दिया। युवावस्था से ही विद्यारण्य ने गायत्री महामंत्र की उपासना आरंभ कर दी थी। उनकी यह तपस्या चौबीस महापुरश्चरणों तक चलती रही। तप करते हुए दीर्घकाल बीत गया, पुरश्चरण भी पूरे हो गये, फिर भी उन्हें गायत्री माता के दर्शन-साक्षात्कार नहीं हुआ। अपनी इस असफलता से वे बड़े खिन्न हुए ओर निराश होकर संन्यास ग्रहण कर लिया।
संन्यास हुए कुछ ही समय बीते थे कि एक दिन गायत्री माता ने उन्हें दर्शन दिया। इस पर उन्हें जीवन धन्य हो जाने की अत्यधिक प्रसन्नता भी हुई ओर आश्चर्य भी। माता से उनने पूछा-जब मैंने आपके दर्शनों की इच्छा से चौबीस पुरश्चरण किये तब आपने मुझे दर्शन नहीं दिया और अब मैं सब प्रकार की कामनाओं को छोड़कर जब संन्यासी हो गया हूँ, तब आप अनायास ही दर्शन देने चली आयी हैं? इसका क्या कारण है? इस पर माता ने उन्हें बताया कि मेरी उपासना कभी निष्फल नहीं जाती। सर्वप्रथम मैं साधक को पूर्वकृत पापों से छुटकारा दिलाती हूँ। जब तक पूर्व जन्मों के एवं इस जन्म के सब पाप नष्ट नहीं हो जाते तब तक उपासक के वे दिव्य नेत्र नहीं खुलते जिनसे मेरा दर्शन होता है। तुम्हारे पुरश्चरणों से पूर्व जन्मों के चौबीस महापातक नष्ट हुए हैं और अब तुम इस योग्य हुए हो कि मेरा दर्शन प्राप्त कर सको। मेरे अनुग्रह की बरसात तो तभी आरंभ हो गयी थी जब तुम मेरी ओर उन्मुख हुए थे, पर वात्सल्य का उभार अब आया जब तुम सच्ची भक्ति में प्रवृत्त हुए हो। इतना सुनकर विद्यारण्य के आनन्द का ठिकाना न रहा वे माता के चरणों में लिपटकर अपने प्रेमाश्रुओं से उन्हें धोने लगे। वरदान माँगने के लिए कहने पर भी वे जब कुछ नहीं माँग सके तो माता ने अपनी ओर से कहा-तुम संसार के कल्याण के लिए सद्ग्रन्थों की रचना करो। मैं तुम्हारी लेखनी पर विराजमान् रहूँगी।’ विद्यारण्य स्वामी ने माता का आदेश शिरोधार्य किया और वे सद्ग्रन्थों की रचना में लग गये।
शास्त्रों में कहा गया है कि गायत्री उपासना से क्या कुछ नहीं मिलता अर्थात् सब कुछ हस्तगत हो जाता है। पर उपासना करने वाले हममें से अनेकों की स्थिति ऐसी ही होती है कि कुछ दिन साधना करने के पश्चात् पूर्व जन्मों के और इस जन्म के पाप, कुसंस्कारों की अधिकता के कारण जब आध्यात्मिक प्रकाश नहीं पाते, अभीष्ट परिणाम नहीं देखते तो निराश हो उठते हैं। यदि धैर्यपूर्वक गायत्री उपासना को श्रद्धा विश्वासपूर्वक एक निष्ठ होकर अपनाते रहा जाय, तो गायत्री साधना के लाभों से सुनिश्चित रूप से लाभान्वित होते रहा जा सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।

