अजूबों से भरी यह मायावी दुनिया
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प्रकृति की लीला कितनी विचित्र और विलक्षण है, इसे मानवी बुद्धि अभी पूर्णतः समझ नहीं पायी है। इस प्रकार की न जाने कितनी अनबूझ पहेलियाँ उसके गर्भ में छिपी पड़ी हैं, जिन्हें शायद अब तक पूरी तरह खोजा भी नहीं जा सका है। कदाचित् आगामी समय में इन्हें खोज भी लिया जाय, तो इनके रहस्यों का पता लगा पाना सामान्य बुद्धि के लिए कठिन ही नहीं, असंभव भी है, क्योंकि सामान्य बुद्धि सदा विज्ञान का सहारा लेती है और विज्ञान की पहुँच मात्र स्थूल जगत तक सीमित है, वह कार्य का स्थूल कारण ही बता सकता है, किन्तु जहाँ कारण सूक्ष्म हो, वहाँ विज्ञान का अवलम्बन निराशाजनक ही सिद्ध होगा । इसके लिए प्रज्ञा स्तर की बुद्धि चाहिए। वही उनका सही और समुचित कारण ढूँढ़ सकती है। आये दिन देखे जाने वाले अजीबोगरीब प्राकृतिक कारनामे अपने रहस्य अनावरण के लिए इसी स्तर की बुद्धि की माँग करते हैं और आशा रखते हैं कि अगले ही दिनों मनुष्य इन्हें समझने में सफल हो सकेगा।
काँगो नदी के पूर्वी तट पर, तट के 5 किलो मीटर दूर एक सघन वन है। उसमें एक छोटी सी गुफा है। गुफा का प्रवेश द्वार इतना छोटा है कि कोई व्यक्ति यदि उसके अन्दर जाना चाहे, तो खड़ा-खड़ा प्रविष्ट नहीं हो सकता। व्यक्ति के झुकने से भी काम नहीं चलता। भीतर जाने के लिए घुटने के बल पर हाथों का सहारा लेकर चलना पड़ता है, तभी उसमें प्रवेश पा सकना संभव है। अन्दर धीरे-धीरे कन्दरा चौड़ी और बड़ी होती चली गई है। कन्दरा के मुख से करीब 30 कदम अन्दर उसकी दायीं दीवार में एक पत्थर की कील जैसी संरचना उभरी हुई है। यदि कोई व्यक्ति उसे छू दे तो दीवार फटने जैसी आवाज अन्दर गूँजने लगती है। यह आवाज ठीक पाँच सेकेण्ड तक होती है, तदुपरान्त वह स्वतः बन्द हो जाती है, भले ही व्यक्ति पत्थर की कील दबाये ही क्यों न रहे। कई बार इस समय में। व्यतिरेक होता देखा गया है। अनेक बार ध्वनि 8-10 सेकेण्ड तक होती रहती है, पर अधिकाँश अवसरों पर यह ठीक पाँच सेकेण्ड बाद बन्द हो जाती है। दुबारा ध्वनि तभी उत्पन्न होती है, जब उसे छोड़ने के पश्चात् पुनः दबाया जाय। विश्व के अनेक वैज्ञानिक दल उस रहस्यमय ध्वनि को जानने समझने के लिए कई बार उस गुफा की यात्रा कर चुके हैं, पर गुत्थी को सुलझाने में वे अब तक विफल रहे हैं।
अमेरिका में “क्रेटर लेक” नामक एक विशाल झील है। इसके मध्य में “विजार्ड आइलैण्ड” नाम का एक छोटा सा टापू है, जो संभवतः कभी किसी ज्वालामुखी के फटने के कारण झील के मध्य उभर आया हो, विशेषज्ञों को इस संबंध में ऐसा ही अनुमान है। इस छोटे-से द्वीप में एक बड़ा ही अनूठा वृक्ष है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अरुणोदय होते ही यह पेड़ पूरब की दिशा में सूर्य की ओर कुछ प्रणत हो जाता है, मानो नवविहान के आगमन पर सविता देव का अभिवादन कर रहा है। कहते हैं कि दोपहर होते-होते यह पुनः पूर्व स्थिति में ठीक उग्र रूप से खड़ा हो जाता है। वनस्पति-शास्त्रियों के लिए आज भी उक्त पेड़ का यह अनोखा करतब चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
प्रकृति का एक कौतुकपूर्ण दृश्य हमें तब देखने को मिलता है जब हम साइबेरिया में स्थित “वेली ऑफ” नामक तंग घाटी की यात्रा करते हैं। सन् 1941 तक इस फव्वारे की घाटी का किसी को पता ना था, किन्तु इसके उपरान्त यहाँ लगभग 20 ऐसे गीजरों का पता चला हैं, जो अपनी रंग-बिरंगी छटा से दर्शकों का मन मोह लेते हैं। इन फव्वारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये 10 मिनट से लेकर 6 घंटे तक के नियमित अन्तराल में छूटते रहते हैं। इनकी नियमितता इतनी सुनियोजित और अटल है, जिसे देख दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। जो गीजर 10 मिनट की अवधि में निःसृत होते हैं, वह सदा दस-दस मिनट पर छूटते ही रहते हैं। ऐसी ही नियमितता अन्यों के साथ भी देखी जा सकती है। वहाँ का सबसे बड़ा फव्वारा, जिसे “फर्स्ट बोर्न” का नाम दिया गया है, हर घंटे पर विभिन्न रंग के फुहारों के साथ जमीन से निकलता रहता है। यह जल के 40 फुट ऊँचे स्तम्भ का निर्माण करता है और इनसे छिटकने वाली फुहारों की ऊँचाई पाँच सौ फुट तक चली जाती है। पूरी घाटी में इन गीजरों के छूटने और मिटने का क्रम बड़े लयबद्ध ढंग से होता रहता है। पश्चिमी ईरान की जागरण पहाड़ियों में भूमिगत एक ऐसी विशाल गुफा है, जिसमें प्रवेश करने पर अनेक ऊँचे-ऊँचे व मोटे पाषाण स्तम्भ दिखाई पड़ते हैं। इन स्तम्भों को देखने के उपरान्त यह स्वीकार कर पाना मुश्किल हो जाता है, कि यह मानवीकृत न होकर प्रकृति की कुशल कारीगरी का नमूना है। इनकी सुगढ़ता किसी भी वास्तुकार को चुनौती देने के लिए पर्याप्त है। इस “धार पराऊ” कन्दरा में सबसे ऊँचे प्रस्तर स्तम्भ का नाम खोजी दल ने “शहंशाह” रखा। इसकी ऊँचाई 138 फुट है। इस प्रकार के और भी अनेक स्तम्भ वहाँ हैं, पर ऊँचाई में सब इससे कम हैं। संभवतः इसी कारण अन्वेषणकर्ताओं ने इसका नाम “शहंशाह” अथवा “सम्राट” रख दिया।
मनुष्य यदि वास्तुशिल्प का कोई आकर्षक और उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करे, तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है, क्योंकि वह सृष्टि का सबसे बुद्धिमान और कार्यकुशल प्राणी है, किन्तु यदि प्रकृति ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करती है, तो निश्चय ही यह अचम्भे की बात है। ऐसा ही एक अचम्भा उत्तरी आयरलैण्ड के काउण्टी एण्ट्री समुद्री तट पर स्थित है। इसे देखने से प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त संरचना किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा निर्मित वास्तुकला का सर्वोत्तम प्रतिमान है, पर पुरातत्व वक्ताओं का कहना है कि यह कोई मानवीकृत निर्माण नहीं है, वरन् निसर्ग की कुशल इंजीनियरिंग का एक अच्छा प्रमाण है। गवेषण करने वालों ने इसका नाम “जाइण्ट्स काउज वे” अर्थात् “दैत्यों का पक्का मार्ग” रखा है। यह 40 हजार बहुकोणीय पाषाण-स्तम्भों की एक विशाल और विस्तृत संरचना है। इस सीढ़ीनुमा संरचना के तीन खण्ड हैं-निम्न मध्य और ऊपरी। यह मध्य खण्ड ही है, जिसकी सुगढ़ता को देखकर खोजियों को आरंभ में इसे किसी सुविकसित प्राचीन सभ्यता की कोई संरचना का भग्नावशेष होने का भ्रम हुआ था, क्योंकि इस हिस्से के प्रस्तर स्तम्भों में इतने उच्चस्तर की शिल्प-कला का प्रदर्शन देखने को मिलता है, जिससे कुछ क्षण के लिए इसके प्रकृतिगत होने के विश्वास कर पाना मुश्किल हो जाता है। इस भाग के सारे स्तम्भ पूर्णतः षट्कोणीय हैं, अन्तर सिर्फ इतना है कि वे सभी एक ही व्यास के पाषाण-खण्ड न होकर उनका विस्तार 15-20 इंच व्यास तक है, किन्तु यहाँ भी बुद्धिमत्ता और सुगढ़ता की बानगी देखने योग्य है। मध्य का निचला हिस्सा 15 इंच व्यास वाले स्तम्भों से शुरू होकर धीरे-धीरे ऊपर की ओर व्यास बढ़ते-बढ़ते इस खण्ड के शीर्ष पर अधिकतम 20 इंच तक पहुँच गया है। इस प्रकार इस खण्ड को देखने से ऐसा मालूम होता है, जैसे कोई कुशल कलाकार ने बड़ी बारीकी से पत्थर के इन शैल-खण्डों को सुरुचिपूर्ण ढंग से परस्पर सटा-सटा कर फिट किया हो।
जब किसी घाटी पर किसी मनुष्य अथवा अन्य प्राणी के पहुँच जाने पर अचानक ही जोरदार धमाका हो उठे, तो इसे क्या कहा जाय? प्रकृति की कौतुकपूर्ण लीला?
आश्चर्य? या कोई ऐसा अपकर्म, जिसके द्वारा वह मानव अथवा मानवेत्तर प्राणियों को अपने निकट न पहुँचाने देने की चेतावनी देती हो? कदाचित ऐसा ही हो, क्योंकि अब तक रियोडीला पाज की घाटी में घटने वाली इस अनूठी घटना का रहस्योद्घाटन करने में वैज्ञानिक और प्रकृतिवादी सर्वथा असमर्थ रहे हैं। वस्तुतः यह घाटी बोलिविया में लापाज नदी के तट पर हिमाच्छादित एण्डीस पर्वत के किनारे स्थित है और पूर्णतः मिट्टी की बनी विचित्र भूलभुलैया जैसी संरचना है। जब कभी कोई जीवधारी भूलवश इसके निकट आ पहुँचता है तो तोप जैसी धड़ाके के साथ भयंकर गर्जना होती है और इसी के साथ धूल का एक गुब्बारा वायुमंडल में छा जाता है, जिससे थोड़े समय तक वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। आये दिन लोग प्रकृति के इस रहस्यमय करतब को छेड़ने और देखने के लिए घाटी के आस-पास आते ही रहते हैं। तोज जैसी इसकी गगनभेदी ध्वनि के कारण ही वह स्थानीय क्षेत्र में “ग्रेण्ड कैनन ऑफ दि ग्रेण्ड केनाइन” अर्थात् “भव्य घाटी का भव्य धमाका “ के नाम से लोकप्रिय हो गई है।
भगवान ने मनुष्य को जानने समझने की बुद्धि दी है। उसके द्वारा कई अवसरों पर वह ऐसी पहेलियों को सुलझा भी लेता है, जो आरंभ में जटिल गुत्थी जान पड़ती हैं, पर हर बार वह ऐसा कर ही लेगा, इसे दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। अनेक मौकों पर स्थूल क्रिया के मूल में कारण स्थूल न होकर सूक्ष्म होते हैं। इन कारणों को सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ही समझा जा सकता है। सूक्ष्म बुद्धि अध्यात्म-अवलम्बन के बिना संभव नहीं। अतः यदि मनुष्य को सृष्टि की इन रहस्यमय गुत्थियों का उत्तर पाना है, तो अध्यात्म का आश्रय लेना ही पड़ेगा। इससे कम में काम चलने वाला नहीं। यदि मनुष्य आगामी सदी में प्रज्ञा-बुद्धि विकसित कर ले और अब तक के अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ ले, तो हमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

