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Magazine - Year 1992 - Version 2

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शक्ति से साथ युक्ति का सार्थक समन्वय !

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मनीषियों का अनुभव भरा कथन है कि शक्ति के बल पर पाया ता कुछ भी जा सकता है, पर उसे भोगा नहीं जा सकता भोगने के लिए युक्ति की, औचित्य से अभिपूरित समझदारी की आवश्यकता है । जहाँ दोनों का समन्वय होगा वहाँ उपलब्धि भी हस्तगत होगी और सुख संवेदना की अनुभूति भी । दोनों का युग्म है । एक के बलबूते तो आधी बात ही बनती है । उसका स्वरूप आधा, औंधा, लँगड़ा, कुबड़ा ही रह जाता है । शक्ति की महत्ता सर्वविदित है । भाप की शक्ति से रेल इंजन दौड़ते, बिजली से कारखाने के यन्त्र चलते हैं । इतने पर भी उनको दिशा देने व्यवस्था करने के लिए बुद्धिमान संचालक की आवश्यकता पड़ती है । ड्राइवर न हो तो भाप की पर्याप्त मात्रा होने पर रेल चल भले ही पड़े , पर उसका अन्त किसी से जा टकराने के रूप में ही होगा । बिजली मोटर

घुमा सकती है और संबंधित मशीनों को गति दे सकती है, पर अभीष्ट उत्पादन नहीं दे सकती । उसके लिए उन कारीगरों की बुद्धिमत्ता अपेक्षित है जो यह जानते हैं कि किस प्रकार के उत्पादन के लिए क्या किया जाना चाहिए । उनका सहकार न मिलने पर बिजली खर्च होती रहेगी और मशीनों घिसती रहेंगी । हो सकता है कि ऐसी स्थिति में कुछ अनर्थ भी हो चले कोई पुर्जा टूट जाय, कोई बायलर फट जाय ।

मनुष्य शक्ति संचय के लिए प्रयत्नशील रहता है और प्रयत्नपूर्वक उसे उपार्जित संकलित भी कर लेता है । धन तो कई व्यक्ति कमाते हैं । इस संदर्भ में बेईमान बदमाश भी सज्जनों की अपेक्षा अधिक मात्रा में अधिक जल्दी धनाध्यक्ष बन जाता है कइयों को जुए, सट्टे, लाटरी में मिल जाता है, किन्हीं को बिना परिश्रम किए उत्तराधिकार में भी । धनाध्यक्ष होना कोई बड़ी बात नहीं है । यह चोरी , चालाकी में भी हो सकता है । बड़ी बात यह है कि उसका उपयोग किस प्रकार हुआ और उससे कितना लाभ उठाया गया ? कैसा सुख पाया गया ? क्या हित साधन हुआ ? यदि इस विषय में समझदारी न साथ न दिया तो दुर्व्यसनों में, कुकर्मों में, अपव्यय में, प्रदर्शन में उसका समापन हो सकता है । इस राह को अपनाने पर नशेबाजी , आराम तलबी, आवारागर्दी में स्वास्थ्य नष्ट हो सकता है । कुसंग में आदतें बिगड़ सकती हैं और अनीति अपनाने पर द्वेष, प्रतिशोध की आपत्ति आ सकती है, बदनामी हो सकती है । ईर्ष्यालुओं का, लुटेरों का एक बड़ा दल शत्रु बनकर घात लगा सकता है । बँटवारे के प्रश्न को लेकर परिवार में कलह हो सकती है । इस प्रकार कमाया हुआ धन उससे भी बुरा पड़ सकता है जैसा कि गरीबी के दिनों में चल रहा था । ऐसी अमीरी की तुलना में वे गरीब कहीं अच्छे रहते हैं जो रोज कमाते रोज खर्चते और समझदारी के साथ संतुलन बिठाकर अपनी गाड़ी हँसी खुशी के बीच चलाते रहते हैं ।

शारीरिक सौंदर्य तो प्रकृति प्रदत्त है, पर बलिष्ठता आहार-बिहार को उच्चस्तरीय बनाकर बढ़ाई जा सकती है । पहलवान और योद्धा बनना कठिन नहीं है । चंदगीराम और हरक्यूलिस जैसे अनेकों रोगी अपनी गतिविधियों में हेरफेर करके बलवान पहलवान बने हैं । पर प्रश्न यह है कि उस समर्थता का उपयोग किस निमित्त हुआ । डाकुओं और आतंकवादियों में अधिकाँश बलिष्ठ ही होते हैं । शिकारी, कसाई और क्रूरकर्मी वही हो सकता है जिसके शरीर में शक्ति हो, ऐसों को ही व्यभिचारी अनाचारी होते देखा गया है । शोषण, उत्पीड़न, अपहरण में भी बलिष्ठों का ही बाहुल्य होता है । यह अँधेरा पक्ष है । उजला पक्ष तब बनता है जब उस समर्थता का उपयोग अनीति रोकने और सत्प्रवृत्ति बढ़ाने में किया जाय । सेना में भरती होकर ऐसे ही योद्धा देश रक्षा का भार उठाते हैं । मुसीबत में फँसे हुओं को निकालने में बलिष्ठ ही बढ़-चढ़ कर स्वयं सेवी की भूमिका निभाते हैं । उनकी उपस्थिति में अनाचारियों की भी दाल नहीं गलती । किन्तु यदि वे स्वयं अनर्थ पर उतर आयें तो वातावरण में विक्षोभ खड़ा कर सकते हैं, विपन्नता खड़ी कर सकते हैं । बलिष्ठता सुन्दरता उत्तम है, पर उसका दुरुपयोग अनेकों के पतन पराभव का कारण भी बन सकता है ।

विद्या का, बुद्धि का अपना उपयोग है । शिक्षा को भी सराहा ही जा सकता है । इसे प्रयत्नशील व्यक्ति व्यस्त और अभावग्रस्त होते हुए भी तत्परतापूर्वक अर्जित कर सकते हैं । यह प्रशंसा की बात है, पर बड़ाई या भलाई की नहीं । यह इस बात पर निर्भर है कि अर्जित ज्ञान का उपयोग किस प्रकार किस कार्य में किया गया ?

अश्लील उत्तेजक, अनाचारी साहित्य सुशिक्षितों का ही लिखा हुआ है। दुष्प्रवृत्तियों को भड़काने वाली फिल्में सुशिक्षित ही बनाते हैं । छल, प्रपंच, पाखण्ड , अन्धविश्वास उत्पन्न करने वाला मायाजाल विद्वानों का ही रचा हुआ है । धर्म के नाम पर व्यापक जालसाजी का बखेड़ा उन्हीं धर्मगुरुओं द्वारा खड़ा किया है जो अपने को विद्वान और पंडित कहते हैं । ऊँचे पदों पर वे ही पहुँचते हैं और रिश्वत का अम्बार ऊपर से बादल की तरह बरसता है और नीचे पोखर जोहड़ तक आता है । उन्हीं के हाथ में समाज की-शासन की बागडोर पहुँचती है । जन-मानस को यही वर्ग कठपुतली की तरह नचाता है । अख़बार रेडियो, टेलीविजन, प्रचार, प्रोपेगैंडा जैसे साधन इन्हीं के हाथ में है । उलटे को सीधा-सीधे को उलटा वैज्ञानिक सुशिक्षित वर्ग के ही तो करते हैं । वे चाहें तो लोकोपयोगी वस्तुएँ भी आविष्कृत, विनिर्मित कर सकते हैं । वे चाहें तो ऐसे घातक अस्त्रों का भी सृजन कर सकते हैं जिससे महाविनाश का खतरा सामने आ खड़ा हो और आशंका असुरक्षा से हर किसी का दिल धड़कने लगे ?

कला की एक शक्ति है । उसमें जनमानस का दिशा देने की अद्भुत क्षमता है । भाषण, गायन, वादन, चित्र, प्रतिमा आदि उसी के अंतर्गत आते हैं । इसमें भगवद् भक्ति, देशभक्ति आदर्शों के अधिग्रहण की भी क्षमता है और ऐसी विषाक्तता भी है जो कामुकता, युद्धोन्माद जैसी पशु प्रवृत्तियों की भड़काने में भी अग्रणी रह सकती है, रह भी रही है ।

यदि उन्हीं क्षमताओं का विवेकपूर्वक उपयोग किया जाय तो उनके ऐसे सत्परिणाम सामने आ सकते हैं जिनसे सर्वसाधारण का हित साधन हो और कल्याणकारी परिणाम सामने आयें ।

कोई भी समर्थ नर-नारी विवाह कर सकते हैं, पर यह विरलों से ही बन पड़ता है कि परस्पर बँध जाने के उपरान्त उस समर्पण का स्वार्थ सिद्धि के लिए शोषण करने की अपेक्षा सहयोगी के प्रति कृतज्ञता का भाव भरे रहें और उसे अधिक सुयोग्य , समुन्नत, स्वावलम्बी, स्वस्थ, सुसंस्कारी बनाने के लिए अनवरत प्रयत्न करें । भले ही इसमें अपनी सुविधाओं में कटौती ही क्यों न होती हो । लेने की अपेक्षा देने का भाव प्रबल एवं सक्रिय रहने से ही वह स्थिति उत्पन्न होती है जिसमें पाणिग्रहण के उच्चस्तरीय परिणाम देखे जा सके । एक और एक मिलकर ग्यारह बनाने वाली उक्ति को चरितार्थ कर सकें ।

थोड़े से धन का भी सदुपयोग करके लोग भामाशाह के रूप में अमर हो गये । श्रम को परमार्थ में नियोजन करके हजारी किसान बिहार प्रान्त में जन-जन की चर्चा का विषय बन गया । सामान्य सी शिक्षा को सदुद्देश्य के लिए लगाकर कबीर, तुलसीदास जैसे कृतकृत्य हो गये । नगण्य सी सामर्थ्य को सही काम में, सही उपयोग करने पर जटायु जैसा पक्षी अपने पीछे ऐतिहासिक उदाहरण छाड़ गया । महामानवों में से प्रत्येक ने अपनी सामर्थ्य का श्रेष्ठतम उपयोग करने का प्रयास किया है । गाँधी, विनोबा जैसों का व्यक्तित्व और कर्तव्य ऐसा रहा जिसका स्मरण करने मात्र से लोग अपने आदर्शवादी अभ्युदय की बात सोचते हैं । यही है वह युक्ति जिसमें शक्ति का उपार्जन सार्थक होता है ।

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