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Magazine - Year 1994 - Version 2

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पुनर्जन्म पर अब भी अविश्वास ?

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वैज्ञानिक भी अब यह मानने लगे हैं कि शरीर के न रहने पर भी कोई ऐसा तत्व विद्यमान रहता है जिसमें पिछले जन्म के क्रियाकलापों की स्मृतियाँ संजोई रहती है। भारतीय दर्शन में इसे आत्मा तथा जीव चेतना का नाम दिया गया है। जहां चिरकाल से ऐसा विश्वास प्रचलित है कि शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा विनष्ट नहीं होती । इस तथ्य की पुष्टि वैज्ञानिकों द्वारा की गयी जाँच पड़ताल से भी अब हो गयी है। इस तरह के प्रकरणों में जिस कठोरता से जाँच पड़ताल की गयी और पूर्व जन्म के संबंध , घटनाक्रम , वस्तुओं का स्वरूप एवं स्थान का विवरण जैसा बताया गया , वैसा ही पाया जाना , उन समस्त शंकाओं को निरस्त कर देता है , जिन्हें कभी अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता था। आत्मा की अमरता पर दृढ़ विश्वास जहाँ मनुष्य को जन्म-मृत्यु के भय से छुटकारा दिलाता है वहीं कर्मफल की सुनिश्चितता के लिए तथा ईश्वर पर आस्था रखने के लिए भी आवश्यक है कि पुनर्जन्म व्यवस्था में विश्वास बनाये रखा जाय।

वैज्ञानिकों के लिए पुनर्जन्म जैसे गुह्य एवं जटिल प्रश्न अब अनुत्तरित नहीं रहे। संसार में ऐसे अनेकों उदाहरण विद्यमान है जो मरणोत्तर जीवन एवं पुनर्जन्म जैसे गंभीर दार्शनिक तथ्यों को प्रमाणित करते हैं। पाश्चात्य परामनोविज्ञान वेत्ताओं द्वारा आत्मा की अमरता संबंधी मान्यताओं को सही प्रमाणित करने के लिए मैस्मेरिज्म एवं हिप्नोटिज्म की विधा के अतिरिक्त मीडियम द्वारा स्पिरिट कम्यूनीकेशन अर्थात् मृतात्माओं से संदेश आवर्तन एवं प्लेंचिट जैसी विधियां भी विकसित की गयी हैं जिनमें मृतात्माओं से संपर्क साधा और जानकारियां हासिल की जाती हैं। फ्राँस , अमेरिका , ब्रिटेन , आस्ट्रेलिया एवं कनाडा आदि देशों में इस पर व्यापक रूप से अनुसंधान चल रहे हैं। योरोप और अमेरिका में आध्यात्मिक आन्दोलन अपनी प्रगति पर हैं। उनकी मान्यता है कि पंच भौतिक शरीर से पृथक् एक सचेतन अधिष्ठात्री सत्ता है जिसे ‘स्पिरिट’ या आत्मा कहते हैं जो मरणोपराँत भी बनी रहती है। इन देशों में ‘गाइड’ संज्ञक कुछ व्यक्ति है जो ध्यानावस्थित हो जाने पर प्रेत लोक की जानकारी प्राप्त करने और बताने का उपक्रम करते हैं। एक अन्य पद्धति में जब किसी मृतात्मा को बुलाना होता है , तो मृत व्यक्ति के किसी संबंधी को सब्जेक्ट या माध्यम मानकर उसे मानसिक वार्ता अर्थात् सम्मोहन के प्रभाव से अर्धनिद्रित सा कर देते हैं और तब अन्य परिवारी जन उससे उस आहूत आत्मा के संबंध में प्रश्न करते हैं। माध्यम उत्तर देता है। उन उत्तरों की फिर छानबीन होती है। कई बार तो पुलिस भी उनकी सहायता लेकर अघन्य अपराधों, हत्याओं की रहस्यमय गुत्थियों को सुलझाने में सफल होती देखी गयी है। सम्मोहन की इस विधा पर सुप्रसिद्ध मनीषी हेलेन बामबच ने “लाइफ बिफोर लाइफ” नामक एक पुस्तक लिखी है। इसमें केवल वे ही प्रश्नोत्तर संग्रहित किये गये हैं जो हिप्नोटिक सब्जेक्ट में आहूत आत्मा से इस विषय पर पूछे गये थे कि गत जीवन में पैदा होने से पहले वे क्या थे और कहाँ थे ? इस पुस्तक में उन 750 आत्माओं के साक्षात्कार एवं अनुभव संग्रहित हैं जो पुनर्जन्म की घटनाओं का सत्यापन करते हैं, साथ ही इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि इस जन्म से पूर्व भी कोई जन्म था।

प्रायः संचित संस्कारों के अनुरूप ही दिवंगत आत्मायें नया शरीर धारण करती हैं। पुनर्जन्म की योनियाँ तो वे स्वयं चुनती हैं अथवा अन्य आत्मायें उन्हें कुछ तद्विषयक परामर्श देती हैं। इस संबंध में की गई गहन खोजों का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए वामबच ने अपनी उक्त कृति में बताया है कि प्रायः 71 प्रतिशत आत्माओं का कहना था कि उन्होंने स्वयं ही किसी परिवार या योनि का चयन किया था। इनमें में बहुतों ने परामर्श का मिलना भी बताया। 27 प्रतिशत आत्माओं का कहना था कि उनका स्वयं का निर्णय था कि पुनः जन्म धारण करें किसी ने चुनाव करने को नहीं कहा। लगभग 3 प्रतिशत का मत था कि उन्होंने परामर्श के विरुद्ध अपना स्वतंत्र निर्णय लिया था, तो 19 प्रतिशत आत्माओं के अनुसार वे फिर से पैदा होना नहीं चाहती थीं और न ही उन्हें याद है कि किसी ने उन्हें इसके लिए परामर्श किया। जबकि 51 प्रतिशत दिवंगत आत्माओं ने बताया कि एक से अधिक परामर्श दात्री आत्मायें थीं। 19 प्रतिशत का कहना था कि सूक्ष्म लोक की सत्ताओं के संपर्क में आने पर ही उन्हें इस तरह के परामर्श मिले थे। इसमें से अधिकाँश प्रेत या पितर आत्मायें थीं जो प्रश्नोत्तर वाले दिन से पूर्व ही मर चुके थे।

अमेरिका के विख्यात पादरी एवं परामनोविज्ञानी नार्मन विंसेन्नपील ने अपनी कृति “द जाँइ आफ पॉजिटिव लिविंग” में दिवंगत आत्माओं से क्लेयरवायेन्स पद्धति से संपर्क कायम करके जीवात्मा की अमरता का सिद्धाँत प्रतिपादित किया है। उनका कहना है कि मृत्यु के उपरांत उच्चतम एवं सुख कर जीवन प्रारम्भ होता है। पूर्व संचित संस्कार इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उइया बोर्ड - (प्लाँचिट) द्वारा भी मृतात्माओं से संपर्क स्थापित किया जाता है। पाश्चात्य जगत में इस विधा का काफी प्रचलन है। नाटिंघम विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैनिक डॉ0 एलन गाऊड ने इस संदर्भ में गंभीरता पूर्वक जाँच पड़ताल ही है और इस प्रक्रिया द्वारा मृतात्माओं से मिली जानकारियों को सही बताया है। उदाहरण के लिए सन् 1950 में घटी एक घटना के बारे में हैरी स्टाक ब्रिज की मृतात्मा ने जो जानकारियाँ दीं जिसमें उसकी 14 जुलाई की मृत्यु तारीख भी सम्मिलित थी, मृत्यु प्रमाण पत्र देखने पर सही पायी गयी, जबकि दस्तावेजों में उसकी मृत्यु 17 जुलाई उसकी स्मृति पट पर उभारा जाता है और उनका विश्लेषण कर पूर्व जन्म की घटनाओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है। पश्चिम जर्मनी की विख्यात मनोचिकित्सक डॉ0 हीडे फिट्टाकाड ने इस संदर्भ में विशेष ख्याति अर्जित की है। वे सम्मोहन द्वारा रोगियों का उपचार करती है। उनका कहना है कि मनुष्य के रोगों की जड़ें प्रायः उनके प्रायः उनके पूर्व जन्म के लिये गये कर्मजं या संस्कारों में होती हैं। पूर्वजन्म की घटनायें भी व्यक्ति के अगले जीवन को प्रभावित करती हैं। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उनने बताया कि एक रोगी को प्रायः अपनी हत्या कर दिये जाने का भय सताता रहता था। सम्मोहन की स्थिति में जब उसका कारण पूछा गया तो ज्ञात हुआ कि पूर्व जीवन में उसकी क्रूरता पूर्वक हत्या कर दी गई थी। पूर्व जन्म की स्मृति या संस्कार अचेतन मन पर सर्वाधिक प्रभाव डालते हैं।

“द बुक आफ लिस्ट्स” नामक प्रसिद्ध पुस्तक में विद्वान लेखक डेविड वेलेचिंस्की ने पुनर्जन्म की अनेकों प्रमाणिक घटनाओं का वर्ण किया है। उनके अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख योद्धा रहे अमरीकी जनरल जार्ज पैटर्न को अपने पिछले छः जन्मों की स्मृति थी। संयोग वश इन सभी जन्मों में वे सेना में ही कार्यरत रहे। प्रथम जन्म में वे प्रागैतिहासिक काल में एक योद्धा थे। दूसरे में ग्रीक योद्धा, जो साइप्रस के राजा के विरुद्ध लड़ते हुए मारे गये। तीसरे जन्म में सिकन्दर की सेना में तो चौथे में जूलियस सीजर के साथ थे। पाँचवे में अंग्रेजों की सेना में “नाइट योद्धा” के नाम से प्रसिद्ध थे, जिसने ‘हंड्रेड इयर्स वार” के समय क्रेसी युद्ध में भाग लिया था और दुश्मनों के दाँत खट्टे किये थे। छठे जन्म में वह नेपोलियन की सेना में मार्शल थे। अमेरिका की प्रसिद्ध मनः चिकित्सक रुथ मोंटगोमेरी ने भी ऐसी अनेकों घटनाओं का वर्णन किया है जिनसे सिद्ध होता है कि मृत्यु के पश्चात् भी जीवन बना रहता है और वह अपना नया कलेवर पुनः मनुष्य रूप में ही धारणा करता है।

तिब्बत में बौद्ध धर्म के मतानुयायियों के अनुसार जीवन मुक्त आत्माएँ समूची मानव जाति के कल्याण हेतु धरती पर अवतरित होती हैं। लामाओं के पुनर्जन्म की घटनायें भी कभी-कभी प्रकाश में आती रहती हैं। पिछले दिनों स्पेन में जन्मा दो वर्षीय बालक ओजेल अपना पूर्व जन्म तिब्बत के लामा परिवार में बताता है।

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