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Magazine - Year 1994 - Version 2

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एक रूप ईसा का - एक शैतान का

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उस कलाकार की इच्छा थी कि अपनी समस्त कला को समेट कर एक अमर कलाकृति बनाए। इसमें पवित्र आत्मा और शैतान का समन्वित चित्रण हो। पवित्रात्मा का प्रतीक वह महाप्रभु ईसा को मानता था और शैतान का प्रतीक उस व्यक्ति को जिसने महाप्रभु को कोड़े लगाकर कीलें ठोककर मर्मान्तक पीड़ा देते हुए उनका प्राण हरण किया था। चित्र में दोनों को पवित्रता और क्रूरता के आमने-सामने खड़ा हुआ दिखाया जाना था।

चित्रकार ऐसे दो जीवना व्यक्ति देखना चाहता था जिनकी आवृत्ति में पवित्रात्मा और शैतान की प्रकृति का पूरी तरह आभास मिल सके। मात्र कल्पना से नहीं सजीव छवि देखकर उस प्रकार की आवृत्ति बनाने की बात उसके मन में जँच रही थी।

पहले उसने पवित्रात्मा की आकृति वाला मनुष्य ढूँढ़ना आरंभ किया । उसके लिए वह दूर-दूर तक भटका। हजारों लाखों मनुष्यों के चेहरे गौर से देखे पर वैसा कोई मिला ही नहीं। एक दिन भटकते - भटकते वह किसी अनाथालय में जा पहुँचा वहाँ उसने एक पाँच वर्ष के बालक को देखा। उसके अभिभावक मर गए थे और भाई-बहिन बिछुड़ गये थे । स्नेह छिन जाने से उसकी आँखों से करुणा और कातरता बरस रही थी। वह प्यार खो चुका था - प्यार पाना चाहता था । चित्रकार ने उसे पवित्रात्मा के अधिक समीप पाया और चित्र के लिए उस आकृति को उपयुक्त मान लिया।

अनाथालय के अधिकारी से चित्रकार ने दो घंटे के लिए उस बालक को माँग लिया। उसे अपने स्टूडियो ले गया । बहुत प्यार किया खिलाया-पिलाया और सामने बिठाकर कुछ ही देर में उसकी आकृति कागज पर उतार ली । इसके बाद उसे धन्यवाद कहकर वापस अनाथालय भेज दिया गया। ईसा की छवि के रूप में यह चेहरा उसे बहुत संतोष जनक प्रतीत हुआ।

बच्चे ने स्टूडियो में प्रवेश करते समय वहाँ जो स्नेह - सद्व्यवहार पाया उससे उसकी आँखों में एक नया उल्लास चमका । किन्तु थोड़ी देर बाद जब उसे फिर उस नीरस कटघरे में लौटा दिया गया तो बच्चा समझ गया कि स्नेह दुनिया में से उठ गया । प्रवेश करते समय और विदा होते समय का अंतर उसके सामने स्पष्ट था । जिस धन्यवाद को साथ लेकर वह वापस लौटा था वह बनावटी भी था और अपर्याप्त भी । स्नेह की प्यास की एक बूँद भी समाधान उसमें न मिल सहा।

यहाँ केवल मतलब के लिए दुलारने पुचकारने की प्रथा है। बच्चा मन पर भरोसा कर फिर अनाथालय में रहने लगा। स्नेह की एक झलक स्टूडियो में उसने जो देखी थी - उसमें भी उसने नकलीपन ही पाया । आशा की किरणें फिर कभी उसने देखी भी नहीं।

चित्रकार का आधा चित्र बना चुका था। अब कोड़े मारने वाले शैतान की क्रूर आकृति की आवश्यकता पड़ी ताकि उस कलाकृति में अधिक यथार्थता का समावेश हो सके। इसके लिए भी वह दूर दूर तक भटका । अब की बार उसे पवित्रात्मा का चेहरा ढूँढ़ने से भी अधिक कठिनाई हुई , वैसी आकृति मिलती ही न थी जिसमें नर पिशाच के सभी चिन्ह पाये जा सकें।

खोजबीन उसने बराबर जारी रखी ! चेहरे देखने और खोजने में बराबर लगा रहा। इस प्रयास में उसके बीस वर्ष गुजर गए। चित्र अधूरा ही पड़ा था। अंत में उसे एक जेलखाने में अपनी इच्छित आकृति मिल गई एक पच्चीस वर्षीय नौजवान लंबी कैद की सजा भुगत रहा था । उसने अनेकों वीभत्स अपराध किए थे। आजीवन कारावास का दंड उसे न्यायालय से मिला था। उसकी आँखें , होंठ , हँसी , भवें और चेहरे की प्रत्येक रेखा पर शैतान नाच रहा था। ऐसी भयंकर आकृति उसने इन बीस वर्षों में अन्यत्र कहीं नहीं देखी थी।

चित्रकार ने संतोष की साँस ली। जेल के अधिकारियों से संपर्क स्थापित किया और दो घंटे के लिए उसे स्टूडियो में ले जाने की सुविधा प्राप्त कर ली। कैदी सुरक्षा अधिकारियों के संरक्षण में स्टूडियो लाया गया । चित्रकार ने पूछा - आपका क्या आतिथ्य किया जाय ? कैदी ने व्हिस्की की याचना की , उसने कहा शराब मेरी प्रिय अभिलाषा थी , पर अब तो जेल में वह भी दुर्लभ हो गई है। पिला सकें तो जी भर व्हिस्की पिलाने का प्रबंध कर दीजिए।

इच्छानुसार उसे शराब पिलाई गई। सामने कुर्सी पर बैठा नशे में धुत कैदी और भी भयंकर लग रहा था। ऐसी ही आकृति की तो चित्रकार को जरूरत थी। वह बड़े उत्साह के साथ चेहरे को देख-देख चित्र बनाता चला गया और शैतान की आकृति ठीक-ठीक बन गई । अपनी इस सफलता पर उसे बहुत संतोष था।

धन्यवाद देकर जब कैदी विदा किया जाने लगा , जब उसने नम्रता पूर्वक पूछा-क्या मैं अपनी आकृति का चित्रण देख सकता हूँ। चित्रकार ने उसकी इच्छा पूरी की और जो चित्र बनाया था वह हाथ में थमा दिया । कैदी उसे देखकर अवाक् रह गया उसने महाप्रभु की पवित्रात्मा और शैतान की पैशाचिकता को बार-बार देखा और हतप्रभ होकर सिर खुजाने लगा। चित्रकार ने इस असमंजस का कारण पूछा। कैदी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कान के पास मुँह ले जाकर कहा-आप भूल गए-पवित्रात्मा का चित्र मेरा ही है। आप अनाथालय से मुझे ही अब से बीस वर्ष पूर्व इसी स्टूडियो में लाये थे और इसी कुर्सी पर बिठाकर मेरा चित्र खींचा था। बीस वर्ष पूर्व का पवित्रात्मा - इतनी छोटी अवधि में कैसे पिशाचात्मा बन गया। महाप्रभु की आकृति शैतान में बदल गई। चित्रकार इसका कारण न जान सका। वह स्वयं भी स्तब्ध खड़ा था।

समाधान उभरा स्नेह की प्यास धन्यवाद से शान्त न हो सकी। नीरस दुर्व्यवहार से उद्विग्न अंतःकरण भटकता हुआ अनाचार के गर्त में जा गिरा। चित्रकार सोचने लगा “उस बालक की तरह इस कैदी की भी कुछ माँग है जिसे संस्कारों का पोषण देकर पूरा किया जा सकता था किन्तु अन्य पिशाच स्तर के व्यक्ति भी ऐसे ही बनते हों। “

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