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Magazine - Year 1994 - Version 2

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चेत गया वह, जिसने यह मर्म जान लिया

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राजकुमारी क्षेमा अपूर्व सुन्दरी थी। सुवर्णवर्णा थी, रूप राशि थी। मगध सम्राट बिंबसार के यहाँ जब वह विवाहिता होकर राजगृह आयी तो महारानी कौशल देवी उस समय अग्रमहिषी थी। परन्तु सागल जैसे छोटे स्थान की राजकुमारी होते हुए भी बिंवसार ने उसे कौशल देवी के समकक्ष अग्र राजमहिषी का ही पद दिया । यह उसके अपूर्व सौंदर्य के कारण ही हो सका। सारे रनिवास में उस जैसी रूप सुन्दरी और कोई नहीं थी। स्वयं सम्राट अंतःपुर में उसके इर्द-गिर्द भँवरे की तरह मँडराया करता था। सम्राट की यह आसक्ति उसके अभिमान का कारण भी बनी हुई थी।

इसी बीच सम्राट-भगवान तथागत के संपर्क में आये। यह संपर्क मानों पारस और लौह खण्ड का मिलन था। काली-कुरूपता सुनहली आभा में बदलने लगी। जीवन के इकतीसवें वर्ष में यह विरल क्षण आया था। महात्मा बुद्ध के मार्गदर्शन में जब उसने स्रोतापन्न अवस्था प्राप्त की तो उसका समूचा जीवन ही बदल गया। सद्गृहस्थ की सारी जिम्मेदारियों को पहले की तरह भली-भाँति निभाते हुए भी उसमें अब बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया था। अब उसमें निरंकुश शासकों की सी पहले वाली उद्दंडता नहीं रह गयी थी। अब पहले की तरह दूर-देशों की नगर वधुओं के पीछे दौड़ने वाला कामुक बिंबसार नहीं रह गया था। अपने इस बदलाव को देखकर उसे स्वयं बहुत प्रसन्नता और संतुष्टि थी।

यह लोकमान्यता थी कि शासन करने वाला व्यक्ति जाने अनजाने अनेकों ऐसे दुष्कर्म कर ही लेता है, जिसकी वजह से नरक की योति मिलती है। परन्तु अब तो उसे विकार विमुक्ति की ऐसी विद्या मिल चुकी थी, जिसकी अपनाकर अधोगति की ओर ले जाने वाले सारे कुसंस्कारों का उन्मूलन हो गया। भविष्य में ऐसा कोई कर्म वह कर ही नहीं सकता था, जो नरक की ओर ले जाए। यों उसने उपदेश, धर्म, प्रवचन पहले भी सुने थे। परन्तु महात्मा बुद्ध ने तो विकार विमुक्ति की सक्रिय विद्या दी थी। अपने भीतर विकारों को तटस्थ भाव से देखते हुए उन्हें क्षीण करने का सरल पर प्रभावशाली उपाय दिया था। जिसके अभ्यास से उसे आशातीत लाभ भी हुआ।

सम्राट की अपने परिवार के लोगों से बहुत प्रेम था। उसकी चाहत यह थी कि इस शाँतिदायिनी विद्या का लाभ उसके अपने प्रियजनों को भी मिले। परन्तु उसे यह भी मालूम था कि इसके लिए किसी पर दबाव नहीं डालना चाहिए। अध्यात्म का जो मार्ग जिसे रुचिकर हो, वह उसे स्वेच्छा से अपनाए। परन्तु अपनी ओर से वह केवल प्रेरणा ही दे सकता था सो देता रहता था।

महारानी क्षेमा उसे बेहद प्रिय थी। अतएव वह चाहता था कि वह तथागत के सान्निध्य में आए और धर्म सीखे। लेकिन उसे यह भी मालूम था कि क्षेमा को तथागत से वितृष्णा है। उनके द्वारा की गई रूप-भर्त्सना से उसे घृणा है। इसीलिए वह उनके उपदेश सुनने के लिए एक बार भी नहीं गई। पहली बार जब इसी उद्देश्य भगवान को आमंत्रित किया गया ताकि राजपरिवार के लोग उनके संपर्क में आ सकें तब भी क्षेमा दूर रही। नगर में वेणुवन का दान देकर तथागत को कुछ समय के लिए राजगृह में रहने का शुभ संकल्प भी इसीलिए किया गया था कि उसके परिवार और राज्य के लोग भगवान के संपर्क में आयें और शुद्ध धर्म सीखकर शान्ति लाभ लें, परन्तु क्षेमा कभी वेणुवन नहीं गई।

बिंबसार क्षेमा के इस व्यवहार से दुःखी था। वह हृदय से चाहता था कि क्षेमा भगवान के उपदेश सुने। उनसे साधना सीखे और अपना मंगल साथ ले। परन्तु अपने परिवार के अथवा राज्य के किसी भी व्यक्ति पर उसने कभी कोई दबाव नहीं डालना चाहता था। अंततः उसने एक उपाय सोचा।

क्षेमा को गायन विद्या से बहुत प्रेम था। अच्छे संगीतकार और गायक उसके मनोरंजन के लिए अंतःपुर रमें बुलाए जाते थे। बिंबसार ने बेणुवन की मनोरमता पर कुछ गीत लिखवाए और कुछ अच्छे गायकों को वे गीत क्षेमा को सुनाने के लिए भेजा। वेणुवन का नन्दनवन जैसा वर्णन सुनकर उसके मनमें यह अभालाषा जागी कि वह वेणुवन की सैर करने जाए, परन्तु ऐसे समय जबकि भगवान मिक्षाटन के लिए बाहर गए हुए हों। महाराज बिंबसार ने ऐसा ही प्रबंध कर दिया।

वह वेणुवन पहुँची। वहाँ की नैसर्गिक सौंदर्य सुषमा और शान्तिप्रद वातावरण को देखकर वह अत्यन्त प्रभावित हुई। जैसा सुना था उससे भी कहीं बढ़कर मनोरमा पाया इस वेणु उद्यान को। कहाँ राज-महलों का घुटन भरा वातावरण ईर्ष्या, द्वेप भरी अशान्ति और कहाँ यह प्रकृति की उन्मुक्त मधुरिमा और तपोभूमि की अगाध शान्ति। घूमते-घूमते बहुत समय बीत गया। भगवान बुद्ध भिक्षाटन से लौट आए। उसने देखा कि अनेक स्थानों पर पेड़ों के नीचे अथवा पुष्प मंडपों के नीचे अनेक विपश्यना योगी ध्यान कर रहे हैं। उनमें से अनेकों युवक हैं। उन्हें देखकर उसके मन में यह भाव जागा कि यह उम्र में तो गृहस्थ जीवन के कामोपभोग का सुख भोगना चाहिए। ध्यान बेकार अपनी जवानी नष्ट कर रहे हैं।

इन्हीं विचारों में उलझी हुई वह वहाँ पहुँची जहाँ भगवान की गंध कुटी थी। उसके समीप एक पेड़ के नीचे स्वयं बुद्ध बैठे थे। जिन्हें टालना चाहती थी उन्हीं का सामना हो गया। तथागत ने नजर उठाकर क्षेमा की ओर देखा उनकी आंखों में असीम करुणा थी। परन्तु क्षेमा ने तो सदा वासना भरी आँखें देखी थी। यहाँ इन आँखों में तो वासना का नामोनिशान नहीं था। भगवान ने एक बार देखकर उपेक्षा से अपनी आंखें फेर लीं। रूपगर्विता क्षेमा का दर्प आहत हो गया। उसे जो देखता-देखता ही रह जाता, उसके रूप लावण्य में ऐसा तीव्र आकर्षण था। आज पहली बार उसने देखा किसी पुरुष ने उसे एक नजर देखकर अपनी आँखें फेर लीं। उसे यह सहन नहीं हुआ।

तथागत ने देखा क्षेमा के पास अनेक जन्मों में अर्जित प्रचुर पुण्यों का संग्रह है। परन्तु इस समय की मानसिकता में इसे शब्दों द्वारा धर्म को नहीं समझाया जा सकता । यह सोचकर महाकारुणिक बुद्ध ने ऋद्धि बल का उपयोग किया। क्षेमा ने देखा भगवान के समीप एक अत्यंत रूपवती देवागंना उपस्थित हो गई है और उनकी सेवा में लगी है।

उसकी रूप शोभा देखकर वह आश्चर्यचकित रह गई। ऐसा रूप तो उसने पहले कभी देखा नहीं था। अनुपम नारी सौंदर्य की सजीव प्रतिमा अंग-अंग लावण्य से भरपूर। अरे ! मैं तो इसकी परिचारिका बनने योग्य भी नहीं। जिसकी सेवा में ऐसी अप्सराएँ नियत हों, वह मेरी ओर आँख उठाकर क्यों देखे भला ? रूप सौंदर्य का ऐसा समुच्चय क्षेमा विस्मय-विमुग्ध होकर उस अप्सरा को देखती रही, देखती रही।

कुछ देर में उसने देखा कि यह नवयौवना धीरे-धीरे प्रौढ़ हो गई है। सौंदर्य की आभा ढलने लगी और देखते ही देखते अरे ! यह क्या हुआ ? चेहरे पर ही नहीं सारे शरीर पर झुर्रियाँ ही झुर्रियाँ । हड्डियों का ढाँचा, जिस पर यहाँ-वहाँ उभरी बदसूरत नसें और तिस पर ये झुर्रियां। अरे ! देख इस अस्थि कंकाल नारी की कमर झुकती जा रही है। डंडे के सहारे खड़ी है। दुर्बलता के कारण हाथ काँपते हैं पाँव काँपते हैं, सारा शरीर काँपता है। अरे ! यह तो डंडे के सहारे भी नहीं टिक सकती झुकते-झुकते गिर ही पड़ी। उखड़े-उखड़े साँस चलने लगे। यह देखो अब साँस भी रुक गया। ओह ! यह हड्डियों का ढेर। अरे ! यह तो सचमुच ढेर हो गई, मृत हो गई। सचमुच मर ही तो गई।

ऐसे सुन्दर रूप की यह अंतिम परिणति ? क्षेमा के मन में यकायक बिजली सी कौंधी। क्या मेरी भी यही दशा होगी। मेरा रूप लावण्य भी ऐसे ही जर्जरित हो जाएगा ? ऐसे ही निष्प्राण हो जाएगा बहुत बड़ा धर्म संवेग जागा उसके मन में। ऐसी जरा-मरणधर्मा काया के प्रति इतनी आसक्ति। वह गंभीर हो गई। यकायक उसके अनेक जन्मों संचित पुण्य पारमिताओं का धर्मबल जाग गया। तथागत समझ गए अब इसकी मनःस्थिति धर्म सुनने समझने योग्य है, तो उनकी करुणा का सरित प्रवाह बह उठा “ देख क्षेमा ! इस शरीर को देख, जो सड़ता है, चूता है, गंदा है, बदसूरत है, मृत है ! मूढ़ जन ही इसका अभिनन्दन करते हैं। चित्त को एकाग्र करके इस तत्व को समझ। इसके प्रति निर्वेद जगा। अनासक्ति जगा । समझ जैसा यह शरीर है वैसा ही तेरा शरीर है। जैसा बाहर है वैसा ही भीतर है। जैसा भीतर है वैसा ही बाहर है अशुचि का गंदगी की ढेर है यह। इस नश्वर शरीर के प्रति विमुख हो। उस परम विमुक्त अविनाशी अवस्था के प्रति सम्मुख हो। सम्यक् ध्यान करके अपने अहंकार की जड़ें खोद ले और निर्वाणिक शान्ति का लाभ कर। “

बुद्ध की करुणा उसके अंतराल के कल्मषों को धोने लगी। चित उपराम होकर देशना की धारणा करने लगा। भीतर चिंतन मंथन का क्रम चल

पड़ा। स्वयं भगवान सम्यक् संबुद्ध द्वारा कल्याणकारी मार्ग का निर्देशन मिला। अनेक जन्मों के पुण्यों का फल मिला। वह भावविभोर होकर भगवान के चरणों में गिर पड़ी और आभार प्रकट किया। उसे अब समझ में आया कि काम मोह में डूबी रहने के कारण इन महाकारुणिक से दूर रहकर वह अपने ही सुख से वंचित रही है। बुद्ध की करुणा से स्नात होकर वह महाराज बिंबसार के पास गई और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की कि किस युक्ति से आपने मुझे भगवान के पास भेज दिया। गई थी वन दर्शन के लिए, पर मिल गया निर्वाण दर्शन। उनके मार्ग निर्देशन में मेरे मन में बड़ा निर्वेद जागा है। मुझे उनके भिक्षु संघ में प्रव्रजित होने की अनुज्ञा दीजिए।

बिंबसार अब पहले वाला बिंबसार नहीं था। उसने बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने अंतःपुर की सर्वोपरि सुन्दरी को प्रव्रज्या लेने की अनुमति दे दी। प्रव्रज्या लेकर क्षोमा गहन ध्यान में प्रविष्ट हो गई । कुछ ही समय में उसने अहँते अवस्था प्राप्त की। उसकी धर्म सिखाने की कला इतनी प्रभावशाली थी कि स्वयं भगवान ने उसकी योग्यता को देखकर कहा-

एतहग्यं भिक्खवे, ममसाविकानं भिक्खुणीन मरायज्ञानं यदिदं क्षेमा। “

सभी श्राविकाओं में भिक्षुणियों में उसे महाप्रज्ञावती के अग्रपद से विभूषित किया।

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