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Magazine - Year 1994 - Version 2

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ईस्टर द्वीप के विशाल प्रस्तर खण्डों का रहस्य

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मनुष्य पुरुषार्थ परायण प्राणी है। वह चाहे तो असंभव भी संभव वन जाता है और अकर्मण्य-आलसियों के लिए सरल-संभव भी अशक्य स्तर का बना रहता है। यह उसके मनोबल और मानसिक संरचना पर निर्भर है कि कठिन-से-कठिन कार्य भी सहज रूप से संपादित हो जाय और आसान लगने वाली क्रिया भी दुरूह प्रतीत होने लगे।

इसी तथ्य की पुष्टि ईस्टर-द्वीप की खोज से भी हुई है। इस टापू के बारे में प्रथम जानकारी सबसे पहले डच एडमिरल जैकब रोगिबीन द्वारा सन् 1722 में मिली। जब वह अपने तीन जहाजों के साथ उक्त द्वीप के निकट पहुँचा, तो उसे दूर से ही विशालकाय मानवाकृति दिखाई पड़ी। नजदीक आने पर ही उसे यह ज्ञात हो सका कि वह कोई जीवित व्यक्ति नहीं, वरन् विशाल प्रस्तर प्रतिमा है। उस भव्य मूर्ति के साथ सामान्य आकार-प्रकार की एक विशाल पाषाण सेना थी। उस दिन ईस्टर सण्डे था, इसलिए उसने उसका नाम ईस्टर द्वीप रख दिया।

टापू की खोज के करीब सौ वर्ष बाद उसका गहन अध्ययन कार्य प्रारंभ हुआ। तब तक भव्य विग्रह भूलुण्ठित हो चुके थे। अध्येताओं के अनुसार यह पत्थर की आकृतियाँ ज्वालामुखी के दौरान बनी विशालकाय चट्टानों को तराश कर बनाई गयी है। उक्त द्वीप में रैनो राराकू के प्रसुप्त ज्वालामुखी के मुख के आस-पास अभी भी भीमाकार प्रस्तर खण्ड देखे जा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन्हें ज्वालामुखी के मुख की दीवार से तोड़ कर एकत्र किया गया है। इनमें से कितने ही टुकड़े मूर्ति की शक्ल में गढ़े हुए हैं और कितने ही अनगढ़ स्थिति में पड़े हुए हैं। इन्हीं में से अनेकों को बड़ी-बड़ी चट्टानों की बनी पीठिका पर बाद में खड़ा किया गया जबकि चार सौ के लगभग अर्धनिर्मित विग्रह ज्वालामुखी के मुख के भीतर अभी भी पड़े हुए हैं। इन अर्धनिर्मित मूर्तियों में से कुछ में तो केवल छैनी के कुछ एक निशान मात्र हैं, जबकि कतिपय खण्ड अधूरे पड़े हुए हैं। इनमें से आधे के आस-पास पूर्णरूप से तैयार हैं, जिन्हें मात्र ऊपर लाना भर था, किन्तु किसी कारणवश बाहर लाया नहीं जा सका। ज्वालामुखी के अंदर प्रवेश करत ही इस प्रकार के तैयार विग्रह बीच-बीच में रखे अब भी देखे जा सकते हैं। इनमें से कइयों के वजन 30 से 40 टन के बीच है। वहाँ की सबसे बड़ी मूर्ति 66 फुट ऊँची है। अनुसंधानकर्ताओं का अनुमान है कि ज्वालामुखी के भीतर रास्ते के इर्द-गिर्द प्रतिमाओं का पड़ा रहना इस बात का प्रतीक है कि वे बाहर आने की प्रक्रिया में सम्मिलित थीं, किन्तु प्रक्रिया पूरी होते से पूर्व ही उसे त्याग दी गई और मूर्तियाँ बाहर नहीं आ सकीं। इस अनुमान को तब और बल मिला जब अंदर में वास्तुकारों के पत्थर औजार भी मिले। इन औजारों की उपस्थिति यह बताती है कि शिल्पकार दुबारा अंदर प्रवेश करने वाले थे, पर संभव है किसी असामान्य परिस्थितिवश वे ऐसा नहीं कर सके और सब कुछ वहाँ छोड़ देना पड़ा। यह भी शक्य है कि अचानक ज्वालामुखी के भीतर कुछ असाधारण हलचल शुरू हो गई हो। अन्वेषणकर्ताओं का एक विचार यह भी है कि शायद मूर्तिकारों को अपने श्रम और समय का महत्व अकस्मात मालूम हो गया हो, और इन बहुमूल्य संपदाओं के निरर्थक अपव्यय किसी कौतुक-क्रिया में करने की तुलना में किन्हीं उच्चस्तरीय निर्माणों में लगाने की बात उनकी समझ में आ गई हो, अतएव बीच में ही वह कार्य रोक दिया गया हो।

तथ्य चाहे जो हो, शोधकर्ताओं का जिस बात ने सबसे अधिक परेशान किया है, वह है उन विशाल प्रतिमाओं का परिवहन। वे इस बात का तनिक भी अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं, कि सर्वथा साधनविहीन स्थिति में उन वृहद मानवाकृतियों को निर्माण स्थल से 10 मील जितनी दूरी तक किस भाँति ले जा सकता संभव हो सका ?

एक मत के अनुसार कदाचित् ऐसा लकड़ी के मोटे-मोटे लट्ठों के माध्यम से किया गया हो, पर टापू के मृदा-परीक्षण से जिस बात की जानकारी मिली, उसके अनुसार वह मिट्टी उतने विशाल वृक्षों को खड़ा रख पाने में समर्थ नहीं है, जितने बड़े और मोटे पेड़ इस कार्य के लिए आवश्यक हैं। एक अन्य विचार वनस्पतियों से बने रस्सों के प्रयोग का पक्ष प्रस्तुत करता है, पर 40 टन जितना भारी वजन इन रस्सों की सहायता से खींच पाना तर्कसंगत नहीं लगता, अतः इसे भी अमान्य कर दिया गया।

वास्तविकता चाहे जो हो, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि संकल्प यदि प्रबल हो और पराक्रम प्रखर , तो बड़ी-से बड़ी बाधा भी छोटी हो जाती है, पर हीन मनोबल वालों के समक्ष छोटा व्यवधान भी हिमालय जितना बड़ा और दुस्साध्य लगने लगता है। दूसरी ओर साहस बढ़ा-चढ़ा होने पर प्रकृति और परिस्थिति भी कर्त्ता की सहयोग देने के लिए विवश हो जाती है और ऐसे उपाय-उपचार सुझाने लगती है, जो सामान्य स्थिति और मानसिक स्तर की अवस्था में असंभव बना रहता है। लकीर बड़ी हो, तो उसके आगे और बड़ी रेखा खींच देना ही उसे छोटी बनाने का एकमात्र तरीका हो सकता है। मुसीबतों के संबंध में भी यही बात है। मनोबल और पुरुषार्थ को प्रखर बना लिया जाय, तो वे स्वतः ही तुच्छ हो जाती हैं, इसमें दो मत नहीं।

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