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Magazine - Year 1994 - Version 2

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स्वभाव वश

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बिच्छू सरिता के पुलिन पर बिल बनाकर सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। उसे जब भूख लगती बिल से बाहर आ जाता और रेत पर घूमकर छोटे-छोटे कीड़े - मकोड़े को उदरस्थ कर अपनी क्षुधा शाँत करता। कभी-कभी उसे केकड़े के दर्शन भी हो जाते। वह रहता तो जल में था पर धूप सेंकने के लिए किनारे पर आ जाता और रेत में घंटों पड़ा रहता। उसने रेत में भी अपने निवास की अस्थाई व्यवस्था कर रखी थी। एक छोटा बिल बना लिया था, जब उसे कौवे बगुले या अन्य किसी शत्रु के आगमन का संकेत मिलता सुरक्षार्थ वह उस बिल में छिप जाता।

केकड़े और बिच्छू दोनों में आकृति की समानता थी। शुरुआत में तो बिच्छू केकड़े से बिल्कुल न बोला, चुपचाप उसके क्रिया कलाप देखता रहता कि वह किस तरह पानी में कूद कर क्रीड़ा करता रहता है और जल विहार का आनंद लेता है। एक दिन बिच्छू से न रहा गया उसने अपनी इच्छा को प्रकट करते हुए कहा- “ मित्र ! आपको जल क्रीड़ा करते देखता हूँ तो मेरे मन में भी आता है कि मैं भी सरिता में कूद कर स्नान करूं। “

“ आप भूल कर भी ऐसा मत करना “ -केकड़े ने बिच्छू को सचेत करते हुए कहा-देखते नहीं नदी का प्रवाह कितना तीव्र है, कहीं जलधारा आपको भंवर की ओर बहा कर ले गई तो तैरने की इच्छा अपूर्ण रह जाएगी और विवश होकर जल समाधि लेती पड़ेगी। कहीं-कहीं पर तो नदी की गहराई इतनी अधिक है कि थाह लेना भी मुश्किल पड़ता है। “

“ मुझे तैरना नहीं आता इसलिए जान-बूझकर मैं मृत्यु को आमंत्रित तो नहीं करना चाहता” - बिच्छू बोला- “ पर क्या आप मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर नदी की धारा की सैर नहीं करा सकते। जब कभी सरिता के मध्य में नौका-विहार करते हुए यात्रियों को देखता हूँ। तो मेरा मन हर्षोल्लास से नाच उठता है, सोचता हूँ उन्हें कितना आनंद मिल रहा होगा। “ सैर करना तो कोई मुश्किल काम नहीं है पर आपकी पूँछ का डंक कितना विषैला है इसे कौन नहीं जानता। यात्रा के बीच में स्वभाववश कहीं आपने डंक चला दिया तो मेरा जीवन समाप्त हो जाएगा।”

“ आपका ही जीवन क्यों ? मेरा अपना बचना भी तो कठिन हो जाएगा। मैं इतना मूर्ख नहीं कि अपना हित अनहित भी न जानता होऊँ। तुम्हें डंक मारने पर मुझे भी तो जल में डूबना पड़ेगा। अतः मेरे डंक का भय तुम न करो। “ बिच्छू ने आश्वासन देते हुए कहा।

केकड़े को विश्वास हो गया । उसने बिच्छू को अपनी पीठ पर बिठाया और उतर पड़ा नदी में हवाखोरी करने के लिए । नदी की लहरों पर केकड़ा तैर रहा था। उसे जल क्रीड़ा में बड़ा आनंद आ रहा था । ऊपर बैठे बिच्छू को ऐसा लग रहा था मानो झूला झूल रहा हो। मंद-मंद प्रवाहित होती शीतल वायु उसे बड़ी भली लग रही थी। अपने चहुँ ओर अपार जल समूह को देखकर उसे ऐसा आनंद आ रहा था मानो छोटी किश्ती में बैठकर अवकाश के क्षणों में अपने व्यथित हृदय को शाँति और नवीनता प्रदान करने के लिए निकल पड़ा हो।

बिच्छू अपने आनंद में भूल ही गया कि केकड़े की पीठ पर बैठा है। तब तक एक बड़ी लहर का प्रवाह आया। हल्की सी फुहार उसकी पीठ पर गिरी। घबराहट में बिच्छू का डंक पूरे वेग से केकड़े की पीठ पर आ गिरा। केकड़ा तिलमिला गया। उसके पूरे शरीर में विष फैल गया। मरते-मरते उसने कहा- “आखिर” जिस बात के लिए मैं डर रहा था वही हुआ न ?

पश्चाताप के स्वर में बिच्छू बोला- “भाई ! स्वभाव का परिवर्तन बड़ा कठिन काम है। जैसे ही किसी वस्तु का स्पर्श मेरे शरीर से होता है स्वभाव वश डंक अपना कार्य पूर्ण कर देता है। अपनी मृत्यु को सामने देखकर मैं स्वभाव को दबा नहीं पाया।”

सचमुच ही वे कितने सम्माननीय हैं जो अपने स्वभाव को नियंत्रित करते के लिए सदैव प्रयत्न शील रहते हैं और जिन्होंने आत्म नियंत्रण द्वारा अपने स्वभाव को वश में कर लिया है।

बिच्छू का दुःस्वभाव उसके लिए ही नहीं केकड़े के लिए भी प्राणघातक सिद्ध हुआ। यह घटनाक्रम हम उन सब पर भी आए दिन घटित होता रहता है जो न तो अपने दुःस्वभाव के दुष्परिणामों का विचार करते हैं और न उसे सुधारने का प्रयत्न।

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