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Magazine - Year 1994 - Version 2

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हमारी यह इच्छा है, इसलिए उसकी ............................................... वह कोई तक नहीं है। देखना यह भी पड़ेगा कि जो चाहते हैं उसके लिए आवश्यक साधन जुटाए भी जा सकते हैं या नहीं । परिस्थितियों का उतार-चढ़ाव कई बार बड़ा विलक्षण बन जाता है। घटनाएँ कई बारे ऐसे अप्रत्याशित रूप से घटित होती है कि नजदीक आई सफलता उलट कर असंभव बन जाती है। ऐसे उलट फेर अपने हाथ से बाहर होते हैं। इस संसार में परिस्थितियों की अनेकों धाराएँ बहती हैं। आँधी-तूफान की तरह कई बार उनका रुख हमारी दिशा में बहुत सहायक होता है और कई बार इतना विपरीत होता है कि एक कदम भी आगे बढ़ते नहीं बन पड़ता। साहसी, सद्गुणी, और क्षमता संपन्न व्यक्ति भी इन विपरीत परिस्थितियों में असहाय हो जाता है जो सोचा गया है जिसके लिए प्रयास किया गया है वह अवश्य ही पूरा होकर रहेगा, इसका कोई निश्चय नहीं।

ऐसी अनेकों विडंबनाएं हैं जिनमें हम घिरे और जकड़े हैं। आकाँक्षा पुरुषार्थ की प्रबलता होते हुए भी अनेक कारण ऐसे हैं जो अभीष्ट सफलता की बात सुनिश्चित नहीं रहने देते। यों सत्प्रयत्नों का परिणाम तो होता ही है और बहुत करके सफलताएं भी उसी आधार पर मिलती हैं। किंतु इतने पर भी यह दावा नहीं किया जा सकता कि हर सुयोग्य और हर प्रतिभाशाली प्रयत्नशील को सफलता उतनी मात्रा में मिल ही जाएगी जितना कि सोचा या चाहा गया है।

असफलता की प्रतिक्रिया मन पर आघात करती है। उससे निराशा होती है और खीझ भी। कई बार तो यह आघात इतने गहरे होते हैं कि भविष्य में कुछ करने की हिम्मत जुटाना भी कठिन हो जाता है। कई व्यक्ति बेतरह टूट जाते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए यह मान लेते हैं कि अपना भविष्य अंधकारमय है। ऐसी मनः स्थिति में दुबारा न तो उत्साहवर्धक सोचते बनता है और न हिम्मत के साथ कोई बड़े कदम उठाने का साहस होता है। जिन का अंतर खोखला हो गया उनका बहिरंग पुरुषार्थ भी कैसे जगेगा। और जहाँ भीतर बाहर का अवसाद छाया हुआ हो वहाँ उज्ज्वल भविष्य का सूर्योदय कैसे होगा। असफलताएँ कई दुर्बल मन वालों पर ऐसा ही अभिशाप पटक जाती हैं जिनके कारण वे सचमुच गई गुजरी स्थिति में दिन काटने के दुर्भाग्य के साथ समझौता कर लेते हैं और निराशा भरी मनःस्थिति में जिंदगी के दिन पूरे करते हैं।

इन सब जंजालों से बचने का एक मात्र तरीका यह है कि हम कर्तव्य कर्म को अपना लक्ष्य निर्धारित करें और उसके लिए किए गए पुरुषार्थों को ही सफलता जितना आनंद उपहार स्वीकार कर लें। सचमुच कर्तव्य धर्म में उत्साह और आनंद पूर्वक निरत रहने वाली निष्ठा को अक्षुण्ण बनाए रखना एक उच्चकोटि की भावनात्मक सफलता को आनंददायक और संतोषजनक मान लिया उसे दृश्यमान सफलता के मिलने न मिलने की चिंता नहीं रहती। वह अपने प्रयास-पुरुषार्थ की उत्कृष्टता को ही सफलता मानकर संतोष कर लेता है और हर भले बुरे परिणाम को खिलाड़ी की हार-जीत मानकर मुसकराते हुए स्वीकार करता रहता है। कर्तव्य कर्म में निष्ठावान होना ही मानवी पुरुषार्थ की चरम सीमा है। अभीष्ट भौतिक परिणाम दैवाधीन है। अनेकों अविज्ञरत कारण सफलता प्राप्त होने के मार्ग में सहायक बाधक होते रहते हैं। इसलिए यह अनुमान कदाचित ही खरा उतरता है कि इतना पुरुषार्थ करने पर इतने समय में अथवा साधनों से इतनी सफलता प्राप्त कर ली जाएगी । घटना क्रम किस प्रकार घटित होता जा रहा हैं , इसे कोई नहीं जानता । ऐसी दशा में अनिश्चित को निश्चित मानकर चलने वालों को अगले दिनों निराश होना पड़े इसकी आशंका पड़ी ही रहेगी । आतुर फलाशा जब निराशा में परिणत होती है तो आदमी को आसमान से गिरकर पाताल में जा टकराने जितना कष्ट होता है। कई बार तो उसकी हड्डी - पसली इस बुरी तरह टूटती हैं कि भविष्य के लिए अपंग ही बनकर रह जाता है।

स्थिति का विश्लेषण करने वाले विज्ञ मनीषियों ने हमारे लिए सुरक्षित एवं सुनिश्चित मार्ग यह बताया हैं कि सफलता के लिए लक्ष्य निर्धारित करें - उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ करें साधन जुटाएँ इतने पर भी निर्दिष्ट फल मिल ही जायगा इसके सम्बन्ध में प्रस्तुत अनिश्चितता को भी ध्यान में रखें और इसके लिए अपनी मनोभूमि को तैयार रखें कि मनोरथ पूरा न हुआ तो भी बिना खीझ और निराशा के आगत का स्वागत किया जाएगा।

इस प्रकार की संतुलित मनः स्थिति केवल उन्हें ही प्राप्त हो सकती है जो कर्तव्य कर्म को अपनी सीमा मर्यादा मान लें और उसके लिए जो तत्परता बरती गई है उसे संतोष जनक समझें । सफलता को मनुष्य के गौरव की कसौटी नहीं माना जा सकता । प्रतिष्ठा उनकी कर्तव्य निष्ठा के साथ जुड़ी रहती है । असफल व्यक्तियों की सूची में वे समस्त महामानव गिने जा सकते हैं जिन्होंने उच्च आदर्शों के लिए अत्यंत कष्ट सहे और सदुपयोग के लिए बलिदान हो गए।

इसी तरह अनीतिपूर्ण दुष्ट-दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाकर ढेरों सफलताएँ पाने वालो की संख्या में कमी नहीं है। आज तो बहुतायत उन्हीं की है। इन सफल मनोरथ लोगों को पदार्थ एवं परिस्थितियाँ मिल गई सो ठीक है। पर उन्हें आत्म संतोष कहाँ मिल सका ? ईश्वर और समाज की दृष्टि में भी वे घृणित ही है। इतनी बड़ी हानि उठाकर जिनने कुछ भौतिक लाभ उठा लिया उन्हें सफल या सौभाग्यशाली नहीं कहा, माना जाना चाहिए।

कर्तव्य कर्म पूर्णतया मनुष्य के हाथ में हैं उसे वह पूरी ईमानदारी एवं तत्परता के साथ करता रह सकता है। अपने हिस्से के अपने हाथ का काम पूरा कर लिया जाना इतना ही संभव भी है और इतना ही पर्याप्त भी।

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