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Magazine - Year 1994 - Version 2

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“न मालूम ! लोग हमारा विरोध क्यों करते हैं ?” हममें से न जाने कितने ऐसे हैं जो इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हैरान परेशान रहते हैं। तनिक चिंतन की गहराई में जायँ तो पता चलता है कि विरोध का जन्म प्रतिकूलता से ही होता है। जब तक पुष्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, शारीरिक अथवा मानसिक मौन अथवा मुखर रूप से प्रतिकूलता की अभिव्यक्ति नहीं करता तब तक विरोध उत्पन्न ही नहीं हो सकता। यह बात दूसरी है कि मनुष्य अपनी उस भूल, कभी अथवा दोष को देख समझ न पाये।

दृष्टि दोष, भाव दोष, भावा दोष और व्यवहार दोष यह चार दोष ऐसे हैं जो किसी भी व्यक्ति के लिए विरोध की बढ़ोत्तरी कर देते हैं। दीप-दर्शन संकीर्ण दृष्टिकोण, अदूरदर्शिता अथवा अतिदर्शन आदि दृष्टिदोष के सामान्य रूप है।

दोषदर्शी व्यक्ति सामान्यतया दूसरों की कमियों, दुर्बलताओं रहस्यों तथा छिद्रों को ही देखता और खीजता रहता है। अपनी इस वृत्ति के वशीभूत रहकर वह यह नहीं सोच पाता कि यदि मैं किसी दुराव अथवा दुर्बलताओं की खोज करने के लिए तत्पर रहूँगा तो संभवतः अन्य पक्ष मुझको अहित चिंतक मान बैठेगा। वह यह विश्वास किए बिना रह नहीं सकता कि यह हमारी कमजोरियों को जानकर या तो अनुचित लाभ उठाना चाहता है, दबाए रहना चाहता है अथवा कोई हानि पहुँचाने के लिए भूमिका तैयार कर रहा है। ऐसी अवस्था में उसका विरोध हो जाना स्वाभाविक ही है। फिर चाहे दोषदर्शी उसका कोई अहित न भी करना चाहता हो, सिर्फ अपनी वृत्ति से मजबूर होकर किसी व्यसन विवश व्यक्ति की तरह ही वैसा कर रहा हो तब भी यह कारण उसके विरोध को रोक नहीं सकता। थोड़े बहुत दोष सभी में होते हैं। कोई भी सर्वथा निर्दोष नहीं होता। इसी प्रकार कुछ न कुछ गुण भी सबमें मौजूद होते हैं। बुद्धिमान मनुष्य जो कि समाज में स्त्रिध तथा सरल जीवन का सुख लेना चाहते हैं , वे किसी के दोष नहीं गुण ही खोजा परखा करते हैं।

संकीर्ण दृष्टिकोण एक पाश के समान दुखदायी होता है। इसको लेकर जो व्यक्ति जहाँ भी जाता है। वहाँ अपने लिए नापसन्दगी तथा असहयोग उत्पन्न कर लेता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति हर वस्तु तथा हर व्यक्ति का अवमूल्यन ही करता रहता है। वह किसी को विशेषता अथवा गुण देखकर सराहना करना तो जानता ही नहीं। किसी की महत्ता अथवा मान्यता स्वीकार कर सकना उसके वश की बात नहीं होती। किसी की रचना कृति सुन्दरता अथवा सफलता से प्रभावित होने पर वह उसकी अभिव्यक्ति में चोरी करता है और यदि प्रभाव को प्रकट भी करता है तो किसी कमी अथवा तुलनात्मक दृष्टि से मूल्य एवं महत्व कम करके। किसी के विश्वासों, आस्थाओं को सम्मान देना तो दूर उनको मार्ग तक देने को तैयार नहीं होता। उसमें यह देख सकने की शक्ति नहीं होती कि कोई दूसरा व्यक्ति उसकी तरह सफल होकर आगे बढ़ जाय। ऐसे संकीर्ण व्यक्ति के प्रति लोग अहितैषी अनुदार अथवा ईर्ष्यालु होने की धारणा बना लेते हैं और उसके, संपर्क में लाने अथवा उसके संपर्क में जाने की पारस्परिकता को निरुत्साहित करने लगते हैं और यह एक प्रकार का विरोध ही है। बुद्धिमान व्यक्ति विशाल दृष्टिकोण को आश्रय देकर दूसरों को रास्ता देते और बदले में रास्ता पाकर निर्भय एवं निर्द्वन्द्व जीवन का सुख उपभोग करते हैं।

अदूरदर्शी व्यक्ति कदम-कदम पर गलती करता रहता है। वह जो कुछ कह रहा है उसका कहाँ पर किस पर किस समय और क्या प्रभाव पड़ सकता है इसका अनुमान कर सकना अदूरदर्शी के लिए संभव नहीं। वह ऐसे अनेक काम कर बैठता है जो उस समय तो बड़े , समीचीन मालूम होते हैं किन्तु समयान्तर में बड़ा ही प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न करते हैं अदूरदर्शी में एक दोष उतावली का भी होता है। जिसके कारण उसके बहुत से काम अहितकर सिद्ध होते है। जैसे किसी की आलोचना का अवसर आ पड़ा तो दूरदर्शी व्यक्ति तो उस अवसर से उत्पन्न उत्सुकता अथवा प्रेरणा को दबा लेगा, किन्तु अदूरदर्शी इसकी आवश्यकता को नहीं समझ पाता और अपनी बुद्धिमत्ता प्रकट करने अथवा स्पष्ट वक्ता होते का श्रेय लेते के लोभ से आलोचना अथवा निन्दा में प्रवृत्त हो जाएगा। जिसके फलस्वरूप सही होने पर भी आलोच्य व्यक्ति के साथ-साथ उस वर्ग अथवा उस समुदाय के सारे व्यक्ति उसके विरोधी बन जाएँगे। ऐसे ही अदूरदर्शी कर्मचारी, विद्यार्थी , नेता अथवा सुधारक अधिकारियों, अध्यापकों तथा लोक भावना को अपने विरुद्ध बना लिया करते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति कहने अथवा करने से पहले उसके प्रत्यक्ष, परोक्ष निकट अथवा दूर पड़ने वाले प्रभाव पर अच्छी तरह विचार कर लेने पर ही कोई काम करते हैं।

अतिदर्शी व्यक्ति किसी भी बात को बहुत बड़ा-चढ़ा कर देखता है। किसी का तिल जैसा दोष उसे ताड़ जैसा और चुल्लू भर गुण समुद्र जैसे दीखते हैं और उसी के अनुसार वह उनकी निंदा स्तुति भी किया करता है। जिससे निन्दा का शिकार व्यक्ति उसे शत्रु मानकर और स्तुति का केन्द्र व्यक्ति उसे प्रलापी अथवा मिथ्यावादी समझकर नापसंद कर देते हैं। अतिदर्शी को किसी का छोटा सा व्यवसाय लाखों-करोड़ों का तथा थोड़ा साधन ने जाने कितना मालूम होता है और तदनुसार ही वह उसका प्रचार भी करता है जिससे उस वर्ग के लोग उसे समाज में बदनाम करने वाला मानकर उसके विरोधी बन जाते हैं। समझदार व्यक्ति अधिकता से बचकर हर बात तथा हर व्यक्ति का उचित मूल्याँकन ही किया करते हैं। गलत मूल्याँकन से अथवा अनुचित प्रशंसा से यदि कोई एक आध हलकी मनोभूमि वाले प्रसन्न भी हो जाते हैं तो अन्य न जाने कितने उपयुक्ततावादी होकर उसके मिथ्या प्रचार के विरोधी बन जायेंगे।

दुर्भाव, स्वार्थभाव तथा अहंभाव- भावदोष के ही रूप माने गये हैं। जिन व्यक्तियों का हृदय दुर्भाव से दूषित रहता है, वे सबका अहित चिंतन ही किया करते हैं। वाक्पटुता व्यवहार कुशलता, दया , करुणा, प्रेम अथवा उदारता के कितने ही कृत्रिम आवरण क्यों न डाले जायें किन्तु दुर्भाव छिपाये नहीं छिप सकता । जिस प्रकार शत्रुता मुख में मिश्री मोल लेने पर भी नहीं छिप सकती उसी प्रकार दुर्भाव भी सौ आवरणों के भीतर से भी झलक जाता है। मनुष्य का मुख्य हृदय का दर्पण कहा गया है। दुर्भावना पूर्ण व्यक्ति किसी कितनी ही अनुकूलता क्यों न प्रकट करें किन्तु उसका अंतरभाव मुख के भावों से आँखों तथा मुद्राओं से प्रकट होता ही रहता है। बधिक के दाना दिखलाने, पुचकारने, प्यार करने और सहलाने खुजलाने पर भी पशु उससे सामंजस्य नहीं कर पाता किन्तु सद्भावना पूर्ण व्यक्ति के पास जाकर खड़ा हो जाता है और गर्दन ऊँची करके खुजलाने अथवा सहलाने का संकेत करने लगता है।

दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति किसी का हितैषी अथवा मित्र हो सकता है यह असंभव है। वह तो कारण अथवा अकारण रहने पर केवल दूसरों को नीचा दिखाने उनको आपत्ति में देखने, समय आने पर अहित करने में ही संतोष मानता है। किसी की उन्नति, विकास, अथवा हँसी-खुशी देखकर वह मन ही मन जलकर खाक हो जाता है। एक की दूसरे से बुराई करना, किन्हीं दो का विरोध भाव बढ़ाना गिरते हुए की टाँग खींच लेना, किसी के परिवार अथवा बच्चों को बिगाड़ना, पारस्परिक कलह को प्रोत्साहन देना आदि दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति के स्वाभाविक काम तथा कौतुक है। समाज का ऐसा कलंक और मूर्खता का पुतला यदि समाज में सहयोग तथा सुख पाना चाहे तो यह उसकी अनाधिकार चेष्टा ही होगी। उसका अधिकार तो विरोध एवं भर्त्सना ही है जो पाता है और उसे मिलना ही चाहिए। अच्छे तथा बुद्धिमान व्यक्ति संसार में किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखते, वे तो सद्भावना के धनी बनकर समाज में दूसरों की सुख देकर सुख पाना ही मनुष्यता की पहचान मानते हैं।

सब कुछ अपने तथा अपनों के लिए चाहने वाला स्वार्थी व्यक्ति समाज का चोर माना गया है। स्वार्थी भावना से दूषित व्यक्ति का संसार बस अपने तक ही सीमित रहता है। उसके गुणों, विशेषताओं संपत्तियों तथा प्रभावों का लाभ किसी दूसरे के काम न आ जाये इस बात से वह बड़ा सतर्क रहता है। यदि किसी विवशतावश उसका कुछ भी किसी के काम आ गया तो वह उसे अपना दुर्भाग्य ही मानता है। किसी भी प्रकार की आवश्यकता में काम आ जाने को वह अपनी चतुरता तथा व्यावहारिक बुद्धि की हार समझता है। स्वार्थी व्यक्ति संसार के सारे सुख साधनों पर केवल अपना ही अधिकार चाहता है। अपने स्वार्थ के समक्ष उसे किसी दूसरे का दर्द, कष्ट, पीड़ा, विपत्ति, आपत्ति कुछ भी तो नहीं नजर आते। वह “अपने जीते जग लिया” वाली कहावत का अक्षरशः समर्थक एवं प्रतिपालक होता है।

स्वार्थ भावना ही तो वह भावना है जो मनुष्य को शोषण, संचय , चोरी, ठगी तथा भ्रष्टाचार के पापों के लिए प्रेरित करती है। यह तो वह पाप है जिसके वशीभूत होकर मनुष्य अत्याचारी, आक्रमणकारी तथा अनाचारी बन जाता है।

एक ओर जहाँ स्वार्थी समाज में हर किसी से उनकी सद्भावना तथा सज्जनता का लाभ उठाकर अपना मतलब बनाता रहता है और वहीं दूसरी ओर अन्यों की आवश्यकता तथा सहायता के लिए बगली काटता रहता है। स्वार्थियों की यह कपट हाँड़ी कुछ ही समय तक चढ़ पाती है। शीघ्र ही उनका स्वरूप प्रकट हो जाता है और तब उन्हें समाज की तीव्र घृणा तथा विरोध का संताप सहन करते हुए एक बहिष्कृत सी जिंदगी बितानी पड़ती है। बुद्धिमान व्यक्ति सीमित स्वार्थ तथा असीम परमार्थ में विश्वास रखकर तदनुसार जीवन अपनाकर मनुष्यता के उन सुखों की उपलब्ध करते रहते हैं जिनके लिए स्वर्ग में देवता भी लालायित रहा करते हैं

अहंभाव तो मानो विरोधों का वटबीज ही है। जो व्यक्ति इस दोष से दूषित हो गया मानो उसके लिए विरोध ही नहीं पतन की भूमिका बनकर तैयार हो गयी। किसी का कहना न मानना, अनुशासन तथा नम्रता में अविश्वास करता, सहयोग तथा नम्रता में अविश्वास करना, सहयोग तथा पारस्परिकता को अनावश्यक मानना अहंकारी व्यक्ति के सहज दुर्गुण होते हैं। किसी की बात मानना अधिकारों को मान्यता देना अथवा समझदारी के आधार पर निर्णय लेना उसकी आत्म प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। जल्दी ही क्रुद्ध हो जाना आवेश से उद्दीप्त हो जाना उसकी वे दुर्बलताएँ है जो विरोध का विस्तार कर दिया करती हैं। जो विरोध का विस्तार कर दिया करती हैं। अपनी गलती पर अड़े रहना कसी की गलती को क्षमा न करना, समाज में आतंक एवं भय का वातावरण उत्पन्न करना उसका सहज स्वभाव होता है। असहनशील एवं अवज्ञापरक प्रवृत्तियों का अहंकारी व्यक्ति समाज में संकट माना जाता है। हो सकता है कि किसी शक्तिशाली अहंप्रधान व्यक्ति का लोग खुले तौर पर विरोध न करें, किन्तु सभी लोग उससे मन ही मन घृणा करते हुए दूर ही रहना चाहते हैं। किन्तु मिथ्याभिमानी, दंभी व्यक्ति तो चार दिन भी समाज में टिकने नहीं पात। शीघ्र ही समाज की असहयोगी भावना उस अवाँछित व्यक्ति को या तो उखाड़ फेंकती है अथवा होश में ला देती है। सत्ता , शक्ति संपत्ति, विद्या, बुद्धि होने पर भी समझदारी का तकाजा यही है कि इस दोष से बचा जाय। ऐसा करने वाले समाज में समानता तथा स्नेह का व्यवहार करते हुए पूजा एवं प्रतिष्ठा के पात्र बनकर जीवन में जिस सुख संतोष का अनुभव करते हैं उसकी तुलना में स्वर्ग का सुख भी खड़ा नहीं हो सकता।

कटु, असत्य, अश्लील तथा अनुपयुक्त बोलना भाषा दोष माना गया है। कटुवादी व्यक्ति एक साधारण बात को भी तीखा करके बोलता है। लोगों को उसकी बात चुभे इसमें उसे बड़ा मजा आता है। जहाँ मनीषियों ने कटु सत्य भाषण कितना अवाँछनीय हो सकता है यह सहज में ही समझा जा सकता है। बैन बाण-विष विशिखों से भी कष्टदायक होते हैं, तब तो ऐसे कटुवादी को समाज में सहयोग की आशा किसी प्रकार भी नहीं करनी चाहिए।

अब देखिए यदि आप विरोध से परेशान हैं तो कहीं इन दोषों में किसी दोष से आप आक्राँत तो नहीं है। और यदि ऐसा हो तो शीघ्र ही उसका परिमार्जन कर डालिए, आपका विरोध शीघ्र ही समाप्त होने लगेगा।

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