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Magazine - Year 1997 - Version 2

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गायत्री साधना के आरंभिक सोपान

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गायत्री उपासना के पाँच चरण है । सर्वजनीन, सार्वभौम उपासना में इन्हें ही प्रस्तुत किया जाता है । गायत्री उपासना के यह पाँच चरण है - (1) आत्म शोधन, (2) देवपूजन (3) जप (4) ध्यान (5) सूर्यार्घदान आदि एक मुखी उपासना के समय काम आने वाले यही वे सूत्र हैं जिनके रहस्य एवं मर्मों को यदि समझते हुए क्रियाकृत्य किये जाये तो सुनिश्चित रूप से यह सत्परिणाम सामने आयेगा जिसका उल्लेख वेद, शास्त्रों, पुराणों में किया गया है ।

सार्वभौम साधना क्षेत्र में गायत्री एकमुखी है । एकमुखी का तात्पर्य है अंतःकरण का परिष्करण के लक्ष्य पर अर्जुन के मत्स्यवेध जैसी गुरुवरण की अखण्ड निष्ठा । लक्ष्य प्राप्ति का एकमात्र यही उपाय है । इसके अवलम्बन की प्रेरणा देन वाली एकमुखी गायत्री है । इसमें जीवन लक्ष्य और उसके धारा प्रवाह की दिशा निर्धारित है ।

उच्चस्तरीय गायत्री साधना में गायत्री पंचमुखी है । कुक्षा के अनुरूप इस साधना को भी पाँच चरणों में विभाजित किया गया है । इस साधना उपक्रम में पाँच कोशों का अनावरण किया जाता है । सूक्ष्म शरीर में पाँच ऐसे रत्नकोश हैं जिसमें विभूतियों और सम्पत्तियों के विपुल भाण्डागार भरे पड़े हैं । इन पाँचों को अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश कहते हैं । यह पाँचों कोश सामान्यतया प्रसुप्त स्थिति में पड़े

रहते हैं, किन्तु इन्हें जब प्रयत्नपूर्वक जगाया जाता है तो वे कुम्भकरण की तरह अपने प्रबल पराक्रम का परिचय देते हैं । जाग्रत स्थिती में पाँच देवों के अनुग्रह से से मिलने वाली सिद्धि वर्षों------------ की तरह साधक को सामान्य से असामान्य, तुच्छ मानव से देवमानव बना देती है । कुण्डलिनी जागरण भी उच्चस्तरीय गायत्री साधना का ही एक विशिष्ट पक्ष है । इसमें भी पाँच साधना तपश्चर्याएँ की जाती हैं । कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसी साधना विज्ञान का पंचाग्नि विद्या का नाम से वर्णन है । इस प्रयोग को किस प्रकार क्रियान्वित किया जाता है इसकी चर्चा यहाँ न करके इन पंक्तियों में केवल सर्वजनीन सर्वसुलभ एक मुखी गायत्री साधना उपासना की चर्चा ही अभीष्ट है ।

इन पाँच उपचारों के सहारे सामान्य और प्राथमिक उपासना को आरम्भ किया जाता है। इसमें प्रथम है- आत्मशोधन । आत्मशोधन के लिए पाँच कृत्य किये जाते है-(1) पवित्रीकरण (2) आचमन (3) प्राणायाम (4) न्यास (5) शिखाबंधन ।

पवित्रीकरण में बायें हाथ की हथेली पर जल रखकर उसे दाहिने हाथ से ढकते और पाठ करते हैं । इसके उपरान्त जल को समस्त शरीर पर छिड़क लिया जाता है । इसमें भावना की जाती है कि इस मंत्रपूत जल के साथ विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त पवित्रता की हमारे ऊपर वर्षा हो रही है । फव्वारे या झरने के नीचे स्नान करने की तरह उस अमृत वर्षा का आनन्द लिया जा रहा है । पवित्रता शरीर के भीतर प्रविष्ट होकर चेतना के समस्त घटकों पवित्र बना रही है ।

आचमन में मंत्रपूर्वक तीन बार तीन चमची जल मुख में डाला जाता है ।इसका तात्पर्य है क्रियाशक्ति, विचारशक्ति और भावना शक्ति का परिमार्जन । इन तीनों चेतना केन्द्रों में शाँति शीतलता और सात्विकता एवं पवित्रता का समावेश है । विशेषतया जिह्वा की पवित्रता इन आचमनों द्वारा विशेष रूप से आवश्यक बताई गयी है । आहार और आचरण के संबंध में सतर्क रहने से जिह्वा में वह शक्ति उत्पन्न होती है कि पवित्र वाणी से किया गया जप ही सफल होता है । यह सिद्धांत इस आचमन प्रक्रिया के अंतर्गत समझाया गया है ।

प्राणायाम में श्वास को भीतर खीचना, भीतर रोकना, बाहर निकालना और बाहर ही रोकना यह चार क्रिया मंत्र पूर्वक की जाती है । इन चार क्रियाओं को पूरक, अंतःकुंभक, रेचक, बाह्य कुंभक कहते हैं । श्वास खींचते समय भावना की जाती है कि निखिल अंतरिक्ष में संव्याप्त वायु तत्व के साथ चेतन प्राणतत्त्व भीतर प्रवेश करता है और दिव्य शक्ति को काया के कण-कण में भर देता है । साँस रोकते समय भावना करनी चाहिए कि उस खींची हुई दिव्य प्राण शक्ति को शरीर के अवयवों, रक्तकणों और चेतन संस्थानों द्वारा सीखा और सर्वदा के लिए भीतर धारण किया जाये । साँस निकालते समय भावना रखनी चाहिए कि बहिष्कृत विकारों को बाहर न लौटने देने के लिए प्रवेश द्वार बन्द कर दिया जाये और तीन बार इस प्रकार के तीन प्राणायाम किये जाते हैं और उनमें तीनों बार उन्हीं भावनाओं की पुनरावृत्ति की जाती है ।

न्यास में बायें हाथ की हथेली पर जल रखा जाता है और दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों को इकट्ठी करके उन्हें जल में डुबाते हैं और मंत्रपूर्वक जल क्रमशः नासिका, नेत्र, भुजाओं और जंघों से लगाते हैं, शेष जल समस्त शरीर पर छिड़काव कर देते हैं । जिन इन्द्रियों पर जल स्पर्श किया जाता है उसमें पवित्रता और सतर्कता भरे जाने की भावना परिपक्व होती है ।

शिखाबंधन में शिखा स्थान का जल से स्पर्श किया जाता है । यह सद्भावना उत्कृष्टता एवं ऋतम्भरा प्रज्ञा की गायत्री माता के शरीर के सर्वोच्च शिखर पर प्राण प्रतिष्ठापना है । इसे --------किनले में लगे झण्डे का अभिवादन करना चाहिए । इसे विवेक बुद्धि का भावभरा अभिवादन भी कहा जा सकता है ।

दूसरा चरण है देवपूजन । गायत्री माता की छवि को देवत्व के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में पूजावेदी पर स्थापित करते हैं । देवता के प्रति श्रद्धांजलि प्रस्तुत की जाती है । उन्हें कुछ देते हैं, इसी अनुदान के प्रतिदान में देव-अनुग्रह प्राप्त होता है । देवता देते हैं । उन्हें वे भी प्रिय होते हैं जो देने की गरिमा स्वीकार करते हैं और उसका शुभारम्भ अपने आप से करते हैं । बीज गलने को तैयार होता है तो धरती माता उसे पोषण देकर विशालकाय वृक्ष बनने का वरदान एवं अनुदान प्रदान करती हैं । यही नीति देवताओं की भी है । वृक्ष अपने फल दूसरों को देते हैं । भेड़ भी अपनी ऊन दूसरों को देती है । नदियाँ अपना जल दूसरों को देती हैं । इसी देव प्रकृति को अपनाये जाने पर प्रसन्न होकर देवता उन्हें अधिकाधिक अनुग्रह देते चले जाते हैं । कृपणता बरतने वाले अनुदार, स्वार्थपरायणों के प्रति देवता भी निष्ठुर ही बने रहते हैं । इस तथ्य को ठीक तरह हृदयंगम करने के लिए पूजा की चौकी पर स्थापित गायत्री प्रतिमा के सम्मुख साधक को पंचोपचार के रूप में पाँच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने होते हैं । उससे यह आत्मशिक्षण मिलता है कि समर्थ देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए क्या रीति-नीति अपनानी होगी ? जीवनचर्या निर्धारण में किस स्तर की गतिविधियों का समावेश करना होगा ? पंचोपचार में पाँच वस्तुएँ प्रयुक्त होती हैं - (1) जल-शीतलता शान्ति, नम्रता एवं सज्जनता का प्रतीक है । सत्प्रयोजनों के लिए समय लगाने, श्रम बिन्दु समर्पित करने की तैयारी करनी चाहिए । पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान के निमित्त देवता को जो चार बार में चार चम्मच जल चढ़ाया जाता है, उसका तात्पर्य है - श्रम समय, मनोयोग एवं धन-साधना की चारों उपलब्धियों को यथासम्भव अधिकाधिक मात्रा में ईश्वरीय प्रयोजन के लिए समर्पित करना ।

चावल-उपार्जित अत्र, धन, वैभव का प्रतीक है । उपार्जन को शरीर, परिवार के उपयोग भर में सीमित नहीं किया जाना चाहिए वरन् उसमें देश-धर्म समाज-संस्कृति की भी भागीदारी स्वीकार करनी चाहिए । इनके लिए अपने-अपने साधनों का अंशदान नियमित रूप से किया जाना आवश्यक है । यह प्रेरणा देवता के सम्मुख अछत अर्पण करने की विधि के साथ जुड़ी हुई है ।

पुष्प अर्थात् खिलने-खिलाने हँसने-हँसाने की हल्की फुल्की जिन्दगी और सद्भावना सम्पन्न सज्जनता की सत्प्रवृत्ति । भीतर और बाहर से सर्वांग सुन्दर बने । विश्व उद्यान को शोभायमान बनाने वाला जीवन जियें । देवत्व की शोभा बढ़ाने के लिए अपनी गर्दन नुचवाने और मर्मभेदी सुई से छेदा जाना भी स्वीकार करें । प्रभु के गले का हार बनने की आकांक्षा रखें । पुष्प समर्पण के साथ इसी नीति को अपनाने की आत्मशिक्षण सन्निहित है ।

दीपक अर्थात् स्नेह से चिकनाई से भरा पूरा स्वयं जल कर दूसरों को प्रकाश देने वाला जीवन । दीपक की लौ की भाँति अंधकार अज्ञान के विरुद्ध अंतिम साँस रहने तक संघर्ष । प्रकाश अभिवर्द्धन के लिए समग्र आत्म समर्पण । स्वयं प्रकाशवान रहना और दूसरों को प्रकाश देना यही है दीप धर्म इसे अपनाकर ही कोई साधक भगवान के मंदिर में करने का, उनकी समीपता का श्रेय पाने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है । इस तथ्य को साधक ठीक तरह से समझ सके इसी निमित्त देव प्रतिमा के समीप दीपक जलाया जाता है । अगरबत्ती, धूपबत्ती और स्थापना भी प्रकारान्तर में दीपक का ही प्रयोजन पूरा करते हैं ।

चन्दन यह वृक्ष जिसका कण कण सुगंधित है और जो समीपवर्ती झाड़ झंखाड़ों को भी सुगंधित करता है । अपनी शीतलता और साँप बिच्छू जैसे विष दंश वालो तक को शाँति प्रदान करता है । चन्दन की लकड़ी काटने वाले सुगंध भरी शीतलता प्राप्त करते हैं । चन्दन की लकड़ी काटने वाले, बेचने वाले, पत्थर पर घिस घिस कर नष्ट कर देने वाले तक प्रतिशोध नहीं उपकार ही पाते हैं । नष्ट होते-होते भी चन्दन अपनी लकड़ी से भजन कराने वालों की माला, हवन सामग्री, चन्दन चूरा आदि उपयोगी सामग्री दे जाता है । हमारी शक्ति एवं सामर्थ्य का उपयोग भी इसी प्रकार होना चाहिए । यही है चन्दन समर्पण के पीछे सन्निहित प्रेरणा, जिसे अपनाकर कोई भी सच्चा ईश्वर भक्त बना रह सकता है और भक्तों को मिलने वाले अनुदानों का अधिकारी बन जाता है ।

आत्मशोधन में व्यक्तित्व पवित्र परिष्कृत बनाने का भाव है और देवपूजा के सदुद्देश्यों के लिए अधिकाधिक अनुदान देने का उत्साह उत्पन्न करने का निर्देश है । इन्हें प्रकारान्तर की चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा कह सकते हैं । ईश्वर भक्ति योगसाधना के यह दोनों ही आरंभिक चरण हैं । इसे साधना की पृष्ठभूमि कह सकते हैं । इसके उपरान्त मंत्र ध्यान आरंभ होता है । मंत्र साधना के दो भाग है - (1) जप (2) ध्यान । इन दोनों के साथ-साथ समन्वय करके चलना पड़ता है ।

जप प्रक्रिया में गायत्री महामंत्र की बार बार पुनरावृत्ति की प्रक्रिया करनी पड़ती है । जिस तथ्य पर मन को सघन करना होता है तो उसकी उच्चारण क्रिया अथवा ध्यान के माध्यम से बार बार दोहराने की आवश्यकता पड़ती है । इसी उपाय से उन तथ्यों को मन की पृष्ठभूमि पर सघन होने का अवसर मिलता है । बच्चों को प्राथमिक कक्षा में प्रायः इसी आधार पर पढ़ाई आरंभ करनी होती है । वे वर्णमाला अथवा गिनती-पहाड़े बार बार दोहराते रहते हैं । तभी उनके स्मृति पटल पर ये बातें स्थान जमा पाती हैं । संगीत शिक्षा के आरंभ से अंत तक दोहराने की प्रक्रिया चलती है । सैनिकों को भी निरन्तर अभ्यास करना पड़ता है । इष्ट के साथ एकाकार होने के लिए उस महान गरिमा के अंतःकरण पर दृढ़ता पूर्वक जमने के लिए उसका नामोच्चार बार बार करना पड़ता है । खोये हुए को भी पुकारने के लिए बार बार नाम लेना पड़ता है । भगवान राम वनवास में सीता को खोजते हुए उनका नाम जोर जोर से लेकर पुकारते थे । मनुष्यों में भी उनका लक्ष्य इष्ट स्वरूप छूट, बिछुड़ गया है । इसके बिना वह मणि हीन साँप की तरह बिलखता है । ग्रास के चंगुल में फँसे हुए गजराज को भगवान ने अनेक नाम लेकर पुकारा और बुलाया था । जप में बार बार भगवान की रट लगाई जाती है और प्यासे पपीहे की तरह प्यास प्यास पुकारा जाता है । उसी प्रकार भगवान को, इष्ट को दूरी समीप करके निकट बुलाने का आवाहन किया जाता है । चेतना पर संस्कार डालना कठिन है । कठिन और कठोर कार्यों को धीरे धीरे घिसकर, रगड़ रगड़कर ही पूरा किया जाता है । स्नान हाथ, मुँह धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कपड़े धोने जैसे काम बार बार रगड़ने से ही होते हैं । पालिश किसी भी प्रकार की हो उसमें घिसाई आवश्यक है । आरी काटने में भी घिसना पड़ता है । रस्सी को पत्थर पर बार बार रगड़ने से उस पर निशान बन जाता है । मंत्र जप में यही प्रयोजन पूरा होता है । गायत्री महामंत्र में शब्द विज्ञान के अत्यंत सूक्ष्म रहस्यों का समन्वय है । इसका गुँथन इस प्रकार किया गया है कि नियत क्रम, नियत लय, ताल के अनुसार यदि कोई पुनरावृत्ति की जाती रही तो उससे एक अदृश्य शब्द चक्र बनता है जो अभीष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ब्रह्मास्त्र का कार्य करता है । बार बार मंत्रोच्चार करने से शरीर के स्थूल और सूक्ष्म अवयवों में, चक्र उपत्यिकाओं में विशिष्ट हलचलें उत्पन्न होती हैं और उससे कई महत्वपूर्ण शक्तियाँ, क्षमताएँ जागृत होने लगती हैं । जप विज्ञान के पीछे ऐसे अनेक कारण हैं जिससे उस प्रयोजन में लगे हुए साधक का श्रम अन्य कार्यों में लगने की अपेक्षा प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणामों की दृष्टि कही अधिक सफल रहती है ।

जप के साथ-साथ ध्यान भी आवश्यक है क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए जप किया जा रहा है उसमें जीभ ही नहीं, मन की एकाग्रता भी नियोजित होती है। जिस भी काम में जीभ और मन दोनों का समन्वय होता है, उसमें सफलता की संभावना अधिक बढ़ जाती है। मात्र जप करते रहा जाये और मन खाली रहे तो वह इधर उधर भागता रहता है। फलतः उपासना साधना में न तो रस मिलेगा और न सफलता का सुयोग बनेगा। सामान्यता मन का चिंतन बहुमुखी है और भौतिकता का ही तान बान बुनता रहता है। अंतःक्षेत्र की दिव्य विभूतियों को समझना और उन्हें प्राप्त करने का उपाय खोजना ध्यान साधना से ही संभव हो सकता है।

मनःशक्ति प्रचण्ड है । बिखराव में वह नष्ट होती रहती है । यदि ध्यान द्वारा उसे एक केन्द्र पर इकट्ठा कर लिया जाये तो उसका प्रभाव परिणाम चमत्कारी होता है । जिस प्रकार सूर्य किरणों उत्तल लेंस पर फोकस कर लिया जाता है तो उससे आग लगने लगती है । भाप को एक केन्द्र पर केन्द्रित कर लिया जाता है तो रेल इंजन हजारों टन माल लेकर द्रुतगति से दौड़ने लगता है । बारूद को बन्दूक में भर कर चलाते हैं तो वह निशाने को भेदता हुआ चला जाता है । ठीक उसी प्रकार मन की शक्ति को ध्यान द्वारा एकाग्र करके भौतिक अथवा आध्यात्मिक प्रयोजनों में लगाने से आशाजनक सफलताओं के नये नये आधार बन जाते हैं । सर्वजनीन सार्वभौमिक गायत्री उपासना का अंतिम चरण है - सूर्यार्घदान । इस प्रक्रिया में पूजा के समय जल पात्र के प्रतिष्ठित छोटे से पवित्र जल कलश को सूर्य भगवान के सम्मुख अथवा उनकी दिशा में अर्घ्य किया जाता है । यह जप रूपी यज्ञ की पूर्णाहुति है इसे श्रद्धांजलि, जलांजलि कह सकते हैं । जल चढ़ाते समय यह भाव रहना चाहिए कि सूर्य परब्रह्म परमात्मा की प्रतिमा है और कलश अपने अस्तित्व का प्रतिनिधि है । कलश में भरा हुआ जल जीवन सम्पदा माना जाये तो सविता देवता के विराट ब्रह्म के चरणों में समर्पित किया जाये । समर्पित करते समय यह भावना उभरनी चाहिए कि हमें अपना अस्तित्व वैभव विशाल विश्व के लिए, लोक कल्याण के लिए अर्पण करके सच्चे अर्थों में सार्थक बनना है । समर्पित जल ऊष्मा की सविता भाप बनकर आकाश में बिखर जाता है और वातावरण में शीतलता उत्पन्न करके सीमित से असीम बनता है । यही आत्म शिक्षण सूर्यार्घदान प्रक्रिया के साथ जुड़ा हुआ है गायत्री उपासना की इस प्रारम्भिक कक्षा को भली भाँति हृदयंगम करने के उपरान्त ही उच्चस्तरीय साधना बन पाती है ।

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